प्रतापगढ़ का संपूर्ण प्रामाणिक इतिहास: सरकारी गजेटियर से जानिए आदिमानव से लेकर 1947 की आज़ादी तक की पूरी दास्तान
उत्तर प्रदेश डिस्ट्रिक्ट गजेटियर (District Gazetteer: Pratapgarh, 1980) के अध्याय-2 (पृष्ठ 16 से 54) का प्रामाणिक, रोचक और कालक्रमानुसार अध्ययन: सराय नाहर राय की पुरापाषाण गुफाओं, बौद्ध स्तूपों, कड़ा-मानिकपुर के तख्तापलट, राजा प्रताप सिंह द्वारा किले की नींव से लेकर 1857 के संग्राम और 1920 के ऐतिहासिक किसान आंदोलन की संपूर्ण गाथा!
🏺 1. प्रागैतिहासिक काल: 10,000 साल पहले जब बेल्हा में इंसान ने कदम रखा
सराय नाहर राय: पूरे भारत में मध्यपाषाण काल की सबसे पुरानी मानव बस्ती
सरकारी गजेटियर (पृष्ठ 16-17) के अनुसार, प्रतापगढ़ की धरती का इतिहास किसी राजा या बादशाह से नहीं, बल्कि पाषाण काल के आदिमानव से शुरू होता है। जिले की कुंडा तहसील में सई नदी की पुरानी छाड़न (गोखुर झील) के किनारे स्थित 'सराय नाहर राय' पूरे गंगा मैदान की सबसे प्राचीन पुरातात्विक साइट है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय और राज्य पुरातत्व विभाग के उत्खनन में यहाँ से 8395 ईसा पूर्व (कार्बन डेटिंग विधि द्वारा प्रमाणित) के मानव कंकाल, हड्डियों के बने नुकीले बाणाग्र, छोटे-छोटे चकमक पत्थर के औजार (माइक्रोलिथ्स) और सामुदायिक चूल्हे (Hearths) मिले हैं। यहाँ का आदिमानव शिकार करता था, जंगली जानवरों (सांभर, बारहसिंगा, गैंडा) का मांस आग पर भूनता था और सामूहिक बस्तियों में रहता था। यह खोज साबित करती है कि प्रतापगढ़ पिछले दस हजार वर्षों से निरंतर आबाद रहा है!
तुसारन बिहार, बिहार और प्राचीन बौद्ध टीले
गजेटियर के अनुसार, कुंडा तहसील का 'बिहार' कस्बा किसी जमाने में एक बहुत बड़ा बौद्ध मठ था, जिसके नाम पर ही इसका नाम 'बिहार' (विहार) पड़ा। यहाँ के दक्षिण-पूर्व में स्थित तुसारन बिहार (तुषारम बिहार) की स्थापना कुषाण/शक राजाओं (Tusharas) द्वारा मानी जाती है।
बौद्ध ग्रंथों और स्थानीय परंपरा के अनुसार, स्वयं तथागत भगवान बुद्ध यहाँ तीन महीने तक साधना हेतु ठहरे थे। सम्राट अशोक के समय यहाँ करीब 200 फीट ऊंचा एक विशाल बौद्ध स्तूप बनवाया गया था, जिसमें भगवान बुद्ध के बाल और नाखून (केश व नख धातु) संरक्षित रखे गए थे। इसके पास ही एक भव्य लाल बौद्ध विहार (सुआ बिहार) और प्राचीन सूर्य मंदिर के नक्काशीदार पत्थर और खंभे आज भी टीलों में बिखरे मिलते हैं।
🏹 2. रामायण, महाभारत और 16 महाजनपदों का कालखंड
अयोध्या के सूर्यवंशी राजा और भगवान राम का वनगमन
गजेटियर के पृष्ठ 20-22 के मुताबिक, प्राचीन काल में प्रतापगढ़ का समूचा क्षेत्र कोशल राज्य (Kosala Kingdom) का अभिन्न अंग था, जिसकी राजधानी अयोध्या थी। अयोध्या के महान सूर्यवंशी चक्रवर्ती राजा सगर, दिलीप, रघु, दशरथ और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की यह पावन कर्मभूमि रही।
जब भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण 14 वर्ष के वनवास के लिए निकले, तो वे तमसा और गोमती को पार कर सई नदी के किनारे पहुंचे। सई नदी को उन्होंने प्रतापगढ़ की पावन धरती पर ही पार किया (जिसका साक्ष्य आज भी घुइसरनाथ धाम, बेलहा देवी और मानिकपुर गंगा तट के रूप में पूज्य है)। वाल्मीकि रामायण में क्रौंच पक्षी के वध की घटना भी इसी पावन सई-गंगा कछार की मानी जाती है।
महाभारत काल: पांडवों का अज्ञातवास और भीम द्वारा बकासुर वध
महाभारत काल में इस क्षेत्र पर शक्तिशाली राजा दीर्घयज्ञ का शासन था, जिसे भीमसेन ने अपने दिग्विजय अभियान में पराजित किया था। लाक्षागृह की आग से बचकर निकलने के बाद पांडवों ने अवध के इन सघन वनों में अज्ञातवास का समय बिताया था।
प्रतापगढ़ की बकुलाही नदी के तट पर स्थित भयहरणनाथ धाम (Bhaiharannath) को गजेटियर और लोक-इतिहास महाभारत कालीन 'एकचक्रा नगरी' से जोड़ता है। इसी पावन स्थल पर महाबली भीम ने नरभक्षी राक्षस बकासुर का वध करके निर्दोष ग्रामीणों को उसके भय से मुक्त कराया था और भगवान शिव के शिवलिंग की स्थापना की थी।
🏛️ 3. मौर्य, शुंग, गुप्त साम्राज्य और चीनी यात्री ह्वेन त्सांग
गुप्त साम्राज्य का केंद्रीय हृदय और सम्राट हर्ष का 'अयमुख'
6वीं शताब्दी ईसा पूर्व में कोशल 16 महाजनपदों में शामिल हुआ। मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त और चक्रवर्ती अशोक के समय बौद्ध धर्म का यहाँ व्यापक प्रसार हुआ। इसके बाद शुंग और कुषाण वंश के सिक्के इस क्षेत्र से बहुतायत में मिले हैं।
320 ईस्वी में जब गुप्त साम्राज्य का उदय हुआ, तो प्रयागराज के ठीक उत्तर में स्थित प्रतापगढ़ गुप्तों के मूल गृह-राज्य (Heartland) में शामिल था। समुद्रगुप्त की प्रसिद्ध प्रयाग प्रशस्ति इसका प्रमाण देती है। 7वीं सदी में जब कन्नौज के सम्राट हर्षवर्धन (606–647 ई.) का शासन था, तब प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन त्सांग (Hiuen Tsang) इस क्षेत्र से गुजरा था। उसने अपने यात्रा-वृत्तांत में 'ओ-ये-मु-खी' (Hayamukha/Ayomukha) राज्य का सजीव वर्णन किया है, जिसकी पहचान इतिहासकारों ने मानिकपुर-बिहार और गंगा कछार के रूप में की है।
🛡️ 4. भर (Bhar) काल और मानिकपुर का ऐतिहासिक उदय
भर राजाओं का शासन और मानिकचंद द्वारा मानिकपुर की स्थापना
सम्राट हर्ष के पतन के बाद पूरे अवध में स्थानीय जनजातीय शक्ति 'भर' (Bhars) अत्यंत शक्तिशाली हो गई। भरों ने पूरे प्रतापगढ़ में मिट्टी के मजबूत दुर्ग (कोट और खेड़े) बनवाए। गजेटियर के अनुसार भरों का सबसे मुख्य प्रशासनिक केंद्र सई नदी के पास स्थित हिंडौर (Hindaur) था, और पट्टी तहसील में भी उनका जबरदस्त दबदबा था।
11वीं-12वीं सदी में कन्नौज के गहड़वाल राजा जयचंद के सौतेले भाई राजा मानिकचंद ने गंगा किनारे स्थित प्राचीन मानपुर (या मानदेव) को जीतकर अपनी राजधानी बनाया और इसका नाम बदलकर 'मानिकपुर' (Manikpur) रखा। इसी काल में यमुना पार अरगल के गौतम राजपूतों ने भरों को हराकर जिले के दक्षिणी हिस्से पर अपना अधिकार जमाया। बाद में सोमवंशी, बिसेन और बछगोती राजपूतों ने भरों के किलों को जीतकर अपनी-अपनी रियासतों की नींव डाली।
⚔️ 5. दिल्ली सल्तनत का दौर: कड़ा-मानिकपुर का तख्तापलट और अलाउद्दीन खिलजी
मलिक छज्जू का विद्रोह (1290 ई.) और कड़ा-मानिकपुर की सूबेदारी
1194 में शहाबुद्दीन गोरी द्वारा जयचंद को हराने के बाद मानिकपुर दिल्ली सल्तनत के अधीन आ गया। सल्तनत काल में कड़ा-मानिकपुर (Kara-Manikpur) पूरे उत्तर भारत का सबसे महत्वपूर्ण और ताकतवर फौजी सूबा बन गया। जो भी कड़ा-मानिकपुर का सूबेदार बनता था, वह दिल्ली की गद्दी को चुनौती देने की ताकत रखता था।
1290 ई. में सुल्तान गयासुद्दीन बलबन के भतीजे मलिक छज्जू ने मानिकपुर में बगावत कर दी। उसने मानिकपुर में खुद का राज्याभिषेक करवाया, अपना नाम 'सुल्तान मुगीसुद्दीन' रखा, अपने नाम के सिक्के ढलवाए और दिल्ली जीतने के लिए फौज लेकर कूच किया। हालांकि सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी के बेटे अरकली खान ने उसे हरा दिया।
1296 ई. की ऐतिहासिक घटना: अलाउद्दीन खिलजी द्वारा चाचा जलालुद्दीन की हत्या
मलिक छज्जू की बगावत के बाद 1291 ई. में सुल्तान जलालुद्दीन ने अपने भतीजे और दामाद अलाउद्दीन खिलजी को कड़ा-मानिकपुर का सूबेदार बनाया। अलाउद्दीन ने मानिकपुर से ही दक्षिण भारत के देवगिरि (महाराष्ट्र) पर ऐतिहासिक चढ़ाई की और वहाँ से सोने, चांदी, जवाहरात और मोतियों का अथाह खजाना लूटकर मानिकपुर लौटा।
जब बूढ़े सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी को इस खजाने का पता चला, तो वह अपने भतीजे से मिलने निहत्थे मानिकपुर आए। 20 जुलाई 1296 को मानिकपुर में गंगा के किनारे जैसे ही सुल्तान अपनी नाव से उतरकर अलाउद्दीन से गले मिले, अलाउद्दीन के इशारे पर उसके सैनिकों (इख्तियारुद्दीन हूद) ने सुल्तान की तलवार से गर्दन काट दी!
गजेटियर दर्ज करता है कि खून से लथपथ सुल्तान जलालुद्दीन का कटा सिर एक भाले की नोक पर टांगकर मानिकपुर की गलियों और बाजारों में घुमाया गया और अलाउद्दीन ने खुद को दिल्ली का सुल्तान घोषित कर दिया! सुल्तान जलालुद्दीन का धड़ मानिकपुर के पास खेमसिना गाँव में दफनाया गया और अलाउद्दीन मानिकपुर का सारा खजाना लेकर दिल्ली की गद्दी हथियाने निकल पड़ा।
🏰 6. मुगल काल और 1617 ई. में 'प्रतापगढ़' शहर व किले की स्थापना
अकबर का मानिकपुर अभियान और मानिकपुर सरकार (1567 ई.)
1532 ई. में मुगल बादशाह हुमायूं ने सई नदी के किनारे 'दादरा का युद्ध' (Battle of Dadra) लड़कर अफगानों को परास्त किया था। अकबर के समय मानिकपुर के सूबेदार आसफ खान और जौनपुर के खान ज़मान (अली कुली खान) ने अकबर के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया।
जून 1567 में सम्राट अकबर खुद एक विशाल सेना लेकर रायबरेली के रास्ते मानिकपुर पहुंचा। अकबर ने भरी बरसात में अपने हाथी को गंगा में उतार दिया और तैरकर गंगा पार की। 9 जून 1567 को कड़ा-मानिकपुर के पास भीषण युद्ध में खान ज़मान मारा गया। इसके बाद अकबर ने मानिकपुर को इलाहाबाद सूबे की एक प्रमुख 'सरकार' (Sarkar-e-Manikpur) बना दिया, जिसके अंतर्गत मानिकपुर, सलोन, पट्टी और जलालपुर महाल आते थे।
1617–1682 ई.: राजा प्रताप सिंह ने रखी बेल्हा की नई राजधानी 'प्रतापगढ़' की नींव
गजेटियर के पृष्ठ 36 के अनुसार, प्रतापगढ़ की स्थापना का सबसे गौरवशाली अध्याय 17वीं सदी में लिखा गया। सोमवंशी क्षत्रिय वंश के राजा प्रताप सिंह (1617–1682 ई.) अपने पिता राजा तेज सिंह के उत्तराधिकारी बने।
उस समय सोमवंशियों की मुख्य गढ़ी 'अरोर' (वर्तमान रामपुर के निकट) में थी। राजा प्रताप सिंह ने अपनी पुरानी राजधानी को छोड़कर सई नदी के किनारे एक रणनीतिक और सुरक्षित स्थान चुना। उन्होंने वहाँ फैले घने जंगलों को कटवाया, सई नदी के ऊंचे टीले पर एक भव्य और अभेद्य ईंटों का विशाल किला बनवाया और अपने नाम पर इस ऐतिहासिक नगर की स्थापना की, जिसे आज पूरी दुनिया 'प्रतापगढ़' (Pratapgarh) के नाम से जानती है!
मुगल बादशाह शाहजहां और औरंगजेब दोनों ने राजा प्रताप सिंह की बहादुरी और प्रभाव को स्वीकार करते हुए उन्हें शाही फरमान, सनद और मनसब प्रदान किए थे। राजा प्रताप सिंह के शासनकाल में प्रतापगढ़ का मान-सम्मान पूरे उत्तर भारत में फैल गया।
⚔️ 7. अवध के नवाब और प्रतापगढ़ के राजाओं का खूनी संघर्ष
राजा पृथ्वीपत सिंह की शहादत और नवाब सफदरजंग का छल (1751 ई.)
1722 में जब नवाब सआदत खान बुरहान-उल-मुल्क ने अवध की स्वायत्त नवाबी रियासत बनाई, तो प्रतापगढ़ के स्वाभिमानी राजाओं ने नवाबों के अत्याचार और भारी लगान को मानने से इनकार कर दिया। 1735 में प्रतापगढ़ की गद्दी पर राजा पृथ्वीपत सिंह बैठे, जो अत्यंत पराक्रमी और निडर योद्धा थे।
जब फर्रुखाबाद के नवाब अहमद खान बंगश ने अवध पर हमला किया, तो अवध के नवाब मंसूर अली खान सफदरजंग बुरी तरह घबरा गए। सफदरजंग ने राजा पृथ्वीपत सिंह की ताकत देखकर उन्हें धोखे से रास्ते से हटाने की साजिश रची। नवाब ने राजा पृथ्वीपत सिंह को संधि वार्ता के बहाने खेमकरन की सराय (सुल्तानपुर सीमा के पास) बुलाया।
जब निहत्थे राजा पृथ्वीपत सिंह नवाब के तंबू में पहुंचे, तो नवाब सफदरजंग के इशारे पर अली बेग खान नामक सैनिक ने पीछे से कटार घोंपकर राजा पृथ्वीपत सिंह की धोखे से हत्या कर दी! राजा के वीर अंगरक्षक ने तुरंत अली बेग को वहीं ढेर कर दिया। इस विश्वासघात के बाद नवाब की सेना ने प्रतापगढ़ किले पर कब्जा कर लिया, लेकिन राजा पृथ्वीपत सिंह के वीर पुत्र दुनिआपत सिंह (मात्र 12 वर्ष की उम्र में) और उनके भाई हिंदूपात सिंह ने सोमवंशियों की सेना एकत्र कर नवाब की फौजों से बदला लिया और प्रतापगढ़ को फिर से आजाद कराया।
बिसेन रियासतों का शौर्य: कालाकांकर, भदरी और नाजिमों से लोहा
गजेटियर के अनुसार केवल सोमवंशी ही नहीं, बल्कि कुंडा क्षेत्र के बिसेन राजपूत (कालाकांकर और भदरी) भी नवाबों के सामने कभी नहीं झुके। 1833 ई. में जब अवध के नाजिम एहसान हुसैन ने 50,000 की विशाल फौज लेकर भदरी किले पर चढ़ाई की, तो राय जगमोहन सिंह (भदरी) ने 12 दिनों तक नाजिम की फौज को धूल चटा दी और नाजिम को समझौते के लिए मजबूर होना पड़ा!
अगले ही साल 1834 में नाजिम ने कालाकांकर के राजा हनवंत सिंह से भारी लगान मांगा, तो धारूपुर गाँव में भयंकर युद्ध हुआ जिसमें नाजिम की दो तोपें छीन ली गईं और उसकी सेना भाग खड़ी हुई। 1853 में नाजिम खान अली खान ने कालाकांकर किले का 57 दिनों तक घेरा डाला, लेकिन राजा हनवंत सिंह ने वीरतापूर्वक मुकाबला कर सुजाखर के जंगलों में मोर्चा संभाला।
🔥 8. 1857 की महान क्रांति: राजा हनवंत सिंह, बाबू गुलाब सिंह और खूनी संग्राम
राजा हनवंत सिंह (कालाकांकर): राजपूती धर्म और वतन परस्ती की अनूठी मिसाल
फरवरी 1856 में अंग्रेजों ने अवध के नवाब वाजिद अली शाह को गद्दी से हटाकर अवध को हड़प लिया और बेल्हा (Bela) को प्रतापगढ़ जिले का मुख्यालय बनाया। लेकिन मई 1857 में जब मेरठ और दिल्ली में गदर भड़का, तो प्रतापगढ़ की ज्वाला सबसे प्रचंड साबित हुई।
सलोन के डिप्टी कमिश्नर कैप्टन बैरो और अन्य अंग्रेज अफसर जान बचाकर भागे। वे कालाकांकर के राजा हनवंत सिंह (Raja Hanwant Singh) के पास धारूपुर किले में पहुंचे। राजा हनवंत सिंह ने शरणागत की रक्षा का राजपूती धर्म निभाते हुए उन सभी अंग्रेजों को 14 दिनों तक अपने किले में शरण दी और अपनी निजी फौज के साथ उन्हें सुरक्षित प्रयागराज पहुँचा दिया।
प्रयागराज छोड़ने के बाद जब कैप्टन बैरो ने धन्यवाद दिया, तो राजा हनवंत सिंह ने ऐतिहासिक शब्द कहे:
"साहिब! जब तुम्हारी सरकार आई, तो तुमने मेरी सारी जागीर और गाँव छीन लिए। आज तुम मेरी शरण में आए थे, इसलिए मैंने अपनी जान पर खेलकर तुम्हें सुरक्षित पहुँचाया। लेकिन अब सुनो—अब मैं वापस अपने घर जाकर अपनी सेना एकत्र करूँगा और अपने वतन, अपने राजा और अपनी माटी की आज़ादी के लिए तुमसे आख़िरी सांस तक लडूंगा!"
और राजा हनवंत सिंह ने ठीक वही किया! वे सुल्तानपुर के चंदा के मैदान में अंग्रेजों से भिड़ गए और अपने चाचा माधव सिंह के साथ अपनी तोपों की रक्षा करते हुए अंग्रेजों को भारी क्षति पहुँचाई।
बाबू गुलाब सिंह (तारागढ़/मानधाता) और बाबू राम गुलाम सिंह का अमर बलिदान
तारागढ़ (तरौल/मानधाता) के बाबू गुलाब सिंह (Babu Gulab Singh) 1857 के सबसे खूंखार स्वतंत्रता सेनानी बनकर उभरे। उन्होंने प्रयागराज से लखनऊ जाने वाली ब्रिटिश फौज की रसद, गोला-बारूद और तोपों के काफिले पर लगातार छापे मारे। अंग्रेज जनरल बर्कले (Brigadier Berkeley) भारी तोपखाना लेकर तारागढ़ किले पर चढ़ आया। बाबू गुलाब सिंह ने अपने साथियों के साथ किले से अंग्रेजों पर भयंकर प्रहार किया। वे लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए और अमर शहीद बन गए!
इसी तरह अठेहा के बाबू राम गुलाम सिंह ने बैसवारा के राणा बेनी माधव सिंह के साथ मिलकर अंग्रेजों के दांत खट्टे किए। उनका रामपुर कसिया किला 3 मील के घेरे में घने जंगलों के बीच बना था। 3 नवंबर 1858 को अंग्रेज ब्रिगेडियर वेदरॉल (Brigadier Wetherall) ने रामपुर कसिया पर हमला बोला, जिसमें अंग्रेजों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। दहियावां में 700 बिसेन योद्धाओं ने मातृभूमि के लिए अपना खून बहाया।
🌾 9. आधुनिक काल: राजा रामपाल सिंह, 1920 का किसान आंदोलन और आजादी की जंग
राजा रामपाल सिंह (कालाकांकर): दैनिक 'हिन्दुस्तान' और राष्ट्रीय चेतना की अलख
1857 की क्रांति के बाद 1858 में प्रतापगढ़ को औपचारिक रूप से एक स्वतंत्र प्रशासनिक जिला बनाया गया। 1880 के दशक में कालाकांकर के राजा रामपाल सिंह ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक क्रांतिकारी अध्याय जोड़ा।
राजा रामपाल सिंह ने 1885 में कालाकांकर से हिंदी का पहला दैनिक राष्ट्रीय समाचार पत्र 'दैनिक हिन्दुस्तान' (Dainik Hindustan) निकालना शुरू किया। उन्होंने महामना पंडित मदन मोहन मालवीय को कालाकांकर लाकर इस अखबार का मुख्य संपादक बनाया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1886 (कोलकाता) और 1888 (इलाहाबाद) के अधिवेशनों में राजा रामपाल सिंह ने प्रमुख भूमिका निभाई और ब्रिटिश हुकूमत के सामने देश की आवाज बुलंद की।
1920 का ऐतिहासिक किसान आंदोलन: बाबा रामचंद्र और रूरे (Rure) की महापंचायत
गजेटियर के पृष्ठ 48-50 के अनुसार, पूरे भारत में किसान आंदोलन की जन्मभूमि हमारा प्रतापगढ़ है! ताल्लुकेदारों के नाजायज लगान, नजराना और बेदखली के जुल्मों के खिलाफ महाराष्ट्र के रहने वाले संन्यासी बाबा रामचंद्र (Baba Ram Chandra) ने किसानों को जगाया। वे कंधे पर रामचरितमानस लेकर गाँव-गाँव घूमते और किसानों को चौपाइयों के जरिए आत्मसम्मान का पाठ पढ़ाते थे।
जून 1920 में बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में करीब 200 किसान नंगे पैर 50 मील पैदल चलकर प्रयागराज पहुंचे और युवा नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू से मिले। नेहरू जी किसानों के आग्रह पर प्रतापगढ़ आए। नेहरू जी ने अपनी आत्मकथा (Autobiography) में लिखा:
"जून 1920 में प्रतापगढ़ के किसानों के बीच तीन दिन बिताकर मैंने पहली बार भारत के असली किसानों के दुख, उनकी सादगी और उनकी असीम शक्ति को देखा। प्रतापगढ़ के इन खेतों ने मेरी राजनीतिक दिशा हमेशा के लिए बदल दी!"
17 अक्टूबर 1920 को प्रतापगढ़ के रूरे (Rure) गाँव में ऐतिहासिक महापंचायत हुई, जिसमें 'अवध किसान सभा' (Oudh Kisan Sabha) की स्थापना की गई! जब ब्रिटिश सरकार ने बाबा रामचंद्र और ठाकुर झिंगुरी सिंह को गिरफ्तार कर जेल भेजा, तो 50,000 किसान लाठियां लेकर प्रतापगढ़ शहर में उमड़ पड़े और कचहरी व जेल का घेराव कर लिया। किसानों का यह जनसैलाब देखकर अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर थर्रा गया और उसे तत्काल जेल का फाटक खोलकर बाबा रामचंद्र को रिहा करना पड़ा!
असहयोग, नमक सत्याग्रह और 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन
दिसंबर 1921 में प्रतापगढ़ में विदेशी कपड़ों की ऐतिहासिक होली जलाई गई। 14-15 नवंबर 1929 को महात्मा गांधी ने प्रतापगढ़, कालाकांकर और भदरी का ऐतिहासिक दौरा किया। भदरी में राजा बजरंग बहादुर सिंह और रानी ने गांधी जी का स्वागत किया और आजादी फंड के लिए भारी धनराशि भेंट की।
1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में प्रतापगढ़ के किसानों ने 'लगान-बंदी आंदोलन' (No-Rent Campaign) चलाया। राजा बजरंग बहादुर सिंह (भदरी) और लाल ब्रजेश सिंह (कालाकांकर) ने खुलेआम राष्ट्रीय आंदोलन का साथ दिया। 1932 में वेंकट राव के नेतृत्व में देशभक्तों ने कचहरी पर ब्रिटिश झंडा 'यूनियन जैक' उतारकर जला दिया और तिरंगा फहराया!
9 अगस्त 1942 को जब 'भारत छोड़ो आंदोलन' (Quit India Movement) छिड़ा, तो प्रतापगढ़ की जनता सड़कों पर उतर आई। रेलवे पटरियां उखाड़ दी गईं, टेलीग्राफ तार काट दिए गए, और सरकारी दफ्तरों पर तिरंगा फहराया गया। अंग्रेजी हुकूमत ने भीषण दमन किया, गोलियां चलाईं, अंबिका सिंह शहीद हुए, 112 से अधिक सेनानियों को कठोर कारावास की सजा हुई और भारी सामूहिक जुर्माने लगाए गए।
अंततः इन अनगिनत बलिदानों के बाद 15 अगस्त 1947 को हमारा प्यारा भारत आजाद हुआ और प्रतापगढ़ के वीरों का सपना साकार हुआ!
📊 10. ऐतिहासिक कालक्रम सारांश (Chronological Timeline Table)
उत्तर प्रदेश डिस्ट्रिक्ट गजेटियर (1980) के अनुसार आदिमानव काल से लेकर 1947 तक का प्रामाणिक घटनाक्रम:
| ऐतिहासिक युग | समय / वर्ष | प्रमुख व्यक्तित्व / शासक | गजेटियर में दर्ज प्रमुख घटना |
|---|---|---|---|
| मध्यपाषाण काल | लगभग 8395 ई.पू. | आदिमानव समाज | सराय नाहर राय: गंगा घाटी की सबसे प्राचीन मानव बस्ती, चूल्हे, माइक्रोलिथ्स व कंकाल। |
| महाभारत व बौद्ध काल | 6ठी सदी ई.पू. | महात्मा बुद्ध, दीर्घयज्ञ, भीम | तुसारन व बिहार: 200 फीट ऊंचा स्तूप, बुद्ध के केश-नख अवशेष, भयहरणनाथ में बकासुर वध। |
| गुप्त साम्राज्य | 320–550 ईस्वी | चंद्रगुप्त I, समुद्रगुप्त | प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार गुप्त साम्राज्य का केंद्रीय कोर क्षेत्र। |
| गहड़वाल व भर काल | 11वीं-12वीं सदी | राजा मानिकचंद, भर शासक | मानिकपुर की स्थापना, सई तट पर हिंडौर में भरों का प्रमुख प्रशासनिक केंद्र। |
| दिल्ली सल्तनत | 1290 ईस्वी | मलिक छज्जू | मानिकपुर में बगावत कर खुद को 'सुल्तान मुगीसुद्दीन' घोषित कर सिक्के चलाए। |
| खिलजी काल | 20 जुलाई 1296 | अलाउद्दीन खिलजी | मानिकपुर गंगा तट पर सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी की धोखे से हत्या, सिर भाले पर घुमाया। |
| मुगल काल | 1532 व 1567 ई. | हुमायूं, अकबर | सई तट पर दादरा का युद्ध (1532), अकबर द्वारा मानिकपुर में खान ज़मान के विद्रोह का दमन। |
| प्रतापगढ़ की स्थापना | 1617–1682 ई. | राजा प्रताप सिंह | सई नदी के किनारे जंगलों को साफ कराकर विशाल ईंटों का किला बनवाया और 'प्रतापगढ़' की नींव रखी। |
| नवाबी संघर्ष | 1751 ईस्वी | राजा पृथ्वीपत सिंह, सफदरजंग | नवाब द्वारा धोखे से राजा पृथ्वीपत सिंह की हत्या, राजकुमार दुनिआपत सिंह द्वारा प्रतिशोध। |
| 1857 की क्रांति | 1857–1858 ई. | राजा हनवंत सिंह, बाबू गुलाब सिंह | तारागढ़, कालाकांकर और रामपुर कसिया में अंग्रेजों से भयंकर युद्ध, 700 बिसेन शहीद। |
| राष्ट्रीय जागरण | 1885 ईस्वी | राजा रामपाल सिंह, पं. मालवीय | कालाकांकर से हिंदी का पहला दैनिक अखबार 'हिन्दुस्तान' प्रारंभ। |
| किसान आंदोलन | 17 अक्टूबर 1920 | बाबा रामचंद्र, पं. जवाहरलाल नेहरू | रूरे गाँव में 'अवध किसान सभा' की स्थापना, 50,000 किसानों द्वारा जेल का घेराव। |
| भारत छोड़ो आंदोलन | अगस्त 1942 | अंबिका सिंह, वेंकट राव आदि | रेलवे व संचार तंत्र ध्वस्त, ब्रिटिश झंडा उतारकर तिरंगा फहराया, भारी दमन व शहादत। |
| राष्ट्रीय स्वतंत्रता | 15 अगस्त 1947 | समस्त स्वतंत्रता सेनानी | भारत स्वाधीन हुआ, प्रतापगढ़ ने आजादी की खुली हवा में सांस ली। |
❓ 11. अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
उत्तर प्रदेश डिस्ट्रिक्ट गजेटियर (1980) के अनुसार, सोमवंशी राजपूत राजा प्रताप सिंह (1617–1682 ई.) ने 17वीं सदी की शुरुआत में सई नदी के किनारे घने जंगलों को साफ कराकर एक विशाल ईंटों का किला बनवाया और अपने नाम पर इस नगर का नाम 'प्रतापगढ़' रखा।
कुंडा तहसील में सई नदी की पुरानी गोखुर झील पर स्थित सराय नाहर राय पूरे गंगा मैदान में मध्यपाषाण काल (Mesolithic Period) की सबसे पुरानी मानव बस्ती है, जो करीब 8395 ईसा पूर्व (लगभग 10,000 वर्ष पूर्व) की मानी गई है। यहाँ से आदिमानव के कंकाल और माइक्रोलिथ्स प्राप्त हुए हैं।
कड़ा-मानिकपुर के सूबेदार अलाउद्दीन खिलजी ने देवगिरि से अपार खजाना लूटा था। उस खजाने को हासिल करने और दिल्ली का सुल्तान बनने के लालच में अलाउद्दीन ने अपने निहत्थे चाचा सुल्तान जलालुद्दीन को धोखे से मानिकपुर बुलाकर 20 जुलाई 1296 को गंगा किनारे उनकी हत्या कर दी थी।
कालाकांकर के राजा हनवंत सिंह ने राजपूती मर्यादा निभाते हुए अंग्रेज शरणार्थियों (कैप्टन बैरो आदि) को 14 दिन पनाह दी और सुरक्षित प्रयागराज छोड़ा। इसके तुरंत बाद उन्होंने अंग्रेजों से खुला ऐलान कर दिया कि अब वे अपने वतन और बादशाह के लिए लड़ेंगे और उन्होंने चंदा के युद्ध में अंग्रेजों से भीषण लोहा लिया।
बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में 17 अक्टूबर 1920 को रूरे गाँव में 'अवध किसान सभा' बनी। पंडित जवाहरलाल नेहरू के आगमन और 50,000 किसानों द्वारा जेल घेराव के दबाव में आकर ब्रिटिश हुकूमत को झुकना पड़ा और किसानों के अधिकारों की रक्षा के लिए 'अवध रेंट एक्ट 1921' पारित करना पड़ा।
प्रतापगढ़ का इतिहास केवल तारीखों और लड़ाइयों की सूची नहीं है; यह इस माटी की खुद्दारी, स्वाभिमान और अदम्य साहस की अमर गाथा है। 10,000 साल पहले सराय नाहर राय के आदिमानव से शुरू होकर राजा प्रताप सिंह के किले की दीवारों, राजा हनवंत सिंह व बाबू गुलाब सिंह की शहादत और रूरे गाँव के गरीब किसानों के हुंकार तक—बेल्हा की हर इंच जमीन वीरों के त्याग से सींची गई है। अपनी इस गौरवशाली विरासत को जानना और संजोना हम सभी का परम कर्तव्य है!
📚 प्रामाणिक ऐतिहासिक एवं सरकारी संदर्भ (Official Gazetteer Source):
- उत्तर प्रदेश डिस्ट्रिक्ट गजेटियर्स: "प्रतापगढ़ (Pratapgarh)" — संपादन: दांगली प्रसाद वरुण, आई.ए.एस. (State Editor, 1980), अध्याय 2: History (पृष्ठ 16 से 54), राजस्व विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार।
- एच. आर. नेविल (H. R. Nevill, 1904), "Pratapgarh: A Gazetteer (Volume XLVII of the District Gazetteers of the United Provinces of Agra and Oudh)", गवर्नमेंट प्रेस, इलाहाबाद।
- पंडित जवाहरलाल नेहरू: "एन ऑटोबायोग्राफी (An Autobiography)" (लंदन, 1936), अध्याय 8: Wandering among the Kisans (प्रतापगढ़ किसान आंदोलन का प्रत्यक्ष विवरण)।
- प्रो. जी. आर. शर्मा: "Excavations at Sarai Nahar Rai and Mahadaha" (इलाहाबाद विश्वविद्यालय पुरातत्व विभाग शोध रिपोर्ट)।
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