प्रतापगढ़ का परिवहन व संचार इतिहास: मुगल सरायों, अवध के सर्वाधिक ऊंटों, 1898 की रेलवे और डाकियों का प्रामाणिक सफर
आज जब हम प्रतापगढ़ से प्रयागराज, अयोध्या या लखनऊ फोर-लेन हाईवे पर फर्राटा भरते हैं या ट्रेन में बैठकर कुछ घंटों में दिल्ली पहुंच जाते हैं, तो क्या कभी सोचा है कि 100-150 साल पहले हमारे पुरखे कैसे सफर करते थे? 17वीं सदी में जब पक्की सड़कें नहीं थीं, तब मुसाफिर घने पेड़ों की छांव वाले कच्चे रास्तों और रात में 'सरायों' (Sarais) की सुरक्षित चारदीवारी में ठहरते थे।
क्या आप जानते हैं कि 1904 में पूरे अवध प्रांत में सबसे अधिक ऊंट प्रतापगढ़ जिले में थे और 20-20 ऊंटों का कारवां मंडियों में गल्ला ढोता था? 1980 के आधिकारिक गजेटियर (अध्याय 7) के पन्नों में दर्ज यह प्रामाणिक दास्तान हमें 1857 के बाद सड़कों के निर्माण, 1864 में 5 रुपये वेतन वाले पोस्टमास्टरों, 1898 की रेलवे क्रांति, 1948 की रोडवेज और 1969 में शुरू होकर बंद हुई अनोखी 'सिटी बस सेवा' के अनछुए इतिहास से रूबरू कराती है।
🚩 1. प्राचीन और मध्यकालीन मार्ग: शाही राजमार्ग और मुसाफिरों की 'सराय'
प्रतापगढ़ का इलाका प्राचीन काल से ही उत्तर भारत के प्रमुख धार्मिक और व्यापारिक केंद्रों (अयोध्या, काशी, कौशाम्बी और प्रयाग) के बीच एक रणनीतिक संगम रहा है। लेकिन 17वीं सदी की शुरुआत तक यहां आज की तरह कोई पक्की डामर या गिट्टी वाली सड़कें नहीं थीं।
मुगल काल का शाही राजमार्ग (Imperial Highway)
इतिहासकार डब्ल्यू. एच. मोरलैंड के संदर्भ से गजेटियर बताता है कि 16वीं और 17वीं सदी में मुख्य आवागमन मार्गों की पहचान सड़कों के दोनों ओर लगे छायादार वृक्षों की कतारों से होती थी:
- दिल्ली से इलाहाबाद का शाही मार्ग: उत्तर भारत का सबसे मशहूर प्राचीन राजमार्ग दिल्ली से चलकर अवध होते हुए इलाहाबाद (प्रयाग) जाता था। गजेटियर के अनुसार यह प्राचीन मार्ग आज के रायबरेली — मानिकपुर — इलाहाबाद सड़क के रूप में स्थित है।
- पहियों वाले वाहनों के अनुकूल: यह रास्ता इतना चौड़ा और सुगम था कि इस पर बैलगाड़ियां, रथ और भारी मालवाहक गाड़ियां आसानी से चल सकती थीं।
'सरायों' (Sarais) का सुरक्षा घेरा
उस दौर में सड़कें सुनसान जंगलों और बीहड़ों से होकर गुजरती थीं, जहां डाकुओं और ठगों का भारी भय रहता था। ऐसे में राहगीरों और व्यापारियों की सुरक्षा के लिए निश्चित दूरी पर 'सराय' (Sarais) बनाई जाती थीं:
- ये सराय ऊंची और मजबूत पक्की चारदीवारी से घिरी होती थीं, जिनका बड़ा मुख्य दरवाजा शाम होते ही बंद कर दिया जाता था।
- सराय के अंदर मुसाफिरों के ठहरने के लिए कोठरियां, पीने के पानी के पक्के कुएं और घोड़ों-बैलों को बांधने के लिए अस्तबल होते थे। व्यापारी रात भर यहां सुरक्षित रहकर सुबह अपनी यात्रा दोबारा शुरू करते थे। सराय नाहर राय और सराय देवराय जैसे नाम आज भी उसी दौर की याद दिलाते हैं।
🛣️ 2. सड़कों का आधुनिक विकास: 1857 की क्रांति के बाद पक्की सड़कों का जाल
1856 में अवध के विलय और 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों ने महसूस किया कि सेना की त्वरित आवाजाही और प्रशासनिक नियंत्रण के लिए सड़कों का निर्माण अत्यंत आवश्यक है।
1870 तक 547 किमी सड़कों का निर्माण
1857 के तुरंत बाद अंग्रेजी हुकूमत ने जिला अधिकारियों को तेजी से सड़कें खोलने का आदेश दिया। नतीजतन 1870 तक जिले में 342 मील (547.2 किमी) सड़कें तैयार हो चुकी थीं:
- 63 मील (100.8 किमी) पक्की सड़कें: प्रतापगढ़ मुख्यालय को इलाहाबाद, फैजाबाद, रायबरेली, अकबरपुर, गौरीगंज, कटरा गुलाब सिंह, रानीगंज और कालाकांकर से आलापुर तक पक्की सड़कों से जोड़ा गया।
- उत्तर-दक्षिण मुख्य धुरी: जिले की सबसे प्रमुख जीवनरेखा इलाहाबाद-फैजाबाद मार्ग थी, जो जिले को दक्षिण से उत्तर की ओर 23 मील (36.8 किमी) की लंबाई में पार करती थी।
- लखनऊ-वाराणसी डायगोनल मार्ग: 1904 से 1914 के बीच रायबरेली से जिले के मध्य भाग से गुजरते हुए जौनपुर के बादशाहपुर तक जाने वाली सड़क को पक्का किया गया, जो आज का प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्ग बना।
आजादी के बाद सड़क क्रांति (1947 से 1966)
1947 में जब देश आजाद हुआ, तब प्रतापगढ़ में केवल 264 किमी पक्की सड़कें थीं। 1966 तक यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 400 किमी पहुंच गया। आजादी के बाद के पहले दो दशकों में लोक निर्माण विभाग (PWD) ने 13 नई पक्की सड़कें (कुल 136 किमी) बनाईं:
| सड़क का नाम (Road Name) | जिले में लंबाई (किमी) | सड़क का प्रकार व महत्व |
|---|---|---|
| इलाहाबाद — उन्नाव मार्ग | 40.00 | अंतरजनपदीय प्रमुख राजमार्ग (कुंडा तहसील होकर) |
| जेठवारा — लालगोपालगंज मार्ग | 33.90 | ग्रामीण व्यापारिक धुरी |
| चांदा — पट्टी मार्ग | 32.00 | सुलतानपुर सीमा से पट्टी तहसील मुख्यालय लिंक |
| जौनपुर — प्रतापगढ़ मार्ग | 26.30 | पूर्वांचल व्यापार संपर्क मार्ग |
| घुटनी — मानिकपुर रेलवे फीडर रोड | 9.60 | गंगा घाट व मानिकपुर स्टेशन संपर्क |
| चिलबिला रेलवे स्टेशन फीडर रोड | 2.40 | चिलबिला जंक्शन पहुंच मार्ग |
| कोहंड़ौर रेलवे स्टेशन फीडर रोड | 0.52 | स्टेशन लिंक मार्ग |
| विश्वनाथगंज रेलवे फीडर रोड | 0.44 | स्टेशन व बाजार लिंक |
| प्रतापगढ़ रेलवे स्टेशन फीडर रोड | 0.39 | मुख्य स्टेशन पहुंच मार्ग |
| प्रतापगढ़ रेलवे गुड्स शेड फीडर | 0.27 | माल गोदाम पहुंच मार्ग |
| गौरा रेलवे स्टेशन फीडर रोड | 0.16 | गौरा स्टेशन लिंक |
| दांदूपुर रेलवे स्टेशन फीडर रोड | 0.16 | स्टेशन लिंक मार्ग |
| रेलवे समपार (Level Crossing No. 8) रोड | 0.43 | रेलवे क्रॉसिंग पहुंच मार्ग |
*स्त्रोत: जिला गजेटियर प्रतापगढ़ (1980), पृष्ठ 155। चौथी पंचवर्षीय योजना में 127.95 किमी नई पक्की सड़कों का लक्ष्य रखा गया था, जिसमें से अप्रैल 1973 तक 76.05 किमी का निर्माण पूरा हो गया था।
🐪 3. आवागमन के पारंपरिक साधन: अवध में सर्वाधिक ऊंट और 'बहंगी' का दौर
मोटर गाड़ियों और पक्की सड़कों से पहले प्रतापगढ़ की जीवनशैली पूरी तरह पशु शक्ति और इंसानी श्रम पर आधारित थी। हाथी, घोड़े, टट्टू, गधे, खच्चर और बैलगाड़ियां आम साधन थे।
1904: पूरे अवध प्रांत में सर्वाधिक 1,038 ऊंट!
आमतौर पर ऊंट को राजस्थान या रेगिस्तान का जीव माना जाता है, लेकिन गजेटियर का यह आधिकारिक आंकड़ा हर किसी को हैरान कर देता है:
- 1904 की पशु गणना: जिले में 2,54,658 बैल, 14,496 भैंसे, 11,873 टट्टू, 2,509 गधे और 1,038 ऊंट (Camels) दर्ज थे।
- अवध में नंबर एक: गजेटियर स्पष्ट लिखता है—"In 1904 in no other district of Avadh, there were so many camels." (1904 में पूरे अवध के किसी भी जिले में इतने ऊंट नहीं थे!)। 1899 में 600 ऊंट थे, जिनमें 5 सालों में 438 नए ऊंट जुड़े।
- बैलगाड़ी से ज्यादा ऊंट पसंद: प्रतापगढ़ के किसान और आढ़ती बैलगाड़ी की तुलना में ऊंट को प्राथमिकता देते थे। 20 या उससे ज्यादा ऊंटों का कारवां अपनी पीठ पर माल लादकर थोक गल्ला मंडियों की ओर बढ़ता दिखाई देता था। एक ऊंट 2 क्विंटल माल लादकर भीषण गर्मी में बिना पानी पिए लंबी दूरी तय कर लेता था।
बहंगी (Behangi), इक्के-तांगे और बैलगाड़ी
ग्रामीण इलाकों में स्थानीय स्तर पर सामान और मुसाफिरों की ढुलाई के लिए निम्नलिखित साधन प्रचलित थे:
- पारंपरिक 'बहंगी': किसान लगभग 1.6 मीटर लंबे मजबूत बांस की कमानी (बहंगी) के दोनों सिरों पर टोकरियां या छीके बांधकर कंधे पर संतुलित करके सब्जियां, फल और अनाज ढोते थे।
- इक्के और तांगे: शहरों और कस्बों में घोड़े व टट्टू से खींचे जाने वाले इक्के चलते थे। 25 किमी से अधिक दूरी के सफर के लिए सड़कों पर 'डाक-चौकी रिले' बनी होती थीं, जहां थके हुए घोड़ों को आराम देकर ताजा दम घोड़े जोते जाते थे। 1908 तक डिस्ट्रिक्ट बोर्ड घोड़ों की नस्ल सुधारने के लिए स्टैलियन (Stallion) भी रखता था।
- 1920 के दशक में साइकिल क्रांति: 1920 के आसपास पहली बार साइकिल आई। 1971 में नगरपालिका में 1,134 और 1972 में 2,000 साइकिलें पंजीकृत थीं। उस समय तक तांगे पूरी तरह गायब हो चुके थे, लेकिन 1972 में भी 627 इक्के और 200 मालवाहक बैलगाड़ियां पंजीकृत थीं।
🚌 4. मोटर गाड़ियां और रोडवेज: 1948 से 'रोडवेज बस' और दो महीने की 'सिटी बस'
1920 के दशक के अंतिम वर्षों में प्रतापगढ़ की सड़कों पर पहली बार मोटर बसें और ट्रक दौड़े। शुरुआत में इलाहाबाद-प्रतापगढ़, प्रतापगढ़-जौनपुर और प्रतापगढ़-रायबरेली मार्गों पर कुछ निजी बसें चलने लगीं।
ताल्लुकदारों का मोटर कार प्रेम
जिले के रईस ताल्लुकदार जो पहले अरबी और सिंधी नस्ल के घोड़ों के शौकीन थे, वे अब मोटर कारों की ओर आकर्षित हुए। प्रतापगढ़-कालाकांकर और प्रतापगढ़-इलाहाबाद मार्ग पर ताल्लुकदारों की निजी विंटेज कारें शान से दौड़ती थीं।
1948 में रोडवेज की शुरुआत और 1972 में UPSRTC का गठन
1948 में 'यूपी गवर्नमेंट रोडवेज' ने जिले में अपनी सरकारी बस सेवाएं शुरू कीं। 1 जून 1972 को इसका पुनर्गठन होकर 'उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम' (UPSRTC) बना:
- 1972 का परिवहन पैमाना: निगम की 34 बसें 18 मार्गों पर प्रतिदिन कुल 2,092 किमी की दूरी तय करती थीं।
- 18.5 लाख यात्री: 1972 में अकेले रोडवेज बसों से 18,49,668 यात्रियों ने सफर किया।
- 1973 में जिले के पंजीकृत वाहन: 336 मोटरसाइकिलें, 60 जीपें, 15 टैक्सियां, 5 मोटर कारें, 96 ट्रक और 144 ट्रैक्टर।
- 14 सीटर मिनी बसें: प्रतापगढ़-इलाहाबाद मार्ग पर 5 मिनी बसें चलती थीं, जिनका किराया मात्र 3 रुपये प्रति सवारी था!
| बस मार्ग (UPSRTC Route) | बसों की संख्या | मार्ग की लंबाई (किमी) | प्रमुख ठहराव व संपर्क |
|---|---|---|---|
| प्रतापगढ़ — ऊंचाहार — कानपुर | 2 | 214 | औद्योगिक महानगर कानपुर सीधा लिंक |
| टांडा — प्रतापगढ़ — इलाहाबाद | 1 | 201 | घाघरा कछार से गंगा संगम संपर्क |
| अयोध्या — प्रतापगढ़ — इलाहाबाद | 2 | 175 | धार्मिक सर्किट (राम जन्मभूमि से प्रयाग) |
| प्रतापगढ़ — आजमगढ़ | 1 | 164 | पूर्वांचल सीधा संपर्क |
| जौनपुर — प्रतापगढ़ — इलाहाबाद | 5 | 163 | सर्वाधिक व्यस्त त्रिकोणीय रूट |
| प्रतापगढ़ — वाराणसी | 1 | 160 | काशी विश्वनाथ धाम लिंक |
| कालाकांकर — इलाहाबाद | 2 | 136 | गंगा तटीय क्षेत्र सेवा |
| प्रतापगढ़ — लालगंज — इलाहाबाद | 2 | 132 | लालगंज तहसील मुख्य धुरी |
| रामगंज — इलाहाबाद | 2 | 116 | ग्रामीण अंचल संपर्क |
| प्रतापगढ़ — बादशाहपुर — जौनपुर | 4 | 101 | व्यापारिक रूट |
| बाबूगंज — इलाहाबाद | 1 | 98 | सदर ग्रामीण लिंक |
| सुलतानपुर — ढकावा — जौनपुर | 3 | 94 | सीमावर्ती संपर्क |
| देवरघाट — प्रतापगढ़ | 1 | 82 | दूरदराज कछारी रूट |
| कालाकांकर — कुंडा — प्रतापगढ़ | 4 | 79 | कुंडा तहसील मुख्यालय लिंक |
| पूरेधनऊ — कुंडा — प्रतापगढ़ | 1 | 65 | ग्रामीण सेवा |
| धरमपुर — प्रतापगढ़ | 1 | 48 | लोकल रूट |
| धुरसमथ — प्रतापगढ़ | 1 | 43 | कस्बा लिंक |
| मानधाता देवी — प्रतापगढ़ | 1 | 26 | धार्मिक स्थल मानधाता लिंक |
1969: बेला प्रतापगढ़ की 'सिटी बस' जो दो महीने में बंद हो गई!
गजेटियर में एक बहुत ही दिलचस्प वाकया दर्ज है: साल 1969 में बेला प्रतापगढ़ शहर के भीतर पहली बार 'सिटी बस सेवा' (City Bus Service) शुरू की गई थी। लेकिन शहरवासियों को पैदल चलने, साइकिल चलाने और इक्के की इतनी आदत थी कि बहुत कम लोग बस में बैठते थे।
दो महीने के भीतर ही निगम को समझ आ गया कि पेट्रोल और ड्राइवर-कंडक्टर का खर्च भी टिकट से नहीं निकल रहा है। घाटे के कारण इस ऐतिहासिक सिटी बस सेवा को मात्र दो महीने (60 दिन) में ही हमेशा के लिए बंद कर दिया गया!
⛵ 5. नदियों के नौका घाट (Ferries): गंगा, सई और गोमती के 9 सरकारी घाट
पक्के पुलों के बनने से पहले नदियों को पार करने का एकमात्र जरिया मल्लाहों की लकड़ी की बड़ी नावें और नौका घाट (Ferries) हुआ करते थे।
जिला परिषद के 9 प्रमुख नौका घाट
गजेटियर के अनुसार जिले में गंगा, गोमती, सई और चम्रौरा नाले पर कुल 9 सरकारी नौका घाट संचालित थे:
- तहसील अनुसार वितरण: सर्वाधिक नौका घाट कुंडा तहसील में गंगा नदी के तट पर स्थित थे। इसके अलावा प्रतापगढ़ सदर और पट्टी तहसील में 2-2 नौका घाट थे।
- प्रबंधन व आमदनी: इन सभी घाटों का प्रबंधन जिला परिषद प्रतापगढ़ द्वारा किया जाता था। घाटों पर यात्रियों और मवेशियों को पार कराने के लिए ठेके दिए जाते थे, जिससे 1971 में जिला परिषद को 67,920 रुपये की वार्षिक आय प्राप्त हुई थी।
- इन घाटों पर लकड़ी के बड़े बेड़े (नावें) होते थे जिन पर एक साथ दर्जनों मुसाफिर, अनाज की बोरियां और यहां तक कि बैलगाड़ियां भी लादकर नदी के उस पार उतारी जाती थीं।
🚆 6. रेलवे क्रांति: 1898 की पहली ट्रेन, 200 किमी ट्रैक और 18 ऐतिहासिक स्टेशन
अंग्रेजों के अवध पर कब्जे के बाद कई दशकों तक प्रतापगढ़ में रेल का कोई नामोनिशान नहीं था। मुसाफिरों को ट्रेन पकड़ने के लिए बैलगाड़ी से गंगा पार करके इलाहाबाद जिले में ईस्ट इंडियन रेलवे के स्टेशनों तक जाना पड़ता था।
1898 में अवध-रुहेलखंड रेलवे का आगमन
1898 में जब अवध-रुहेलखंड रेलवे (Oudh and Rohilkhand Railway) की मुख्य लाइन बेला प्रतापगढ़ से होकर गुजरी, तो जिले की किस्मत बदल गई। अनाज का निर्यात रातों-रात दोगुना हो गया और बेला जंक्शन पूरे इलाके का मुख्य व्यापारिक केंद्र बन गया।
जिले के 3 प्रमुख रेल मार्ग और 18 रेलवे स्टेशन (200 किमी नेटवर्क)
गजेटियर काल तक जिले में लगभग 200 किमी लंबा रेलवे ट्रैक बिछ चुका था, जो उत्तर रेलवे (Northern Railway) के लखनऊ मंडल के अधीन संचालित था:
| रेल मार्ग (Railway Line) | जिले के अंतर्गत आने वाले सभी रेलवे स्टेशन | महत्व व विशेषताएं |
|---|---|---|
| 1. लखनऊ — वाराणसी मुख्य लाइन | अंतू (Antu), जगेसरगंज (Jagesharganj), चिलबिला (Chilbila), प्रतापगढ़ जंक्शन (Pratapgarh), पृथ्वीगंज (Pirthiganj), दांदूपुर (Dandupur / माँ वराही देवी धाम), गौरा (Gaura), सुरवां सा (Surwansa) | जिले की सबसे पुरानी और मुख्य रेल धुरी; पूर्व से पश्चिम आवागमन का प्रमुख आधार। |
| 2. फैजाबाद — इलाहाबाद लाइन | कोहंड़ौर (Kohndaur), चिलबिला (Chilbila), प्रतापगढ़ जंक्शन (Pratapgarh), भूपिया मऊ (Bhupiamau), विश्वनाथगंज (Bishnathganj / शनि देव धाम) | उत्तर से दक्षिण की ओर अवध की राजधानी अयोध्या को संगम नगरी प्रयाग से जोड़ने वाली पवित्र रेल लाइन। |
| 3. इलाहाबाद — रायबरेली लाइन (कुंडा क्षेत्र) | ऊंचाहार (Unchahar - सीमावर्ती), परियावां कालाकांकर (Pariyawan), गढ़ी मानिकपुर (Garhimanikpur), हरनामगंज (Harnamganj / कुंडा हरनामगंज), भदरी (Bhadari) | गंगा के समानांतर चलने वाली पश्चिमी लाइन, जिससे कुंडा, मानिकपुर और कालाकांकर का पूरा इलाका जुड़ा। |
✉️ 7. डाक व्यवस्था का इतिहास: हरकारों के थैले से चार्ल्स करी की 1864 डाक योजना
आज जब ईमेल और व्हाट्सएप पर एक सेकंड में संदेश पहुंच जाता है, तब 1856 में प्रतापगढ़ में चिट्ठी पहुंचाना किसी दुर्गम तपस्या से कम नहीं था!
1856: हरकारों और ग्राम चौकीदारों की व्यवस्था
1856 में अवध विलय के समय कोई संगठित डाक विभाग नहीं था:
- डाक व्यवस्था सीधे जिला मजिस्ट्रेट (District Officer) के अधीन थी। पूरे जिले में केवल जिला मुख्यालय पर एक डाकघर था।
- पैदल दौड़ने वाले डाकिये जिन्हें 'हरकारा' (Runners) कहा जाता था, वे घुंघरू बंधी लाठी लेकर मुख्यालय से डाक के थैले पुलिस थानों तक पहुंचाते थे।
- थानों के पुलिसकर्मी उन चिट्ठियों को गांव के चौकीदारों को सौंपते थे, और चौकीदार अपने-अपने गांवों में जाकर लोगों को चिट्ठियां बांटते थे! यह व्यवस्था इतनी धीमी और लचर थी कि चिट्ठियां महीनों तक अटकी रहती थीं।
1864: चार्ल्स करी की ऐतिहासिक डाक योजना (11 डाक सर्किल)
इस बदहाली को दूर करने के लिए 1864 में मिस्टर चार्ल्स करी (Mr. Charles Currie) ने जिले के पहले नियमित बंदोबस्त (First Regular Settlement) के समय एक क्रांतिकारी डाक योजना लागू की:
- 11 डाक सर्किल: पूरे जिले को 11 डाक सर्किलों में बांटा गया। प्रत्येक डाकघर का एक पोस्टमास्टर बनाया गया, जिसका वेतन 5 रुपये प्रति महीना तय हुआ!
- अक्सर स्थानीय स्कूल मास्टर या छोटे सरकारी कर्मचारी ही अपने मूल काम के साथ-साथ डाक बांटने का जिम्मा संभालते थे।
- डाक सेस (Dak Cess): डाक व्यवस्था का पूरा खर्च चलाने के लिए किसानों के भू-राजस्व (लगान) पर 0.25% (एक चौथाई प्रतिशत) का 'डाक उपकर' (Dak Cess) लगाया गया।
| तहसील (Tahsil) | 1864 में स्थापित मूल डाकघर (Postal Circles) | डाक संचालन व्यवस्था |
|---|---|---|
| प्रतापगढ़ (सदर) | प्रतापगढ़ (मुख्यालय), बरेनी (Bareni), सराय नाहर (Sarai Nahar), रायगढ़ (Raigarh), अठेहा (Ateha) | 5 डाक सर्किल; सराय नाहर व अठेहा दूरदराज के सीमांत केंद्र थे। |
| कुंडा | मानिकपुर (Manikpur), बिहार (Bihar), राजापुर (Rajapur), लालगंज (Lalganj) | 4 डाक सर्किल; गंगा तटीय तीर्थ व व्यापारिक कस्बों को जोड़ा। |
| पट्टी | पट्टी (Patti), रानीगंज (Raniganj), हनुमानगंज (Hanumanganj) | 3 डाक सर्किल; पट्टी तहसील व पूर्वी गल्ला मंडियों की डाक संभालते थे। |
1881 की 'मेल कार्ट' (घोड़ा गाड़ी डाक) और एक्स्ट्रा डिपार्टमेंटल एजेंट
1872 में जिला डाक व्यवस्था को 'इंपीरियल पोस्ट' (केंद्रीय डाक) में मिला दिया गया:
- 1881 की मेल कार्ट (Mail-carts): चिट्ठियों के भारी थैलों को लाने-ले जाने के लिए घोड़ों से खींची जाने वाली 'मेल कार्ट' शुरू की गई। 1896 में जब रेलवे ने डाक ढोना शुरू किया, तब यह घोड़ा-गाड़ी डाक बंद हुई।
- एक्स्ट्रा डिपार्टमेंटल (ED) एजेंट: देहातों में शाखा डाकघर खोलने के लिए गैर-सरकारी एजेंट रखे जाते थे, जिन्हें 3 से 5 रुपये मासिक मानदेय मिलता था। वे अपने ही घरों में डाकघर चलाते थे और सरकार उन्हें कोई मकान किराया नहीं देती थी!
- गजेटियर काल (1973) तक बेला प्रतापगढ़ में डाक अधीक्षक (Divisional Superintendent of Post Offices) का मंडल कार्यालय स्थापित हो चुका था।
📻 8. रेडियो, जनसंचार और ऐतिहासिक डाक बंगले व नहर कोठियां
आजादी के बाद दूरदराज के गांवों में देश-दुनिया की खबरें और कृषि सलाह पहुंचाने में रेडियो सबसे शक्तिशाली माध्यम बना।
रेडियो लाइसेंस और आकाशवाणी का प्रभाव
आकाशवाणी (All India Radio) के विभिन्न केंद्रों से किसानों के लिए उन्नत खेती, मजदूरों के अधिकार और छात्रों के लिए शैक्षिक कार्यक्रम प्रसारित होते थे। उस समय रेडियो रखने के लिए डाकघर से बाकायदा सरकारी लाइसेंस लेना अनिवार्य होता था:
- 1969: जिले में मात्र 364 रेडियो लाइसेंस थे।
- 1970: संख्या बढ़कर 527 हुई।
- 1971: छलांग लगाकर 1,323 रेडियो लाइसेंस हुए।
- 1972: जिले में कुल 1,381 पंजीकृत रेडियो सेट काम कर रहे थे। शाम को चौपालों पर एक रेडियो के इर्द-गिर्द पूरा गांव बैठकर समाचार सुनता था।
जिले के ऐतिहासिक डाक बंगले, निरीक्षण भवन और नहर कोठियां
गजेटियर के अंत में जिले भर में बने सरकारी डाक बंगलों और नहर कोठियों की प्रामाणिक सूची दी गई है, जहां प्रशासनिक अधिकारी और यात्री विश्राम करते थे:
- लोक निर्माण विभाग (PWD) डाक बंगले: बेला प्रतापगढ़ (सिविल लाइंस), लालगंज (लखनऊ-वाराणसी मार्ग पर), कुंडा कस्बा और पट्टी कस्बा।
- कुंडा तहसील की नहर कोठियां (Canal Kothis): रामपुर तिहाई, पंगा, परियावां, मुबारकपुर, बड़गवां, जहानाबाद, पिंगरी और कस्तूरीपुर।
- पट्टी तहसील की नहर कोठियां: चौमरी कैनाल बंगला, रामगंज कैनाल कोठी, दोहरी, परहरिया कलां और मुन्नामधरगंज।
- सदर तहसील: बेला प्रतापगढ़ कैनाल इंस्पेक्शन हाउस, सरैयापुर कैनाल कोठी, और सैनिकों के लिए 'डिस्ट्रिक्ट सोल्जर्स, सेलर्स एंड एयरमेन्स बोर्ड रेस्ट हाउस' (प्रतापगढ़)।
- वन विभाग: लालगंज इंस्पेक्शन हाउस।
- धर्मशालाएं: तीर्थयात्रियों के लिए कुंडा में गंगा स्नान हेतु निजी धर्मशालाएं तथा प्रतापगढ़ और पट्टी में सस्ती मुसाफिर धर्मशालाएं संचालित थीं।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (प्रतापगढ़ परिवहन व संचार FAQs)
1980 के सरकारी गजेटियर का यह सातवां अध्याय हमें यह सिखाता है कि आज हम जिस तीव्र गति के युग में जी रहे हैं, उसकी नींव हमारे पुरखों के अथक परिश्रम, नदियों पर नौका घाटों के संघर्ष, हरकारों की पैदल दौड़ और 1898 की रेलवे क्रांति पर टिकी है।
अवध में सर्वाधिक ऊंटों के कारवां से लेकर 1948 की पहली रोडवेज बस और 1864 की 11 डाक सर्किलों का यह गौरवशाली सफर यह सिद्ध करता है कि संसाधनों की कमी के बावजूद प्रतापगढ़ की माटी ने कभी अपनी रफ्तार को थमने नहीं दिया। अपनी इस ऐतिहासिक विकास यात्रा को जानना हर प्रतापगढ़वासी के लिए आत्मसम्मान का विषय है।
यह आलेख उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 1980 में प्रकाशित आधिकारिक 'Uttar Pradesh District Gazetteers: Pratapgarh' के Chapter VII - 'Communications' (पृष्ठ 154 से 166) में दर्ज प्रामाणिक लोक निर्माण विभाग (PWD) रिपोर्ट, 1904 पशुगणना, 1972 UPSRTC रोडवेज आंकड़ों, उत्तरी रेलवे रिकॉर्ड, 1864 चार्ल्स करी डाक बंदोबस्त और ऐतिहासिक डाक बंगलों की आधिकारिक सूची पर आधारित है।