धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज: भटनी गाँव से काशी तक — त्याग, तपस्या और ज्ञान की सच्ची कहानी (Swami Karpatri Ji Maharaj Biography, Har Narayan Ojha, Dharmasangh Varanasi, Ram Rajya Parishad)
हाथ की अंजुली को बर्तन बनाने वाले संन्यासी, जिनकी गजब की याददाश्त और खुली बहस ने देश की संसद से काशी तक हिला दिया
ज़रा सोचिए, क्या आज के दौर में कोई ऐसा इंसान हो सकता है जिसने अपनी पूरी जिंदगी में कभी किसी थाली, कटोरी या गिलास का इस्तेमाल ही न किया हो? न तांबा, न पीतल, न मिट्टी — पानी पीना हो या दो मुट्ठी खाना खाना हो, केवल अपने दोनों हाथों की अंजुली को ही बर्तन बनाया! और सिर्फ यही नहीं, उनकी याददाश्त (Photographic Memory) इतनी गजब की थी कि बरसों पहले पढ़ी किसी भी पुरानी किताब का पन्ना, पैराग्राफ और लाइन नंबर तक बिना देखे जुबानी बोल देते थे!
यह कोई मनगढ़ंत कहानी या जादू नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की लालगंज तहसील के भटनी गाँव (पिनकोड 229410) से निकलकर देश की संसद, काशी की विद्वान सभा और 1952 के पहले चुनाव में हलचल मचाने वाले त्यागी संन्यासी — हर नारायण ओझा यानी स्वामी करपात्री जी महाराज के जीवन की असली दास्तान है। उन्होंने न केवल धर्म और दर्शन पर बड़ी-बड़ी किताबें लिखीं, बल्कि समाज और राजनीति में भी गरीबों और किसानों के हक के लिए बेखौफ होकर आवाज उठाई।
वेदों और दर्शन की गहरी समझ के लिए चारों शंकराचार्य पीठों और काशी के बड़े-बड़े विद्वानों ने मिलकर उन्हें 'धर्मसम्राट' (धर्म का राजा) माना था।
जन्म सन् 1907 में भटनी गाँव, लालगंज, प्रतापगढ़ 229410 में हुआ था। घर-परिवार में उनका असली नाम हर नारायण ओझा था।
संन्यास लेने के बाद उन्होंने बर्तन छोड़ दिए। वे अपने 'कर' यानी हाथ की अंजुली में ही खाना और पानी लेते थे, जिससे वे 'स्वामी करपात्री' कहलाए।
वे ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के शिष्य थे। उनकी याददाश्त 'फोटोग्राफिक' थी—पुरानी किताबों का पन्ना और लाइन तक याद रहता था।
उनकी मशहूर किताबों में 'वेदार्थ पारिजात', 'रामायण मीमांसा', 'विचार पीयूष' और 'मार्क्सवाद और रामराज्य' हैं, जिनमें अद्वैत दर्शन और समाज कल्याण की बात है।
उन्होंने काशी में छात्रों के लिए 'श्री धर्मसंघ' बनाया और सन् 1948 में किसानों-मजदूरों और नीति की आवाज उठाने के लिए 'अखिल भारतीय राम राज्य परिषद' पार्टी बनाई।
"वेदोऽखिलो धर्ममूलम् — धर्म का मतलब सिर्फ पूजा-पाठ नहीं, बल्कि सच्चाई, त्याग और समाज की भलाई है। जिस समाज में किसानों, मजदूरों और कमजोरों का सम्मान नहीं, वह कभी आगे नहीं बढ़ सकता।"
— धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज (परमहंस परिव्राजकाचार्य स्वामी हरिहरानन्द सरस्वती)भटनी गाँव में जन्म: बालक हर नारायण
गंगा और सई नदी के बीच की खेतिहर जमीन पर बसा उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की लालगंज तहसील का एक सीधा-सादा, शांत गाँव है — भटनी (पिनकोड 229410)। इसी गाँव में सन् 1907 के अगस्त महीने (सावन के महीने) में एक सरयूपारीण ब्राह्मण परिवार में पंडित रामनिधि ओझा और माता शांति देवी के घर एक बच्चे का जन्म हुआ। परिवार वालों ने रीति-रिवाज के अनुसार बालक का नाम रखा — हर नारायण ओझा।
गाँव की चौपाल में आज भी बुजुर्ग बताते हैं कि बालक हर नारायण आम बच्चों की तरह खेल-कूद में समय नहीं गंवाते थे। जब बाकी बच्चे मिट्टी और धूल में खेलते, तब हर नारायण गाँव के शिव मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर बड़ों के मुख से सुने संस्कृत के मंत्र दोहराते थे। उनके पिता पं. रामनिधि ओझा पूजा-पाठ और संस्कृत के जानकार थे। बालक हर नारायण ने घर के दालान में बैठकर पिता की बातें सुनकर ही वेदों की कई ऋचाएं बिना पढ़े ही याद कर ली थीं।
गाँव के प्राइमरी स्कूल में जब हर नारायण को दाखिला दिलाया गया, तो मास्टर साहब उनकी तेज बुद्धि देखकर दंग रह गए। जिस सबक को याद करने में दूसरे बच्चों को हफ्ते भर का समय लगता, उसे हर नारायण सिर्फ एक बार सुनकर ही पूरा सुना देते थे। उनके चेहरे पर बचपन से ही एक अनोखा ठहराव और सादगी थी, जिससे सबको लगता था कि यह लड़का बड़ा होकर कोई बड़ा काम करेगा।
9 साल में शादी, 17 में घर का त्याग
उस जमाने में गाँवों में बच्चों की शादी बहुत छोटी उम्र में ही कर देने का आम चलन था। हर नारायण का मन हमेशा किताबों, भजन और एकांत सोच-विचार में लगा रहता था। परिवार वालों को डर हुआ कि कहीं यह लड़का साधु न बन जाए। इसी डर से जब हर नारायण सिर्फ 9 साल के थे, तभी उनकी शादी पास के गाँव की एक सुशील कन्या महादेवी जी से कर दी गई।
लेकिन शादी के बाद भी हर नारायण का मन गृहस्थी के ताने-बाने में नहीं फंसा। वे अपना ज्यादातर समय पढ़ाई, ध्यान और भगवान के नाम में ही बिताते। वक्त गुजरता गया और जब वे करीब 16-17 साल के हुए, तब उनके घर एक प्यारी सी बेटी ने जन्म लिया, जिसका नाम रखा गया सुशीला। घर में बुजुर्ग मां-बाप, नेक पत्नी और गोद में खेलती नन्हीं बेटी — सब कुछ था, जो एक आम इंसान को खुश रखने के लिए चाहिए।
"अगर मैं सिर्फ अपने एक छोटे से परिवार तक सीमित रहा, तो देश और समाज के लाखों दुखी लोगों का दर्द कौन समझेगा? जब तक पूरे संसार को अपना कुनबा नहीं माना जाएगा, तब तक सच्चा ज्ञान और मुक्ति कैसे मिलेगी?"
और फिर वही हुआ जिसका परिवार को अंदेशा था। जब वे सिर्फ 17 साल के नौजवान थे, एक अंधेरी रात में जब सब लोग गहरी नींद में सो रहे थे, हर नारायण ने बिस्तर छोड़ दिया। उन्होंने सोते हुए माता-पिता, पत्नी और अपनी नन्हीं बेटी को दूर से ही हाथ जोड़कर प्रणाम किया और दबे पांव भटनी गाँव की पगडंडियों से बाहर निकल पड़े। यह सफर एक साधारण किसान-परिवार के लड़के को काशी के सबसे बड़े मंच तक पहुंचाने वाला था।
ज्योतिर्मठ शंकराचार्य से दीक्षा
घर छोड़ने के बाद युवा हर नारायण सीधे साधुओं की नगरी काशी पहुंचे और फिर वहां से जंगलों और तीर्थों की ओर निकल पड़े। उन्होंने नैमिषारण्य, अयोध्या और प्रयागराज में गंगा किनारे कई साल तक बहुत सादा जीवन जिया, कभी भूखे रहे तो कभी सिर्फ पानी पीकर गुजारा किया। इसी खोज के दौरान उनकी मुलाकात उस दौर के सबसे बड़े तपस्वी और बदरिकाश्रम ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज से हुई।
"गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥"
— स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी के चरणों में आत्मसमर्पण करते हुए युवा संन्यासीस्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी ने इस नौजवान के तेज, सादगी और सीखने की लगन को पहली ही नजर में पहचान लिया। उन्होंने हर नारायण को संन्यास की दीक्षा दी और हिंदू परंपरा के सरस्वती संप्रदाय में शामिल कर लिया। दीक्षा के बाद उनका नया नाम रखा गया — परमहंस परिव्राजकाचार्य स्वामी हरिहरानन्द सरस्वती।
गुरु की देखरेख में स्वामी जी ने उपनिषद, गीता, रामायण और बड़े-बड़े दर्शन ग्रंथों का ऐसा गहरा अध्ययन किया कि बड़े-बड़े विद्वान भी उनकी बातें सुनकर कायल हो जाते थे।
हाथ ही बर्तन बना: 'करपात्री' नियम
दीक्षा के बाद उनका आधिकारिक नाम तो स्वामी हरिहरानन्द सरस्वती था, लेकिन जिस नाम से वे देश के कोने-कोने में जाने गए, वह नाम था — 'स्वामी करपात्री'। यह नाम उनके एक ऐसे अनोखे नियम से पड़ा, जिसे सुनकर आज भी लोग दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं।
- बर्तनों का पूरा त्याग: संन्यास लेते ही उन्होंने तांबे, पीतल, मिट्टी या लकड़ी के किसी भी बर्तन (थाली, कटोरी या गिलास) का उपयोग जिंदगी भर न करने का पक्का नियम बना लिया।
- हथेली में भिक्षा: वे भोजन मांगते समय अपने दोनों हाथों की अंजुली आगे फैला देते थे। गृहस्थ जो दो मुट्ठी रूखा-सूखा अन्न या रोटी उनकी अंजुली में डाल देता, वे उतना ही ग्रहण करते।
- एक ही बार में आहार: जो खाना एक बार में हथेलियों में आ गया, बस वही उनका दिन भर का भोजन था। न तो वे खाना बचाकर रखते थे, न दोबारा मांगते थे। पानी भी दोनों हथेलियों को जोड़कर ही पीते थे।
संस्कृत में 'करमेव पात्रं यस्य सः करपात्री' अर्थात् जिसका हाथ ही उसका बर्तन हो, उसे करपात्री कहा जाता है। जब काशी की गलियों में यह त्यागी संन्यासी केवल अंजुली में भिक्षा लेकर गंगा किनारे जाता, तो आम नाविक से लेकर बड़े-बड़े पंडित तक आदर से कहते — "देखो, सच्चे त्यागी करपात्री जी जा रहे हैं!"
गजब की याददाश्त (फोटोग्राफिक मेमोरी)
स्वामी करपात्री जी महाराज की चर्चा सिर्फ उनके संन्यास की वजह से नहीं थी, बल्कि उनकी याददाश्त (Photographic Memory) इतनी गजब की थी कि बड़े-बड़े डॉक्टर, वैज्ञानिक और विदेशी प्रोफेसर भी हैरत में पड़ जाते थे। उनकी खूबी यह थी कि वे जिस किताब को एक बार पढ़ लेते थे, वह पूरी की पूरी उनके दिमाग में छप जाती थी — कौन सी बात किस पन्ने पर है, किस पैराग्राफ में है और किस लाइन में लिखी है, सब कुछ उन्हें जुबानी याद रहता था।
एक बार काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में विद्वानों के बीच पुरानी किताबों और वेदों के एक खास विषय पर खुली बहस चल रही थी। एक प्रोफेसर ने अपनी बात को सही साबित करने के लिए ऋग्वेद की एक पुरानी किताब का हवाला दिया। स्वामी जी ने तुरंत टोकते हुए कहा — "प्रोफेसर साहब, आप जिस किताब की बात कर रहे हैं, वह मुंबई के निर्णय सागर प्रेस से सन् 1912 में छपी थी। उसके तीसरे भाग के पेज नंबर 247 की सातवीं लाइन में यह श्लोक तो लिखा है, लेकिन आपने उसकी अगली आधी लाइन छोड़ दी। उस पूरी लाइन को पढ़िए, आपका भ्रम तुरंत दूर हो जाएगा!"
जब लाइब्रेरी से तुरंत वह पुरानी किताब मंगवाकर खोली गई, तो देखा गया कि स्वामी जी ने जो पेज नंबर, लाइन और शब्द बताए थे, वे अक्षर-अक्षर सही निकले! पूरी सभा में सन्नाटा छा गया और सब लोग उनकी याददाश्त के कायल हो गए।
वेदों की हज़ारों ऋचाएं, उपनिषदों के मंत्र, पाणिनीय अष्टाध्यायी के सूत्र, महाभारत के प्रसंग और विदेशी दर्शन की किताबें — सब कुछ उनके दिमाग में हमेशा ताजा रहता था। वे भाषण देते समय कभी कोई कागज या पर्ची हाथ में नहीं लेते थे; जो एक बार उनकी आँखों के सामने से गुजर गया, वह हमेशा के लिए उनके दिमाग में बैठ जाता था।
काशी में 'धर्मसंघ' और मुफ्त गुरुकुल
स्वामी जी केवल जंगलों में ध्यान लगाने वाले साधु नहीं थे। उन्होंने देखा कि अंग्रेजी हुकूमत और नए जमाने के चक्कर में हमारे पुराने गुरुकुल और पढ़ाई का तौर-तरीका खत्म हो रहा था, और गरीब परिवारों के बच्चों के पास पढ़ने-लिखने के साधन नहीं थे। इसी संकट को दूर करने के लिए उन्होंने बनारस (काशी) को अपनी कर्मस्थली बनाया और 'श्री धर्मसंघ' (Dharmasangh) नाम की एक बड़ी संस्था बनाई।
वाराणसी के केदारघाट और बाद में दुर्गाकुंड में बना 'धर्मसंघ' केवल एक आश्रम नहीं था, बल्कि गरीब छात्रों के लिए एक खुला गुरुकुल था। यहाँ देश भर से आए जरूरतमंद बच्चों के रहने, खाने-पीने, कपड़े और किताबों का पूरा इंतजाम बिल्कुल मुफ्त किया जाता था। स्वामी जी खुद वहां बैठकर छात्रों को न्याय, व्याकरण और दर्शन पढ़ाते थे।
धर्मसंघ के जरिए उन्होंने पूरे उत्तर भारत में यज्ञ, भजन और सत्संग का ऐसा माहौल बनाया कि आम लोगों के भीतर अपनी संस्कृति और संस्कारों के प्रति खोया हुआ गौरव फिर से जाग उठा। उनका ज्यादातर जीवन इसी काशी की पावन धरती पर गंगा किनारे बीता।
'धर्मसम्राट' सम्मान और खुली बहस
शास्त्रों और दर्शन की खुली बहस में स्वामी करपात्री जी के तर्कों को काट पाना किसी के बस की बात नहीं थी। वे अपनी बात इतने सीधे, शांत और अकाट्य सबूतों के साथ रखते थे कि सामने वाले के पास कोई जवाब नहीं होता था। उन्होंने पारंपरिक विद्वानों से लेकर उस दौर के आधुनिक विचारकों के सवालों का भी बहुत सटीक और तार्किक उत्तर दिया।
"जैसे चक्रवर्ती राजा पूरे देश पर राज करता है, वैसे ही ज्ञान और धर्म के क्षेत्र में स्वामी हरिहरानन्द सरस्वती (करपात्री जी) का मुकाबला कोई नहीं कर सकता। धर्म और समाज की रक्षा के लिए उनका समर्पण बेमिसाल है, इसलिए पूरा भारत उन्हें एक सुर में 'धर्मसम्राट' (धर्म का राजा) मानकर नमन करता है।"
भारत के चारों कोनों में स्थित शंकराचार्य पीठों (श्रृंगेरी, द्वारका, पुरी और ज्योतिर्मठ) और काशी विद्वत् परिषद् ने मिलकर उन्हें 'धर्मसम्राट' की उपाधि दी। आज़ाद भारत के इतिहास में वे अकेले ऐसे संन्यासी थे जिन्हें आम जनता, किसान, मजदूर और देश के सबसे बड़े आचार्यों ने एक सुर में 'धर्मसम्राट' का दर्जा दिया।
मशहूर किताबें: 'वेदार्थ पारिजात'
स्वामी करपात्री जी महाराज केवल अच्छे वक्ता ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने ज्ञान से भरी कई बड़ी और गंभीर किताबें भी लिखीं। उनकी किताबें आज भी विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों और रिसर्च करने वाले छात्रों के लिए बहुत काम की हैं।
- वेदार्थ पारिजात (Vedartha Parijata): यह उनका 2000 से अधिक पन्नों का महाग्रंथ है। इसमें उन्होंने विदेशी विद्वानों द्वारा भारतीय वेदों पर उठाए गए गलत सवालों का एक-एक शब्द करके तार्किक और शास्त्रीय प्रमाणों से समाधान किया।
- रामायण मीमांसा (Ramayana Mimansa): भगवान श्री राम के चरित्र, वाल्मीकि रामायण के रहस्यों और उस दौर के समाज पर लिखी गई एक बेजोड़ किताब।
- मार्क्सवाद और रामराज्य (Marxism and Ramrajya): इस किताब में उन्होंने कार्ल मार्क्स के कम्युनिज्म (साम्यवाद) और भारत के पारंपरिक 'रामराज्य' की तुलना की। उन्होंने बताया कि सिर्फ वर्ग-संघर्ष और लड़ाई-झगड़े से समाज का भला नहीं हो सकता; असली तरक्की तभी होगी जब नीति में नैतिकता हो और किसान, मजदूर तथा कमजोर तबके को बराबरी का हक मिले।
- विचार पीयूष (Vichar Piyush): धर्म, अध्यात्म और समाज के रोजमर्रा के सवालों पर उनके गंभीर और सरल लेखों का संग्रह।
- संकीर्तन मीमांसा व भक्ति सुधा: ज्ञान के साथ-साथ भगवान के नाम और भक्ति रस को समझाने वाली पुस्तकें।
उनकी किताबों में तर्क और ज्ञान इतना गहरा है कि आज भी दुनिया भर के बड़े विश्वविद्यालयों (जैसे ऑक्सफोर्ड, हार्वर्ड और बीएचयू) के शोधार्थी उनके ग्रंथों पर अपनी डॉक्टरेट (Ph.D.) की रिसर्च करते हैं।
1948: राम राज्य परिषद और चुनाव
15 अगस्त 1947 को हमारा देश आज़ाद हुआ। लेकिन स्वामी जी का मानना था कि आज़ादी के बाद देश की नीतियां ऐसी होनी चाहिए जिससे गाँव, किसान और आम आदमी का भला हो। उनका कहना था कि अगर राजनीति में ईमानदारी और धर्म (नैतिकता) नहीं होगी, तो नेता भ्रष्ट हो जाएंगे और जनता पिसती रहेगी।
इसी सोच के साथ उन्होंने सन् 1948 में अपने साथियों और संतों के सहयोग से 'अखिल भारतीय राम राज्य परिषद' (RRP) नाम से एक राजनीतिक पार्टी बनाई।
"रामराज्य का मतलब किसी एक जाति या धर्म का राज नहीं है, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था है जहाँ सरकार ईमानदार हो, कमजोर और गरीब को इंसाफ मिले, किसानों और मजदूरों को उनके पसीने की पूरी कमाई मिले, और कोई भी इंसान भूखा या बेबस न रहे।"
जब सन् 1952 में आज़ाद भारत का पहला आम चुनाव हुआ, तो स्वामी जी की इस पार्टी ने सबको चौंका दिया। बिना किसी बड़े पैसे या तामझाम के इस पार्टी ने लोकसभा में 3 सीटें जीतीं और राजस्थान तथा मध्य भारत की विधानसभाओं में कई विधायक चुने गए। राजस्थान विधानसभा में तो राम राज्य परिषद मुख्य विपक्षी दल बनी थी। उन्होंने दिखा दिया कि सादगी और सच्चाई के बल पर भी चुनाव लड़ा जा सकता है।
1966 संसद गोरक्षा आंदोलन और जेल
आज़ाद भारत के इतिहास में 7 नवंबर 1966 (गोपाष्टमी) का दिन हमेशा याद रखा जाता है। देश में गोवंश की रक्षा और कत्लखाने बंद कराने की मांग को लेकर स्वामी करपात्री जी के नेतृत्व में लाखों साधु, किसान और आम लोग दिल्ली के संसद भवन के बाहर शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए जमा हुए।
संसद मार्ग पर संतों और आम लोगों का इतना बड़ा हुजूम उमड़ा था, जैसा दिल्ली ने पहले कभी नहीं देखा था। स्वामी करपात्री जी इस आंदोलन की अगुवाई कर रहे थे। लेकिन दुर्भाग्य से उस शांतिपूर्ण धरने पर आंसू गैस के गोले छोड़े गए और लाठीचार्ज हुआ, जिसमें कई संतों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
स्वामी करपात्री जी को पुलिस ने गिरफ्तार करके दिल्ली की तिहाड़ जेल भेज दिया। जेल में भी वे अपनी मांग पर अड़े रहे और कई दिनों तक अन्न-जल छोड़ दिया। वे पहले स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी अंग्रेजों की जेलों में गए थे और आज़ाद भारत में भी अपनी बात पर अड़े रहकर जेल गए। उनका यह हौसला लोगों के दिलों में हमेशा के लिए बस गया।
7 फरवरी 1982: केदारघाट पर जल-समाधि
75 साल तक समाज सेवा, पढ़ाई-लिखाई और त्याग का जीवन जीने के बाद स्वामी जी का शरीर धीरे-धीरे कमजोर होने लगा। 7 फरवरी 1982 (माघ शुक्ल चतुर्दशी) को काशी के केदारघाट पर गंगा किनारे उन्होंने अपने शिष्यों को आखिरी सीख दी।
"ॐ तत्सत् — धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद्धर्मो न त्यक्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥"
— जो धर्म और सच्चाई की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। सच के रास्ते पर चलना ही सबसे बड़ा धर्म है।'हरि ॐ' और 'शिवोऽहम्' का जाप करते हुए स्वामी करपात्री जी ने अपने प्राण त्याग दिए। संन्यासी परंपरा के अनुसार, उनके पार्थिव शरीर को एक सजी हुई नाव पर रखकर बनारस में गंगा जी की पवित्र और गहरी जलधारा में जल-समाधि दी गई।
उस दिन बनारस का हर घाट और हर गली गमगीन थी, और हजारों लोगों ने नम आँखों से अपने इस त्यागी संन्यासी को अंतिम विदाई दी।
प्रतापगढ़ का मान और जीवन सीख
प्रतापगढ़ की माटी ने कई बड़े नेताओं और साहित्यकारों को जन्म दिया है, लेकिन स्वामी करपात्री जी का जीवन त्याग और उसूलों की एक अनूठी मिसाल है। भटनी गाँव का एक साधारण लड़का अपनी लगन, सच्चाई और सादगी के दम पर पूरे देश में अपनी पहचान बना गया।
आज भी जब कोई प्रतापगढ़ के भटनी गाँव (लालगंज) से गुजरता है, तो गर्व से उसका सीना चौड़ा हो जाता है कि इसी धरती ने देश को स्वामी करपात्री जैसा महान त्यागी सपूत दिया।