प्रतापगढ़ का प्रशासनिक ढांचा: कमिश्नरी, कलेक्टरी और कचहरी का ऐतिहासिक ब्योरा
किसी भी जिले का कामकाज कैसे चलता है? कलेक्ट्रेट के बड़े हाकिम से लेकर गांव की मेड़ नापने वाले लेखपाल तक, शासन की यह मजबूत कड़ी सदियों से कैसे काम करती रही है? उत्तर प्रदेश के आधिकारिक गजेटियर (अध्याय-10: General Administration) के पन्नों में बेल्हा (प्रतापगढ़) के इसी प्रशासनिक तंत्र का एक-एक पन्ना बड़ी बारीकी से दर्ज है।
इस आलेख में हम जानेंगे कि आजादी के बाद और 1970 के दशक में प्रतापगढ़ का शासन कैसे चलता था—फैजाबाद कमिश्नरी की निगरानी, कलेक्ट्रेट में डिप्टी कमिश्नर (डीएम) की दोहरी भूमिका, 90 दिनों के जमीनी दौरे का ऐतिहासिक नियम, 3 प्रमुख तहसीलें, कचहरी की न्याय व्यवस्था और जिले में तैनात 17 सरकारी महकमों की पूरी कहानी।
🏛️ 1. फैजाबाद कमिश्नरी और मंडल स्तर का प्रशासनिक नियंत्रण
प्रतापगढ़ जिला ऐतिहासिक रूप से उत्तर प्रदेश के फैजाबाद मंडल (Faizabad Division) के छह जिलों में से एक रहा है। इस पूरे मंडल की बागडोर फैजाबाद (अब अयोध्या) में बैठने वाले कमिश्नर (आयुक्त) के हाथों में होती थी। ब्रिटिश हुकूमत के दौर में वर्ष 1929 में सबसे पहले 'कमिश्नर ऑफ रेवेन्यू एंड सर्किट' (Commissioner of Revenue and Circuit) का पद बनाया गया था।
कमिश्नर मंडल के भीतर राज्य सरकार की आंख, कान और हाथ की तरह काम करता है। जिले के भीतर जितने भी सरकारी विभाग और स्थानीय निकाय (जैसे जिला परिषद, नगरपालिका और टाउन एरिया) काम करते हैं, उन सभी के कामकाज में तालमेल बैठाना और उनकी निगरानी करना कमिश्नर की मुख्य जिम्मेदारी होती है। यदि जिले के बड़े अफसर यानी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (डीएम) को शासन से कोई भी नीतिगत बातचीत करनी हो, तो वह कमिश्नर के जरिए ही सरकार को पत्र भेजते हैं।
- आपदा प्रबंधन में सबसे आगे: जब भी जिले में या सीमावर्ती इलाकों में भीषण सूखा, बाढ़ या कोई बड़ी विपदा आती है, तो कमिश्नर फौरन राहत कार्यों की कमान संभालते हैं।
- न्यायिक अदालत: कमिश्नर ज़मींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार कानून (Zamindari Abolition and Land Reforms Act), मकान किराया नियंत्रण (Rent Control and Eviction Act) और एंटी-गुंडा एक्ट के तहत अपीलों और रिवीजनों की सुनवाई करते हैं।
- परिवहन प्राधिकरण: वे रीजनल ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी (RTA) के पदेन चेयरमैन होते हैं, जो पूरे क्षेत्र के बस-ट्रक परमिट और परिवहन व्यवस्था तय करता है।
- स्थानीय निकायों पर नियंत्रण: जिला परिषद, नगर पालिका और टाउन एरिया कमेटियों के बड़े बजट, निर्माण योजनाओं और टाउन एरिया के सदस्यों को हटाने तक की अंतिम मंजूरी कमिश्नर के स्तर से ही मिलती है।
- सहायक अमला: विकास कार्यों की देखरेख के लिए कमिश्नर की मदद हेतु एक डिप्टी या जॉइंट डेवलपमेंट कमिश्नर और अदालती मुकदमों के निपटारे के लिए एक एडिशनल कमिश्नर (अपर आयुक्त) तैनात रहते हैं।
⚖️ 2. जिले के हाकिम: कलेक्ट्रेट और डीएम की दोहरी भूमिका
प्रतापगढ़ जिले के सर्वोच्च प्रशासनिक मुखिया को आम बोलचाल में डीएम (District Magistrate) कहा जाता है। लेकिन गजेटियर के अनुसार, अवध के इस ऐतिहासिक जिले में जिला अधिकारी की दोहरी पहचान होती है:
- डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (ज़िला मजिस्ट्रेट): फौजदारी और आपराधिक प्रशासन का मुखिया होने के नाते उन्हें 'डीएम' कहा जाता है। इस रूप में उनका सबसे बड़ा कर्तव्य जिले में शांति, अमन-चैन और कानून-व्यवस्था (Law and Order) बनाए रखना है।
- डिप्टी कमिश्नर (उपायुक्त): मालगुजारी और राजस्व प्रशासन (Revenue Administration) का मुखिया होने के नाते उन्हें 'डिप्टी कमिश्नर' कहा जाता है। इस रूप में उनकी मुख्य जिम्मेदारी किसानों से भू-राजस्व वसूलना, सरकारी कर्जों की भरपाई कराना और जमीन के सरकारी रिकॉर्ड दुरुस्त रखना है।
जिले में राज्य सरकार के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (Chief Executive Officer) के रूप में सरकार के हर आदेश, नियम और योजना को जमीन पर उतारना उन्हीं का काम होता है। जिले के पुलिस कप्तान यानी पुलिस अधीक्षक (SP) के साथ मिलकर डीएम यह सुनिश्चित करते हैं कि किसी भी प्रकार की हिंसा, उपद्रव या अपराध न पनपे। साथ ही, जिले की जेल में बंद कैदियों के रहन-सहन और अदालतों में चल रहे मुकदमों की पैरवी पर भी डीएम की सीधी नजर रहती है।
भू-राजस्व वसूली के साथ-साथ जिले के कोषागार (District Treasury) का संचालन भी डिप्टी कमिश्नर के अधीन होता है, जिसे रोजमर्रा के स्तर पर ट्रेजरी ऑफिसर संभालते हैं। इसके अलावा चकबंदी (Consolidation of Holdings) के कामकाज की निगरानी, राशन की दुकानों (Fair Price Shops) के जरिए सस्ते अनाज का वितरण (जिसकी सीधी देखरेख जिला पूर्ति अधिकारी - DSO करते हैं), और चुनाव आयोग के प्रतिनिधि के रूप में जिले में लोकसभा व विधानसभा के निष्पक्ष चुनाव कराने का दायित्व (पदेन जिला निर्वाचन अधिकारी) भी डीएम के कंधों पर होता है।
वे जिले के भूतपूर्व सैनिकों और देश की सरहदों पर तैनात जवानों के परिवारों की भलाई देखने वाले 'जिला सैनिक, नाविक और वायुसैनिक बोर्ड' के भी पदेन अध्यक्ष होते हैं।
🌾 3. 90 दिनों के देहाती दौरे का नियम और आपदा राहत प्रबंधन
प्रतापगढ़ गजेटियर में जिला अधिकारी के कर्तव्य का एक बेहद अनूठा और मानवीय पहलू दर्ज है। उस जमाने में डीएम को सिर्फ दफ्तर में बैठकर फाइलें नहीं पलटनी होती थीं, बल्कि गजेटियर के नियम अनुसार:
"डिप्टी कमिश्नर से यह अनिवार्य अपेक्षा की जाती है कि वे हर साल कम से कम 90 दिन जिले के देहातों का सघन दौरा करें।"
इस 90 दिनों के ग्रामीण प्रवास का मकसद यह था कि जिले का सबसे बड़ा हाकिम खुद गांव-गांव जाकर किसानों की असल हालत देखे, उनकी खेती-किसानी की समस्याएं समझे और यह जांचे कि सरकार की विकास योजनाएं सचमुच गरीबों तक पहुंच रही हैं या सिर्फ कागजों में सिमट गई हैं।
जब भी बेल्हा की धरती पर कोई कुदरती आफत आती थी—जैसे सई या गंगा की बाढ़, सूखा, बेमौसम ओलावृष्टि, आग लगने की घटनाएं या टिड्डी दल (Locust Invasion) का हमला—तो कलेक्ट्रेट का रुख फौरन बदल जाता था। ऐसे संकट के समय डीएम की प्रमुख जिम्मेदारियां इस प्रकार होती थीं:
- संकट आने से पहले ही चेतावनी जारी करना और जान-माल के नुकसान को न्यूनतम करने के पुख्ता इंतजाम करना।
- बाढ़ या आग पीड़ितों को तुरंत मुफ्त राशन, दवाइयां और अस्थायी तंबू उपलब्ध कराना।
- किसानों को नए सिरे से खड़ा करने के लिए तकावी कर्ज (Taccavi Loans), अनुदान (Subsidies) और अनुग्रह सहायता राशि (Gratuitous Relief) मंजूर करना।
- यदि आपदा बहुत भीषण हो और लोगों के पास मजदूरी न बचे, तो तुरंत सरकारी 'टेस्ट रिलीफ वर्क' (Test Works) शुरू करवाना, ताकि जरूरतमंदों को तत्काल काम और मजदूरी मिल सके।
- फसलें तबाह होने पर सरकार को किसानों की मालगुजारी (भू-राजस्व) माफ करने या स्थगित (Remission & Suspension) करने की औपचारिक सिफारिश भेजना।
📐 4. जिले की 3 ऐतिहासिक तहसीलें और प्रशासनिक अमला
प्रशासनिक सहूलियत, राजस्व वसूली और कानून व्यवस्था की देखरेख के लिए पूरे प्रतापगढ़ जिले को 3 उप-प्रभागों (Subdivisions) में बांटा गया था, जो इसी नाम की 3 तहसीलें भी थीं:
- 1. प्रतापगढ़ सदर (Pratapgarh Sadar): जिले का मध्य और मुख्यालय क्षेत्र।
- 2. कुंडा (Kunda): गंगा के किनारे बसा पश्चिमी उप-प्रभाग।
- 3. पट्टी (Patti): सई नदी के पार का पूर्वी उप-प्रभाग।
हर उप-प्रभाग की कमान एक उप-प्रभागीय अधिकारी (SDO / SDM - Subdivisional Magistrate) के हाथों में होती थी। ये अधिकारी जिला मुख्यालय पर रहते थे लेकिन लगातार अपनी तहसील और गांवों का दौरा करते रहते थे। जमीन से जुड़े झगड़े सुलझाना, धारा 144 और शांति व्यवस्था देखना, गांव सभा की भूमि प्रबंध समितियों (Land Management Committees) के कामों की जांच करना और विकास कार्यों को आगे बढ़ाना एसडीएम का दैनिक काम था।
वहीं तहसील की जमीनी व्यवस्था के सर्वेसर्वा तहसीलदार होते थे। तहसीलदार तहसील का उप-कोषागार अधिकारी (Sub-treasury Officer) भी होता था और प्रथम श्रेणी का असिस्टेंट कलेक्टर व मजिस्ट्रेट भी। तहसीलदार के नीचे नायब तहसीलदार, सुपरवाइजर कानूनगो और लेखपालों की पूरी फौज काम करती थी।
| प्रशासनिक पद | कुल संख्या (1972-73) | कार्यक्षेत्र व मुख्य जिम्मेदारियां |
|---|---|---|
| उप-प्रभागीय अधिकारी (SDM / SDO) | 3 (सदर, कुंडा, पट्टी) | उप-प्रभाग में कानून-व्यवस्था, विकास कार्यों की निगरानी, राजस्व व फौजदारी मुकदमों की अदालत। |
| तहसीलदार (Tahsildar) | 3 | मालगुजारी की वसूली, तहसील सब-ट्रेजरी की कमान, प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट व सहायक कलेक्टर के अधिकार। |
| नायब तहसीलदार (Naib Tahsildar) | 11 | तहसीलदार के सहायक; नामान्तरण (दाखिल-खारिज), राजस्व मुकदमों की सुनवाई और मौके पर पैमाइश। |
| सुपरवाइजर कानूनगो (Kanungo) | 12 | लेखपालों के काम की जांच, खसरा-खतौनी का मिलान, फसल पड़ताल (गश्त) और सीमा चिह्नों का निरीक्षण। |
| लेखपाल (Lekhpal / पटवारी) | 320 | गांव के नक्शे, खसरे और खतौनी का वास्तविक रख-रखाव, फसल गिरदावरी, आपदा नुकसान का प्रारंभिक आकलन। |
| सब-रजिस्ट्रार (Sub-Registrar) | 3 (प्रत्येक तहसील में 1) | जमीन, मकान, बैनामा, पावर ऑफ अटॉर्नी और अचल संपत्ति के कानूनी दस्तावेजों का आधिकारिक पंजीकरण। |
🛡️ 5. पुलिस महकमा और अमन-चैन की व्यवस्था
जिले में शांति व्यवस्था बनाए रखने और अपराधों पर नकेल कसने का काम जिला पुलिस संगठन करता था। पुलिस महकमे के सर्वोच्च मुखिया पुलिस अधीक्षक (Superintendent of Police - SP) होते थे। पुलिस एक्ट (1861 का अधिनियम 5) और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत एसपी पुलिस बल के अनुशासन और कार्यकुशलता के लिए जिम्मेदार होते थे, जबकि पूरे जिले की पुलिसिंग का सामान्य नियंत्रण डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के पास रहता था।
पुलिस अधीक्षक की सहायता के लिए जिले में 2 पुलिस उपाधीक्षक (Deputy Superintendent of Police - Dy. SP / CO) और सर्किल स्टाफ तैनात रहते थे। पुलिस बल का काम थानों में रिपोर्ट दर्ज करना, वारंट तामील कराना, संगीन जुर्मों की तफ्तीश करना और कचहरी में चालान पेश करना था।
जिले के ग्रामीण इलाकों में सुरक्षा की सबसे बुनियादी इकाई गांव का चौकीदार होता था, जो थाने को गांव की हर संदिग्ध गतिविधि, मौत और अपराध की पहली सूचना देता था।
⚖️ 6. न्यायपालिका: जिला जज और कचहरी की अदालतें
प्रतापगढ़ जिले में न्याय व्यवस्था की कमान जिला एवं सत्र न्यायाधीश (District and Sessions Judge) के हाथों में केंद्रित थी। इनका मुख्यालय प्रतापगढ़ शहर (बेल्हा) में था और यह सीधे इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) के अधीन काम करते थे।
जिला जज जिले में दीवानी (Civil) और फौजदारी (Criminal) दोनों प्रकार के मामलों में न्याय की सर्वोच्च अदालत होते थे। उनके मुख्य अधिकार इस प्रकार थे:
- निचली आपराधिक अदालतों (मजिस्ट्रेट कोर्ट्स) के फैसलों के खिलाफ आने वाली फौजदारी अपीलों और रिवीजनों की अंतिम सुनवाई करना।
- जिले के सिविल जज (Civil Judge) और मुंसिफ (Munsif) अदालतों के फैसलों के खिलाफ दीवानी अपीलों का निपटारा करना।
- गंभीर आपराधिक मामलों (जैसे हत्या, डकैती) का सत्र परीक्षण (Sessions Trial) चलाना और सजा सुनाना।
- जिला एवं सत्र न्यायाधीश के फैसलों के खिलाफ अपील केवल इलाहाबाद हाईकोर्ट में ही की जा सकती थी।
🏢 7. जिले के 17 अन्य प्रमुख राज्य स्तरीय विभाग
कलेक्ट्रेट और पुलिस के अलावा जिले के विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती और बुनियादी ढांचे को संभालने के लिए विभिन्न सरकारी विभागों के जिला स्तरीय अधिकारी बेल्हा में तैनात रहते थे। ये सभी अपने-अपने विभागों के प्रांतीय निदेशकों के अधीन काम करते थे, लेकिन जिले में समग्र विकास हेतु डीएम और जिला योजना अधिकारी (DPO / ADM Planning) के साथ मिलकर काम करते थे:
| क्रमांक | अधिकारी का पदनाम | संबंधित विभाग व मुख्य दायित्व |
|---|---|---|
| 1 | मुख्य चिकित्सा अधिकारी (Chief Medical Officer - CMO) | जिले के सभी सरकारी अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) और महामारी नियंत्रण की कमान। |
| 2 | जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) | जिले के माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों, शिक्षकों और बोर्ड परीक्षाओं का प्रबंधन। |
| 3 | बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) | ग्रामीण व शहरी प्राथमिक और जूनियर हाईस्कूलों की शिक्षा व्यवस्था और शिक्षकों की देखरेख। |
| 4 | जिला कृषि अधिकारी (DAO) | उन्नत बीजों, उर्वरकों का वितरण, खेती की नई तकनीकों का प्रसार और कृषि रक्षा। |
| 5 | सहायक निबंधक, सहकारी समितियां (AR Co-operative) | सहकारी बैंकों, प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) और खाद-बीज केंद्रों का संचालन। |
| 6 | बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी (Settlement Officer Consolidation) | जमीनों की चकबंदी, किसानों के बिखरे खेतों को एक जगह इकट्ठा करने और चक नक्शों की पुष्टि। |
| 7 | अधिशासी अभियंता, सिंचाई (EE Irrigation) | शारदा सहायक नहर प्रणाली, रजवाहों और सरकारी नलकूपों के पानी का प्रबंधन। |
| 8 | अधिशासी अभियंता, लोक निर्माण (EE PWD) | जिले की पक्की सड़कों, पुल-पुलियों, डाक बंगलों और सरकारी इमारतों का निर्माण व मरम्मत। |
| 9 | जिला उद्योग अधिकारी (District Industries Officer) | आंवला प्रसंस्करण, छोटे कुटीर उद्योगों, हथकरघा और ग्रामीण कारखानों को बढ़ावा देना। |
| 10 | जिला पंचायत राज अधिकारी (DPRO) | ग्राम पंचायतों के चुनाव, ग्राम सभा फंड और ग्रामीण स्वच्छता कार्यों की देखरेख। |
| 11 | जिला पशुधन अधिकारी (District Livestock Officer) | पशु चिकित्सालयों, कृत्रिम गर्भाधान केंद्रों और मवेशियों के टीकाकरण का संचालन। |
| 12 | जिला पूर्ति अधिकारी (DSO) | राशन की दुकानों से चीनी, मिट्टी तेल, अनाज का कोटा और किराया नियंत्रण (Rent Control)। |
| 13 | जिला रोजगार अधिकारी (Employment Officer) | शिक्षित बेरोजगारों का पंजीकरण और विभिन्न विभागों में भर्ती के अवसर मुहैया कराना। |
| 14 | जिला समाज कल्याण अधिकारी (Social Welfare Officer) | कमजोर वर्गों, छात्रवृत्तियों, विधवा/वृद्धावस्था पेंशन और समाज कल्याण योजनाओं का क्रियान्वयन। |
| 15 | जिला सांख्यिकी अधिकारी (District Statistics Officer) | जिले के आर्थिक-सामाजिक आंकड़ों, जनगणना और उत्पादन रिपोर्ट का संकलन। |
| 16 | जिला सूचना अधिकारी (District Information Officer - DIO) | सरकारी नीतियों का प्रचार-प्रसार, प्रेस रिलीज और मीडिया समन्वय। |
| 17 | जिला परिवीक्षा अधिकारी (District Probation Officer) | किशोर अपराधियों और परिवीक्षा पर छूटे कैदियों का पुनर्वास व सामाजिक निगरानी। |
🇮🇳 8. जिले में केंद्र सरकार के दफ्तर और रेलवे नेटवर्क
राज्य सरकार के दफ्तरों के साथ-साथ प्रतापगढ़ में भारत सरकार (Central Government) के भी कई महत्वपूर्ण महकमे सीधे काम कर रहे थे। गजेटियर में दर्ज इन केंद्रीय कार्यालयों की रूपरेखा इस प्रकार है:
1. आयकर विभाग (Income-tax Department)
प्रतापगढ़ का आयकर प्रशासन सीधे अपीलीय आयकर आयुक्त, इलाहाबाद के क्षेत्राधिकार में आता था। जिले के व्यापारियों और करदाताओं के मुकदमों की सुनवाई इलाहाबाद में बैठने वाले आयकर अधिकारी उनकी आय और वित्तीय सीमा (Pecuniary Jurisdiction) के आधार पर करते थे।
2. केंद्रीय उत्पाद शुल्क (Central Excise)
केंद्रीय आबकारी प्रशासन के लिए प्रतापगढ़ जिला सेंट्रल एक्साइज डिवीजन इलाहाबाद के अंतर्गत आता था। जिले को दो प्रमुख रेंजों में बांटा गया था:
- प्रतापगढ़ रेंज (Pratapgarh Range): मुख्यालय बेल्हा शहर।
- कुंडा रेंज (Kunda Range): मुख्यालय कुंडा कस्बा।
हर रेंज में एक सेंट्रल एक्साइज इंस्पेक्टर तैनात रहता था, जो सहायक कलेक्टर केंद्रीय उत्पाद शुल्क, इलाहाबाद के सीधे नियंत्रण में काम करता था। जिले में मुख्य रूप से तंबाकू (Tobacco) के व्यापार और पावरलूम के कपड़े (Power-loom cloth) पर उत्पाद शुल्क की निगरानी की जाती थी।
3. राष्ट्रीय बचत संगठन (National Savings Organisation)
इस महकमे का मुख्य उद्देश्य समाज में महंगाई के असर को कम करना और आम जनता व किसानों में छोटी-छोटी बचत करने की आदत डालना था। इसके लिए डाकघर बचत पत्र, राष्ट्रीय बचत प्रमाण पत्र (NSC) जैसी योजनाएं चलाई जाती थीं। प्रतापगढ़ में एक जिला आयोजक (District Organiser) तैनात रहता था, जो सहायक क्षेत्रीय निदेशक राष्ट्रीय बचत, फैजाबाद के मार्गदर्शन में कार्य करता था।
4. भारतीय डाक एवं तार विभाग (Post & Telegraph)
जिले का डाक-तार नेटवर्क काफी सशक्त था। यह पूरा महकमा प्रभागीय डाक अधीक्षक (Divisional Superintendent of Post Offices, Pratapgarh) के अधीन था। उनकी सहायता के लिए 6 डाक निरीक्षक (Inspectors) तैनात थे।
बेल्हा स्थित प्रधान डाकघर (Head Post Office) की कमान मुख्य पोस्टमास्टर के हाथ में थी, जबकि जिले के विभिन्न कस्बों में फैले 11 उप-डाकघरों (Sub-post offices) को सब-पोस्टमास्टर संभालते थे।
5. रेलवे नेटवर्क (Northern Railway)
प्रतापगढ़ जिला उत्तर रेलवे (Northern Railway - ब्रॉड गेज / बड़ी लाइन) से अच्छी तरह जुड़ा हुआ था। प्रतापगढ़ जंक्शन हावड़ा-अमृतसर मुख्य लाइन और इलाहाबाद-फैजाबाद शाखा लाइन का एक बेहद व्यस्त और रणनीतिक रेलवे जंक्शन था। इसके अतिरिक्त रायबरेली से इलाहाबाद को जोड़ने वाली एक अन्य रेल लाइन जिले की कुंडा तहसील से होकर गुजरती थी, जिससे जिले के पश्चिमी छोर को बेहतरीन रेल कनेक्टिविटी मिलती थी।
| केंद्रीय विभाग | क्षेत्रीय नियंत्रण / मुख्यालय | प्रतापगढ़ में प्रशासनिक इकाई | कार्य व दायरा |
|---|---|---|---|
| आयकर विभाग | अपीलीय आयुक्त, इलाहाबाद | इलाहाबाद के आईटीओ द्वारा क्षेत्राधिकार अनुसार कार्य | व्यापारियों और करदाताओं की आय पर टैक्स निर्धारण। |
| केंद्रीय उत्पाद शुल्क | सेंट्रल एक्साइज डिवीजन, इलाहाबाद | 2 रेंज (प्रतापगढ़ व कुंडा), 2 इंस्पेक्टर | तंबाकू उत्पादन और पावरलूम वस्त्रों पर आबकारी शुल्क वसूली। |
| राष्ट्रीय बचत संगठन | सहायक क्षेत्रीय निदेशक, फैजाबाद | जिला आयोजक (District Organiser), प्रतापगढ़ | अल्प बचत, डाकघर बचत योजनाओं और एनएससी का प्रचार। |
| डाक एवं तार विभाग | प्रभागीय डाक अधीक्षक, प्रतापगढ़ | 1 प्रधान डाकघर, 11 उप-डाकघर, 6 इंस्पेक्टर | पत्र, पार्सल, मनीऑर्डर, टेलीग्राम और बचत बैंक सेवाएं। |
| उत्तर रेलवे (NR) | मंडल रेल प्रबंधक, लखनऊ | प्रतापगढ़ जंक्शन व कुंडा तहसील स्टेशन | हावड़ा-अमृतसर मुख्य लाइन व इलाहाबाद-अयोध्या रेल आवागमन। |
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
ऐतिहासिक गजेटियर के अनुसार, प्रतापगढ़ फैजाबाद मंडल (Faizabad Division) के छह जिलों में से एक था। कमिश्नर का मुख्यालय फैजाबाद (वर्तमान अयोध्या) में था। कमिश्नर का पद 1929 में 'कमिश्नर ऑफ रेवेन्यू एंड सर्किट' के रूप में सृजित किया गया था।
यह पद दोहरी जिम्मेदारी संभालता है। फौजदारी कानून और अमन-चैन बनाए रखने के कारण वे डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (DM) कहलाते हैं, जबकि भू-राजस्व (मालगुजारी) और सरकारी बकायों की वसूली का मुखिया होने के कारण उन्हें अवध क्षेत्र की परंपरा अनुसार डिप्टी कमिश्नर (उपायुक्त) कहा जाता है।
डिप्टी कमिश्नर से यह अनिवार्य अपेक्षा रखी जाती थी कि वे साल में कम से कम 90 दिन गांवों का दौरा करें, ताकि वे किसानों और ग्रामीणों की वास्तविक दशा को अपनी आँखों से देख सकें और विकास योजनाओं की जमीनी हकीकत परख सकें।
उस समय जिले में 3 तहसीलें थीं—प्रतापगढ़ सदर, कुंडा और पट्टी। इन तीनों तहसीलों के कामकाज को संभालने के लिए 11 नायब तहसीलदार, 12 सुपरवाइजर कानूनगो और 320 लेखपाल तैनात थे।
जिले में सेंट्रल एक्साइज की दो रेंज थीं (प्रतापगढ़ सदर और कुंडा)। यहां मुख्य रूप से तंबाकू (Tobacco) के व्यापार और पावरलूम से बनने वाले कपड़े पर आबकारी शुल्क की निगरानी और वसूली की जाती थी।
प्रतापगढ़ का प्रशासनिक ढांचा इस बात का जीता-जागता सबूत है कि एक विशाल ग्रामीण जिले में व्यवस्था, कानून और जन-कल्याण का संतुलन कैसे बनाया जाता था। कमिश्नरी से लेकर गांव के लेखपाल तक, हर पद की जिम्मेदारी बिल्कुल साफ तय थी। बाढ़-सूखे जैसी आफतों में तुरंत तकावी और टेस्ट रिलीफ वर्क शुरू कराने की संवेदनशील व्यवस्था हो या फिर 90 दिनों तक देहात में रहकर जनता की नब्ज टटोलने का नियम, यह ऐतिहासिक प्रशासनिक व्यवस्था आज भी हमारे शासन तंत्र की मजबूत बुनियाद बनी हुई है।