जगद्गुरू कृपालु जी महाराज जिनका पूरा नाम रामकृपालु त्रिपाठी था का जन्म अक्टूबर 1922 को इलाहाबाद उन्होंने हिन्दी और संस्कृति की शिक्षा ग्रामिण विधालय से प्राप्त की। संस्कृत और आयुर्वेद की उच्च शिक्षा इन्होंने इन्दौर और वाराणसी से प्राप्त की। लगभग एक वर्ष का समय इन्होंने चित्रकूट में भी गुजारा। 16 साल की उम्र में अपनी बुनियादी शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् उन्होंने वृंदावन को प्रस्थान किया और अगले ही साल वो गुरू के रूप में श्री महाराज जी के रूप में सम्बोधित हुए। 17 साल की उम्र में 6 महीनों तक लगातार उन्होंने महामंत्र का जाप करना शुरू कर दिया।
1955 में कृपालु जी ने एक बहुत बड़ा धार्मिक सम्मेलन का आयोजन किया जिसमें भारत वर्ष के बाहुत सारे धार्मिक लोगों ने भाग लिया। काशी विधा परिषद के महामहोपाध्याय श्री गिरिधर शर्मा भी इस सम्मेलन में प्रस्तुत थे। कृपालू जी की आध्यात्मिक ज्ञान से वो बड़े प्रभावित हुए। उन्होंने कृपालु जी को 1957 में काशी विधा परिषद में प्रवचन देने के लिए आमंत्रित किया। यहाँ पर इन्होंने 7 दिनों तक भाषण दिया। इसके बाद वो पांचवें जगद् गुरू के रूप में चर्चित हुए। 14 जनवरी 1957 को मात्र 34 साल की उम्र में ही उन्हें काशी विधा परिषद द्वारा जगद्गुरू की उपाधि प्रदान की गई। मनगढ़ का भव्य मंदिर कृपालु जी महाराज के देख रेख में निर्मित हुआ जहाँ राधा एवं कृष्ण के साथ वे स्वयं विभिन्न मुद्राओं में विराजमान है। देश-विदेश से लोग इस मंदिर के दर्शन हेतू पधारते हैं।
उन्होंने जगद्गुरु कृपालु परिषद् के नाम से विख्यात एक वैश्विक हिन्दू संगठन का गठन किया था। जिसके इस समय 5 मुख्य आश्रम पूरे विश्व में स्थापित हैं। विदेशों में इनका मुख्य आध्यात्मिक केन्द्र (द हार्वर्ड प्लूरिश प्रोजेक्ट) यूएसए में है।
इनमें से चार भारत में तथा एक (द हार्वर्ड प्लूरिश प्रोजेक्ट) अमरीका में है। जेकेपी राधा माधव धाम तो सम्पूर्ण पश्चिमी गोलार्द्ध, विशेषकर उत्तरी अमेरिका में सबसे विशाल हिन्दू मन्दिर है।
14 जनवरी 1957 को मकर संक्रांति के दिन महज़ 34 वर्ष की आयु में उन्हें काशी विद्वत् परिषद् की ओर से जगद्गुरु की उपाधि से विभूषित किया गया था।
जगद्गुरु कृपालु महाराज का 15 नवम्बर, 2013 (शुक्रवार) सुबह 7 बजकर 5 मिनट पर गुड़गाँव के फोर्टिस अस्पताल में निधन हो गया।
अपनी ननिहाल मनगढ़ में जन्मे राम कृपालु त्रिपाठी ने गाँव के ही मिडिल स्कूल से 7वीं कक्षा तक की शिक्षा प्राप्त की और उसके बाद आगे की पढ़ाई के लिये महू मध्य प्रदेश चले गये। अपने ननिहाल में ही पत्नी पद्मा के साथ गृहस्थ जीवन की शुरुआत की और राधा कृष्ण की भक्ति में तल्लीन हो गये। भक्ति-योग पर आधारित उनके प्रवचन सुनने भारी संख्या में श्रद्धालु पहुँचने लगे। फिर तो उनकी ख्याति देश के अलावा विदेश तक जा पहुँची। उनके परिवार में दो बेटे घनश्याम व बालकृष्ण त्रिपाठी हैं। इसके अलावा तीन बेटियाँ भी हैं - विशाखा, श्यामा व कृष्णा त्रिपाठी। उन्होंने अपने दोनों बेटों की शादी कर दी जो इस समय दिल्ली में रहकर उनके ट्रस्ट का सारा कामकाज खुद सभालते हैं। जबकि उनकी तीनों बेटियों ने अपने पिता की राधा कृष्ण भक्ति को देखते हुए विवाह करने से मना कर दिया और कृपालु महाराज की सेवा में जुट गयीं।
भगवान कृष्ण और राधा के मन्दिर के रूप में बनवाया गया प्रेम मन्दिर कृपालु महाराज की ही अवधारणा का परिणाम है। भारत में मथुरा के समीप वृंदावन में स्थित इस मन्दिर के निर्माण में 11 वर्ष का समय और लगभग सौ करोड़ रुपए खर्च हुए थे। इटैलियन संगमरमर का प्रयोग करते हुए इसे राजस्थान और उत्तर प्रदेश के एक हजार शिल्पकारों ने तैयार किया। इस मन्दिर का शिलान्यास स्वयं कृपालुजी ने ही किया था। यह मन्दिर प्राचीन भारतीय शिल्पकला का एक उत्कृष्ट नमूना है।
मन्दिर वास्तुकला के माध्यम से दिव्य प्रेम को साकार करता है। सभी वर्ण, जाति तथा देश के लोगों के लिये हमेशा खुले रहने वाले इसके दरवाज़े सभी दिशाओं में खुलते है। मुख्य प्रवेश द्वार पर आठ मयूरों के नक्काशीदार तोरण हैं एवं सम्पूर्ण मन्दिर की बाहरी दीवारों को राधा-कृष्ण की लीलाओं से सजाया गया है। मन्दिर में कुल 94 स्तम्भ हैं जो राधा-कृष्ण की विभिन्न लीलाओं से सजाये गये हैं। अधिकांश स्तम्भों पर गोपियों की मूर्तियाँ अंकित हैं।

के निकट प्रतापगढ़ जिले के अंतर्गत स्थित कुण्डा के पास मनगढ़ नामक स्थान पर हुआ था।