प्रतापगढ़ का आर्थिक इतिहास और जीवन स्तर: जब 1 रुपये में मिलता था 12 मन गेहूं, 3 रुपये थी दिहाड़ी और बने 15 ब्लॉक
आज जब बाजार में सौ-दो सौ रुपये का नोट सब्जी खरीदने में ही खत्म हो जाता है, तो क्या कभी आपने अपने दादा-परदादा से सुना है कि एक जमाना ऐसा भी था जब एक रुपये में 12 मन (करीब 480 किलो) गेहूं या 44 सेर शुद्ध दूध मिल जाता था?
1980 के सरकारी गजेटियर (अध्याय 9) में दर्ज यह इतिहास हमें बताता है कि कैसे 1856 में अवध विलय के बाद कीमतें बढ़ीं, 1929 की महामंदी में भाव गिरने पर भी किसानों की कमर टूटी, और द्वितीय विश्व युद्ध ने महंगाई का ऐसा तूफान खड़ा किया कि 1 रुपये का गेहूं 1 किलो पर आ गया। इसमें 1971 में शहर के दर्जियों, नाइयों, धोबियों की पाई-पाई मजदूरी, 1960 में खुले सेवायोजन कार्यालय और जिले के 15 विकास खंडों (ब्लॉकों) के बनने की पूरी दास्तान आसान बोलचाल में दर्ज है।
🌾 1. आजीविका का स्वरूप: 87.5% आबादी का जीवन सिर्फ खेती के भरोसे
प्रतापगढ़ शुरू से ही एक विशुद्ध देहाती और खेती-किसानी पर टिका जिला रहा है। गजेटियर में 1901 से लेकर 1971 तक की जनगणनाओं का तुलनात्मक ब्योरा दर्ज है, जो दिखाता है कि आबादी बढ़ने के साथ कामगारों का अनुपात कैसे बदला:
1901 से 1971: काम करने वाले लोगों का घटता प्रतिशत
पुराने जमाने में परिवार के लगभग सभी लोग किसी न किसी रूप में काम में हाथ बंटाते थे:
- 1901: जिले की कुल आबादी में से 51.8% लोग कामगार (Workers) थे।
- 1921: काम करने वालों का यह अनुपात बढ़कर 60.1% पहुंच गया (पूरे उत्तर प्रदेश के औसत 52.1% से भी काफी ज्यादा)।
- 1951 व 1961: कामगारों का प्रतिशत घटकर क्रमशः 46.5% और 45.7% रह गया।
- 1971 की नई परिभाषा: 1971 की जनगणना में केवल उन्हीं लोगों को कामगार माना गया जिनका कोई मुख्य नियमित रोजगार था (अंशकालिक या बिना वेतन के पारिवारिक काम करने वालों को गैर-कामगार माना गया)। इसके चलते 1971 में जिले की 14,22,707 आबादी में से 4,32,090 लोग (30.16%) मुख्य कामगार और 9,90,617 लोग (69.84%) गैर-कामगार दर्ज हुए।
| आजीविका का मुख्य क्षेत्र (Livelihood Class) | 1971 में कामगारों की संख्या | कुल कामगारों में प्रतिशत | आर्थिक स्थिति व निर्भरता |
|---|---|---|---|
| खुद की खेती करने वाले किसान (Cultivators) | 2,66,282 | 61.6% | जिले का सबसे बड़ा आर्थिक वर्ग |
| खेतिहर मजदूर (Agricultural Labourers) | 1,12,181 | 25.9% | दूसरों के खेतों में दैनिक मजदूरी करने वाले |
| कुटीर व घरेलू उद्योग (Household Industry) | 14,540 | 3.4% | हथकरघा, कुम्हारी, लोहारी, टोकरी व सनई शिल्पी |
| व्यापार और वाणिज्य (Trade & Commerce) | 10,452 | 2.4% | आढ़त, गल्ला मंडी, खुदरा दुकानदार व फेरीवाले |
| अन्य उद्योग व विनिर्माण (Non-household) | 4,059 | 0.9% | आटा चक्की, तेल पेराई, ईंट भट्ठे व मरम्मत कार्य |
| परिवहन, भंडारण व संचार | 1,911 | 0.5% | बस, ट्रक, तांगा, रिक्शा व डाक कर्मचारी |
| बागवानी, पशुपालन व मछली पालन | 379 | 0.1% | आंवला-आम के बाग, डेयरी व मत्स्य पालन |
| मकान व सड़क निर्माण (Construction) | 557 | 0.1% | राजमिस्त्री व निर्माण मजदूर |
| लोक सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य व अन्य सेवाएं | 21,665 | 5.0% | सरकारी बाबू, शिक्षक, वकील, डॉक्टर व सफाईकर्मी |
*साफ दिखता है कि 1971 तक जिले की 87.5% कामकाजी आबादी (61.6% किसान + 25.9% खेतिहर मजदूर) सीधे तौर पर खेती की माटी से ही अपनी रोटी कमाती थी।
👴 2. मेहनतकश समाज: 60 साल से अधिक उम्र के 90% बुजुर्ग भी करते थे काम
आजकल जहां लोग 60 की उम्र में रिटायर होकर आराम की सोचते हैं, वहीं 1961 के गजेटियर में दर्ज प्रतापगढ़ का समाज एक ऐसा मेहनतकश समाज था जहां उम्र कभी काम के आड़े नहीं आती थी।
उम्र के अनुसार पुरुषों की काम में भागीदारी
गजेटियर के अनुसार जिले के पुरुषों में काम करने का जज्बा हर उम्र में दिखाई देता था:
- 15 से 34 साल: इस आयु वर्ग के 90.3% पुरुष सक्रिय रूप से काम में लगे थे।
- 35 से 59 साल: इस आयु वर्ग के 99.4% पुरुष (लगभग हर कोई) कमाने में जुटा था।
- 60 साल और उससे अधिक (बुजुर्ग वर्ग): सबसे प्रेरणादायक आंकड़ा यह है कि 60 वर्ष पार कर चुके बुजुर्गों में से 89.9% (लगभग 10 में से 9 बुजुर्ग) खेतों में, खलिहानों में या दुकानों पर सक्रिय काम करते थे! खाली बैठना हमारे पुरखों के मिजाज में नहीं था।
- बाल श्रम का नगण्य प्रतिशत: 0 से 14 साल के बच्चों में केवल 9.2% ही किसी हल्के पारिवारिक काम में हाथ बंटाते थे, बाकी स्कूल जाते थे।
गैर-कामगार कौन थे?
1961 की गणना में 6.65 लाख गैर-कामगारों में मुख्य रूप से तीन श्रेणियां थीं:
- घर का कामकाज संभालने वाली महिलाएं: 1,84,972 माताएं-बहनें जो घर-परिवार और चूल्हा-चौका संभालती थीं।
- पूर्णकालिक छात्र: 67,375 बच्चे और नौजवान जो स्कूलों-कॉलेजों में पढ़ाई कर रहे थे।
- छोटे बच्चे व अशक्त बुजुर्ग: 4,09,508 नन्हे बच्चे और चलने-फिरने में असमर्थ लोग।
💰 3. कीमतों का अनोखा इतिहास: जब 1 रुपये में मिलता था 12 मन गेहूं
पुराने जमाने की कीमतों की दास्तान सुनकर आज किसी को भी यकीन नहीं होगा। इतिहासकार ए. एल. श्रीवास्तव के हवाले से गजेटियर में मुगल काल से लेकर आजादी के बाद तक के भाव दर्ज हैं:
बादशाह अकबर का जमाना: सस्ता जमाना, संतुष्ट जीवन
मुगल काल में जब आबादी बहुत कम थी और लोगों की जरूरतें सीमित थीं, तब एक चांदी के रुपये में इतना सामान आ जाता था कि पूरे महीने का राशन भर जाए:
- गेहूं: 1 रुपये में 12 मन (करीब 448 किलोग्राम)
- जौ और मूंग: 1 रुपये में 18 मन (करीब 672 किलोग्राम)
- चावल व उड़द: 1 रुपये में 16 मन (करीब 597 किलोग्राम)
- शुद्ध दूध: 1 रुपये में 44 सेर (करीब 41 किलोग्राम)
- गोश्त (Meat): 1 रुपये में 17 सेर
1856 (अवध विलय) से 1929 तक: अंग्रेजों के दौर में बढ़ती महंगाई
1856 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने अवध पर कब्जा किया, उस समय तक भी देहात में अनाज बहुत सस्ता था:
- 1856 से पहले: 1 रुपये में 50 सेर (करीब 46 किलो) जौ, ज्वार या अरहर मिलती थी। मटर और चावल 40 सेर प्रति रुपया बिकता था।
- 1871 आते-आते: 1 रुपये में गेहूं घटकर 20 सेर और जौ 31 सेर रह गया।
- 1901 (तीस सालों में 39% महंगाई): 1901 में 1 रुपये का गेहूं मात्र 14.43 सेर और बाजरा 17.52 सेर रह गया।
- 1910 से 1912: कीमतें 12 से 13 सेर प्रति रुपया के बीच टिक गईं।
1929 की विश्वव्यापी महामंदी: भाव गिरे पर किसान तबाह
1929 में दुनिया भर में आई 'आर्थिक महामंदी' (Great Depression) ने प्रतापगढ़ के किसानों की कमर तोड़ दी:
- 1929 में जो गेहूं 7 सेर 4 छटांक प्रति रुपया था, वह 1933 में धड़ाम से गिरकर 13 सेर प्रति रुपया हो गया। जौ 18 सेर और चावल 12 सेर प्रति रुपया बिकने लगा।
- कीमतें गिरना आम जनता के लिए खुशी नहीं लाया, क्योंकि लोगों की आमदनी और मजदूरी पूरी तरह सूख चुकी थी। किसानों की फसल कौड़ियों के भाव बिकी और वे लगान तक नहीं चुका पाए।
| ऐतिहासिक दौर / वर्ष | गेहूं (प्रति रुपया) | जौ (प्रति रुपया) | चावल (प्रति रुपया) | चना (प्रति रुपया) | अरहर दाल (प्रति रुपया) |
|---|---|---|---|---|---|
| 1856 से पूर्व (नवाबी दौर) | लगभग 40 सेर | 50 सेर | 40 सेर | 45 सेर | 50 सेर |
| 1871 (ब्रिटिश बंदोबस्त) | 20 सेर | 31 सेर | 22 सेर | 25 सेर | 24 सेर |
| 1901 (सूखे के बाद) | 14.4 सेर | 21.6 सेर | 16 सेर | 18 सेर | 17.5 सेर |
| 1912 (प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व) | 12.2 सेर | 15.0 सेर | 8.0 सेर | 18.0 सेर | 12.0 सेर |
| 1929 (महामंदी से ठीक पहले) | 7.2 सेर | 9.2 सेर | 6.0 सेर | 7.0 सेर | 5.7 सेर |
| 1933 (महामंदी का चरम) | 13.0 सेर | 18.0 सेर | 12.0 सेर | 15.0 सेर | 11.0 सेर |
| 1941-42 (द्वितीय विश्व युद्ध) | 5.1 सेर | 6.7 सेर | 4.6 सेर | 5.9 सेर | 4.6 सेर |
| 1948-49 (महंगाई का चरम) | 1.38 किलो | 1.97 किलो | 1.38 किलो | 2.31 किलो | 2.08 किलो |
| 1955 (मूल्य समर्थन दौर) | 2.90 किलो | 4.25 किलो | 2.45 किलो | 4.45 किलो | 2.90 किलो |
| 1971 (खुदरा भाव प्रति किलो) | 78 पैसे/किलो | 61 पैसे/किलो | 1.18 रु/किलो | 69 पैसे/किलो | 1.60 रु/किलो |
*नोट: 1971 में अन्य जरूरी चीजों के भाव: सरसों का तेल 4.60 रु/किलो, चीनी 1.85 रु/किलो, देशी गुड़ 1.05 रु/किलो, नमक मात्र 20 पैसे/किलो और केरोसिन (मिट्टी का तेल) 75 पैसे प्रति लीटर था।
🔨 4. मजदूरी का इतिहास: 12 पैसे रोजाना से 3 रुपये दिहाड़ी तक का सफर
मुगल काल से लेकर बीसवीं सदी के मध्य तक प्रतापगढ़ में मजदूरों को नकद पैसे के बजाय अनाज (जिंस) के रूप में मजदूरी देने का रिवाज था।
अनाज में मजदूरी की पुरानी परंपरा
19वीं सदी में खेत मजदूरों को उनके काम की प्रकृति के आधार पर रोज शाम को अनाज दिया जाता था:
- खेत जोतने और खाद डालने पर: रोजाना 1.5 सेर अनाज (सस्ता व हल्का अनाज जैसे जौ, बाजरा)।
- कुएं से पुर (चरस) द्वारा सिंचाई पर: 2 सेर अनाज प्रतिदिन।
- दौरा या डोगला से पानी उठाने पर: ज्यादा मेहनत होने के कारण 2.5 सेर अनाज रोजाना।
- नकद मजदूरी: 16वीं सदी में खेत मजदूर को 12.5 पैसे रोजाना (या 3.75 रुपये महीना) मिलता था, जो 1878 तक लगभग स्थिर रहकर 4 रुपये महीने तक पहुंचा। 1873 में गांव के लोहार और बढ़ई को औसतन 6 रुपये प्रति महीना मिलता था।
1906 से 1971: नकद मजदूरी में उछाल
प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब महंगाई बढ़ी तो नकद मजदूरी में भी बढ़ोतरी हुई:
- 1906 व 1911: अकुशल मजदूर को 12 पैसे (दो आने) और कुशल कारीगर को 30 पैसे रोजाना मिलते थे।
- 1928: अकुशल को 19 पैसे और कारीगर को 50 पैसे रोजाना।
- 1944: अकुशल मजदूर की दिहाड़ी 50 पैसे (आठ आने) और कुशल मिस्त्री की 1.00 रुपया हुई।
- 1950 से 1971: 1950 में अकुशल मजदूर को 2 रुपये और 1960 में 4 रुपये मिलने लगे। 1971 तक आते-आते गांव में 8 घंटे के काम के लिए 3 रुपये रोजाना अकुशल मजदूर और 6 रुपये रोजाना कुशल कारीगर (लोहार/बढ़ई) की सर्वमान्य दिहाड़ी बन गई।
🏪 5. 1971 में बेला शहर की अनोखी मजदूरी: 25 पैसे में दाढ़ी, 5 रुपये में प्रसव
गजेटियर के पृष्ठ 183 पर 1971 में बेला प्रतापगढ़ शहर में विभिन्न पेशों की मजदूरी का जो ब्योरा दिया गया है, वह आज के दौर में किसी तिलिस्म जैसा लगता है:
| पेशा / कामगार (Occupation) | काम की इकाई (Unit) | 1971 में मजदूरी की दर (नगरपालिका व निजी) |
|---|---|---|
| माली (Gardener) | पूर्णकालिक (महीना) / पार्ट-टाइम | 90 रुपये प्रति माह (फुल-टाइम) / 30 रुपये (पार्ट-टाइम) |
| चौकीदार (Chowkidar) | प्रति माह | 90 रुपये प्रति माह |
| लकड़हारा (Wood-cutter) | 1 मन (37.32 किलो) लकड़ी चीरने पर | मात्र 30 पैसे प्रति मन |
| चरवाहा / ग्वाला (Herdsman) | प्रति मवेशी (मासिक) | गाय चराने का 1.50 रु/माह, भैंस का 2.00 रु/माह |
| पल्लेदार / कुली (Porter) | 1 मन (37.32 किलो) बोझा 1.6 किमी ढोने पर | 1.00 रुपया |
| घरेलू नौकर (Domestic Servant) | प्रति माह | बिना खाने के 80 रु/माह, खाने के साथ 30 रु/माह |
| बढ़ई व लोहार (Carpenter & Blacksmith) | प्रति दिन (दिहाड़ी) | 6.00 रुपये रोजाना |
| दर्जी: ऊनी सूट सिलाई | प्रति सूट | 35.00 रुपये |
| दर्जी: सूती सूट सिलाई | प्रति सूट | 12.00 रुपये |
| दर्जी: कमीज (फुल / हाफ आस्तीन) | प्रति शर्ट | फुल शर्ट 2.00 रुपये / हाफ शर्ट 1.00 रुपया |
| पारंपरिक दाई (Midwife) | प्रति बच्चा जन्म (प्रसव) | 5.00 रुपये प्रति प्रसव |
| नाई: दाढ़ी बनाना (हजामत) | प्रति शेव | मात्र 25 पैसे (चार आने) |
| नाई: बाल काटना (हेयरकट) | प्रति कटिंग | मात्र 75 पैसे (बारह आने) |
| सफाईकर्मी (Sweeper) | प्रति दिन | 3.00 रुपये रोजाना |
| मोटर कार ड्राइवर | प्रति माह | 200 रुपये महीना |
| ट्रक ड्राइवर | प्रति माह | 250 रुपये महीना |
📋 6. सेवायोजन कार्यालय और बेरोजगारी: टाइपिस्टों की कमी, बीए पासों की भरमार
जिले के शिक्षित नौजवानों को रोजगार दिलाने और निजी व सरकारी दफ्तरों को योग्य कर्मचारी उपलब्ध कराने के लिए दिसंबर 1960 में बेला प्रतापगढ़ में सेवायोजन कार्यालय (Employment Exchange) की स्थापना की गई।
1967 से 1971 का रोजगार रिकॉर्ड
दफ्तर ने 'एम्प्लॉयमेंट मार्केट इंफॉर्मेशन स्कीम' के तहत 5 या अधिक कर्मचारियों वाले दफ्तरों से आंकड़े जुटाने शुरू किए:
- 1967: 5,115 बेरोजगारों ने नाम लिखाया, जिनमें से 619 को नौकरी मिली।
- 1971: 145 सरकारी व निजी प्रतिष्ठानों में कुल 14,297 कर्मचारी काम कर रहे थे (12,613 सरकारी क्षेत्र में और 1,684 निजी क्षेत्र में)।
- 1971 में बेरोजगारों की कतार: साल भर में 6,217 युवाओं ने रोजगार दफ्तर में पंजीकरण कराया, 811 रिक्तियां आईं और 773 को रोजगार दिलाया गया। साल के अंत में 4,350 अभ्यर्थी 'लाइव रजिस्टर' पर नौकरी की आस में दर्ज थे।
- कामकाजी महिलाएं: 1971 में संगठित क्षेत्र में कुल 634 महिलाएं नौकरी कर रही थीं, जिनमें से 69.9% शिक्षा विभाग में (शिक्षिकाएं) और 27.0% स्वास्थ्य विभाग में (नर्सें/दाइयां) थीं।
जिले का अजीब विरोधाभास: टाइपिस्ट नहीं मिल रहे, बीए-एमए बेरोजगार!
गजेटियर दर्ज करता है कि 1971 में प्रतापगढ़ में रोजगार का एक बड़ा असंतुलन सामने आया:
- इनकी भारी कमी थी: सरकारी और दीवानी दफ्तरों में हिंदी और अंग्रेजी के स्टेनोग्राफर (आशुलिपिक), टाइपिस्ट, कंपाउंडर और ट्रेंड नर्सों की सख्त किल्लत थी। पद खाली पड़े रहते थे पर योग्य अभ्यर्थी नहीं मिलते थे!
- इनकी भारी भरमार थी: सामान्य बीए, एमए, इंटर पास युवा और अप्रशिक्षित शिक्षक जरूरत से बहुत ज्यादा (Surplus) थे, जिनके लिए दफ्तरों में कोई पद नहीं था। बेरोजगारी रजिस्टर पर 35 पोस्ट-ग्रेजुएट, 329 ग्रेजुएट और 882 इंटर पास युवक कतार में खड़े थे।
🏛️ 7. पंचायती राज और 15 विकास खंड: 26 जनवरी 1954 को बना पहला ब्लॉक
आजादी के बाद गांव-गांव तक विकास, नहरें, स्कूल और खाद-बीज पहुंचाने के लिए त्रिस्तरीय पंचायती राज और ब्लॉक प्रणाली लागू की गई।
लक्ष्मणपुर से 15 ब्लॉकों का ऐतिहासिक सफर
ग्रामीण विकास की शुरुआत 1937 में पहली कांग्रेस सरकार के समय ग्रामीण विकास संघ से हुई थी, लेकिन वास्तविक क्रांति 1954 में आई:
- 26 जनवरी 1954: जिले का सबसे पहला सामुदायिक विकास खंड 'लक्ष्मणपुर' (Laxmanpur) गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर उद्घाटित हुआ।
- 2 दिसंबर 1961: जिले में औपचारिक रूप से त्रिस्तरीय पंचायती राज (ग्राम पंचायत, क्षेत्र समिति और जिला परिषद) लागू हुआ।
- 15 विकास खंड: जिले के हर गांव को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए प्रतापगढ़ को 15 विकास खंडों में बांटा गया:
| तहसील (Tahsil) | विकास खंड (Block Name) | उद्घाटन की तिथि | ग्राम सभाएं | न्याय पंचायतें | 1961 में आबादी |
|---|---|---|---|---|---|
| प्रतापगढ़ (सदर) | लक्ष्मणपुर (Laxmanpur) | 26 जनवरी 1954 (प्रथम ब्लॉक) | 100 | 10 | 74,277 |
| प्रतापगढ़ (सदर) | सांड़वा चंडिका (Sandwa Chandika) | 2 अक्टूबर 1956 | 93 | 11 | 79,283 |
| प्रतापगढ़ (सदर) | सदर (Sadar / प्रतापगढ़) | 1 अप्रैल 1957 | 105 | 12 | 80,711 |
| प्रतापगढ़ (सदर) | सांगीपुर (Sangipur) | 1 जुलाई 1957 | 102 | 12 | 84,634 |
| प्रतापगढ़ (सदर) | मानधाता (Mandhata) | 2 अक्टूबर 1972 | 121 | 13 | 83,811 |
| कुंडा | बाबागंज (Babaganj) | 2 अक्टूबर 1955 | 98 | 11 | 82,003 |
| कुंडा | कुंडा (Kunda) | 2 अक्टूबर 1956 | 101 | 11 | 97,086 |
| कुंडा | कालाकांकर (Kalakankar) | 1 अप्रैल 1957 | 85 | 10 | 67,583 |
| कुंडा | बिहार (Bihar) | 1 अक्टूबर 1963 | 91 | 11 | 88,260 |
| कुंडा | रामपुर खास (Rampur Khas) | 2 अक्टूबर 1972 | 125 | 16 | 98,622 |
| पट्टी | आसपुर देवसरा (Aspur Deosra) | 26 जनवरी 1955 | 103 | 11 | 72,338 |
| पट्टी | पट्टी (Patti) | 1 अप्रैल 1957 | 91 | 10 | 61,869 |
| पट्टी | गौरा (Gaura) | 1 अप्रैल 1960 | 92 | 10 | 77,912 |
| पट्टी | मंगरौरा (Mangraura) | 1 अप्रैल 1960 | 111 | 11 | 89,166 |
| पट्टी | शिवगढ़ (Shivgarh) | 2 अक्टूबर 1972 | 107 | 12 | 81,550 |
📈 8. पंचवर्षीय योजनाएं: खेती, हरित क्रांति और आत्मनिर्भरता की राह
आजादी के बाद देश में शुरू हुई पंचवर्षीय योजनाओं ने प्रतापगढ़ के गांवों की तस्वीर बदलने में बुनियादी भूमिका निभाई:
प्रथम से चतुर्थ पंचवर्षीय योजना की उपलब्धियां
- प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-1956): सबसे ज्यादा जोर खेती, नहरों के विस्तार, पक्के कुओं और बिजली पर दिया गया ताकि भुखमरी खत्म हो सके।
- द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956-1961): ग्रामीण कुटीर उद्योगों, सनई, चमड़ा और आंवला प्रसंस्करण को बढ़ावा मिला।
- तृतीय पंचवर्षीय योजना (1961-1966): आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था बनाने पर बल दिया गया। पहली बार मैक्सिकन उन्नत गेहूं के बीज, धान की ताइचुंग किस्में और रासायनिक खादों का प्रयोग शुरू हुआ जिसने हरित क्रांति की जमीन तैयार की।
- चतुर्थ योजना (1969-1974): जिले में आमदनी बढ़ाने, बेरोजगारी दूर करने और समाज के सबसे गरीब तबके तक विकास का लाभ पहुंचाने का संकल्प लिया गया।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (प्रतापगढ़ आर्थिक इतिहास FAQs)
1980 के सरकारी गजेटियर का यह नौवां अध्याय हमें यह सिखाता है कि प्रतापगढ़ की माटी ने कभी मुफ्त की रोटी नहीं खाई। 60 पार कर चुके 90 फीसदी बुजुर्गों का खेतों में काम करना और 12 पैसे रोजाना से 3 रुपये दिहाड़ी तक का सफर हमारे पुरखों के स्वाभिमान और अटूट संघर्ष की मिसाल है।
1 रुपये में 12 मन गेहूं के सस्ते दौर से लेकर विश्व युद्धों की भयानक महंगाई और 1954 में लक्ष्मणपुर से शुरू हुई 15 विकास खंडों की विकास यात्रा हमें बताती है कि आज हम जिस मुकाम पर हैं, वह हमारे पुरखों के पसीने और त्याग की बदौलत ही संभव हो सका है।
यह आलेख उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 1980 में प्रकाशित आधिकारिक 'Uttar Pradesh District Gazetteers: Pratapgarh' के Chapter IX - 'Economic Trends' (पृष्ठ 172 से 189) में दर्ज प्रामाणिक आर्थिक आंकड़ों, जनगणना रिपोर्टों (1901-1971), मूल्य व मजदूरी रजिस्टरों, 1960 सेवायोजन कार्यालय रिकॉर्ड और 15 विकास खंडों के बंदोबस्त दस्तावेजों पर आधारित है।