प्रतापगढ़ के सरकारी विभागों का इतिहास (Pratapgarh Departments History)

प्रतापगढ़ के प्रमुख सरकारी विभाग और विकास तंत्र: गजेटियर 1980 की प्रामाणिक पड़ताल

किसी भी जिले का इतिहास केवल राजाओं की तलवारों, युद्धों या राजस्व वसूली के कागजों तक सीमित नहीं होता। असल मायने में किसी इलाके की असली तरक्की इस बात से तय होती है कि वहां का किसान अपने खेतों में कितना अनाज उगा पा रहा है, उसके मवेशियों के इलाज का क्या इंतजाम है, बच्चों के लिए स्कूल की घंटी बज रही है या नहीं, और गांवों तक पक्की सड़क, नहर का पानी व बिजली का खंभा पहुंचा या नहीं।

उत्तर प्रदेश जिला गजेटियर (1980) का अध्याय 13 (Other Departments) आज़ादी के बाद के उस दौर का आईना है जब प्रतापगढ़ अभावों से निकलकर एक आधुनिक जिले के रूप में आकार ले रहा था। कृषि, पशुपालन, सहकारिता, बेसिक शिक्षा, वन संपदा, कुटीर उद्योग, पीडब्ल्यूडी की सड़कें, बिजली ग्रिड और नहरों का जाल—आइए बहुत ही आसान और बोलचाल की भाषा में समझें कि 40-50 साल पहले बेल्हा की प्रशासनिक मशीनरी जमीन पर कैसे काम करती थी।

कृषि एवं मृदा संरक्षण
3 विशेष इकाइयां
प्रतापगढ़ (1962), कुंडा (1966) व लालगंज (1969) में स्थापित।
पशु स्वास्थ्य नेटवर्क
20 पशु अस्पताल
12 कृत्रिम गर्भाधान केंद्र व 3 भेड़-ऊन विस्तार केंद्र।
सहकारी साख व्यवस्था
30 बीज भंडार
गांव-गांव खाद, बीज व भूमि विकास बैंक से फसली कर्ज।
प्राथमिक शिक्षा तंत्र
15 उप-उप निरीक्षक
जिला परिषद व बेसिक स्कूलों की ग्रामीण निगरानी।
वन प्रभाग व चौकियां
4 सेक्शन / 12 बीट
चिलबिला, पहाड़पुर, लालगंज व कुंडा से हरियाली संरक्षण।
पीडब्ल्यूडी रोड कनेक्ट
4.6 किमी का दायरा
पंचवर्षीय योजनाओं में हर गांव को पक्की सड़क से जोड़ना।

1 कृषि विभाग: उन्नत बीज, फसल सुरक्षा और मिट्टी बचाने की मुहिम

प्रतापगढ़ हमेशा से एक खेती-किसानी वाला जिला रहा है। आज़ादी के बाद जिले के किसानों को पुरानी परंपराओं से निकालकर आधुनिक खेती से जोड़ने का जिम्मा कृषि विभाग (Agriculture Department) के कंधों पर था। जिले में इस पूरे महकमे की कमान जिला कृषि अधिकारी (District Agriculture Officer - DAO) के हाथ में होती थी, जो प्रशासनिक तौर पर फैज़ाबाद मंडल के उप-कृषि निदेशक और राज्य स्तर पर लखनऊ स्थित कृषि निदेशक के मार्गदर्शन में काम करते थे।

जिले के हर ब्लॉक में किसानों की मदद के लिए दो-दो कृषि निरीक्षक (Agriculture Inspectors) तैनात किए गए थे। इनका मुख्य काम गांव-गांव जाकर किसानों को उन्नत किस्म के गेहूं, धान और दलहन के बीज उपलब्ध कराना, सही मात्रा में रासायनिक खाद का इस्तेमाल सिखाना और तकावी (सरकारी कृषि ऋण) की वसूली में तहसील प्रशासन का सहयोग करना था।

🐛 फसलों को टिड्डियों और बीमारियों से बचाने का पहरा

उस जमाने में फसलों पर टिड्डी दलों (Locust invasions) के हमले और कीड़े-मकोड़ों की बीमारियां किसानों की महीनों की मेहनत पल भर में चट कर जाती थीं। इसके लिए जिले में एक विशेष पादप संरक्षण अधिकारी (Plant Protection Officer) बैठते थे। उनके पास कीटनाशक छिड़कने वाली मशीनें, दवाइयां और तकनीकी कर्मचारी होते थे, जो गांव से सूचना मिलते ही मौके पर पहुंचकर कीटनाशक दवाओं का छिड़काव कराते थे।

🌱 बागवानी शाखा: बेल्हा के बगीचों और आंवले की बुनियाद

प्रतापगढ़ को पूरे देश में आंवले की राजधानी कहा जाता है, और इसकी वैज्ञानिक शुरुआत में कृषि विभाग की बागवानी शाखा (Horticulture Section) का बहुत बड़ा हाथ रहा। जिले में बागवानी के लिए सीनियर हॉर्टिकल्चर इंस्पेक्टर, एक हॉर्टिकल्चर इंस्पेक्टर, 2 कुशल सरकारी माली और 1 हेड चौधरी तैनात थे।

यह टीम जिले में सरकारी पौधशालाएं (नर्सरी) तैयार करती थी। किसानों को आंवला, आम, अमरूद और नींबू की कलमी पौध बांटी जाती थी और नए बगीचे लगाने के लिए जमीन के लेआउट का नक्शा बनाकर दिया जाता था। साथ ही समय-समय पर फलों और सब्जियों के कीटों से बचाव के लिए गांव-गांव प्रदर्शन शिविर लगाए जाते थे।

🚜 भूमि संरक्षण इकाइयां: बीहड़ों और मिट्टी के कटाव पर नकेल

सई और गंगा जैसी नदियों के कछारों में बरसात के दिनों में उपजाऊ मिट्टी बहकर नालों में समा जाती थी। इस गंभीर समस्या को रोकने के लिए जिले में तीन विशेष भूमि संरक्षण इकाइयां (Soil Conservation Units) खोली गईं:

  • प्रतापगढ़ इकाई: साल 1962-63 में स्थापित हुई, जिसका दायरा मुख्यालय के आसपास की तहसीलों तक था।
  • कुंडा इकाई: साल 1966-67 में बनी, जिसने गंगा और उसके नालों से कटने वाली रेतीली जमीन को संवारा।
  • लालगंज इकाई: साल 1969-70 में शुरू हुई, जिसने लालगंज और आसपास के इलाकों में मेड़बंदी का काम संभाला।

प्रत्येक इकाई का मुखिया एक भूमि संरक्षण अधिकारी (Soil Conservation Officer) होता था, जिनकी मदद के लिए 2 अवर अभियंता (JEs) और 5 तकनीकी निरीक्षक तैनात थे। इन्होंने खेतों के किनारे कंटूर बंधी (Contour Bunding), छोटे चेक डैम, नालों पर पक्के स्पर और बंजर जमीन पर पेड़ लगाने का विशाल काम किया, जिससे हजारों एकड़ बंजर जमीन फिर से लहलहा उठी।

2 पशुपालन विभाग: 20 पशु अस्पताल, कृत्रिम गर्भाधान और कुक्कुट फार्म

ग्रामीण जीवन में हल खींचने वाले बैलों और दूध देने वाली गाय-भैंसों की अहमियत घर के सदस्यों जैसी होती थी। पशुओं को खुरपका-मुंहपका (FMD), गलघोंटू और रिंडरपेस्ट जैसी जानलेवा महामारियों से बचाने और उनकी नस्ल सुधारने का काम पशुपालन विभाग (Animal Husbandry Department) करता था। जिले में इस विभाग के मुखिया जिला पशुधन अधिकारी (District Livestock Officer - DLO) थे, जो फैज़ाबाद के उपनिदेशक और लखनऊ के निदेशक के अधीन थे।

गजेटियर के आंकड़ों के अनुसार उस समय जिले में पशु स्वास्थ्य का एक मजबूत ढांचा खड़ा किया गया था:

सुविधा का नाम कुल संख्या तैनात अधिकारी / कर्मचारी मुख्य कार्य व जनहित लाभ
पशु चिकित्सालय (Veterinary Hospitals) 20 अस्पताल 15 पशु चिकित्सा सहायक सर्जन व 4 पशु चिकित्सा अधिकारी पशुओं का इलाज, टीकाकरण, शल्य चिकित्सा और बीमारियों की रोकथाम।
कृत्रिम गर्भाधान केंद्र (A.I. Centres) 12 मुख्य केंद्र प्रशिक्षित स्टॉकमेन व वीर्य संग्रह प्रभारी उन्नत सांडों के वीर्य से गाय-भैंसों की नस्ल सुधार ताकि अधिक दूध मिले।
कृत्रिम गर्भाधान उप-केंद्र 11 उप-केंद्र स्टॉकमेन / कंपाउंडर दूर-दराज के देहाती इलाकों में पशुपालकों के घर तक नस्ल सुधार सुविधा।
भेड़ एवं ऊन विस्तार केंद्र 3 केंद्र स्टॉकमेन (लक्ष्मणपुर, कुशवापुर, मुज़ाही बाज़ार) गडेरिया समुदाय की भेड़ों की नस्ल सुधार, ऊन कतरन व संवर्धन।
राजकीय कुक्कुट प्रक्षेत्र (Poultry Farm) 1 फार्म पोल्ट्री इंस्पेक्टर व सहायक स्टाफ उन्नत नस्ल की मुर्गियों के चूजे पालना और ग्रामीणों को स्वरोजगार हेतु देना।

मुख्यालय पर एक केंद्रीय वीर्य संग्रह केंद्र (Semen Collection Station) बनाया गया था, जहां से पूरे जिले के 12 मुख्य और 11 उप-केंद्रों पर रेफ्रिजरेटेड कंटेनरों में सीमन पहुंचाया जाता था। इससे जिले के किसानों को घर बैठे देशी नस्लों की जगह हरियाणा, साहीवाल और मुर्रा नस्ल के मवेशी तैयार करने का बड़ा मौका मिला।

3 सहकारिता विभाग: साहूकारों के चंगुल से मुक्ति और 30 बीज गोदाम

पुराने समय में किसान बुवाई के समय महाजनों और साहूकारों से 25 से 50 फीसदी ब्याज पर 'सवाई' या 'ड्योढ़ा' कर्ज लेने को मजबूर होते थे। इस जानलेवा कर्ज जाल को तोड़ने के लिए सहकारिता विभाग (Co-operative Department) ने गांव स्तर पर प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) का जाल बिछाया।

जिले में विभाग के मुखिया सहायक निबंधक, सहकारी समितियां (Assistant Registrar Co-operative Societies) होते थे, जो फैज़ाबाद के उपनिबंधक के प्रशासनिक नियंत्रण में थे। उनकी मदद के लिए एक पूरी प्रशासनिक टीम तैनात थी:

अपर जिला सहकारी अधिकारी (विपणन)
किसानों की फसलों की सही कीमत दिलाने और खरीद मंडियों के नियमन का प्रभार।
ADCO (अधिक उपज उत्पादन)
हाई यील्डिंग वेराइटी (HYV) फसलों के लिए समय पर खाद-बीज का अग्रिम भंडारण।
सीनियर फार्मिंग इंस्पेक्टर व 3 इंस्पेक्टर
सहकारी समितियों की कार्यप्रणाली, ऑडिट और ग्रामीण बैठकों का सुपरविजन।
ADO (सहकारिता) - प्रत्येक ब्लॉक
ब्लॉक स्तर पर क्रेडिट सुपरवाइजरों के जरिए फसली कर्ज बांटना और वसूली सुनिश्चित करना।

जिले भर में 30 सहकारी बीज भंडार स्थापित थे। यहां से किसानों को बुवाई के समय रियायती दरों पर उन्नत बीज और यूरिया-डीएपी जैसी रासायनिक खाद दी जाती थी। इसके अलावा, लंबे समय के लिए नलकूप लगाने, ट्रैक्टर खरीदने या जमीन सुधारने के लिए उत्तर प्रदेश राज्य सहकारी भूमि विकास बैंक (Land Development Bank) की शाखाएं किसानों को 10 से 15 साल की आसान किस्तों पर सस्ता कर्ज उपलब्ध कराती थीं।

4 शिक्षा विभाग: डीआईओएस, बालिका शिक्षा और 15 उप-उप निरीक्षकों का तंत्र

आज़ादी के बाद अशिक्षा को दूर भगाना जिले की सबसे बड़ी चुनौती थी। प्रतापगढ़ में शिक्षा प्रशासन दो अलग-अलग धाराओं में बंटा हुआ था—माध्यमिक विद्यालय (हाईस्कूल व इंटरमीडिएट) और प्राथमिक व जूनियर बेसिक स्कूल। यह पूरा ढांचा फैज़ाबाद के उप-शिक्षा निदेशक और राज्य स्तर पर इलाहाबाद (प्रयागराज) में बैठने वाले शिक्षा निदेशक (उत्तर प्रदेश) के अधीन था।

🏫 माध्यमिक और उच्च शिक्षा की देखरेख

जिले के सभी बालकों के इंटरमीडिएट कॉलेजों और हाईस्कूलों के वित्तीय, अकादमिक और प्रशासनिक नियंत्रण की जिम्मेदारी जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS - District Inspector of Schools) के पास थी। वहीं, बेटियों की शिक्षा को बढ़ावा देने और कन्या विद्यालयों के निरीक्षण के लिए अलग से उप-विद्यालय निरीक्षिका (Inspectress of Girls' Schools) नियुक्त थीं, जो महिला शिक्षकों की नियुक्ति और छात्राओं की सुविधाओं की निगरानी करती थीं।

🎒 बेसिक शिक्षा और ग्रामीण स्कूलों का पहरा

ग्रामीण अंचल में जिला परिषद के अधीन चलने वाले प्राइमरी और जूनियर हाईस्कूलों की कमान उप-विद्यालय निरीक्षक (Deputy Inspector of Schools / शिक्षा अधिकारी) के हाथों में थी। जिले के विशाल ग्रामीण भूगोल को संभालने के लिए उनके मातहत निम्नलिखित स्टाफ काम करता था:

  • 15 उप-उप निरीक्षक (Sub-deputy Inspectors): ये अधिकारी ब्लॉक स्तर पर नियमित रूप से प्राइमरी पाठशालाओं का औचक निरीक्षण करते थे, शिक्षकों की हाजिरी जांचते थे और मिड-डे मील व टाट-पट्टी जैसी सुविधाओं की रिपोर्ट देते थे।
  • 4 सहायक बालिका विद्यालय निरीक्षिकाएं: जिले को चार सर्किलों में बांटकर बेटियों की देहाती प्राथमिक पाठशालाओं की सीधी निगरानी इनके जिम्मे थी।
  • उर्दू एवं संस्कृत संस्थाएं: क्षेत्रीय स्तर पर उर्दू माध्यम के स्कूलों के लिए एक उप-निरीक्षक और संस्कृत पाठशालाओं के लिए एक सहायक निरीक्षक फैज़ाबाद मुख्यालय से जिले के मदरसों और संस्कृत विद्यालयों का मुआयना करते थे।

5 वन विभाग: 4 सेक्शन, 12 बीट्स और बंजर भूमि पर हरियाली का संकल्प

प्रतापगढ़ में हालांकि कोई घना प्राकृतिक जंगल नहीं था, लेकिन नदियों के किनारे के बीहड़, ऊसर भूमि और खाली पड़ी सरकारी जमीनों पर लकड़ी, छाया और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए वन विभाग (Forest Department) ने बड़ा अभियान चलाया था।

प्रशासनिक रूप से प्रतापगढ़ जिला फैज़ाबाद वन प्रभाग (Faizabad Forest Division) के अंतर्गत आता था, जिसके मुखिया प्रभागीय वनाधिकारी (DFO) फैज़ाबाद में बैठते थे। राज्य स्तर पर इस पूरे विभाग के सर्वोच्च अधिकारी लखनऊ स्थित मुख्य वन संरक्षक (Chief Conservator of Forests) थे।

🌲 प्रतापगढ़ रेंज का भौगोलिक ढांचा: 4 सेक्शन और 12 बीट्स

जिले में स्थानीय स्तर पर प्रतापगढ़ रेंज बनाई गई थी, जिसका कार्यभार एक डिप्टी रेंजर (Deputy Ranger) के पास था। उनके अधीन 2 वन दरोगा (Foresters) और 6 वन रक्षक (Forest Guards) तैनात थे। इस पूरी रेंज को चार मुख्य सेक्शनों में बांटा गया था, जिनके अंतर्गत 12 चौकियां (Beats) थीं:

1. चिलबिला सेक्शन:
पट्टी, चिलबिला और सुवंसा बीट।
2. पहाड़पुर सेक्शन:
प्रतापगढ़, पहाड़पुर और बैरामपुर बीट।
3. लालगंज सेक्शन:
लक्ष्मणपुर, भागीपुर और रानीगंज बीट।
4. कुंडा सेक्शन:
कुंडा, संग्रामगढ़ और बाघराय बीट।

वन विभाग का मुख्य काम बेकार पड़ी उसर जमीनों पर बबूल, शीशम, नीम और यूकेलिप्टस जैसे तेजी से बढ़ने वाले और औद्योगिक रूप से उपयोगी पेड़ लगाना, सड़कों और नहरों की पटरियों पर वृक्षारोपण करना और वन्यजीवों (जैसे नीलगाय, तीतर, बटेर व कछुए) का अवैध शिकार रोकना था।

6 उद्योग विभाग: आईटीआई, ग्राम सेवक केंद्र और कुटीर उद्योगों की संजीवनी

आज़ादी के बाद देश में यह महसूस किया गया कि केवल खेती के भरोसे करोड़ों लोगों की गरीबी दूर नहीं हो सकती। इसलिए उद्योग विभाग (Industries Department) की स्थापना की गई ताकि ग्रामीण इलाकों में छोटे कारखाने, हथकरघा, तेल पेरने के कोल्हू और बर्तन उद्योग को बढ़ावा दिया जा सके।

जिले में इस महकमे की बागडोर जिला उद्योग अधिकारी (District Industries Officer - DIO) संभालते थे, जो लखनऊ ज़ोन के संयुक्त निदेशक (Joint Director of Industries) के अधीन काम करते थे। उनकी मदद के लिए उद्योग निरीक्षक (Industries Inspector) और तकनीकी सहायक नियुक्त थे।

⚙️ युवाओं को हुनरमंद बनाने वाले दो बड़े संस्थान

प्रतापगढ़ के युवाओं को कारखानों और स्वरोजगार के लायक बनाने के लिए गजेटियर के अनुसार जिले में दो बड़े प्रशिक्षण केंद्र चलाए जा रहे थे:

  • राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (ITI प्रतापगढ़): यहां नौजवानों को तकनीकी ट्रेडों जैसे लोहारगीरी (हॉट स्मिथी व कोल्ड स्मिथी), इलेक्ट्रीशियन, फिटर, टर्नर और जनरल मैकेनिक का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाता था ताकि वे कल-कारखानों में काम पा सकें।
  • ग्राम सेवक प्रशिक्षण केंद्र (Gram Sevak Training Centre): यहां ग्रामीण विकास कार्यकर्ताओं को कृषि तकनीक, ग्रामीण कुटीर उद्योग, उन्नत बागवानी, ग्राम नियोजन और पशु प्राथमिक उपचार का गहन प्रशिक्षण दिया जाता था।

यही वह दौर था जब जिले में आंवले से मुरब्बा, कैंडी, अचार और तेल बनाने वाली छोटी-छोटी घरेलू इकाइयों को उद्योग विभाग ने वित्तीय सब्सिडी और लाइसेंस देना शुरू किया, जिसने आगे चलकर प्रतापगढ़ को एक जनपद एक उत्पाद (ODOP) का सिरमौर बना दिया।

7 लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी): 4.6 किमी का सड़क लक्ष्य और पुल निर्माण

पक्की सड़कें किसी भी इलाके की जीवन रेखा होती हैं। जब तक किसान का अनाज पक्की सड़क से होकर शहर की मंडी तक न पहुंचे, तब तक उसकी खुशहाली अधूरी रहती है। प्रतापगढ़ में प्रांतीय राजमार्गों, जिला मार्गों, पुलों और सरकारी भवनों के निर्माण का जिम्मा लोक निर्माण विभाग (Public Works Department - PWD) के पास था।

🎯 पंचवर्षीय योजनाओं का ऐतिहासिक संकल्प

गजेटियर में दर्ज है कि विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं के तहत पीडब्ल्यूडी का सबसे बड़ा और क्रांतिकारी लक्ष्य यह तय किया गया था कि जिले के प्रत्येक गांव को किसी न किसी पक्की (डामरयुक्त) सड़क से अधिकतम 4.6 किलोमीटर की दूरी के भीतर लाया जाए। ताकि किसी भी ग्रामीण को मुख्य सड़क तक पहुंचने के लिए कीचड़ और पगडंडियों पर 4.6 किमी से अधिक न भटकना पड़े।

🏢 पीडब्ल्यूडी का इंजीनियरिंग ढांचा

प्रतापगढ़ जिला लोक निर्माण विभाग के एक प्रभाग (Division) का मुख्यालय था, जिसका नियंत्रण इलाहाबाद में बैठने वाले अधीक्षण अभियंता (Superintending Engineer) के पास था। पूरे प्रदेश के स्तर पर सर्वोच्च अधिकारी प्रमुख अभियंता (Chief Engineer) लखनऊ में बैठते थे:

  • अधिशासी अभियंता (Executive Engineer) प्रतापगढ़: इनके पास जिले के सभी सरकारी भवनों, डाक बंगलों और मुख्य सड़कों का प्रभार था। खास बात यह थी कि इनका कार्यक्षेत्र पड़ोसी सुलतानपुर जिले की कुछ सीमाओं तक भी फैला हुआ था।
  • कार्य अधीक्षक (Superintendent of Works): जिले में चल रहे निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और परीक्षण (District Test Works) की निगरानी इनके जिम्मे थी।
  • पारस्परिक सर्किल: जौनपुर के कार्य अधीक्षक और सुलतानपुर के अधिशासी अभियंता का क्षेत्राधिकार भी प्रतापगढ़ की सीमावर्ती सड़कों से जुड़ता था, जिससे तीनों जिलों की सड़कों का आपस में सुगम तालमेल रहता था।

8 राज्य विद्युत परिषद: उत्तर-दक्षिण डिवीजन और गांव-गांव बिजली का उजाला

1970 और 80 के दशक में प्रतापगढ़ के गांवों में ढिबरी और लालटेन का युग समाप्त कर बिजली का खंभा पहुंचाना अपने आप में एक बड़ा चमत्कार था। इसके लिए उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत परिषद (UP State Electricity Board) जिम्मेदार था, जिसका काम बिजली के उत्पादन, पारेषण (Transmission), वितरण और बिल वसूली को संभालना था।

जिले में बिजली के विस्तार और मेंटेनेंस को सुचारू रखने के लिए पूरे प्रतापगढ़ को तीन अलग-अलग प्रभागों (Divisions) में बांटा गया था, जिनमें से प्रत्येक का मुखिया एक अधिशासी अभियंता (Executive Engineer) होता था:

विद्युत प्रभाग (Division) प्रभारी अधिकारी सहायक तकनीकी स्टाफ दायित्व एवं कार्यक्षेत्र
विद्युत अनुरक्षण खंड (उत्तर) अधिशासी अभियंता (नॉर्थ) सहायक अभियंता (राजस्व) व उपखंड अधिकारी (SDOs) उत्तरी क्षेत्र में बिजली आपूर्ति की देखरेख, फॉल्ट सुधार, शिकायत निवारण और बकाया बिजली बिलों की वसूली।
विद्युत अनुरक्षण खंड (दक्षिण) अधिशासी अभियंता (साउथ) उपखंड अधिकारी (मुख्यालय प्रतापगढ़) व लाइन इंस्पेक्टर दक्षिणी व कछारी क्षेत्र में हाईटेंशन व एलटी लाइनों का मेंटेनेंस और विद्युत उपकेंद्रों का संचालन।
ग्रामीण विद्युतीकरण खंड अधिशासी अभियंता (मुख्यालय प्रतापगढ़) 4 उपखंड अधिकारी (SDOs) व तकनीकी लाइनमैन गांव-गांव तक नए खंभे गाड़ना, ट्रांसफार्मर लगाना और किसानों के निजी व सरकारी ट्यूबवेलों को कनेक्शन देना।

ये तीनों प्रभाग क्षेत्रीय स्तर पर अधीक्षण अभियंता (विद्युत अनुरक्षण एवं ग्रामीण विद्युतीकरण मंडल) के प्रशासनिक नियंत्रण में काम करते थे। उपखंड अधिकारी (SDO) सीधे जनता से जुड़े होते थे और उपभोक्ताओं की शिकायतों का मौके पर निपटारा करते थे।

9 सिंचाई विभाग: नहर प्रभाग और 12 ब्लॉकों में लघु सिंचाई का नेटवर्क

प्रतापगढ़ की धरती पर अच्छी पैदावार के लिए बारिश के भरोसे रहने की मजबूरी को सिंचाई विभाग (Irrigation Department) ने तोड़ा। इस महकमे के दो सबसे बड़े काम थे—पहला, नहरों और सरकारी नलकूपों से खेतों तक पानी पहुंचाना, और दूसरा, बरसात के दिनों में सई, बकुलाही और गंगा की बाढ़ से शहरों व गांवों को जलभराव (Waterlogging) से बचाना।

गजेटियर के अनुसार जिले में सिंचाई तंत्र को दो बिल्कुल अलग और विशिष्ट प्रभागों में संगठित किया गया था:

🌊 1. नहर प्रभाग (Canal Division): 5 जिलों का विशाल समन्वय

प्रतापगढ़ नहर प्रभाग का कार्यालय एक अधिशासी अभियंता (Executive Engineer) के अधीन था, जो लखनऊ के अधीक्षण अभियंता और राज्य स्तर पर प्रमुख अभियंता (सिंचाई) लखनऊ के नियंत्रण में थे।

रोचक ऐतिहासिक तथ्य यह है कि प्रतापगढ़ के अधिशासी अभियंता का कार्यक्षेत्र केवल प्रतापगढ़ तक सीमित नहीं था, बल्कि उनका अधिकार क्षेत्र रायबरेली, सुलतानपुर, बाराबंकी और इलाहाबाद के नहर तंत्रों तक फैला हुआ था। उनकी सहायता के लिए 3 सहायक अभियंता (Assistant Engineers) तैनात थे। इनका मुख्य काम नहरों की सफाई, कुलावों (Outlets) से पानी का वितरण, जल निकासी (Drainage System) को ठीक रखना और किसानों से नहरी सिंचाई कर (Irrigation Revenue) का आकलन करना था।

🚰 2. नलकूप एवं लघु सिंचाई प्रभाग (Tube-well Division)

जिन इलाकों में नहरें नहीं पहुंच सकती थीं, वहां भूजल ही एकमात्र सहारा था। जिले में लघु सिंचाई की कमान प्रतापगढ़ मुख्यालय पर तैनात एक सहायक अभियंता (Assistant Engineer) के हाथ में थी।

इस प्रभाग का ढांचा सीधे किसान के दरवाजे से जुड़ा हुआ था:

  • 12 सहायक विकास अधिकारी - लघु सिंचाई (ADO Minor Irrigation): जिले के प्रत्येक ब्लॉक में एक-एक एडीओ तैनात किया गया था।
  • 2 मैकेनिकल सुपरवाइज़र: जो बोरिंग मशीनों और सरकारी नलकूपों के तकनीकी रखरखाव को संभालते थे।
  • निजी नलकूप बोरिंग योजना: यह विभाग किसानों के खेतों में निजी नलकूपों (Private Tube-wells) के लिए तकनीकी बोरिंग कराता था, डीजल व इलेक्ट्रिक पंपिंग सेट खरीदने के लिए ऋण पत्रावलियां तैयार करता था और सरकारी सब्सिडी दिलाता था।

📋 एक नज़र में: प्रतापगढ़ के 9 प्रमुख विभागों का प्रशासनिक तुलनात्मक चार्ट

विभाग का नाम जिला स्तर पर मुखिया क्षेत्रीय मंडल मुख्यालय राज्य स्तरीय सर्वोच्च अधिकारी मुख्य जमीनी जिम्मेदारी
1. कृषि विभाग जिला कृषि अधिकारी (DAO) उप-कृषि निदेशक (फैज़ाबाद) कृषि निदेशक (लखनऊ) उन्नत बीज वितरण, पौध संरक्षण व खाद आपूर्ति।
2. भूमि संरक्षण मृदा संरक्षण अधिकारी (SCO - 3 यूनिट) संयुक्त निदेशक (फैज़ाबाद) कृषि निदेशक (लखनऊ) कंटूर बंधी, बीहड़ सुधार व कटाव रोकथाम।
3. पशुपालन विभाग जिला पशुधन अधिकारी (DLO) उपनिदेशक (फैज़ाबाद) पशुपालन निदेशक (लखनऊ) 20 पशु अस्पताल, 12 A.I. केंद्र व 3 भेड़ केंद्र।
4. सहकारिता विभाग सहायक निबंधक सहकारी समितियां उपनिबंधक (फैज़ाबाद) निबंधक सहकारी समितियां (लखनऊ) 30 बीज भंडार, फसली ऋण व भूमि विकास बैंक।
5. शिक्षा विभाग DIOS / बेसिक शिक्षा अधिकारी उप-शिक्षा निदेशक (फैज़ाबाद) शिक्षा निदेशक (इलाहाबाद / लखनऊ) माध्यमिक, बेसिक व 15 उप-उप निरीक्षकों का तंत्र।
6. वन विभाग डिप्टी रेंजर (प्रतापगढ़ रेंज) प्रभागीय वनाधिकारी - DFO (फैज़ाबाद) मुख्य वन संरक्षक (लखनऊ) 4 सेक्शन, 12 बीट, सामाजिक वानिकी व वृक्षारोपण।
7. उद्योग विभाग जिला उद्योग अधिकारी (DIO) संयुक्त उद्योग निदेशक (लखनऊ ज़ोन) उद्योग निदेशक (कानपुर / लखनऊ) आईटीआई, ग्राम सेवक केंद्र व कुटीर उद्योग प्रोत्साहन।
8. लोक निर्माण (PWD) अधिशासी अभियंता (EE) अधीक्षण अभियंता (इलाहाबाद मंडल) प्रमुख अभियंता - पीडब्ल्यूडी (लखनऊ) 4.6 किमी पक्की सड़क लक्ष्य, पुल व डाक बंगले।
9. सिंचाई व विद्युत अधिशासी अभियंता (नहर / विद्युत) अधीक्षण अभियंता (लखनऊ / इलाहाबाद) प्रमुख अभियंता / चेयरमैन UPSEB शारदा सहायक नहर, 3 विद्युत प्रभाग व लघु सिंचाई।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q. 1 प्रतापगढ़ में मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए सबसे पहले भूमि संरक्षण इकाई कब बनी थी?

जिले में सबसे पहली भूमि संरक्षण इकाई साल 1962-63 में प्रतापगढ़ मुख्यालय पर शुरू हुई थी। इसके बाद गंगा और कछारी इलाकों के लिए 1966-67 में कुंडा और 1969-70 में लालगंज में इकाइयां स्थापित की गईं।

Q. 2 आज़ादी के बाद प्रतापगढ़ वन प्रभाग को किन 4 मुख्य सेक्शनों और बीट्स में बांटा गया था?

प्रतापगढ़ रेंज को 4 मुख्य सेक्शनों—चिलबिला, पहाड़पुर, लालगंज और कुंडा में बांटा गया था। इनके अंतर्गत कुल 12 बीट्स (पट्टी, चिलबिला, सुवंसा, प्रतापगढ़, पहाड़पुर, बैरामपुर, लक्ष्मणपुर, भागीपुर, रानीगंज, कुंडा, संग्रामगढ़ और बाघराय) बनाई गई थीं।

Q. 3 जिले में किसानों को खाद-बीज और कर्ज देने के लिए कितने सहकारी बीज भंडार थे?

गजेटियर के अनुसार सहकारिता विभाग के अधीन जिले भर में 30 सहकारी बीज भंडार संचालित थे। ये भंडार किसानों को उन्नत बीज, खाद और अल्पकालिक फसली ऋण देते थे, जबकि भूमि विकास बैंक दीर्घकालिक लोन मुहैया कराता था।

Q. 4 लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) का प्रत्येक गांव के लिए क्या मुख्य लक्ष्य था?

पंचवर्षीय योजनाओं के तहत पीडब्ल्यूडी का सबसे प्रमुख लक्ष्य जिले के प्रत्येक गांव को किसी न किसी पक्की डामर वाली सड़क से अधिकतम 4.6 किलोमीटर की दूरी के भीतर जोड़ना था, ताकि ग्रामीणों को सुगम आवागमन मिल सके।

Q. 5 प्रतापगढ़ में सिंचाई के लिए नहर प्रभाग का दायरा किन पड़ोसी जिलों तक फैला हुआ था?

प्रतापगढ़ नहर प्रभाग के अधिशासी अभियंता का क्षेत्राधिकार केवल प्रतापगढ़ तक ही नहीं, बल्कि रायबरेली, सुलतानपुर, बाराबंकी और इलाहाबाद के सीमावर्ती नहर तंत्रों और ड्रेनेज प्रणालियों तक विस्तृत था।

🏛️ निष्कर्ष: आधुनिक प्रतापगढ़ की मजबूत बुनियाद गढ़ने वाले 9 स्तंभ

उत्तर प्रदेश जिला गजेटियर (1980) का यह 13वां अध्याय हमें बताता है कि आज हम जिस प्रतापगढ़ को विकसित और आत्मनिर्भर देखते हैं, उसकी नींव में इन 9 विभागों के इंजीनियरों, निरीक्षकों, डॉक्टरों और शिक्षकों का दशकों का अथक पसीना शामिल है। चाहे वह 30 सहकारी बीज भंडारों से हरित क्रांति का आगाज हो, 20 पशु अस्पतालों से श्वेत क्रांति की तैयारी हो, 3 भूमि संरक्षण इकाइयों से बंजर बीहड़ों को उपजाऊ बनाना हो या पीडब्ल्यूडी की 4.6 किमी सड़क योजना—इन्हीं मजबूत कदमों ने बेल्हा को आधुनिक भारत के मानचित्र पर गर्व से स्थापित किया।

प्रामाणिक संदर्भ: यह संपूर्ण आलेख उत्तर प्रदेश जिला गजेटियर: प्रतापगढ़ (1980), अध्याय-13: "Other Departments" (पेज 239 से 244) के आधिकारिक सरकारी अभिलेखों, संगठनात्मक चार्ट्स और ऐतिहासिक सांख्यिकी पर पूरी तरह आधारित है।
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