प्रतापगढ़ के विविध व्यवसाय और आजीविका: सरकारी बाबुओं, गुरुजनों, वकीलों से लेकर 19 पारंपरिक दस्तकारों का प्रामाणिक सफर
खेती-किसानी के अलावा कोई जिला अपनी असली पहचान अपने उन मेहनतकश हाथों से बनाता है, जो समाज की हर दैनिक जरूरत को पूरा करते हैं। क्या आप जानते हैं कि 1921 में पूरे प्रतापगढ़ जिले में केवल 349 शिक्षक थे जिनमें मात्र 8 महिला शिक्षिकाएं थीं, जो 1972 तक बढ़कर लगभग 5,000 हो गए?
1980 के आधिकारिक जिला गजेटियर (अध्याय 8) के पन्नों में दर्ज यह आलेख हमें प्रतापगढ़ के 12 हजार से अधिक सरकारी कर्मचारियों, कचहरी के 400 वकीलों, 1939 में बनी डॉक्टरों की आईएमए (IMA) शाखा, शादी-ब्याह में अगुआ बनने वाले नाइयों और 1961 की उस ऐतिहासिक गणना से रूबरू कराता है, जिसमें जिले के 5,004 कुम्हार, 2,304 लोहार, 1,335 सुनार और 847 बढ़ई जिले की स्वावलंबी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी थे।
🏛️ 1. लोक प्रशासन और सरकारी सेवा: 1921 के 2 हजार से 1971 के 12 हजार कर्मचारी
ब्रिटिश काल से लेकर आजादी के बाद तक प्रतापगढ़ में सरकारी नौकरी को सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक सुरक्षा का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता रहा है।
सरकारी कर्मचारियों की संख्या में छह गुना उछाल
गजेटियर के अनुसार जिले में सरकारी और सार्वजनिक सेवाओं में कार्यरत लोगों की संख्या में आजादी के बाद अभूतपूर्व वृद्धि हुई:
- 1921 (अंग्रेजी हुकूमत): जिले में कुल 2,014 लोक सेवक थे, जिनमें से 827 सिविल प्रशासन में और 1,187 पुलिस विभाग में पदस्थ थे।
- 1961: राज्य सरकार के कर्मचारियों की संख्या 2,908 (जिसमें 844 पुलिसकर्मी थे), केंद्र सरकार के 437 तथा स्थानीय निकायों व अर्द्ध-सरकारी संस्थाओं के 303 कर्मचारी कार्यरत थे।
- 1971 का विस्तृत आंकड़ा: विकास योजनाओं और तहसीलों के विस्तार के बाद सरकारी अमला 12,500 से अधिक हो गया। इसमें राज्य सरकार के 5,310, केंद्र सरकार के 2,538, अर्द्ध-सरकारी संस्थानों के 4,559 और स्थानीय निकायों के 106 कर्मचारी शामिल थे।
सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधाएं और कल्याण योजनाएं
बढ़ती महंगाई से निपटने के लिए सरकार ने वेतनमान के अनुसार नियमित महंगाई भत्ता (Dearness Allowance - DA) देना शुरू किया। इसके अलावा सरकारी कर्मचारियों को निम्नलिखित महत्वपूर्ण सुविधाएं मिलती थीं:
- आवास और वाहन ऋण: कर्मचारियों को अपनी साइकिल, मोटरसाइकिल या कार खरीदने और निजी मकान बनाने के लिए आसान ब्याज पर सरकारी ऋण।
- भविष्य निधि (PF) से अग्रिम: आकस्मिक जरूरतों के लिए पीएफ खाते से ऋण और मुफ्त चिकित्सा सुविधाएं।
- ग्रामीण महिला कर्मचारियों को विशेष सुरक्षा: गांवों में तैनात महिला कर्मचारियों (विशेषकर शिक्षिकाओं और नर्सों) को मुफ्त सरकारी आवास (Free Accommodation) दिया जाता था।
- सरकारी क्वार्टर: यदि आवास उपलब्ध हो, तो कर्मचारी के मूल वेतन के मात्र 10% किराए पर सरकारी क्वार्टर आवंटित किया जाता था।
| प्रशासनिक श्रेणी (Sector) | 1921 में कर्मचारी | 1961 में कर्मचारी | 1971 में कर्मचारी | प्रमुख कार्य व विभाग |
|---|---|---|---|---|
| राज्य सरकार (State Govt.) | 827 (सिविल) | 2,908 | 5,310 | कलेक्ट्रेट, तहसील, ट्रेजरी, PWD, नहर व स्वास्थ्य |
| पुलिस बल (Police) | 1,187 | 844 | — (राज्य सेवा में सम्मिलित) | थाने, चौकियां व कानून व्यवस्था |
| केंद्र सरकार (Central Govt.) | — | 437 | 2,538 | रेलवे, डाक-तार, आयकर व राष्ट्रीयकृत बैंक |
| अर्द्ध-सरकारी व स्थानीय निकाय | — | 303 | 4,665 | जिला परिषद, नगरपालिका व विकास बोर्ड |
📚 2. शिक्षा और शिक्षक जगत: 1921 में 8 महिला शिक्षिकाओं से 1972 के 4,908 गुरुजन
प्रतापगढ़ की धरती हमेशा से साहित्य और विद्या की उर्वरा भूमि रही है। लेकिन 20वीं सदी के प्रारंभ में यहां औपचारिक शिक्षा का दायरा बहुत संकीर्ण था।
1921 से 1972: शिक्षकों की संख्या में 14 गुना वृद्धि
गजेटियर में जिले के शिक्षक वर्ग का हृदयस्पर्शी आधिकारिक आंकड़ा दर्ज है:
- 1921 का दौर: पूरे जिले के सभी स्कूलों और कॉलेजों में मिलाकर केवल 349 शिक्षक थे। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह था कि इनमें मात्र 8 महिला शिक्षिकाएं थीं!
- 1961 में विस्तार: आजादी के बाद जब गांव-गांव प्राथमिक विद्यालय खुले, तो शिक्षकों की संख्या बढ़कर 2,039 हो गई, जिसमें महिला शिक्षिकाओं की संख्या 153 तक पहुंची।
- 1972 का रिकॉर्ड आंकड़ा: 1972 तक जिले में शिक्षकों की संख्या 4,908 के विशाल आंकड़े को छू गई:
- जूनियर बेसिक (प्राइमरी स्कूल): 3,573 शिक्षक-शिक्षिकाएं।
- सीनियर बेसिक (जूनियर हाई स्कूल): 384 शिक्षक।
- डिग्री कॉलेज प्राध्यापक: 62 प्रोफेसर (जिसमें 1 महिला प्राध्यापिका शामिल थीं)।
1964 की 'ट्रिपल बेनिफिट स्कीम' और शिक्षक कल्याण
1964 में अशासकीय सहायता प्राप्त (एडेड) और जिला परिषद के विद्यालयों के शिक्षकों के लिए 'ट्रिपल बेनिफिट स्कीम' (Triple Benefit Scheme) लागू की गई, जिसने शिक्षकों के जीवन में स्थायित्व ला दिया:
- तीन लाभ: (1) अंशदायी भविष्य निधि (CPF), (2) अनिवार्य जीवन बीमा, और (3) सेवानिवृत्ति पर पारिवारिक पेंशन।
- बच्चों को मुफ्त शिक्षा: शिक्षकों के बच्चों को इंटरमीडिएट तक शिक्षण शुल्क में शत-प्रतिशत छूट (Freeship) दी गई।
- राष्ट्रीय शिक्षक कल्याण कोष: जरूरतमंद और दिव्यांग शिक्षकों को आर्थिक मदद। देहात में पदस्थ महिला शिक्षिकाओं और प्रधानाध्यापकों को आवासीय क्वार्टर दिए जाने लगे।
- शिक्षक संगठन: प्राथमिक शिक्षक संघ, माध्यमिक शिक्षक संघ और डिग्री कॉलेज टीचर्स एसोसिएशन अपने अधिकारों और सेवा शर्तों की रक्षा के लिए सक्रिय रूप से गठित हुए।
| वर्ष (Year) | कुल शिक्षक संख्या | महिला शिक्षिकाओं की संख्या | संस्थानों का स्तर व स्थिति |
|---|---|---|---|
| 1921 | 349 | 8 (मात्र 2.3%) | सीमित प्राथमिक पाठशालाएं व चंद मिडिल स्कूल |
| 1961 | 2,039 | 153 | आजादी के बाद बेसिक विद्यालयों का व्यापक प्रसार |
| 1972 | 4,908 | सैकड़ों (प्राइमरी व मिडिल) | 3,573 प्राइमरी + 384 मिडिल + 62 डिग्री कॉलेज प्राध्यापक |
🩺 3. चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवा: वैद्य, हकीम, डॉक्टर और 1939 का IMA
पुराने समय में प्रतापगढ़ के गांवों में रोगों का इलाज पारंपरिक नाड़ी-परीक्षक वैद्यों और यूनानी हकीमों द्वारा जड़ी-बूटियों, काढ़ों और भस्मों से किया जाता था। 1856 में कंपनी शासन के बाद एलोपैथिक (अंग्रेजी) दवाओं का प्रचलन शुरू हुआ।
चिकित्सकों का बढ़ता दायरा (1921 से 1971)
बीसवीं सदी में स्वास्थ्य सेवाओं का विकास इस प्रकार हुआ:
- 1921: पूरे जिले में दंत चिकित्सक और पशु डॉक्टरों सहित कुल 66 चिकित्सक, 42 दाइयां (Midwives) तथा कुछ नर्सें और कंपाउंडर थे।
- 1961: डॉक्टरों और वैद्यों की संख्या बढ़कर 316 तथा दाइयों की संख्या 87 हो गई।
- 1971 में सरकारी अस्पतालों का अमला: जिला अस्पताल और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) में 26 एलोपैथिक डॉक्टर, 12 आयुर्वेदिक वैद्य, 2 यूनानी हकीम, 2 स्टाफ नर्सें, 21 दाइयां और 38 कंपाउंडर तैनात थे।
- फील्ड स्वास्थ्य कर्मी: 120 बेसिक हेल्थ वर्कर, 60 स्वास्थ्य सहायक, 52 एएनएम (ANM), 49 टीकाकर्मी (चेचक व हैजा टीकाकरण हेतु), 20 स्वास्थ्य निरीक्षक, 15 परिवार कल्याण कार्यकर्ता और 14 प्रयोगशाला तकनीशियन गांवों में महामारी रोकने में जुटे रहते थे।
1939-40: इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) प्रतापगढ़ शाखा
चिकित्सा पेशे की गरिमा और डॉक्टरों के आपसी समन्वय के लिए 1939-40 में 'इंडियन मेडिकल एसोसिएशन' (IMA) की प्रतापगढ़ शाखा स्थापित की गई। 1973 तक इसके 28 सक्रिय डॉक्टर सदस्य थे, जो जिले में स्वास्थ्य संगोष्ठियां और लोक स्वास्थ्य सुधार के सुझाव देते थे।
⚖️ 4. वकालत और विधि व्यवसाय: 400 वकील, मुंशी-मोहर्रिर और कचहरी की शान
भूमि विवादों, जमींदारी बंदोबस्त और मुकदमों के चलते प्रतापगढ़ में कानून का पेशा (Law) हमेशा से सबसे प्रतिष्ठित और आकर्षक पेशा रहा।
1972: जिले में 400 अधिवक्ता और मुख्तार
गजेटियर के अनुसार विधि व्यवसाय में कानून स्नातकों (Law Graduates) के साथ-साथ कई अवकाशप्राप्त अधिकारी भी आते थे:
- 400 प्रैक्टिसिंग वकील: 1972 में जिले में लगभग 400 अधिवक्ता, प्लीडर (Pleaders) और मुख्तार (Mukhtars) वकालत कर रहे थे। अधिकांश वकील बेला प्रतापगढ़ जिला मुख्यालय पर बैठते थे जहां दीवानी और फौजदारी की मुख्य अदालतें थीं।
- मुंशी व मोहर्रिर (Clerks): हर सफल वकील के पास एक या एक से अधिक मुंशी (मोहर्रिर) होते थे जो मुकदमों की तारीख नोट करने, नकल लेने और मुवक्किलों से फाइलें तैयार कराने का काम करते थे।
- शासकीय अधिवक्ता (DGC) व पैनल वकील: सरकार की ओर से मुकदमों की पैरवी के लिए अनुभवी वकीलों में से फौजदारी (Criminal), दीवानी (Civil) और राजस्व (Revenue) के जिला शासकीय अधिवक्ता (DGC) तथा पैनल अधिवक्ता नियुक्त किए जाते थे।
- वकीलों का सामाजिक रसूख बहुत ऊंचा था और समाज के हर बड़े मसले में उनकी राय को सर्वोपरि सम्मान दिया जाता था।
📐 5. इंजीनियरिंग और तकनीकी सेवाएं: PWD, नलकूप और बिजली का नेटवर्क
नहरों के विस्तार, शारदा नहर शाखाओं, राजकीय नलकूपों और सड़कों के डामरीकरण के साथ ही जिले में इंजीनियरों और तकनीशियनों की नई पीढ़ी तैयार हुई।
1971: जिले के तकनीकी विशेषज्ञों का आंकड़ा
- लोक निर्माण विभाग (PWD): 5 अधिशासी व सहायक इंजीनियर और 19 ओवरसियर (तकनीकी सहायक), जो पुलों और पक्की सड़कों की निगरानी करते थे।
- सिंचाई विभाग (Irrigation): 7 इंजीनियर और 2 ओवरसियर, जिनके जिम्मे शारदा नहर, बंजर भूमि सुधार और राजकीय नलकूप थे।
- उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत परिषद (UPSEB): 5 इंजीनियर, जो जिले के ग्रामीण विद्युतीकरण और सब-स्टेशनों का काम देखते थे।
- जिला परिषद व नगरपालिका: दोनों संस्थाओं में 1-1 इंजीनियर और 1-1 ओवरसियर तैनात थे।
✂️ 6. घरेलू सेवाएं, नाई और धोबी: पारंपरिक रिश्तों से आधुनिक दुकानों तक
प्रतापगढ़ के सामाजिक ताने-बाने में व्यक्तिगत और पारिवारिक सेवाएं देने वाले वर्गों की भूमिका केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि पारिवारिक और सांस्कृतिक थी।
घरेलू सहायक व रसोइये (Domestic Servants)
1921 में जिले में 5,138 घरेलू नौकर थे। 1961 की गणना में 279 रसोइये (Cooks), 380 वेटर, बेयरर व आया तथा 321 सफाईकर्मी व कहार (Watermen) दर्ज थे। पूर्णकालिक नौकर केवल बड़े ताल्लुकदार, धनी आढ़ती और उच्च प्रशासनिक अधिकारी ही रखते थे।
नाई (Barbers): संस्कारों के साक्षी और शादी के अगुआ
पुराने समय में नाई घर-घर जाकर बाल काटते और हजामत बनाते थे:
- संस्कारों में अनिवार्य उपस्थिति: बच्चे के मुंडन, जन्म (सौरी), जनेऊ, शादी-विवाह और अंत्येष्टि (दशगात्र/श्राद्ध) जैसे सभी 16 संस्कारों में नाई की मौजूदगी और रस्में अनिवार्य थीं।
- शादी-ब्याह के अगुआ (Matchmakers): पुराने जमाने में नाई वर और कन्या पक्ष के बीच रिश्ते तय कराने वाले मुख्य संदेशवाहक और मध्यस्थ हुआ करते थे (हालांकि साठ के दशक तक यह भूमिका कम होने लगी थी)।
- सैलून दुकानों की शुरुआत: शहरों में हेयर कटिंग सैलून खुलने लगे। 1921 में जहां 2,978 नाई थे, वहीं 1961 में इनकी संख्या 1,973 दर्ज की गई।
धोबी और लांड्री (Washermen)
कस्बों में धोबी घर-घर जाकर गंदे कपड़े इकट्ठा करते और नदियों/तालाबों के घाटों पर भट्टी में उबालकर धोते थे:
- 1921 में जिले में 4,302 धोबी थे, जो 1961 में बढ़कर 5,104 हो गए।
- साठ के दशक में धुलाई और प्रेस का खर्च बढ़ने पर गृहणियों ने रोजमर्रा के कपड़े घर पर धोना शुरू किया और शहरों में आधुनिक लांड्री दुकानें खुलने लगीं जो समय पर साफ कपड़े देती थीं।
🧵 7. दर्जी और सिलाई कला: कुर्ता-पाजामा से सरकारी सिलाई केंद्रों तक
गांधी जी के खादी आंदोलन और स्वदेशी चेतना के कारण प्रतापगढ़ में सिलाई का काम बहुत तेजी से फला-फूला।
दर्जियों की संख्या में वृद्धि और सरकारी वजीफा
1921 में जिले में 1,613 दर्जी व कसीदाकार थे, जो 1961 में बढ़कर 1,950 हो गए:
- शहरी दर्जी: शहरों में कटिंग मास्टर कपड़े की कटिंग खुद करते थे और कई सिलाई कारीगरों को दैनिक या मासिक मजदूरी पर रखकर कोट, पैंट और शेरवानी सिलवाते थे।
- ग्रामीण सिलाई: गांवों में सिलाई सरल थी, जहां मुख्य रूप से धोती-कुर्ता, बंडी, पाजामा और कमीज सिली जाती थी।
- सरकारी प्रशिक्षण केंद्र (Stipend): उत्तर प्रदेश सरकार ने युवाओं को सिलाई कला में आत्मनिर्भर बनाने के लिए 'उत्पादन-सह-सिलाई केंद्र' खोले, जहां शिक्षार्थियों को मासिक वजीफा (Stipend) देकर सिलाई का आधुनिक हुनर सिखाया जाता था।
🏺 8. 1961 की ऐतिहासिक दस्तकार गणना: माटी से लेकर सोने-लोहे के 19 हुनर
1961 की जनगणना में प्रतापगढ़ के पारंपरिक कारीगरों, दस्तकारों और श्रमजीवियों की एक ऐसी प्रामाणिक सूची दर्ज की गई है, जो हमारे पुरखों की आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सजीव दर्पण है:
| व्यवसाय व हुनर (Craft / Occupation) | 1961 में कामगारों की संख्या | पारंपरिक उत्पाद व सामाजिक भूमिका |
|---|---|---|
| कुम्हार व माटी शिल्पी (Potters & Clay Formers) | 5,004 | कुल्हड़, घड़े, सुराही, दीये, खपड़ा (खपरैल) व मटके निर्माण |
| लोहार व हथौड़ाकार (Blacksmiths & Forgemen) | 2,304 | हल के फाल, खुरपी, हंसिया, कुदाल व लोहे के कृषि औजार |
| टोकरी व सूप बुनकर (Basketry Weavers) | 1,475 | बांस और मूंज से टोकरियां, सूप, पंखे, दौरी व झाड़ू बनाना |
| सुनार व सर्राफा शिल्पी (Jewellers & Goldsmiths) | 1,335 | सोने-चांदी के पारंपरिक गहने (हंसुली, कड़ा, पायल, नथ, झुमका) |
| बढ़ई व काष्ठ शिल्पी (Carpenters) | 847 | हल, जुआठ, बैलगाड़ी के पहिए, चारपाई, दरवाजे व खिड़कियां |
| हलवाई, मिठाई व बेकरी निर्माता | 626 | पेड़ा, जलेबी, इमरती, लड्डू, देशी मिठाइयां व बिस्कुट |
| पशु चालित वाहन चालक (बैलगाड़ी/इक्का) | 526 | मंडियों और गांवों के बीच माल व सवारी ढोने वाले |
| चर्मकार व जूता शिल्पी (Leather Workers) | 504 | देशी जूतियां, चमड़े की चरस (पुर), नाद व मवेशी साज-सज्जा |
| फेरीवाले व पटरी विक्रेता (Hawkers & Peddlers) | 479 | हाट-बाजारों में बिसाती, बर्तन, मसाले व चूड़ियां बेचने वाले |
| राजमिस्त्री व प्लास्टरकार (Masons & Brick Layers) | 377 | पक्के कुएं, हवेलियां, कोठियां, मंदिर व मकान निर्माण |
| फीता व जाली बुनने वाले (Knitters & Lace Makers) | 282 | गोटा, किनारी, जाली व हथकरघा बुनाई |
| बुनकर व जुलाहे (Weavers & Drawers) | 226 | सूती खद्दर, गाढ़ा, गमछा, चादर व टाट बुनाई |
| दुकान सहायक व सेल्समैन | 217 | आढ़त और थोक गल्ला दुकानों के मुनीम व सहायक |
| माली व बागवान (Gardeners) | 191 | आंवला, आम व महुआ के बागों की देखरेख व फूल-माला सज्जा |
| पुरोहित व धार्मिक कर्मी (Religious Workers) | 128 | पूजा-पाठ, कर्मकांड, कथा-भागवत व धार्मिक अनुष्ठान |
| साइकिल रिक्शा चालक | 107 | शहरी क्षेत्रों में पर्यावरण-अनुकूल सवारी परिवहन |
| सूत कातने वाले (Spinners) | 105 | चरखे पर कपास और सनई से सूत कातने वाले कतैया |
| पारंपरिक नर्तक व कलाकार (Dancers & Artists) | 76 | नौटंकी, बिरहा, धोबिया नृत्य व पारंपरिक लोक कलाकार |
| चित्रकार व वॉलपेपर कर्मी (Painters) | 11 | दीवारों पर भित्ति चित्र, साइनबोर्ड व लेखन कार्य |
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (प्रतापगढ़ आजीविका व व्यवसाय FAQs)
1980 के सरकारी गजेटियर का यह आठवां अध्याय हमें यह सिखाता है कि प्रतापगढ़ का इतिहास केवल राजाओं और युद्धों की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे उन 5 हजार कुम्हारों, 23 सौ लोहारों, सिलाई करते दर्जियों, दीवानी में न्याय दिलाते वकीलों और लालटेन की रोशनी में ककहरा सिखाते गुरुजनों के पसीने की महागाथा है।
इन श्रमजीवियों और बुद्धिजीवियों के हुनर और त्याग ने ही प्रतापगढ़ को हर संकट में आत्मनिर्भर बनाए रखा। आज जब मशीनें और डिजिटल दुनिया हमारे पुराने हुनर को लील रही हैं, तब अपने पुरखों के इन 19 पारंपरिक शिल्पों और उनकी निष्ठा को नमन करना ही हमारी असली सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखना है।
यह आलेख उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 1980 में प्रकाशित आधिकारिक 'Uttar Pradesh District Gazetteers: Pratapgarh' के Chapter VIII - 'Miscellaneous Occupations' (पृष्ठ 167 से 171) में दर्ज प्रामाणिक व्यावसायिक जनगणना रिपोर्ट (1911, 1921, 1951, 1961, 1971 व 1972), शिक्षा विभाग, स्वास्थ्य रिकॉर्ड, बार एसोसिएशन आंकड़ों और 1964 शिक्षक कल्याण बंदोबस्त पर आधारित है।