सराय नाहर राय मांधाता प्रतापगढ़ ( Sarai Nahar Rai, Mandhata, Pratapgarh )

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🏺 विश्व प्रसिद्ध पुरातात्विक धरोहर ⏳ 10,000 वर्ष प्राचीन (8400 ई.पू.) 🏹 दक्षिण एशिया में युद्ध का प्रथम साक्ष्य

सराय नाहर राय: जब 10,000 साल पहले प्रतापगढ़ की धरती पर रहते थे 6 फीट लंबे बलिष्ठ पुरखे

प्रतापगढ़ के मानधाता में दफन एक ऐसा प्राचीन रहस्य, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप में मानव सभ्यता, आदिम युद्ध और जीवन शैली के पूरे इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया!

ज़रा सोचिए, आज से 10,000 साल पहले जब दुनिया में न कोई शहर था, न खेती शुरू हुई थी और न ही पहिए का आविष्कार हुआ था, तब हमारे प्रतापगढ़ (मानधाता) की हरी-भरी झीलों के किनारे एक बेहद ताकतवर मानव बस्ती फल-फूल रही थी! यहाँ रहने वाले लोग आज के सामान्य इंसानों से कहीं ज़्यादा लंबे (6 फीट से भी ऊंचे), फौलादी हड्डियों वाले और गज़ब के निशानेबाज़ थे।
स्थान व ब्लॉक मानधाता, प्रतापगढ़ (उ.प्र.)
काल निर्धारण (C-14) 10,345 BP (~8400 ई.पू.)
मुख्य खोजकर्ता के.सी. ओझा व प्रो. जी.आर. शर्मा
मानव प्रजाति प्रारंभिक होमो सेपियन्स
🦴
फौलादी कद-काठी
पुरुष 5'9" से 6'3", महिलाएं 5'10"
🏹
प्राचीनतम युद्ध
पसली में धंसा हुआ बाण मिला
⚰️
अनोखा अंतिम संस्कार
4 शव एक साथ एक ही कब्र में
🧠
बड़ा दिमाग
मस्तिष्क क्षमता 1450 cc (अधिक)
🍖
आदिम बारबेक्यू
8 ज़मीनी चूल्हे व भुनी हड्डियां
💎
विंध्याचल से व्यापार
80-100 किमी दूर से आए सुंदर पत्थर

⏳ समय के आईने में: 1968 की वो सर्द दोपहर जिसने इतिहास रच दिया

सराय नाहर राय की यह अद्भुत दास्तान किसी रोमांचक जासूसी उपन्यास से कम नहीं है। 1968 की सर्दियों की बात है। उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग के अन्वेषक के.सी. ओझा प्रतापगढ़ के ग्रामीण इलाकों में टीलों और पुरानी झीलों के किनारों का सर्वेक्षण कर रहे थे। मानधाता से कुछ ही दूरी पर एक वीरान टीले पर उनकी नज़र ज़मीन से बाहर निकली कुछ अजीबोगरीब हड्डियों और छोटे-छोटे नुकीले पत्थरों पर पड़ी।

जब उन्होंने करीब जाकर देखा, तो उनके होश उड़ गए! वो कोई साधारण हड्डियां नहीं थीं, बल्कि हज़ारों साल पुरानी इंसानी खोपड़ी और रीढ़ के हिस्से थे। इसके तुरंत बाद, 1970 से 1973 के बीच इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास एवं पुरातत्व विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर जी.आर. शर्मा के नेतृत्व में यहाँ बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक खुदाई शुरू हुई।

⚡ इतिहास की किताबों में दर्ज हुआ नया अध्याय

उस समय तक पूरी दुनिया के इतिहासकार यह मानते थे कि गंगा के मैदानी इलाकों में इंसान बहुत देर से (खेती शुरू होने के बाद) आकर बसा था। लेकिन सराय नाहर राय की खुदाई ने इस धारणा को जड़ से उखाड़ फेंका! जब इन हड्डियों की कार्बन-14 (C-14) डेटिंग कराई गई, तो पता चला कि यह बस्ती आज से लगभग 10,345 साल पुरानी (लगभग 8400 ईसा पूर्व) है। यानी पूरे दक्षिण एशिया में आधुनिक मानव (Homo sapiens) के सबसे पुराने कंकाल हमारे प्रतापगढ़ की मिट्टी से ही मिले थे!

🌊 भीखमपुर की गोखुर झील और माँ खुईलन देवी धाम: कुदरत का मुफ़्त दस्तरख़्वान

अब सवाल उठता है कि 10,000 साल पहले आदिमानवों ने रहने के लिए सराय नाहर राय को ही क्यों चुना? इसका जवाब छिपा है यहाँ के अनोखे भूगोल में।

उस ज़माने में गंगा और सई नदियों की धाराएं बदलते-बदलते रास्ते में बड़ी-बड़ी अर्धचंद्राकार झीलें छोड़ जाती थीं, जिन्हें भूगोल की भाषा में 'गोखुर झील' (Oxbow Lake) कहा जाता है। सराय नाहर राय का यह पूरा इलाका एक विशाल झील के किनारे बसा हुआ था।

🌿 आज भी ज़िंदा है वो प्राचीन झील: भीखमपुर-नेवारी का 118 बीघा ताल

आपको जानकर हैरानी होगी कि उस 10,000 साल पुरानी गोखुर झील का जीता-जागता स्वरूप आज भी सराय नाहर राय से मात्र 5 किलोमीटर दूर भीखमपुर-नेवारी कछार में देखा जा सकता है! यहाँ आज माँ खुईलन देवी का पावन धाम है। मंदिर के पास फैला 118 बीघे का विशाल प्राकृतिक ताल उसी प्राचीन नदी तंत्र का बचा हुआ हिस्सा है। इसी ताल से 28 किलोमीटर लंबी सकरनी नदी निकलती है, जिसे हाल ही में मनरेगा के तहत पुनर्जीवित किया गया है।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, कलिका भगत और माँ खुईलन देवी के चमत्कारों से जुड़ी यह भूमि वास्तव में प्रागैतिहासिक काल से ही जीवन का केंद्र रही है। इस विशाल झील में साल भर मीठा पानी रहता था। यहाँ भारी संख्या में कछुए, मछलियां और ताज़े पानी के घोंघे (Snails) मिलते थे। शाम ढलते ही घने जंगलों से बारहसिंगा, नीलगाय, जंगली सूअर और चीतल पानी पीने झील के किनारे आते थे। आदिमानवों के लिए यह एक ऐसा 'मुफ़्त दस्तरख़्वान' था, जहाँ शिकार करने के लिए उन्हें दूर भटकना नहीं पड़ता था।

💪 6 फीट लंबे बलिष्ठ पुरखे: जब प्रयोगशाला में टन-टन बजीं हड्डियां!

यहाँ की खुदाई में कुल 11 कब्रों से 15 मानव कंकाल मिले (जिनमें 9 पुरुष, 4 महिलाएं और 1 बच्चे का अवशेष था)। इन कंकालों का अध्ययन करने के लिए अमेरिका की विश्वप्रसिद्ध कॉर्नेल यूनिवर्सिटी (Cornell University) के जाने-माने मानवविज्ञानी प्रोफेसर केनेथ ए.आर. कैनेडी (Prof. Kenneth A.R. Kennedy) भारत आए। उनके वैज्ञानिक शोध ने पूरी दुनिया को चौंका दिया:

  • लंबी और गठीली कद-काठी: सराय नाहर राय के पुरुष सामान्यतः 5 फीट 9 इंच से लेकर 6 फीट 3 इंच (174 से 192 सेमी) तक लंबे थे! वहीं महिलाएं भी औसतन 5 फीट 10 इंच (175 से 190 सेमी) लंबी थीं। आज के औसत भारतीय से वे कहीं अधिक लंबे और भीमकाय थे।
  • लोहे जैसी फौलादी हड्डियां: जब प्रो. कैनेडी ने प्रयोगशाला में इन हड्डियों की जांच की, तो उन्हें थपथपाने पर धातु जैसी 'टन-टन' की आवाज़ आ रही थी! इन आदिमानवों में हड्डियों की कमज़ोरी (Osteoporosis) या गठिया का नामोनिशान नहीं था।
  • गज़ब की शारीरिक ताकत: उनकी जांघ की हड्डियों पर बनी 'सोलियल लाइन' (Soleal Line) बताती है कि वे बिना थके रोज़ाना 25-30 किलोमीटर पैदल चलते थे और भारी शिकार उठाकर लाते थे। वहीं बाजुओं की हड्डियों पर मजबूत उभार यह साबित करते हैं कि वे बेहद ताकत के साथ भारी भाले और तीर फेंकने में माहिर थे।
  • बड़ा मस्तिष्क और मज़बूत जबड़े: उनकी खोपड़ी की दिमागी क्षमता लगभग 1450 क्यूबिक सेंटीमीटर (cc) मापी गई, जो आज के आधुनिक इंसान (1350-1400 cc) की तुलना में भी थोड़ी अधिक है! उनके दांतों में कोई कीड़ा (Cavity) नहीं था, हालांकि कच्चा कंदमूल, भुना हुआ कड़ा मांस और रेत के कण चबाने के कारण दांत काफी घिसे हुए थे।

🏹 पसली में धंसा बाण और 4 शवों की रहस्यमयी कब्र: भारत की पहली लड़ाई!

सराय नाहर राय केवल शांति से रहने की जगह नहीं थी, बल्कि यहाँ एक ऐसा दिल दहला देने वाला सच सामने आया जिसने इतिहास के पन्नों में सनसनी मचा दी।

खुदाई के दौरान वैज्ञानिकों को एक प्रौढ़ पुरुष का कंकाल मिला। जब उसकी हड्डियों को ध्यान से साफ किया गया, तो देखा गया कि उसकी 8वीं-9वीं पसली के बीच पत्थर का एक नुकीला बाण (माइक्रोलिथ) गहराई तक धंसा हुआ था! वैज्ञानिक जांच से साबित हुआ कि यह तीर किसी शिकार का नहीं, बल्कि इंसानी हाथ से चलाए गए धनुष का था, जिससे उस व्यक्ति की मौके पर ही तड़प-तड़पकर मौत हो गई थी।

⚔️ दक्षिण एशिया में संगठित युद्ध का पहला सुबूत

यह कंकाल पूरे दक्षिण एशिया में मानवीय हिंसक संघर्ष (Prehistoric Warfare) का सबसे पहला फोरेंसिक प्रमाण है! इससे साबित होता है कि 10,000 साल पहले भी शिकार के मैदानों, पानी की झीलों या कबीलाई वर्चस्व को लेकर कबीलों के बीच खूनी लड़ाइयाँ हुआ करती थीं।

चार इंसानों की एक साथ अंत्येष्टि (Quadruple Burial)

यहीं पर एक बहुत ही रहस्यमयी कब्र भी मिली, जिसमें दो पुरुषों और दो महिलाओं को एक ही अंडाकार गड्ढे में अगल-बगल दफनाया गया था। ऐसा माना जाता है कि कबीलाई छापे या किसी हिंसक हमले में ये चारों एक ही दिन मारे गए थे और कबीले वालों ने एक साथ उनका अंतिम संस्कार किया था।

लेकिन मौत के इस खौफ के बावजूद, इन आदिमानवों में अपनों के प्रति गहरा प्रेम और सम्मान था:

  • मखमली बिछौना: शव को सीधे पथरीली मिट्टी पर नहीं रखा जाता था, बल्कि कब्र के नीचे छानी हुई मुलायम मिट्टी और चूल्हे की पवित्र राख की गद्देदार परत बिछाई जाती थी।
  • दिशा का नियम: सिर हमेशा पश्चिम में और पैर पूर्व दिशा की ओर रखे जाते थे, ताकि मृत व्यक्ति उगते हुए सूरज की ओर देख सके।
  • हाथों की विशेष मुद्रा: पुरुषों का दाहिना हाथ पेट पर और महिलाओं का बायां हाथ नाभि के ऊपर करीने से रखा गया था।
  • परलोक का भोजन: कब्र के भीतर भुने हुए मांस की हड्डियां, पत्थर के छोटे हथियार और नदी के चमकदार सीपों (Shells) से बने आभूषण रखे गए थे। यानी 10,000 साल पहले भी हमारे पुरखे मानते थे कि मरने के बाद भी आत्मा का एक सफर होता है, जहाँ उसे भोजन और हथियारों की ज़रूरत पड़ेगी!

🍖 आदिम बारबेक्यू (Barbecue) और विंध्याचल के पत्थरों से बना हथियार बाज़ार

सराय नाहर राय में आदिमानव किसी बंद गुफा में नहीं, बल्कि खुले मैदान में झोपड़ियाँ बनाकर रहते थे। खुदाई में ज़मीन में गाड़े गए बल्लियों के गड्ढे (Post-holes) मिले हैं, जो बताते हैं कि वे सरकंडों और घास-फूस से गोल-अंडाकार छप्पर बनाते थे।

बस्ती के बीचों-बीच 8 ज़मीनी चूल्हे (Pit-hearths) मिले हैं। यह कोई साधारण चूल्हे नहीं थे, बल्कि ज़मीन में खोदे गए गहरे गड्ढे थे, जिनमें नीचे सूखी लकड़ियां और कंडे जलाकर ऊपर शिकार का मांस रखा जाता था—बिल्कुल आज के तंदूर या बारबेक्यू की तरह! इन चूल्हों से बारहसिंगा, हाथी, गैंडे, भैंसे और मछलियों की अधजली हड्डियां मिली हैं।

💎 100 किलोमीटर दूर विंध्याचल से पत्थरों का आयात

गंगा-सई के इस मैदानी दोआब में पत्थर का एक भी टुकड़ा नहीं पाया जाता (यहाँ सिर्फ दोमट मिट्टी और बालू है)। लेकिन सराय नाहर राय में हज़ारों की संख्या में चर्ट, एगेट, क्वार्ट्ज़ और कैल्सीडोनी जैसे लाल, सफेद और चमकीले पत्थरों से बने अत्यंत महीन औजार (Microliths) मिले हैं—जैसे नुकीले तीर, ब्लेड, अर्धचंद्राकार छिलने वाले औजार।

वैज्ञानिक विश्लेषण से पता चला कि ये सारे बेशकीमती पत्थर 70 से 100 किलोमीटर दूर विंध्याचल पर्वतमाला (मिर्ज़ापुर, रीवा और बांदा) से लाए गए थे! इसका मतलब है कि आज से 10,000 साल पहले भी हमारे पुरखों का विंध्य क्षेत्र के साथ एक सुव्यवस्थित व्यापारिक संपर्क (Seasonal Trade Network) था।

📊 प्रतापगढ़ का पाषाण कालीन त्रिकोण: सराय नाहर राय, महदहा और दमदमा

प्रतापगढ़ जिला प्रागैतिहासिक पुरातत्व के मामले में पूरे भारत का सिरमौर है। यहाँ तीन ऐसे स्थल मिले हैं जिन्हें विश्व स्तर पर 'मध्य-पाषाण कालीन त्रिकोण' (The Mesolithic Triangle) कहा जाता है। नीचे दी गई सारणी से आप इन तीनों के वैज्ञानिक अंतर को आसानी से समझ सकते हैं:

तुलना के बिंदु सराय नाहर राय (मानधाता) महदहा (पट्टी तहसील) दमदमा (पट्टी तहसील)
स्थान एवं तहसील मानधाता ब्लॉक (द.-प. प्रतापगढ़) पट्टी तहसील (उत्तर-पूर्व) पट्टी तहसील (उत्तर-पूर्व)
प्राचीनता (काल) लगभग 10,345 BP (~8400 ई.पू.) लगभग 8000 से 7000 ई.पू. लगभग 7000 से 5000 ई.पू.
सांस्कृतिक परत की मोटाई मात्र 6 सेमी (मौसमी शिविर) 60 सेमी (अर्ध-स्थायी आवास) 1.5 मीटर (10 परतें, दीर्घकालिक बस्ती)
कुल कब्रें व मानव कंकाल 11 कब्रें, कुल 15 कंकाल 28 कब्रें, कुल 30 कंकाल 41 कब्रें, कुल 48 कंकाल
विशिष्ट अंत्येष्टि (दफनाने का तरीका) 4 शवों की संयुक्त कब्र (2 पुरुष, 2 महिला) स्त्री-पुरुष की युगल (Double) कब्र 5 युगल कब्रें + 1 तिहरी (Triple) कब्र
आभूषण एवं कलाकृतियां नदी के सीप (Shells) के पेंडेंट मृगशृंग (हिरण के सींग) की कुंडल व माला हाथी दांत का लॉकेट व हड्डी की सुइयां
हिंसक संघर्ष का साक्ष्य पसली में बाण का सिरा धंसा मिला कोई प्रत्यक्ष हिंसक चोट नहीं हड्डियों पर मामूली घर्षण के निशान
भोजन एवं रसोई का स्वरूप 8 ज़मीनी चूल्हे (तंदूर/बारबेक्यू) कसाईखाना (Butchering area) व सिलबट्टा अनाज पीसने के सिलबट्टे व अनेक चूल्हे

🏛️ भविष्य की रूपरेखा: विश्वस्तरीय जियो-हेरिटेज पार्क व 60 किमी कॉरिडोर

सराय नाहर राय केवल एक पुरातात्विक टीला नहीं, बल्कि प्रतापगढ़ का गौरवशाली वैश्विक हस्ताक्षर है। आने वाले समय में इसे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं प्रस्तावित हैं:

  • ओपन-एयर जीवाश्म संग्रहालय: मुख्य उत्खनन स्थल को पारदर्शी ग्लास शेड और आधुनिक फेंसिंग से सुरक्षित कर यहाँ एक इंटरप्रिटेशन सेंटर बनाना, जहाँ 10,000 साल पुराने जीवन को 3D मॉडल और ऑडियो-विजुअल के ज़रिये दिखाया जाए।
  • भीखमपुर खुईलन ताल वेटलैंड रिज़र्व: माँ खुईलन देवी धाम के पास फैले 118 बीघे के प्राकृतिक ताल को एक इको-टूरिज्म और प्रवासी पक्षी अभयारण्य के रूप में विकसित करना, जिससे सकरनी नदी के पुनरुद्धार को स्थायी मजबूती मिले।
  • 60 किलोमीटर प्रागैतिहासिक हेरिटेज कॉरिडोर: सराय नाहर राय (मानधाता) को पट्टी के महदहा और दमदमा से जोड़ने वाला एक विशेष टूरिस्ट सर्किट, ताकि देश-विदेश के शोधार्थी और पर्यटक एक ही दिन में पाषाण काल के पूरे सफ़र का अनुभव कर सकें।

📸 विशेष फोटो गैलरी: सराय नाहर राय की ऐतिहासिक झलकियां

उत्खनन स्थल, सराय नाहर राय गाँव, खुईलन देवी और गोखुर झील के प्रामाणिक छायाचित्र (चित्र पर क्लिक करके बड़ा देखें):

🎬 वीडियो डाक्यूमेंट्री: आँखों से देखिए सराय नाहर राय की ज़मीनी हकीकत

📹 यूट्यूब डाक्यूमेंट्री: सराय नाहर राय का पूरा इतिहास व वर्तमान स्थिति

🗺️ कैसे पहुंचे सराय नाहर राय: यात्रा मार्ग एवं गूगल मैप

📍 गूगल मैप लाइव लोकेशन (सराय नाहर राय, मानधाता - प्रतापगढ़)
🚗 यात्रा मार्गदर्शिका (Travel Guide)
  • रेलवे द्वारा: सबसे निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन माँ बेल्हा देवी धाम प्रतापगढ़ जंक्शन (MBDP) है, जो यहाँ से मात्र 18 से 20 किमी दूर है। इसके अलावा विश्वनाथगंज (SBTJ) स्टेशन भी पास में है।
  • सड़क मार्ग: प्रतापगढ़ मुख्यालय से मानधाता-विश्वनाथगंज मार्ग पकड़कर आसानी से ऑटो, टैक्सी या निजी वाहन द्वारा 30-40 मिनट में सराय नाहर राय पहुँचा जा सकता है।
  • हवाई मार्ग: सबसे नजदीकी हवाई अड्डा प्रयागराज (बमरौली) एयरपोर्ट (लगभग 55 किमी) और वाराणसी (बाबतपुर) एयरपोर्ट (लगभग 130 किमी) है।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. सराय नाहर राय पुरातात्विक स्थल की सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि क्या है?

इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने साबित किया कि गंगा के मैदानी इलाकों में 10,000 साल पहले भी इंसान रहता था। यहाँ से पूरे दक्षिण एशिया में आधुनिक मानव (होमो सेपियन्स) के प्राचीनतम जीवाश्म और संगठित युद्ध (पसली में धंसे तीर) का पहला साक्ष्य मिला।

Q2. यहाँ के मानव कंकाल आज के इंसानों से कितने अलग थे?

यहाँ के पुरुष 5'9" से 6'3" और महिलाएं लगभग 5'10" लंबी थीं। उनकी खोपड़ी की क्षमता 1450 cc (आज से भी बड़ी) थी। उनकी हड्डियां अत्यधिक घनी और फौलादी थीं, जिन्हें बजाने पर धातु जैसी टन-टन की आवाज़ आती थी।

Q3. सराय नाहर राय में मिले पत्थरों के औजार कहाँ से आए थे?

गंगा के मैदानों में प्राकृतिक पत्थर नहीं होते। यहाँ मिले चर्ट, अगेट और कैल्सीडोनी के सूक्ष्म औजार (माइक्रोलिथ) लगभग 80 से 100 किमी दूर विंध्याचल की पहाड़ियों (मिर्ज़ापुर-रीवा) से लाए गए थे, जो 10,000 साल पुराने मौसमी व्यापार को साबित करते हैं।

Q4. क्या यहाँ कोई मंदिर या धार्मिक स्थल भी जुड़ा है?

हाँ, सराय नाहर राय की प्राचीन गोखुर झील से 5 किमी दूर भीखमपुर में माँ खुईलन देवी का प्रसिद्ध धाम स्थित है, जहाँ 118 बीघे का प्राकृतिक ताल आज भी मौजूद है और जहाँ से सकरनी नदी निकलती है।

Q5. सराय नाहर राय और महदहा-दमदमा में क्या मुख्य अंतर है?

सराय नाहर राय सबसे पुराना (10,345 BP) मौसमी शिकारियों का कैंप था। महदहा में हिरण के सींगों के आभूषण और कसाईखाना मिला, जबकि दमदमा में सबसे लंबी 1.5 मीटर मोटी बस्ती की परतें, हाथीदांत के पेंडेंट और 41 कब्रें मिलीं।

🌟 आखिर में एक बात...

सराय नाहर राय केवल मिट्टी और हड्डियों का ढेर नहीं, बल्कि यह गवाही है कि जब दुनिया सभ्यता की वर्णमाला सीख रही थी, तब हमारे प्रतापगढ़ की गोद में इंसान कुदरत के साथ कदम से कदम मिलाकर जीना सीख चुका था। 6 फीट लंबे उन बलिष्ठ पुरखों का खून आज भी इस पावन माटी की रग-रग में बहता है। हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी इस विश्व-धरोहर को जानें, उस पर गर्व करें और इसे संजोकर अगली पीढ़ी तक पहुँचाएं!

📚 प्रामाणिक ऐतिहासिक एवं वैज्ञानिक संदर्भ (Authentic References):

  1. प्रो. जी.आर. शर्मा (1973), "Mesolithic lake culture in the Ganga Valley: Sarai Nahar Rai", प्रोसीडिंग्स ऑफ द प्रीहिस्टोरिक सोसाइटी, कैम्ब्रिज।
  2. डॉ. केनेथ ए.आर. कैनेडी (1984), "Trauma and Disease in the Ancient Harappans and Late Stone Age Peoples of India", कॉर्नेल यूनिवर्सिटी रिसर्च पेपर्स।
  3. उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग, "सराय नाहर राय उत्खनन रिपोर्ट एवं गज़ेटियर प्रतापगढ़"।
  4. इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग उत्खनन संकलन (1970–1973)।

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