उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद: लमही से प्रतापगढ़ और गोदान तक — कलम के सिपाही की सच्ची दास्तान (Munshi Premchand Biography, Dhanpat Rai Srivastava, Pratapgarh District School 1900, Godan, Soz-e-Watan)
20 रुपये की मास्टरी, फटे जूते और भूखे पेट लिखकर जिसने दुनिया को बताया कि असली भारत महलों में नहीं, गाँव के खेतों में बसता है
ज़रा सोचिए, क्या आज के दौर में ऐसा मुमकिन है कि फटे कुर्ते और टूटे जूतों में घूमने वाला एक सीधा-साधा स्कूल मास्टर, जिसे महीने के सिर्फ बीस रुपये मिलते हों, वह अपनी टूटी कलम की नोक से अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दे? जिसने कभी महलों की झूठी शान पर नहीं लिखा, बल्कि गाँव की चौपाल पर बैठे उस अनपढ़ किसान (होरी) का दर्द पन्नों पर उतारा जो जिंदगी भर सिर्फ एक गाय पालने का सपना देखते-देखते दम तोड़ देता है!
यह कोई काल्पनिक किस्सा नहीं, बल्कि वाराणसी के लमही गाँव में जन्मे, सन् 1900 में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिला स्कूल में मास्टरी करने वाले और पूरे देश में कथा सम्राट कहलाने वाले धनपत राय श्रीवास्तव यानी मुंशी प्रेमचंद के जीवन की असली दास्तान है। उन्होंने राजा-रानियों के तिलिस्म को तोड़कर पहली बार खेत में पसीना बहाते किसान और मजदूर को साहित्य का सबसे बड़ा नायक बना दिया।
बंगाल के महान कथाकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने आम आदमी और किसानों के सच्चे सुख-दुख लिखने के कारण उन्हें 'उपन्यास सम्राट' माना था।
सन् 1900 में प्रेमचंद जी जिला स्कूल, प्रतापगढ़ में ₹20 महीने पर शिक्षक बने। यहीं के माहौल और बाद के अवध किसान आंदोलन ने उनके उपन्यासों को जन्म दिया।
असली नाम धनपत राय था। पहले 'नवाब राय' नाम से लिखते थे। जब सोज़े-वतन पर रोक लगी, तब मुंशी दयानारायण निगम की सलाह पर 'प्रेमचंद' बने।
उपन्यासों में 'गोदान', 'प्रेमाश्रम', 'गबन', 'रंगभूमि', 'निर्मला' और कहानियों में 'कफ़न', 'पूस की रात', 'ईदगाह' सबसे मशहूर हैं।
मशहूर पत्रिका 'हंस' के संपादक कन्हैयालाल मुंशी और प्रेमचंद दोनों थे। कवर पर 'मुंशी, प्रेमचंद' छपता था, जिसे पाठकों ने एक ही नाम 'मुंशी प्रेमचंद' मान लिया।
प्रेमचंद से पहले किताबों में केवल राजा-रानी और जासूस होते थे। प्रेमचंद ने पहली बार खेत में पसीना बहाते किसान (होरी) को अपनी कहानियों का सबसे बड़ा नायक बनाया।
"साहित्यकार देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है। हमारा काम सिर्फ किस्से सुनाना नहीं, बल्कि सोए हुए समाज को जगाना है।"
— उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद (लखनऊ प्रगतिशील लेखक संघ अधिवेशन, 1936)लमही गाँव में जन्म: बालक धनपत राय का संघर्ष
वाराणसी (बनारस) शहर से करीब चार मील दूर एक छोटा सा, सीधा-सादा गाँव बसा है — लमही। इसी गाँव में 31 जुलाई 1880 को एक साधारण कायस्थ परिवार में डाकमुंशी अजायब राय और माता आनन्दी देवी के घर एक बालक ने जन्म लिया। घर के बड़ों ने प्यार से उसका नाम रखा — धनपत राय श्रीवास्तव, जबकि उसके चाचा उसे लाड़-प्यार में 'नवाब राय' कहकर पुकारते थे।
लेकिन तकदीर ने इस बच्चे की झोली में बचपन से ही खुशियों से ज्यादा मुश्किलें डाल दी थीं। जब धनपत सिर्फ सात साल के थे, तभी उनकी मां का साया सिर से उठ गया। पिता ने दूसरा ब्याह कर लिया, पर सौतेली मां से उन्हें वह दुलार कभी नहीं मिला जो एक अबोध बालक को चाहिए था। और जब वे सिर्फ चौदह वर्ष के हुए, तब पिता का भी साया उठ गया।
गाँव के लोग बताते हैं कि बालक धनपत को किताबें पढ़ने का ऐसा गजब का चस्का था कि जब जेब में नया उपन्यास खरीदने के पैसे नहीं होते थे, तो वे बनारस के एक पुराने बुकसेलर की दुकान पर जा बैठते थे। वे दूकानदार की किताबों की जिल्द बांधने में मदद करते और बदले में वहीं बैठकर उर्दू के तिलिस्मी किस्से चाव से पढ़ते। मात्र 13 साल की उम्र में उन्होंने 'तिलिस्मे होशरूबा' और रतननाथ 'सरशार' के बड़े-बड़े किस्से एक सांस में पढ़ डाले थे!
सिर पर न छत का सहारा, न जेब में पैसे। अपनी और छोटे भाई की पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए किशोर धनपत राय बनारस में एक वकील साहब के बेटे को पाँच रुपये महीने पर ट्यूशन पढ़ाते थे। कई बार ऐसा होता कि दोपहर के खाने में सिर्फ दो पैसे का सत्तू पानी में घोलकर पीते और रात को दीये की मद्धिम रोशनी में बैठकर देर रात तक पढ़ाई करते।
₹20 की पहली मास्टरी और प्रतापगढ़ जिला स्कूल तबादला
सन् 1898 में कड़ी मेहनत के बाद धनपत राय ने मैट्रिक (दसवीं) की परीक्षा पास कर ली। अब जिंदगी के सामने सबसे बड़ा सवाल था — दो वक्त की रोटी कैसे चले? इसी जद्दोजहद के बीच सन् 1900 में उन्हें शिक्षा विभाग में 20 रुपये महीने पर बहराइच के एक सरकारी स्कूल में सह-अध्यापक (असिस्टेंट मास्टर) की पहली नौकरी मिली।
लेकिन बहराइच में वे ज्यादा दिन नहीं रहे। सिर्फ तीन महीने बाद ही सरकार ने उनका तबादला अवध के ऐतिहासिक जिले प्रतापगढ़ के जिला स्कूल (District School, Pratapgarh) में कर दिया।
- 20 रुपये का वेतन: प्रतापगढ़ में सह-अध्यापक के रूप में मिले ₹20 के मामूली वेतन से ही वे घर-परिवार का खर्च चलाते थे और अपनी आगे की पढ़ाई जारी रखी।
- सरकारी आवास में रिहाइश: प्रतापगढ़ में स्कूल के पास मिले एक सादे सरकारी आवास में रहते हुए उन्होंने अपने पुत्र की आरंभिक शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था की।
- गाँव-देहात से सीधा संपर्क: प्रतापगढ़ की कच्ची सड़कों, बाजारों और सई नदी के कछारों में घूमते हुए युवा प्रेमचंद ने अवध के सीधे-सादे किसानों और मजदूरों की बेबसी को बहुत करीब से देखा।
प्रतापगढ़ की यह मास्टरी भले ही छोटी सी नौकरी थी, लेकिन लेखक के तौर पर उनके दिलो-दिमाग को तराशने में इस जगह का बहुत बड़ा हाथ रहा। यहाँ के तालुकेदारों का रौब, लगान न चुका पाने पर किसानों पर होते कोड़े और बेगार कराते जमींदारों की मनमानी ने युवा शिक्षक धनपत राय के मन में बगावत की वह चिंगारी सुलगा दी, जिसने आगे चलकर हिंदी साहित्य को हिलाकर रख दिया।
"बाबू! हम रात-दिन पसीना बहा के माटी से सोना उपजाईत हन, पर जब फसल कटत है त सारा गल्ला जमींदार और महाजन उठा ले जात हीं... हमार लरिकन भूखे पेट सुतत हीं!"
युवा शिक्षक प्रेमचंद ने उस किसान के फटे हाथ अपने हाथों में थामकर मन ही मन कहा था — "काका, तुम्हारी इस बेबसी को मैं अपनी कलम की ताकत बनाऊंगा!"
सोज़े-वतन का धमाका और 'प्रेमचंद' नाम का जन्म
शुरुआती दौर में धनपत राय उर्दू भाषा में लिखते थे और उनका उपनाम था — 'नवाब राय'। सन् 1908 में कानपुर के मशहूर 'ज़माना' प्रेस से उनकी पाँच देशभक्ति कहानियों का पहला संग्रह छपा, जिसका नाम था — 'सोज़े-वतन' (जिसका सीधा मतलब होता है — 'देश का दर्द')।
इस किताब की पहली ही कहानी थी — 'दुनिया का सबसे अनमोल रतन', जिसमें उन्होंने लिखा था कि दुनिया का सबसे कीमती मोती वह खून का कतरा है जो वतन की आजादी के लिए गिरे। यह किताब जैसे ही बाजार में आई, अंग्रेजी हुकूमत के अफसरों के होश उड़ गए!
हमीरपुर के अंग्रेज कलक्टर ने नवाब राय को अपने बंगले पर तलब किया। मेज पर सोज़े-वतन की प्रति पटकते हुए अंग्रेज अफसर चीखा — "तुम्हारी इन कहानियों में बगावत की बू आती है! तुम अंग्रेजों के खिलाफ जनता को भड़का रहे हो। तुम्हारी खुशकिस्मती है कि यह अंग्रेजी राज है, मुगलिया सल्तनत होती तो तुम्हारे दोनों हाथ काट दिए जाते!"
अंग्रेज कलक्टर ने फौरन आदेश देकर सोज़े-वतन की सभी 1,000 प्रतियों को जब्त कर आग के हवाले करवा दिया और सख्त चेतावनी दी कि अगर बिना मंजूरी एक हर्फ भी लिखा तो सीधे जेल की कालकोठरी में डाल दिए जाओगे!
अब सवाल यह था कि क्या लिखना बंद कर दिया जाए? तब उनके अजीज दोस्त और कानपुर की 'ज़माना' पत्रिका के संपादक मुंशी दयानारायण निगम ने एक नायाब रास्ता निकाला। उन्होंने कहा — "नवाब राय के नाम पर पहरा है, धनपत राय पर नहीं। तुम अपना नाम बदलकर लिखो — 'प्रेमचंद'!"
और इस तरह, दिसंबर 1910 में जब 'ज़माना' पत्रिका में मशहूर कहानी 'बड़े घर की बेटी' छपी, तो पहली बार उस पर लेखक का नाम दर्ज था — प्रेमचंद। वही नाम जो आगे चलकर इतिहास बन गया!
गांधी जी की पुकार पर सरकारी नौकरी का त्याग
अपनी लगन और मेहनत के बल पर प्रेमचंद ने पढ़ाई जारी रखी। सन् 1919 में उन्होंने अंग्रेजी, फारसी और इतिहास से बी.ए. पास किया और शिक्षा विभाग में डिप्टी इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स (उप-शिक्षा निरीक्षक) के बड़े ओहदे पर पहुँच गए। अच्छा वेतन था, सरकारी मान-सम्मान था और आराम की जिंदगी थी।
लेकिन तभी 8 फरवरी 1921 को महात्मा गांधी गोरखपुर आए। वहाँ एक विशाल जनसभा में बापू ने देशवासियों से आह्वान किया कि जो लोग देश को आजाद देखना चाहते हैं, वे अंग्रेजों की दी हुई नौकरियां और स्कूल छोड़ दें।
प्रेमचंद: "रानी! अगर मैं बापू के कहने पर सरकारी नौकरी छोड़ दूँ, तो क्या तुम रूखी-सूखी खाकर गुजारा कर लोगी? कलम घिसकर जो दो पैसे मिलेंगे, उसी में जीना होगा।"
शिवरानी देवी: "अगर देश के लिए सब कुछ न्योछावर करना पड़े, तो मैं खुशी-खुशी आपके साथ भूखी रहने को तैयार हूँ। गुलामी की रोटी से आजादी की भूख कहीं भली है!"
उस दौर में जब लोग एक छोटी सी सरकारी चपरासी की नौकरी पाने के लिए तरसते थे, प्रेमचंद ने बिना एक पल गंवाए अपने इंस्पेक्टर पद से इस्तीफा दे दिया। वे बीमार रहते थे, पेट में भयानक दर्द रहता था, बच्चे छोटे थे, लेकिन देश की आन-बान के आगे उन्होंने हर सुख हंसते-हंसते कुर्बान कर दिया।
प्रतापगढ़ व अवध किसान आंदोलन की गूंज: प्रेमाश्रम से गोदान तक
सन् 1920-21 का दौर पूरे अवध के लिए ऐतिहासिक था। इसी दौरान उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले (रूर गाँव) से बाबा रामचंद्र, झिंगुरी सिंह और सहबदीन सिंह के नेतृत्व में देश का सबसे बड़ा अवध किसान आंदोलन उठ खड़ा हुआ था। प्रतापगढ़ के हजारों किसानों ने तालुकेदारों की बेगार, नजराना और अवैध बेदखली के खिलाफ हल चलाकर अंग्रेजी राज को हिला दिया था।
प्रतापगढ़ में मास्टरी कर चुके प्रेमचंद इस आंदोलन की हर धड़कन को अपनी नसों में महसूस कर रहे थे। उन्होंने देखा कि किसान केवल मिट्टी में अन्न नहीं उगाता, बल्कि वह उस सामंती जुल्म की चक्की में पिस रहा है जहाँ थानेदार, पटवारी, जमींदार और सूदखोर सब मिलकर उसका खून चूसते हैं।
- प्रेमाश्रम (1921): किसान आंदोलन के ठीक बीच लिखा गया हिंदी का पहला किसान उपन्यास। इसमें लखनपुर गाँव के मनोहर, बलराज और कादिर खां जैसे किसान सीधे तालुकेदारों से मोर्चा लेते हैं।
- कर्मभूमि (1932): लगानबंदी और अछूतोद्धार के लिए किसानों और मजदूरों का खुला सत्याग्रह, जिसमें गाँव की महिलाएं भी लाठियों के आगे सीना तानकर खड़ी होती हैं।
- गोदान (1936): विश्व साहित्य का महाग्रंथ! बेलारी गाँव का सीधा किसान होरी महतो और उसकी स्वाभिमानी पत्नी धनिया। होरी का जीवन भर का सपना था — एक गाय पालना। लेकिन कर्ज, लगान और बिरादरी के दंड में पिसते-पिसते वह सड़क पर गश खाकर गिर पड़ता है और उसकी अंतिम सांसों पर धनिया कहती है — "महाराज, घर में न गाय है, न बछिया, न पैसा... यही बीस आने पैसे हैं, यही इनका गोदान है!"
प्रतापगढ़ और अवध की माटी का यह जीवंत यथार्थ ही प्रेमचंद के साहित्य की सबसे बड़ी रीढ़ बना। वे किताबी विद्वान नहीं थे; उन्होंने किसानों की झोपड़ियों का धुआं अपनी आँखों से देखा था और उनके फटे पैरों की बिवाइयों का दर्द खुद महसूस किया था।
'उपन्यास सम्राट' और आम आदमी की बेबाक आवाज
प्रेमचंद से पहले हिंदी साहित्य में सिर्फ परियों के किस्से, जादुई तिलिस्म (जैसे देवकीनंदन खत्री की 'चंद्रकांता') या जासूसी कहानियाँ ही छपती थीं। आम गरीब इंसान का किताबों की दुनिया में कोई वजूद ही नहीं था। प्रेमचंद ने हिंदी साहित्य का रुख पूरी तरह बदल दिया।
उन्होंने समाज के सबसे दबे-कुचले इंसानों को अपनी कहानियों का सिरमौर बनाया। जब बंगाल के सबसे विख्यात कथाकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने प्रेमचंद के उपन्यास पढ़े, तो वे दंग रह गए और उन्होंने सार्वजनिक रूप से प्रेमचंद को 'उपन्यास सम्राट' की उपाधि से नवाजा।
• हामिद (ईदगाह): तीन पैसे के मेले में जब बाकी बच्चे खिलौने और रेवड़ियां खरीदते हैं, तब छोटा हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना के लिए चिमटा खरीदता है ताकि रोटियां सेकते वक्त दादी की उंगलियां न जलें!
• हलकू और जबरा कुत्ता (पूस की रात): कड़कड़ाती ठंड में खेत की मेड़ पर फटे कंबल में ठिठुरता किसान, जो अपने पालतू कुत्ते जबरा को गले लगाकर रात काटता है।
• घीसू और माधव (कफ़न): भूख और गरीबी की उस अंधी पराकाष्ठा का दर्द, जहाँ इंसानियत भी रोटी के आगे लाचार हो जाती है।
• अलगू चौधरी व जुम्मन शेख (पंच परमेश्वर): "पंच के दिल में खुदा बसता है, पंच की जुबान से खुदा बोलता है!" — न्याय और दोस्ती की अमर मिसाल।
प्रेमचंद ने करीब 15 उपन्यास और 300 से अधिक कालजयी कहानियाँ लिखीं, जो आज 'मानसरोवर' के आठ खंडों में संगृहीत हैं।
नाम के आगे 'मुंशी' कैसे जुड़ा? जानिए असली सच्चाई
आज पूरी दुनिया उन्हें 'मुंशी प्रेमचंद' के नाम से जानती है। लेकिन बहुत कम लोग यह बात जानते हैं कि प्रेमचंद जी ने अपने जीवन में कभी भी अपने नाम के आगे खुद 'मुंशी' नहीं लिखा! वे हमेशा केवल 'प्रेमचंद' ही लिखते थे।
आम लोगों में यह गलतफहमी फैल गई कि वे अध्यापक (मास्टर) थे, इसलिए लोग आदर में उन्हें मुंशी जी कहने लगे, या कायस्थ होने के नाते उनके नाम से मुंशी जुड़ गया। लेकिन साहित्यिक शोध और ऐतिहासिक दस्तावेजों से इसका असली और प्रामाणिक भेद सामने आया:
- संयुक्त संपादन: सन् 1930 के दशक में जब बनारस से प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका 'हंस' निकलती थी, तब उसके दो संयुक्त संपादक थे — गुजरात के विख्यात साहित्यकार व राजनेता कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (के. एम. मुंशी) और प्रेमचंद।
- अल्पविराम (Comma) का कमाल: पत्रिका के मुखपृष्ठ पर संपादकों के नाम इस तरह छपते थे:
संपादक: मुंशी, प्रेमचंदयहाँ 'मुंशी' शब्द कन्हैयालाल मुंशी का संक्षिप्त नाम था और 'प्रेमचंद' हमारे कथा सम्राट का नाम था। - पाठकों की सहज समझ: आम पाठकों ने बीच के उस अल्पविराम (कोमा) पर ध्यान नहीं दिया और दोनों शब्दों को एक साथ जोड़कर 'मुंशी प्रेमचंद' पढ़ना शुरू कर दिया।
प्रेमचंद जी इतने सरल स्वभाव के थे कि जब पाठकों और प्रशंसकों ने उन्हें 'मुंशी प्रेमचंद' कहना शुरू किया, तो उन्होंने किसी को टोका नहीं, बल्कि मुस्कुराकर इस आदर को स्वीकार कर लिया। आज यह नाम इतना घुल-मिल गया है कि 'मुंशी' कहे बिना प्रेमचंद का नाम अधूरा सा लगता है!
बंबई सिनेमा का कड़वा अनुभव और 'मजदूर' फिल्म का किस्सा
प्रेस के भारी कर्ज और घर की तंगहाली से निपटने के लिए सन् 1934 में प्रेमचंद ने एक नया फैसला लिया। बंबई (मुंबई) की अजंता सिनेटोन कंपनी के मालिक मोहन भवनानी ने उन्हें फिल्मों के लिए कहानी लिखने का न्योता दिया और आठ हजार रुपये सालाना का बड़ा अनुबंध तय हुआ।
प्रेमचंद बंबई पहुँचे और उन्होंने मिल मजदूरों के दर्द पर एक सशक्त कहानी लिखी, जिस पर फिल्म बनी — 'मजदूर' (1934)। इस फिल्म में उन्होंने खुद भी एक छोटी सी भूमिका (मजदूरों के नेता) के रूप में निभाई थी।
जैसे ही 'मजदूर' फिल्म बंबई और दिल्ली के सिनेमाघरों में लगी, मिल में काम करने वाले हजारों मजदूर उसे देखने उमड़ पड़े। फिल्म में मालिकान के जुल्म और मजदूरों के हक की ऐसी सच्ची तस्वीर दिखाई गई थी कि दिल्ली और बंबई की कपड़ा मिलों में मजदूरों ने हड़ताल कर दी! घबराकर अंग्रेज सरकार ने फिल्म के प्रदर्शन पर फौरन सेंसर का चाबुक चलाकर पाबंदी लगा दी।
लेकिन प्रेमचंद को बंबई की वह बनावटी, तड़क-भड़क और पैसे की अंधी दौड़ वाली फिल्मी दुनिया बिल्कुल रास नहीं आई। फिल्म निर्माता उनकी गंभीर कहानियों में नाच-गाना और मसाला ठूंसना चाहते थे। स्वाभिमानी प्रेमचंद ने साफ कह दिया — "मैं अपनी कलम का सौदा नहीं कर सकता। जो सच नहीं है, वह मेरी कलम से कभी नहीं निकलेगा।"
वे अनुबंध का साल पूरा होने से पहले ही, दो महीने की पगार छोड़कर चुपचाप बोरिया-बिस्तर बांधा और अपनी प्रिय नगरी बनारस लौट आए!
हंस, माधुरी और सरस्वती प्रेस का कर्ज: फटे कुर्ते में शहंशाह
प्रेमचंद केवल लिखना नहीं चाहते थे, वे चाहते थे कि देश के नौजवानों और नए लेखकों को एक ऐसा मंच मिले जहाँ बिना किसी अंग्रेज अफसर के डर के सच बोला जा सके। इसी सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने बनारस में 'सरस्वती प्रेस' लगाई।
उन्होंने लखनऊ से निकलने वाली मशहूर पत्रिका 'माधुरी' का छह साल तक संपादन किया। सन् 1930 में बनारस से अपना ऐतिहासिक मासिक पत्र 'हंस' शुरू किया और सन् 1932 में साप्ताहिक 'जागरण' निकाला।
- कर्ज का भारी बोझ: सरस्वती प्रेस लगातार घाटे में चल रही थी। कागज वाले, स्याही वाले और कंपोजिटरों का पैसा चुकाने के लिए वे दिन-रात लिखते थे।
- घटिया विज्ञापनों से इनकार: कई व्यापारियों ने शराब, अश्लील दवाइयों और अंग्रेजों के वफादार सेठों के बड़े-बड़े विज्ञापन छपवाने की पेशकश की, पर प्रेमचंद ने एक झटके में ठुकरा दिया। उनका कहना था — "हंस की पवित्रता पर मैं किसी लालच का दाग नहीं लगने दूँगा।"
- शिवरानी देवी का संस्मरण: उनकी पत्नी शिवरानी देवी ने अपनी मशहूर किताब 'प्रेमचंद घर में' में लिखा है कि घर में कई बार राशन के पैसे नहीं होते थे, पर अगर कोई गरीब जरूरतमंद दरवाजे पर आ जाता तो प्रेमचंद अपनी जेब का आखिरी रुपया भी उसे दे डालते थे।
वे सचमुच फटे कुर्ते और टूटे चप्पलों में रहने वाले साहित्य के सबसे बड़े शहंशाह थे, जिनका खजाना सोने-चांदी से नहीं, बल्कि करोड़ों पाठकों के प्यार से भरा था।
1936 लखनऊ अधिवेशन: "साहित्य का उद्देश्य" और अंतिम रचना
अप्रैल 1936 का महीना हिंदी साहित्य के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। लखनऊ के रिफा-ए-आम क्लब में अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ का पहला ऐतिहासिक सम्मेलन हुआ। देश भर के तमाम बड़े लेखकों ने सर्वसम्मति से मुंशी प्रेमचंद को इस पहले सम्मेलन का सभापति (अध्यक्ष) चुना।
उस सम्मेलन में प्रेमचंद ने जो अध्यक्षीय भाषण दिया, उसका शीर्षक था — 'साहित्य का उद्देश्य'। यह भाषण केवल एक भाषण नहीं था, बल्कि भारतीय साहित्य का सबसे बड़ा घोषणा-पत्र बन गया।
"हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो — जो हम में गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं; क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है!"
— उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद (लखनऊ अधिवेशन, 1936)उन्होंने साहित्यकारों को ललकारते हुए कहा कि अब हमें सुंदरता की परिभाषा बदलनी होगी। सुंदरता केवल राजा के शीशमहल में नहीं, बल्कि खेत की मेड़ पर पसीना बहाते किसान के माथे और हथौड़ा चलाते मजदूर के फौलादी बाजुओं में देखनी होगी।
इसी दौर में वे अपने नए उपन्यास 'मंगलसूत्र' पर काम कर रहे थे। लेकिन उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा था और यह उपन्यास अधूरा ही रह गया (जिसे बाद में उनके सुपुत्र अमृत राय ने पूरा किया)।
8 अक्टूबर 1936: कलम के सिपाही का महाप्रस्थान
जिंदगी भर तंगहाली, पेट की पुरानी बीमारी (अल्सर) और रात-दिन जागकर लिखने की थकान ने आखिरकार इस महान लेखक के जिस्म को तोड़ दिया। पर उनका जज्बा आखिरी सांस तक नहीं टूटा। बिस्तर पर पड़े-पड़े भी वे अपनी आखिरी अमर कहानी 'कफ़न' और लेख लिखते रहे।
8 अक्टूबर 1936 को मात्र 56 वर्ष की आयु में बनारस में कलम के इस सबसे सच्चे सिपाही ने दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके बेटे अमृत राय ने आगे चलकर अपने पिता की जो अमर जीवनी लिखी, उसका नाम रखा — 'कलम का सिपाही'।
उनकी जन्मशती के अवसर पर 31 जुलाई 1980 को भारत सरकार के डाकतार विभाग ने उनके सम्मान में एक विशेष डाक टिकट जारी किया। उनकी रचनाएं रूसी, चीनी, अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच और दुनिया की दर्जनों भाषाओं में आज भी बड़े चाव से पढ़ी जाती हैं।
वीडियो डाक्यूमेंट्री: मुंशी प्रेमचंद की प्रामाणिक जीवन गाथा
उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद के लमही गाँव में बिताए बचपन, प्रतापगढ़ जिला स्कूल में मास्टरी, सोज़े-वतन की जब्ती, असहयोग आंदोलन और 'गोदान' की रचना तक के पूरे सफर को नीचे दी गई PK Singh की आधिकारिक वीडियो डाक्यूमेंट्री में बहुत ही सरल और गहराई के साथ दिखाया गया है:
यह डाक्यूमेंट्री वीडियो सिर्फ एक साहित्यकार का जीवन परिचय नहीं, बल्कि उस दौर के भारत, गाँव की चौपालों और आम जनता के आत्मसम्मान की सजीव दास्तान है।
❓ मुंशी प्रेमचंद के बारे में गूगल पर खोजे जाने वाले सभी प्रश्न
गूगल और इंटरनेट पर उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद के जीवन, प्रतापगढ़ प्रवास, गोदान, सोज़े-वतन और इतिहास को लेकर सबसे ज़्यादा पूछे जाने वाले प्रामाणिक सवाल व जवाब:
मुंशी प्रेमचंद (1880–1936) आधुनिक हिन्दी और उर्दू साहित्य के सबसे बड़े कथाकार थे। उनसे पहले कहानियों में सिर्फ राजा-रानियों और जासूसों के किस्से होते थे। प्रेमचंद ने पहली बार गाँव के गरीब किसान और मजदूर के सुख-दुख को साहित्य का मुख्य विषय बनाया। उनके इसी अभूतपूर्व योगदान को देखकर बंगाल के महान लेखक शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें 'उपन्यास सम्राट' की उपाधि दी थी।
उनका असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। उर्दू में वे पहले 'नवाब राय' के नाम से लिखते थे। उनका जन्म 31 जुलाई 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर के पास स्थित लमही गाँव में एक साधारण कायस्थ परिवार (डाक मुंशी अजायब राय के घर) में हुआ था।
सन् 1900 में मात्र 20 वर्ष की आयु में प्रेमचंद जी जिला स्कूल, प्रतापगढ़ में ₹20 महीने के वेतन पर सहायक अध्यापक बने थे। यहाँ उन्होंने छात्रों को अंग्रेजी और इतिहास पढ़ाया। बाद में सन् 1920 में जब प्रतापगढ़ में बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में ऐतिहासिक अवध किसान आंदोलन भड़का, तो उसी जमीनी संघर्ष ने प्रेमचंद के विश्वप्रसिद्ध उपन्यासों 'प्रेमाश्रम' और 'गोदान' की नींव रखी।
1908 में हमीरपुर में जब उनका पहला उर्दू कहानी संग्रह 'सोज़े-वतन' (देश का दर्द) छपा, तो ब्रिटिश हुकूमत ने इसे बगावत मानकर इसकी 700 प्रतियां जब्त करके सरेआम जला दीं। अंग्रेज कलेक्टर ने बिना अनुमति लिखने पर जेल की चेतावनी दी। तब कानपुर के 'ज़माना' के संपादक मुंशी दयानारायण निगम की सलाह पर उन्होंने नया छद्म नाम 'प्रेमचंद' रखकर लिखना शुरू किया।
1930 में मशहूर पत्रिका 'हंस' की शुरुआत हुई, जिसके संयुक्त संपादक कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी और प्रेमचंद दोनों थे। पत्रिका के मुख्य पृष्ठ पर लिखा जाता था: 'मुंशी, प्रेमचंद' (यानी मुंशी जी और प्रेमचंद जी)। पाठकों ने बीच का कॉमा हटाकर इसे एक ही व्यक्ति का नाम मान लिया और वे हमेशा के लिए 'मुंशी प्रेमचंद' कहलाए।
सन् 1936 में छपा 'गोदान' भारतीय किसान के शोषण का सबसे बड़ा महाकाव्य माना जाता है। इसकी कहानी लखनपुर गाँव के एक गरीब किसान होरी और उसकी पत्नी धनिया के इर्द-गिर्द घूमती है। होरी जिंदगी भर सिर्फ एक गाय पालने का सपना देखता है, लेकिन महाजनों के कर्ज और जमींदार के लगान में पिसकर अंत में दम तोड़ देता है।
8 फरवरी 1921 को गोरखपुर में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन की जनसभा में सरकारी नौकरियों के बहिष्कार का आह्वान किया। इस भाषण से प्रेरित होकर, बीमारी और घर में छह सदस्यों के भरण-पोषण की चिंता के बावजूद, प्रेमचंद जी ने ब्रिटिश हुकूमत की ₹100 महीने की सुरक्षित डिप्टी इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स की नौकरी से तत्काल इस्तीफा दे दिया।
प्रेमचंद जी ने लगभग 300 से अधिक कहानियां लिखीं, जो 'मानसरोवर' (8 भाग) में संकलित हैं। उनकी सबसे प्रसिद्ध कहानियों में 'कफ़न' (घीसू-माधव की संवेदनहीनता), 'पूस की रात' (हल्कू किसान की ठंड और मजबूरी), 'ईदगाह' (नन्हे हामिद का चिमटा), 'नमक का दारोगा' (मुंशी वंशीधर की ईमानदारी), और 'पंच परमेश्वर' प्रमुख हैं।
1934 में कर्ज चुकाने के लिए वे अजंता सिनेटोन कंपनी में कथा-लेखक बने। उन्होंने 'मजदूर' फिल्म की कहानी लिखी, जिसमें मिल मालिकों द्वारा मजदूरों के शोषण को दिखाया गया था। फिल्म देखकर बंबई और पंजाब में मजदूरों ने हड़ताल कर दी, जिससे घबराकर अंग्रेज हुकूमत ने फिल्म पर प्रतिबंध लगा दिया। फिल्मी दुनिया के व्यावसायिक समझौते रास न आने पर वे बनारस लौट आए।
प्रेमचंद जी ने बनारस में सरस्वती प्रेस की स्थापना की और 'हंस' तथा 'जागरण' पत्रिकाएं निकालीं। जनता को जागरूक करने के उद्देश्य के कारण ये पत्रिकाएं लगातार घाटे में रहीं। प्रेस को चलाने के लिए उन्हें भारी कर्ज लेना पड़ा और अपनी किताबों के सर्वाधिकार (रॉयल्टी) औने-पौने दामों में बेचने पड़े, फिर भी उन्होंने पत्रिकाएं बंद नहीं कीं।
प्रेमचंद की भाषा न तो क्लिष्ट संस्कृतनिष्ठ हिन्दी थी और न ही दुरूह फारसी उर्दू; बल्कि वह आम जनता की सहज 'हिन्दुस्तानी' थी। वे गाँव की चौपाल, खेत-खलिहान और घर-आँगन में बोले जाने वाले मुहावरों का ऐसा जीवंत प्रयोग करते थे कि अनपढ़ किसान से लेकर विद्वान भी उनकी बात को अपने दिल से महसूस कर लेता था।
आर्थिक तंगी और पेट के गंभीर अल्सर व जलोदर (Dropsy) रोग से जूझते हुए 8 अक्टूबर 1936 को मात्र 56 वर्ष की आयु में वाराणसी में उनका निधन हुआ। उनके निधन से पहले अप्रैल 1936 में लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन में उनका ऐतिहासिक भाषण 'साहित्य का उद्देश्य' आज भी साहित्य जगत के लिए मार्गदर्शक मशाल है।
- अमृत राय द्वारा रचित प्रामाणिक जीवनी: 'कलम का सिपाही' (साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त जीवनी, सरस्वती प्रेस)।
- शिवरानी देवी संस्मरण: 'प्रेमचंद घर में' (पारिवारिक यथार्थ, आर्थिक तंगी और व्यक्तिगत संघर्ष के प्रामाणिक संदर्भ)।
- डॉ. रामविलास शर्मा ग्रंथ: 'प्रेमचंद और उनका युग' (अवध किसान आंदोलन व गोदान के ऐतिहासिक संदर्भ)।
- प्रतापगढ़ जिला गजेटियर व शिक्षा अभिलेख (1900): जिला स्कूल प्रतापगढ़ में सह-अध्यापक नियुक्ति व ₹20 वेतनमान के प्रामाणिक दस्तावेज।
- हंस व जमाना पत्रिका अभिलेख (1908–1936): 'सोज़े-वतन' जब्ती आदेश, मुंशी दयानारायण निगम पत्र व्यवहार व लखनऊ प्रगतिशील लेखक संघ (1936) का ऐतिहासिक अध्यक्षीय भाषण।