प्रतापगढ़ की संस्कृति का इतिहास (Pratapgarh Culture History)

प्रतापगढ़ का जनजीवन, समाज और संस्कृति: 1980 के सरकारी गजेटियर की प्रामाणिक पड़ताल

किसी भी माटी की असली पहचान केवल उसके नक्शे या सीमाओं से नहीं, बल्कि वहां बसने वाले इंसानों, उनके रहन-सहन, बोली की मिठास और सदियों पुरानी परंपराओं से होती है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 1980 में प्रकाशित आधिकारिक 'प्रतापगढ़ जिला गजेटियर' (District Gazetteer) का अध्याय-3 'People' (लोग) हमारे जिले के उस दौर की एक ऐसी सजीव तस्वीर पेश करता है, जो आज की पीढ़ी के लिए किसी अनमोल खजाने से कम नहीं है।

1869 की पहली औपचारिक जनगणना से लेकर 1971 तक आबादी का सफर, गांव-देहात में गूंजती अवधी की सोंधी मिठास, जातियों का सामाजिक ताना-बाना, कड़ा-मानिकपुर से लेकर बेल्हा माई तक के मेले और 1952 के जमींदारी उन्मूलन से आया सामाजिक बदलाव—आइए गजेटियर के पन्नों से बिल्कुल आसान और आम बोलचाल की भाषा में समझें अपने प्रतापगढ़ का लोक जीवन।

14,22,707
कुल जनसंख्या (1971 जनगणना)
1,016
लिंगानुपात (प्रति 1,000 पुरुष महिलाएं)
98% ग्रामीण
2,195 आबाद गांवों का समाज
92.6%
अवधी/हिन्दी मातृभाषा भाषी
25+ बड़े मेले
सालाना ऐतिहासिक सांस्कृतिक उत्सव
2.76 लाख+
1952 में बने नए भूमिधर व सीरदार

📊 1. आबादी का सफर: 1869 से 1971 तक का प्रामाणिक लेखा-जोखा

प्रतापगढ़ जिले में पहली बार विधिवत सिरगिनती (जनगणना) 1 फरवरी 1869 को कराई गई थी। उस जमाने में सरकारी अमले, पुलिस और स्थानीय तालुकेदारों की मदद से घर-घर जाकर आंकड़े जुटाए गए थे। उस समय जिले की कुल आबादी मात्र 7,82,681 थी और प्रति वर्ग मील 543 लोग रहते थे। उस दौर में पूरे जिले में केवल एक ही ऐसा शहर था जिसकी आबादी 5,000 से अधिक थी—वह था बेल्हा प्रतापगढ़।

इसके बाद 1881 और 1891 में अच्छी बारिश और बढ़िया पैदावार के चलते आबादी बढ़कर 9 लाख के पार पहुंच गई। लेकिन बीसवीं सदी की शुरुआत प्रतापगढ़ के लिए बेहद दर्दनाक साबित हुई।

1918-19 का इन्फ्लुएंजा और प्लेग का कहर

सरकारी गजेटियर बताता है कि 1901 से 1921 के बीच प्रतापगढ़ की आबादी बढ़ने की बजाय घट गई थी। 1901 में जहां 9.08 लाख लोग थे, वहीं 1921 में यह घटकर 8.50 लाख रह गई। इसकी सबसे बड़ी वजह 1918-19 में फैली भयानक इन्फ्लुएंजा (फ्लू) महामारी और प्लेग थी, जिसने गांव के गांव खाली कर दिए थे। इसके बाद 1921 से जिले की आबादी में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई।

प्रतापगढ़ में पुरुषों से अधिक महिलाएं: अनोखा लिंगानुपात और परदेस गमन

प्रतापगढ़ की जनसांख्यिकी की सबसे अनोखी और गर्व करने वाली बात इसका स्त्री-पुरुष अनुपात (Sex Ratio) रहा है। जहां पूरे देश और उत्तर प्रदेश में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या हमेशा कम दर्ज की जाती थी, वहीं प्रतापगढ़ में दशकों तक 1,000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या 1,000 से कहीं ज्यादा रही:

  • 1901: प्रति 1,000 पुरुषों पर 1,045 महिलाएं
  • 1911: प्रति 1,000 पुरुषों पर 1,057 महिलाएं
  • 1921: प्रति 1,000 पुरुषों पर 1,048 महिलाएं
  • 1931: प्रति 1,000 पुरुषों पर 1,049 महिलाएं
  • 1951: प्रति 1,000 पुरुषों पर 1,039 महिलाएं
  • 1961: प्रति 1,000 पुरुषों पर 1,062 महिलाएं
  • 1971: प्रति 1,000 पुरुषों पर 1,016 महिलाएं (पुरुष: 7,05,726 | महिलाएं: 7,16,981)

इसके पीछे का असल कारण क्या था? गजेटियर स्पष्ट करता है कि प्रतापगढ़ कृषि प्रधान और घनी आबादी वाला जिला था, जहां उद्योग-धंधे सीमित थे। इसलिए यहां के युवा और पुरुष रोजी-रोटी कमाने के लिए बड़ी संख्या में बंबई (मुंबई), कलकत्ता (कोलकाता), कानपुर जैसे महानगरों में चले जाते थे। गांव में माताएं, बहुएं और बेटियां ही घर, परिवार और खेती की देखरेख करती थीं।

जनगणना वर्ष कुल जनसंख्या दशकीय बदलाव प्रतिशत घट-बढ़ पुरुष महिलाएं
1901 9,08,105 4,43,994 4,64,111
1911 8,95,279 -12,826 -1.41% 4,35,152 4,60,127
1921 8,50,752 -44,527 -4.97% (महामारी दौर) 4,15,491 4,35,261
1931 9,01,618 +50,866 +5.98% 4,40,051 4,61,567
1941 10,36,496 +1,34,878 +14.96% 5,27,429 5,09,067
1951 11,06,805 +70,309 +6.78% 5,42,763 5,64,042
1961 12,52,196 +1,45,391 +13.14% 6,07,165 6,45,031
1971 14,22,707 +1,70,511 +13.62% 7,05,726 7,16,981

1971 की गणना में प्रतापगढ़ का क्षेत्रफल 3,730 वर्ग किलोमीटर दर्ज था। उत्तर प्रदेश में क्षेत्रफल के लिहाज से यह 48वें और आबादी में 37वें स्थान पर था। जिले का जनसंख्या घनत्व 381 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी था, जो उस समय के राज्य औसत (300 व्यक्ति) से काफी अधिक था। सबसे सघन तहसील प्रतापगढ़ (432 व्यक्ति/किमी²) थी, जिसके बाद पट्टी (370) और कुंडा (364) का स्थान था।

🗣️ 2. भाषा और बोली: प्रतापगढ़िया अवधी की मिठास और व्याकरणिक पहचान

प्रतापगढ़ की आत्मा उसकी बोली में बसती है। 1961 की जनगणना के अनुसार जिले के 92.6% लोगों की मातृभाषा हिन्दी (अवधी) और 7.3% लोगों की उर्दू थी। ग्रामीण इलाकों में 92.9% घरों में अवधी बोली जाती थी।

महान भाषाविद जॉर्ज ग्रियर्सन (George Grierson) के भाषा वर्गीकरण के अनुसार, प्रतापगढ़ की बोली इंडो-आर्यन परिवार की 'पूर्वी हिन्दी' शाखा की मुख्य बोली अवधी (कोशली) है। चूंकि प्रतापगढ़ प्राचीन अवध के पूर्वी हिस्से में पड़ता है, इसलिए इसे 'पूर्वी अवधी' (Eastern Avadhi) कहा जाता है। जिले के पूर्वी छोर (पट्टी और रानीगंज) पर जौनपुर की सीमा लगने के कारण इसमें पश्चिमी भोजपुरी का हल्का पुट भी घुल जाता है।

प्रतापगढ़िया अवधी की अनोखी विशेषताएं (गजेटियर के उदाहरण)

सरकारी गजेटियर ने प्रतापगढ़ में बोली जाने वाली अवधी की कुछ ऐसी व्याकरणिक बारीकियों को दर्ज किया है, जो इसे पूरे अवध में एकदम अलग और खास बनाती हैं:

‘औना’ (auna) प्रत्यय का प्रयोग
प्रतापगढ़ में रिश्तों और संज्ञा शब्दों में 'औना' जोड़ने की पुरानी आदत है; जैसे बेटे को ‘बेटाउना’, पिता को ‘बापाउना’, और बेटी को ‘धियाउना’
‘कीहिसि’ (Kihisi) क्रिया रूप
सकर्मक क्रिया के भूतकाल में 'कीहिस' की जगह 'कीहिसि' (उसने किया) और क्रोध में 'रिसियान' या दया में 'दयान' का प्रयोग।
संबंध कारक ‘कै’ (Kai)
संबंध दर्शाने के लिए 'का' की जगह 'कै' बोला जाता है; जैसे ‘दादा कै मजूर’ (पिताजी के मजदूर) या ‘दयूँ कै नगीच’ (भगवान के करीब)।
अधिकरण में ‘मा’ और ‘ए’
अंदर या स्थान बताने के लिए 'हाथे मा' (हाथ में), 'घरे मा' (घर में), और बहुवचन क्रिया में 'रहेन' की जगह 'रहे' बोला जाता है।

पश्चिमी तहसील (कुंडा) की बोली पर रायबरेली का प्रभाव दिखता है, जहां 'एक' को 'यक', 'देश' को 'द्यास', और 'देख लिया' को 'द्याख लिहिस' बोला जाता है। बोलचाल में ‘हम जावा चहीत अहै’ (हम जाना चाहते हैं) और ‘बेचब्या?’ (क्या बेचोगे?) जैसे ठेठ मुहावरे आज भी गांव-गांव में कान में रस घोलते हैं।

🤝 3. सामाजिक ताना-बाना: जातियां, समुदाय और आपसी भाईचारा

1971 की जनगणना के अनुसार जिले में 88.1% हिन्दू (12,54,298), 11.8% मुस्लिम (1,67,678) तथा थोड़ी संख्या में सिख (534), ईसाई (127), बौद्ध (56) और जैन (14) निवास करते थे। समाज सदियों पुरानी श्रम-विभाजन परंपरा पर टिका हुआ था, जहां हर वर्ग ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अटूट अंग था।

ब्राह्मण समाज

जिले के हर हिस्से में बसे ब्राह्मणों में मुख्य रूप से सरयूपारीण और कान्यकुब्ज शाखाएं हैं। ये पारंपरिक रूप से पूजा-पाठ, अध्यापन और खेती-किसानी से जुड़े रहे हैं।

क्षत्रिय / राजपूत घराने

जिले की राजनीति और तालुकेदारी में क्षत्रियों का बड़ा प्रभाव रहा। मध्य भाग में सोमवंशी (प्रतापगढ़ राजघराना), कुंडा-कालाकांकर में बिसेन, पट्टी में बछगोती, तथा बिलखरिया और रायकवार प्रमुख रहे।

यादव (अहीर) एवं कुर्मी कृषक

प्रतापगढ़ की उपजाऊ धरती को सींचने और खेती-किसानी को समृद्ध बनाने में यादव और कुर्मी समाज का योगदान सबसे बड़ा रहा। इनके पास पारंपरिक पशुपालन और उन्नत खेती की गहरी समझ थी।

अनुसूचित जातियां (20.8% हिस्सा)

1961 में कुल आबादी का 20.8% हिस्सा अनुसूचित जातियों का था। इनमें चमार/जाटव (खेतीहर मजदूर व चर्मशिल्प), पासी (पारंपरिक पहरेदार व तीरंदाज), कोरी (कपड़ा बुनकर) और धोबी समाज शामिल रहे।

वैश्य एवं व्यापारिक वर्ग

व्यापार, हाट-बाजार और अनाज मंडियों का संचालन वैश्य समुदाय करता था। इनमें अग्रहरि, केसरवानी, बनिया, कलवार और कसौधन प्रमुख थे, जो बेल्हा, कुंडा, लालगंज और पट्टी के बाजारों के केंद्र थे।

दस्तकार व सेवा जातियां

गांव की आत्मनिर्भरता के आधार स्तम्भ—कुम्हार (मिट्टी के बर्तन), बढ़ई (हल व बैलगाड़ी), लोहार, नाई, कहार, गड़ेरिया (भेड़ पालन व ऊनी कंबलों की बुनाई), और मल्लाह/केवट (नाव संचालन व मछली पालन) थे।

मुस्लिम समुदाय और कड़ा-मानिकपुर की सूफी विरासत

मुस्लिम आबादी में शेख, सैयद, पठान, और मुगल के साथ-साथ बड़ी संख्या में दस्तकार वर्ग—अंसारी (जुलाहा/बुनकर), धुनिया (रुई पिंजने वाले), कुरैशी (कसाब) और दर्जी शामिल थे।

प्रतापगढ़ का मानिकपुर कस्बा मध्यकाल से ही गंगा-जमुनी सूफी संस्कृति का बहुत बड़ा केंद्र रहा है। यहां हजरत मखदूम जहांगश्त, सैयद सालार और शाह मलूकदास जैसे सूफी-संतों की मजारों और खानकाहों पर हिन्दू-मुस्लिम दोनों सिर झुकाते आए हैं।

🛕 4. धर्म और आस्था: शिव, शक्ति और लोकदेवताओं के प्राचीन धाम

प्रतापगढ़ की धार्मिक भावना में शैशवा (शिव पूजा) और शाक्त (देवी पूजा) का सबसे गहरा असर दिखाई देता है। सई और गंगा के कछारों पर स्थित प्राचीन शिवलिंग और शक्तिपीठ सदियों से जन-जन की आस्था के केंद्र रहे हैं:

🔹 बाबा हौदेश्वरनाथ (हौधनाथ धाम, कुंडा): गंगा तट के पास स्थित यह अति प्राचीन शिव मंदिर पूरे जनपद की सबसे बड़ी आस्था है। फाल्गुन महाशिवरात्रि पर यहां दूर-दराज से लाखों कांवड़िए और भक्त जलाभिषेक के लिए उमड़ते हैं।

🔹 मां बेल्हा देवी मंदिर (सदर): सई नदी के तट पर स्थित मां बेल्हा देवी प्रतापगढ़ की कुलदेवी के रूप में पूजी जाती हैं। हर सोमवार और शुक्रवार को तथा चैत्र-क्वार के नवरात्र में यहां विशाल मेला लगता है।

🔹 भयहरणनाथ धाम (कटरा गुलाब सिंह): मान्यता है कि महाभारत काल में पांडवों ने बकासुर वध के बाद यहां शिवलिंग स्थापित कर शिव की आराधना की थी। यह भय और संकटों को हरने वाला तीर्थ माना जाता है।

🔹 बाबा बेलखरनाथ एवं घुइसरनाथ: पट्टी क्षेत्र में बेलखरनाथ और सांगीपुर क्षेत्र में सई नदी किनारे बाबा घुइसरनाथ धाम जिले के प्रमुख ज्योर्तिलिंग-तुल्य शिवधाम हैं।

🔹 बाबा चंद्रकंकन (रामपुर संग्रामगढ़): स्थानीय लोक आस्था के जाग्रत संत-धाम, जहां मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु मिट्टी के घोड़े और घंटा चढ़ाते हैं।

🎪 5. लोक मेले और सांस्कृतिक उत्सव: गांव का उल्लास

मेले केवल खरीद-बिक्री की जगह नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज के मिलन, मनोरंजन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के सबसे बड़े रंगमंच रहे हैं। साल भर खेती के कड़े परिश्रम के बाद किसान और उनका परिवार इन मेलों में साल भर की जरूरत का सामान (लोहे के औजार, मिट्टी-पीतल के बर्तन, लकड़ी के सामान, मिठाइयां) खरीदते थे।

गजेटियर के अनुसार जिले में 10 दिवसीय विजयादशमी और रामलीला सबसे बड़ा लोकोत्सव था, जो बेल्हा, कटरा गुलाब सिंह, सराय प्रानमती, लालगंज और पट्टी में पूरी भव्यता से मनाया जाता था। इसके अलावा दिवाली, होली, खिचड़ी (मकर संक्रांति), नागपंचमी और कजरी तीज बड़े चाव से मनाई जाती थी।

सरकारी गजेटियर में दर्ज प्रतापगढ़ के ऐतिहासिक मेलों की सूची

गजेटियर (1980) के पृष्ठ 84-85 पर 'Statement II: List of Fairs' में जिले के प्रमुख मेलों का अधिकृत विवरण इस प्रकार दर्ज है:

तहसील कस्बा / गांव मेले का नाम आयोजन तिथि (हिन्दी मास) अनुमानित उपस्थिति (भीड़)
कुंडा मलका रजकपुर उर्स मुबारक चैत्र, शुक्ल 3 2,500
कुंडा कमसिन कमसिन देवी मेला चैत्र 8 (नवरात्र) 10,000
कुंडा पुरे अली नकी (मानिकपुर) शीतला सप्तमी मेला आषाढ़, कृष्ण 7-8 10,000
कुंडा नौबस्ता अष्टमी मेला आषाढ़, कृष्ण 8 1,500
कुंडा बाबूगंज (मझिलगांव) दशहरा / रामलीला आश्विन (क्वार) 1-30 1,500
कुंडा पुरे अली नकी (गंगा तट) कार्तिक पूर्णिमा गंगा स्नान मेला कार्तिक, शुक्ल 14-15 1,00,000+ (जिले का सबसे बड़ा मेला)
कुंडा झौवापुर / बिटियन का मेला बिटियन का मेला अग्रहायण (अगहन), शुक्ल 1 8,000
कुंडा शहाबपुर (हौदेश्वरनाथ) हौधनाथ महाशिवरात्रि मेला फाल्गुन, कृष्ण 13 25,000+
कुंडा हथीगवां शिवरात्रि मेला फाल्गुन, कृष्ण 13 1,000
प्रतापगढ़ संडवा चंद्रिका चंद्रिका देवी मेला चैत्र शुक्ल 9 व आश्विन शुक्ल 9 5,000
प्रतापगढ़ गोंडा रामनवमी मेला चैत्र, सुदी 9 1,000
प्रतापगढ़ शेवरा भैरवी मेला चैत्र, शुक्ल 8 4,000
प्रतापगढ़ पूरब गांव गाजी मियां का मेला ज्येष्ठ का पहला रविवार 2,000
प्रतापगढ़ अजगरा नाग पंचमी मेला भाद्रपद (भादों), कृष्ण 5 5,000
प्रतापगढ़ कटरा गुलाब सिंह दशहरा / विजयदशमी मेला आश्विन, शुक्ल 10 4,500
प्रतापगढ़ बेलाघाट (सई तट) दशहरा मेला आश्विन, शुक्ल 10 3,000
प्रतापगढ़ सराय प्रानमती दशहरा मेला आश्विन, शुक्ल 10 5,000
प्रतापगढ़ भुपियामऊ पशु मेला (मवेशी हाट) आश्विन (क्वार) 10,000
प्रतापगढ़ घुइसरनाथ धाम महाशिवरात्रि मेला फाल्गुन, कृष्ण 13 10,000+
प्रतापगढ़ बेल्हा (सदर) मां बेल्हा देवी मेला प्रत्येक सोमवार व शुक्रवार 4,000 नियमित
पट्टी मंगौरा देवी मेला चैत्र शुक्ल 8 व आश्विन शुक्ल 8 2,500
पट्टी परसरामपुर देवी मेला आश्विन, शुक्ल 8 3,000
पट्टी रामगंज मवेशी मेला नवंबर 3,000
पट्टी मदाफरपुर धनुष यज्ञ मेला पौष (पूस) 1,000
पट्टी यहियापुर बेलदियार नाथ (बेलखरनाथ) फाल्गुन, कृष्ण 13 4,000
पट्टी सदाना विशंभर नाथ मेला फाल्गुन, कृष्ण 13 2,000
पट्टी महरोरा महरोरा नाथ मेला फाल्गुन, कृष्ण 13 2,000
पट्टी पट्टी कस्बा पट्टी मेला अक्टूबर/नवंबर (3 दिन) 10,000

💍 6. रीति-रिवाज, शादी-ब्याह और महिलाओं की बदलती स्थिति

गजेटियर के अनुसार प्रतापगढ़ का पारिवारिक जीवन पारंपरिक संयुक्त परिवार (Joint Family System) पर आधारित था, जहां घर के बुजुर्ग की आज्ञा सर्वोपरि मानी जाती थी।

शादी-ब्याह के रीति-रिवाज: हिन्दू समाज में विवाह माता-पिता द्वारा अपनी ही जाति और गोत्र की मर्यादा देखकर तय किए जाते थे। विवाह की मुख्य रस्मों में बरइच्छा (फलदान), तिलक, लगन, द्वारपूजा, कन्यादान, और भांवरें (सप्तपदी) शामिल थीं। मुस्लिम समुदाय में निकाह काजी द्वारा गवाहों की मौजूदगी में पढ़ा जाता था और 'मेहर' की रकम तय की जाती थी।

दहेज कानून (1961) और सामाजिक सुधार

पुराने समय में तालुकेदारों और संपन्न परिवारों में 'तिलक' और 'दहेज' का भारी चलन था, जो गरीब किसानों के लिए कर्ज का कारण बनता था। 1961 में भारत सरकार के 'दहेज निषेध अधिनियम' (Dowry Prohibition Act, 1961) और 'हिन्दू विवाह अधिनियम 1955' के लागू होने के बाद सामाजिक चेतना बढ़ी।

महिलाओं की स्थिति: गजेटियर रेखांकित करता है कि आजादी के बाद प्रतापगढ़ में बालिका शिक्षा का तेजी से प्रसार हुआ। पुराने समय का सख्त घूंघट और पर्दा प्रथा धीरे-धीरे कमजोर पड़ा। चूंकि जिले के पुरुष परदेस में नौकरी करते थे, इसलिए प्रतापगढ़ की महिलाओं ने परिवार प्रबंधन, खेती की देखरेख और बच्चों की शिक्षा में असाधारण आत्मनिर्भरता और नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया।

🍲 7. खान-पान, रहन-सहन, वेशभूषा और लोक मनोरंजन

प्रतापगढ़ का लोक जीवन सादगी, प्रकृति और पौष्टिकता से भरपूर था। गजेटियर में दर्ज विवरण के अनुसार:

सादा और पौष्टिक देसी खान-पान

आम लोगों का मुख्य भोजन दाल, भात (चावल), रोटी, चोखा और हरी सब्जियां थीं। गर्मियों में चने और जौ का सत्तू और प्याज अमृत समान माना जाता था। कंडे (उपले) की आग में पकी बाटी-चोखा हर उत्सव की जान थी।

जिले के जंगलों में प्रचुर महुआ होने के कारण गरीबों और मजदूरों के लिए महुए की लापसी और भुना महुआ ऊर्जा का बड़ा स्रोत था। इसके साथ ही प्रतापगढ़ के आंवले का मुरब्बा, अचार, गन्ने का गुड़, ताजी छाछ (मट्ठा) और कढ़ी हर घर में चाव से खाई जाती थी।

पहनावा और वेशभूषा: ग्रामीण पुरुषों का मुख्य पहनावा धोती, कुर्ता, बंडी (फतुही), सिर पर साफा या अंगोछा (गमछा) और गांधी टोपी थी। महिलाएं सूती धोती (साड़ी) पहनती थीं। कस्बों में पैंट-कमीज और पायजामा का चलन शुरू हो चुका था।

मकानों की बनावट: गांवों में 90% से अधिक मकान मिट्टी की कच्ची दीवारों और खपरैल (कैलू) की छतों वाले होते थे। हर घर के आगे एक खुला 'ओसारा' (बरामदा) होता था जहां मेहमान बैठते थे, और भीतर एक खुला 'आंगन' होता था, जो रोशनी और हवा का मुख्य जरिया था। तालुकेदारों और रईसों के पास पक्की हवेलियां और गढ़ियां थीं।

लोक मनोरंजन: बिरहा, आल्हा, कजरी और दंगल

टेलीविजन और मोबाइल से कोसों दूर उस जमाने में लोकगीत ही जीवन की थकान मिटाने का जरिया थे:

  • आल्हा गायन: बरसात की रातों में गांव की चौपाल पर ढोलक की थाप पर महोबा के वीर आल्हा-ऊदल की 52 लड़ाइयों की वीरगाथा सुनने सैकड़ों लोग जमा होते थे।
  • बिरहा एवं कजरी: अहीर समाज द्वारा गाए जाने वाले तेज तर्रार 'बिरहा' और सावन में झूला झूलते समय गाई जाने वाली मधुर 'कजरी' से पूरा माहौल गुंजायमान रहता था।
  • होली का फाग: फाल्गुन में झांझ-मंजीरे के साथ गांव-गांव फाग गाया जाता था और रंग-गुलाल उड़ता था।
  • नौटंकी और नक्कालों का स्वांग: शादी-ब्याह और मेलों में हाथरस और कानपुर शैली की नौटंकी तथा नक्कालों के हास्य-व्यंग्य लोगों को रात भर हंसाते थे।
  • कुश्ती के दंगल: नागपंचमी पर हर गांव के अखाड़े में कुश्ती का दंगल होता था, जहां जिले के नामी पहलवान जोर-आजमाइश करते थे। इसके अलावा कबूतरबाजी और पतंगबाजी भी खूब होती थी।

🌱 8. 1952 का जमींदारी उन्मूलन: तालुकेदारों का अंत और किसानों का उदय

1 जुलाई 1952 को लागू हुआ 'उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम' प्रतापगढ़ के सामाजिक इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।

आजादी से पहले प्रतापगढ़ की 70% से अधिक उपजाऊ जमीन पर मुट्ठी भर बड़े तालुकेदारों और राजाओं का कब्जा था। आम किसान केवल शिकमी काश्तकार थे और उनसे नजराना, बेगार (बिना पैसे के काम), और कई गैर-कानूनी लाग-बाग वसूले जाते थे। 1920-21 में बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में प्रतापगढ़ से ही अवध का ऐतिहासिक किसान आंदोलन फूटा था।

गजेटियर के आधिकारिक आंकड़े: किसानों को मिला स्वाभिमान

जमींदारी कानून के बाद तालुकेदारों की बिचौलिया व्यवस्था खत्म हो गई:

  • जिले के 1,10,400 काश्तकार सीधे अपनी जमीन के मालिक (भूमिधर) बने, जिन्हें जमीन बेचने और ट्रांसफर करने का पूरा हक मिला।
  • 1,65,600 किसानों को 'सीरदार' का अधिकार मिला, जिनसे कभी बेदखली नहीं की जा सकती थी।
  • गांवों में 'गांव सभा' और 'भूमि प्रबंधक समिति' बनीं, जिससे पहली बार गांव के गरीब, दलित और पिछड़े वर्गों को पंचायत चुनावों में वोट देकर अपना प्रधान चुनने का लोकतांत्रिक अधिकार मिला।

इस ऐतिहासिक कानून ने प्रतापगढ़ के समाज से सामंती जुल्म को उखाड़ फेंका और एक समतामूलक, स्वाभिमानी और लोकतांत्रिक ग्रामीण भारत की नींव रखी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (प्रतापगढ़ लोक संस्कृति एवं समाज FAQs)

गजेटियर के अनुसार प्रतापगढ़ में पुरुषों से अधिक महिलाएं (सेक्स रेशियो) क्यों थीं?
1951, 1961 और 1971 की जनगणना में प्रतापगढ़ का लिंगानुपात 1,016 से 1,062 महिलाएं प्रति 1,000 पुरुष दर्ज था। इसका मुख्य कारण रोजगार के अभाव में जिले के पुरुषों का बंबई, कलकत्ता, कानपुर जैसे शहरों में जाना था। गांव में महिलाएं ही घर-परिवार और कृषि संभालती थीं।
प्रतापगढ़ की अवधी बोली की सबसे अनूठी व्याकरणिक पहचान क्या है?
प्रतापगढ़िया अवधी में संज्ञा शब्दों के पीछे 'औना' (auna) प्रत्यय लगाया जाता है; जैसे बेटे को 'बेटाउना', पिता को 'बापाउना', और बेटी को 'धियाउना'। इसके अलावा 'कीहिसि', 'हाथे मा', 'घरे मा' और 'दादा कै मजूर' जैसी शब्दावली इसकी पहचान है।
सरकारी गजेटियर के अनुसार जिले का सबसे बड़ा धार्मिक मेला कौन सा है?
कुंडा तहसील के कड़ा-मानिकपुर में गंगा तट पर लगने वाला 'कार्तिक पूर्णिमा मेला' जिले का सबसे बड़ा मेला है, जिसमें 1 लाख से अधिक श्रद्धालु जुटते हैं। इसके अलावा मां बेल्हा देवी, कमसिन देवी और बाबा हौदेश्वरनाथ का महाशिवरात्रि मेला सबसे प्रमुख हैं।
1952 के जमींदारी उन्मूलन से आम किसानों को क्या सीधा लाभ हुआ?
जमींदारी खात्मे से बेगार और अवैध लगान खत्म हुआ। जिले के 1.10 लाख काश्तकार भूमिधर (जमीन के पूर्ण मालिक) और 1.65 लाख काश्तकार सीरदार बने। ग्राम सभाओं के गठन से आम ग्रामीणों को पहली बार पंचायत में मताधिकार मिला।
प्रतापगढ़ के ग्रामीण समाज के प्रमुख लोक मनोरंजन के साधन क्या थे?
चौपालों पर आल्हा-ऊदल की वीरगाथा का गायन, बिरहा, सावन की कजरी, होली का फाग, नौटंकी, नक्कालों का खेल और नागपंचमी पर होने वाले कुश्ती के दंगल ग्रामीणों के प्रमुख लोक मनोरंजन थे।
आखिर में एक बात...

1980 के सरकारी गजेटियर के पन्नों में दर्ज प्रतापगढ़ का समाज केवल आंकड़ों का संकलन नहीं, बल्कि हमारी जड़ों, हमारे पुरखों के संघर्ष और अवध की उस गौरवशाली माटी का दर्पण है जिसने हर कठिन दौर में अपनी जिंदादिली और आपसी सौहार्द को बनाए रखा।

आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में जब हम मोबाइल स्क्रीन में खोते जा रहे हैं, तब अपनी अवधी बोली की मिठास, चौपालों की आत्मीयता, मेलों की रौनक और अपनी लोक परंपराओं को संजोकर रखना ही अपनी माटी के प्रति हमारा सबसे सच्चा कर्तव्य है।

प्रामाणिक संदर्भ एवं स्रोत (Official Gazetteer Reference):
यह आलेख उत्तर प्रदेश सरकार (Government of Uttar Pradesh) द्वारा 1980 में प्रकाशित आधिकारिक 'Uttar Pradesh District Gazetteers: Pratapgarh' के Chapter III - 'People' (पृष्ठ 55 से 85) में दर्ज ऐतिहासिक, जनसांख्यिकीय एवं सांस्कृतिक आंकड़ों पर आधारित है। सभी आंकड़े, भाषा विश्लेषण और मेलों की सूचियां राजकीय अभिलेखों से पूर्णतः प्रमाणित हैं।
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