प्रतापगढ़ में शिक्षा और संस्कृति का इतिहास: गुरुकुल से डिग्री कॉलेज और महाकवि भिखारी दास (गजेटियर 1980)
सई नदी की पावन गोद में बसा प्रतापगढ़ केवल वीरों की धरती ही नहीं, बल्कि ज्ञान, विद्या और कालजयी साहित्य की तपोभूमि भी रहा है। त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के वनगमन पथ से लेकर कोसल साम्राज्य के वैदिक गुरुकुलों, मध्यकालीन मकतब-पाठशालाओं और फिर ब्रिटिश काल के आधुनिक स्कूलों तक—बेल्हा की माटी ने हमेशा ज्ञान की मशाल जलाए रखी है।
उत्तर प्रदेश जिला गजेटियर (1980) का अध्याय 15 (Education and Culture) हमें बताता है कि कैसे 1859 में मात्र 12 बच्चों से शुरू हुआ पहला हाईस्कूल आगे चलकर सैकड़ों इंटर व डिग्री कॉलेजों में बदल गया। इसी धरती के लाल महाकवि भिखारी दास ने हिंदी काव्यशास्त्र को नई दिशा दी, तो कालाकांकर और भदरी की रियासतों ने शिक्षा, पत्रकारिता और दुर्लभ पुस्तकालयों की अलख जगाई। आइए, बहुत ही आसान और आत्मीय भाषा में बेल्हा के शैक्षिक और सांस्कृतिक सफरनामे को जानें।
1 वैदिक गुरुकुलों से मध्यकालीन मकतब-पाठशालाओं तक की ज्ञान-यात्रा
प्राचीन काल में प्रतापगढ़ का क्षेत्र कोसल साम्राज्य का अभिन्न अंग था। उस समय शिक्षा शहरों की चकाचौंध से दूर शांत तपोवनों और ऋषियों के आश्रमों में दी जाती थी। विद्यार्थी गुरु के सान्निध्य में रहकर वेद, उपनिषद, गणित, धनुर्विद्या और जीवन मूल्यों का पाठ सीखते थे।
मध्यकाल में शिक्षा का रूप बदला, लेकिन ज्ञान की धारा नहीं सूखी। गांवों और कस्बों में दो तरह की पारंपरिक शिक्षण व्यवस्थाएं काम कर रही थीं:
इन दोनों ही व्यवस्थाओं में सरकार से कोई आर्थिक मदद नहीं मिलती थी। समाज के संपन्न लोग, ज़मींदार और आम जनता ही अपने सहयोग से शिक्षकों और छात्रों के भोजन-आवास का प्रबंध करते थे।
2 अंग्रेजी हुकूमत, 1859 का पहला हाईस्कूल और 3 रियासती एंग्लो-वर्नाक्युलर कॉलेज
1856 में अंग्रेजों द्वारा अवध पर कब्जा करने और 1857 की क्रांति के शांत होने के बाद जिले में आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा की पहली नींव पड़ी। साल 1859 में बेला प्रतापगढ़ में पहला हाईस्कूल खोला गया, जो स्थानीय चंदे और मामूली सरकारी सहायता से चलता था।
शुरुआत में हालात बेहद निराशाजनक थे। गजेटियर में दर्ज है कि साल 1864 में यह स्कूल पूरे अवध में सबसे पिछड़ा था, जहाँ रोजाना केवल 12 बच्चे पढ़ने आते थे। लेकिन 1869 में इस स्कूल के दो पूर्व छात्रों—नूरपुर के राजा चितपाल सिंह और दहियावां के बाबू महेश बख्श ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। ज़मींदारों के बच्चों को स्कूल लाने के लिए खुद गाड़ियां भेजीं, जिससे उपस्थिति 12 से उछलकर 129 तक पहुंच गई।
उसी साल 1869 में परियावां के शेख दोस्त मोहम्मद ने नवाबगंज में सहायता प्राप्त मिडिल स्कूल खोला, जबकि पट्टी और बिहार में सरकारी टाउन स्कूल और 50 देहाती प्राथमिक पाठशालाएं शुरू हुईं। 1875 तक जिले में स्कूलों की संख्या 90 और विद्यार्थियों की संख्या 3,194 हो चुकी थी।
जब अंग्रेजी हुकूमत भारतीय बच्चों को केवल क्लर्क बनाने लायक शिक्षा दे रही थी, तब बेल्हा के देशभक्त राजाओं ने अपने निजी खजाने खोलकर उच्च कोटि के एंग्लो-वर्नाक्युलर स्कूल स्थापित किए:
- 1. अजीत सोमवंशी एंग्लो-वर्नाक्युलर स्कूल, प्रतापगढ़ (1893): राजा अजीत सिंह की स्मृति में उनके उत्तराधिकारी राजा प्रताप बहादुर सिंह ने अपने निजी खर्च पर इसे शुरू किया। यह पुरानी तहसील स्कूल की इमारत में खुला, जिसमें 2 भव्य छात्रावास (Boarding Houses) थे। यहाँ अंग्रेजी के साथ-साथ संस्कृत की विशेष शाखा चलाई गई। यही स्कूल आगे चलकर पी.बी. इंटर कॉलेज बना।
- 2. हनुमंत एंग्लो-वर्नाक्युलर स्कूल, कालाकांकर: राजा रामपाल सिंह द्वारा स्थापित यह स्कूल ग्रामीण बच्चों को मिडिल स्तर तक अंग्रेजी व आधुनिक विज्ञान की उत्कृष्ट शिक्षा देता था।
- 3. भदरी एंग्लो-वर्नाक्युलर स्कूल: कोर्ट ऑफ वार्ड्स द्वारा भदरी रियासत के खर्च पर देहात के पिछड़े बच्चों के लिए संचालित किया गया।
🏫 हल्काबंदी (Halqabandi) स्कूल: 1% जमींदारी टैक्स से गांव-गांव शिक्षा
अंग्रेज सरकार गांवों में प्राथमिक शिक्षा पर ज्यादा खर्च नहीं करना चाहती थी। इसके लिए जिले में 'हल्काबंदी प्रणाली' (Circuit Schools) लागू की गई। इसमें 4-5 नजदीकी गांवों का एक समूह (हल्का) चुना जाता था और बीच के बड़े गांव में स्कूल खोला जाता था। इस स्कूल का सारा खर्च उस इलाके के ज़मींदार अपनी मालगुजारी (लगान) का 1% स्वैच्छिक सेस देकर उठाते थे। साल 1903 तक जिले के कुल 161 प्राइमरी स्कूलों में से 98 स्कूल इसी हल्काबंदी योजना से चल रहे थे।
🌸 बालिका शिक्षा की पहली किरण (1868)
बेटियों की पढ़ाई के मामले में समाज बहुत संकीर्ण था। जिले में पहला बालिका विद्यालय 1868 में रणजीतपुर चिलबिला के नवाबगंज में खुला, लेकिन सख्त पर्दा प्रथा और बाल विवाह के कारण छात्राएं नहीं आईं और स्कूल कुछ ही समय में बंद हो गया। बाद में जब सर विलियम मुईर लेफ्टिनेंट गवर्नर बने, तो बालिका शिक्षा को दोबारा संजीवनी मिली। बेला के मैकेन्ड्रूगंज में बालिकाओं का स्कूल खुला, कुंडा के गुटनी में मिशन स्कूल और सराय खांडे राय में सहायता प्राप्त कन्या पाठशाला शुरू हुई।
3 साक्षरता का ऐतिहासिक सफर: 1881 में 3.4% से 1971 में 31.2% तक
आज़ादी से पहले जिले में साक्षरता की गति बहुत धीमी थी, खासकर महिलाओं में पढ़ाई का प्रतिशत न के बराबर था। लेकिन आज़ादी के बाद शिक्षा के प्रति लोगों की सोच में भारी बदलाव आया:
| जनगणना वर्ष | पुरुष साक्षरता (%) | महिला साक्षरता (%) | जिले की कुल साक्षरता व ऐतिहासिक टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| 1881 | 3.4% | 0.05% | गुलामी का दौर, महिलाओं में 10,000 में मात्र 5 महिलाएं साक्षर थीं। |
| 1901 | 6.1% | 0.1% | हल्काबंदी और तहसील स्कूलों का मामूली असर। |
| 1921 | 6.0% | 0.2% | प्रथम विश्व युद्ध और महामारियों के कारण प्रगति ठहरी रही। |
| 1951 | 14.6% | 1.2% | आज़ादी के बाद प्राथमिक स्कूलों का विस्तार शुरू हुआ। |
| 1961 | 24.8% | 3.2% | कुल साक्षरता 13.7% (प्रदेश में 42वां स्थान)। |
| 1971 | 31.2% | 6.0% | शहरी साक्षरता 45.7% (पुरुष 59.8%, महिला 29%), ग्रामीण साक्षरता 13.1%। |
4 महात्मा गांधी की वर्धा योजना, बेसिक स्कूल और 1972 का राष्ट्रीयकरण
आज़ादी के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने महात्मा गांधी की प्रसिद्ध वर्धा शिक्षा योजना को स्वीकार किया। इसके तहत कक्षा 1 से 5 तक जूनियर बेसिक और कक्षा 6 से 8 तक सीनियर बेसिक (कुल 8 वर्ष) की अनिवार्य व निशुल्क शिक्षा लागू की गई। गांधीजी के चार बुनियादी सिद्धांतों पर बल दिया गया: मातृभाषा में शिक्षा, बच्चों के तन-मन-आत्मा का सर्वांगीण विकास, उपयोगी हस्तशिल्प (कताई-बुनाई, बढ़ईगीरी) से स्वावलंबन और विद्यालय को आत्मनिर्भर बनाना।
1972 से पहले तक बेसिक स्कूलों का संचालन जिला परिषद और नगर पालिका करती थी। लेकिन शिक्षकों के वेतन और पढ़ाई के गिरते स्तर को सुधारने के लिए 25 जुलाई 1972 को 'उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा अधिनियम' लागू हुआ। इसके तहत बेसिक शिक्षा को स्थानीय निकायों से छीनकर सीधे राज्य सरकार के अधीन 'बेसिक शिक्षा परिषद' को सौंप दिया गया। जिले में 'जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी' (BSA) का पद बना और गांव स्तर पर ग्राम प्रधान की अध्यक्षता में 'ग्राम शिक्षा समिति' गठित हुई।
साथ ही जिले के 37 जूनियर व हायर सेकेंडरी स्कूलों में पुनर्विन्यास योजना (Re-orientation Scheme) लागू की गई, जिसमें प्रत्येक स्कूल के पास 10 एकड़ जमीन होती थी। छात्रों को किताबी कीड़ा बनाने के बजाय 250 एकड़ भूमि में से 118 एकड़ पर आधुनिक खेती, सब्जियां और बागवानी सिखाई जाती थी ताकि उनमें श्रम के प्रति सम्मान जागे।
5 माध्यमिक शिक्षा की रीढ़: बेल्हा के गौरवशाली इंटर कॉलेज
1950 और 60 के दशक में जिले के ग्रामीण अंचलों में उच्चतर माध्यमिक और इंटरमीडिएट कॉलेजों की बाढ़ आ गई। स्वतंत्रता सेनानियों, समाजसेवियों और जागरूक किसानों ने अपनी जमीनें दान देकर ऐसे स्कूल खड़े किए जो आज वटवृक्ष बन चुके हैं:
| कॉलेज का नाम व स्थान | स्थापना वर्ष | हाईस्कूल / इंटर वर्ष | शिक्षक (1971) | छात्र संख्या | वार्षिक बजट (₹) |
|---|---|---|---|---|---|
| राजकीय इंटर कॉलेज (GIC), प्रतापगढ़ | 1859 | 1925 / 1967 | 26 | 630 | ₹45,873 |
| पी.बी. इंटर कॉलेज, प्रतापगढ़ | 1893 | 1944 / 1953 | 55 | 1,552 | ₹2,26,649 |
| के.पी. इंटर कॉलेज, प्रतापगढ़ | 1937 | 1940 / 1964 | 53 | 1,801 | ₹2,22,099 |
| हनुमंत इंटर कॉलेज, कालाकांकर | 1932 | 1940 / 1952 | 21 | 674 | ₹91,871 |
| राजकीय बालिका इंटर कॉलेज (GGIC) | 1948 | 1948 / 1952 | 20 | 539 | ₹1,48,825 |
| टी.पी. इंटर कॉलेज, कुंडा | 1949 | 1950 / 1967 | 39 | 1,156 | ₹1,80,735 |
| इंटर कॉलेज, पट्टी | 1949 | 1952 / 1962 | 35 | 1,350 | ₹1,13,321 |
| इंटर कॉलेज, रानीगंज | 1949 | 1950 / 1963 | 30 | 1,213 | ₹1,09,297 |
| आर.बी. दुबे इंटर कॉलेज, प्रतापगढ़ | 1947 | 1949 / 1955 | 34 | 965 | ₹1,28,717 |
| बजरंग इंटर कॉलेज, भदरी | 1953 | 1960 / 1964 | 29 | 921 | ₹1,38,000 |
| गणेश इंटर कॉलेज, सांगीपुर | 1950 | 1952 / 1962 | 29 | 907 | ₹87,918 |
| इंटर कॉलेज, लालगंज | 1952 | 1963 / 1968 | 24 | 927 | ₹60,403 |
इसके अलावा संग्रामगढ़ (1942), गड़वारा (1946), कुंभीआंवा (1949), कोहंडौर (1950), साहेबगंज (1950), बीरापुर (1950), तिलक इंटर कॉलेज (1952), महादेवनगर (1952), सेवाश्रम (1954), लक्ष्मणपुर गंगाधर इंटर कॉलेज (1956), टिकरिया बुजुर्ग (1964) और लखपेड़ा कोटा भगवानगंज (1965) जैसे कॉलेजों ने ग्रामीण देहात में शिक्षा की क्रांति ला दी।
6 उच्च शिक्षा के शिखर: 6 डिग्री कॉलेज और गोरखपुर विश्वविद्यालय का दौर
1960 के दशक से पहले प्रतापगढ़ के नौजवानों को बीए या बीएससी करने के लिए इलाहाबाद, लखनऊ या बनारस जाना पड़ता था, जो गरीब परिवारों के बस की बात नहीं थी। 1961 के बाद जिले में स्थानीय डिग्री कॉलेजों की स्थापना हुई (उस समय ये सभी कॉलेज गोरखपुर विश्वविद्यालय से संबद्ध थे):
7 तकनीकी शिक्षा (ITI) और शिक्षक प्रशिक्षण (BTC नॉर्मल स्कूल)
औद्योगिक विकास के लिए साल 1962 में राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (ITI प्रतापगढ़) की स्थापना हुई। यहाँ फिटर (96 सीटें), टर्नर (48 सीटें), इलेक्ट्रीशियन (32 सीटें), वायरमैन (32 सीटें), वेल्डिंग (16 सीटें), बढ़ईगीरी और शीट-मेटल जैसे 8 ट्रेडों में युवाओं को हुनरमंद बनाया जाता था। 1962 से 1968 के बीच ही 503 नौजवानों को नेशनल ट्रेड सर्टिफिकेट दिया गया।
वहीं बेसिक स्कूलों में पढ़ाने वाले योग्य शिक्षकों को तैयार करने के लिए जिले में चार सरकारी नॉर्मल स्कूल सक्रिय थे:
- राजकीय नॉर्मल स्कूल डालीपुर (1958): 1 वर्षीय बीटीसी कोर्स (103 प्रशिक्षु, 11 शिक्षक)।
- राजकीय नॉर्मल स्कूल प्रतापगढ़ (1966): 1 वर्षीय बीटीसी (98 प्रशिक्षु, 11 शिक्षक)।
- राजकीय कन्या नॉर्मल स्कूल प्रतापगढ़ (1959): महिला शिक्षिकाओं के लिए 1 से 2 वर्षीय विशेष बीटीसी प्रशिक्षण (94 छात्राएं, 12 शिक्षिकाएं)।
- राजकीय जूनियर ट्रेनिंग कॉलेज (1963): 2 वर्षीय उच्च बीटीसी कोर्स (94 प्रशिक्षु)।
- प्रसार शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र (1954): शिक्षकों को आधुनिक कृषि और बागवानी तकनीकों का 7 माह का प्रशिक्षण देने वाला अनूठा केंद्र (289 प्रशिक्षु)।
8 प्राच्य विद्या: 22 संस्कृत पाठशालाएं और ऐतिहासिक मदरसे
आधुनिक अंग्रेजी स्कूलों के उभार के बावजूद प्रतापगढ़ ने अपनी देववाणी संस्कृत और प्राच्य विद्या की जड़ों को कभी कमजोर नहीं होने दिया। जिले की संस्कृत पाठशालाएं वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय (संपूर्णानंद विश्वविद्यालय वाराणसी) से संबद्ध थीं और यहाँ मध्यमा, शास्त्री तथा आचार्य की डिग्रियां दी जाती थीं:
| संस्कृत पाठशाला का नाम व स्थान | स्थापना वर्ष | संस्थापक / प्रेरक | पाठ्यक्रम स्तर |
|---|---|---|---|
| धर्मप्राण कोठीवाल संस्कृत पाठशाला, बसीरपुर | 1880 | लक्ष्मीकांत जी | मध्यमा |
| छत्रपाल संस्कृत विद्यालय, आमीवां | 1884 | सत्यनारायण जी | मध्यमा |
| अजीत सोमवंशी संस्कृत पाठशाला, सुखपालनगर | 1902 | राजा प्रताप बहादुर सिंह | मध्यमा |
| सांडवा चंद्रिका संस्कृत पाठशाला | 1913 | द्वारिका बख्श सिंह | मध्यमा |
| रघुराज संस्कृत पाठशाला, बेती | 1919 | बैजनाथ सिंह | शास्त्री |
| बी.एन. मेहता संस्कृत विद्यालय, प्रतापगढ़ | 1920 | बी.एन. मेहता | आचार्य (सर्वोच्च) |
| वाराही संस्कृत माध्यमिक विद्यालय, रानीगंज | 1923 | उदयराज सुख | आचार्य |
| मुनीश्वर संस्कृत पाठशाला, गौरामाफी (अमरगढ़) | 1935 | मुनीश्वर पांडेय | शास्त्री |
| अंबिका संस्कृत पाठशाला, हनुमानगंज | 1941 | लाल प्रताप बहादुर सिंह | मध्यमा |
| रामटहल संस्कृत विद्यालय, सैफाबाद | 1942 | रामदुलारे शुक्ल | शास्त्री |
| रामकृपालु संस्कृत विद्यालय, पूरे मुरली | 1948 | रामकृपालु शुक्ल | आचार्य (65 छात्र) |
| जान्हवी संस्कृत विद्यालय, कालाकांकर | 1958 | सुखराम दास | शास्त्री |
इसके साथ ही अरबी-फारसी भाषा और इस्लामी शिक्षा के लिए दो सरकारी सहायता प्राप्त मदरसे—मदरसा फैज-ए-आम और बालिकाओं के लिए मदरसा फैज-ए-आम निस्वां रजिस्ट्रार अरबी-फारसी परीक्षाएं (उत्तर प्रदेश) के तहत आलिम, फाजिल और कामिल की उच्च स्तरीय तालीम दे रहे थे।
9 पुस्तकालय परंपरा: भदरी महल का 9,000 ग्रंथों का खजाना और ब्लॉक वाचनालय
किताबें किसी भी समाज की बौद्धिक चेतना का पैमाना होती हैं। प्रतापगढ़ में अध्ययन की समृद्ध संस्कृति थी:
जिले का सबसे बड़ा और समृद्ध पुस्तकालय राजा बजरंग बहादुर सिंह (भदरी) का निजी संग्रह था। इस पुस्तकालय में मूल रूप से 9,000 दुर्लभ पुस्तकें थीं। राजा साहब ने ज्ञान के प्रचार के लिए इनमें से 4,000 बहुमूल्य पुस्तकें जिले के विभिन्न शिक्षण संस्थानों और पुस्तकालयों को दान कर दीं। इसके बावजूद महल के पुस्तकालय में अंग्रेजी, हिंदी और संस्कृत के 5,000 दुर्लभ ग्रंथ, पांडुलिपियां और शोध संदर्भ सुरक्षित थे, जिनकी देखरेख एक विशेष लाइब्रेरियन करते थे।
जिले के 12 विकास खंडों (कुंडा, बिहार, कालाकांकर, बाबागंज, सदर, सांडवा चंद्रिका, सांगीपुर, लक्ष्मणपुर, पट्टी, आसपुर देवसरा, मंगरौरा और गौरा) में सूचना विभाग व विकास खंडों द्वारा सार्वजनिक पुस्तकालय-सह-वाचनालय चलाए जा रहे थे, जहाँ सैकड़ों पुस्तकें और राष्ट्रीय पत्रिकाएं ग्रामीणों के लिए उपलब्ध थीं। नगर पालिका बेला द्वारा चौक पर महात्मा गांधी स्मारक पुस्तकालय एवं दैनिक वाचनालय संचालित था।
10 साहित्य एवं संस्कृति के अमर साधक: महाकवि भिखारी दास और बेल्हा के मनीषी
प्रतापगढ़ की धरती ने हिंदी साहित्य को वह अनमोल रत्न दिया है जिसके बिना रीतिकाल का इतिहास अधूरा है।
✍️ रीतिकालीन काव्य-सिद्धांतों के शिरोमणि: महाकवि भिखारी दास
18वीं शताब्दी के महान हिंदी कवि और आचार्य भिखारी दास का जन्म प्रतापगढ़ तहसील के टेऊँगा (Teonga) गांव में एक संभ्रांत कायस्थ (श्रीवास्तव) परिवार में हुआ था। उनका रचनाकाल 1728 से 1750 ईस्वी के बीच माना जाता है। वे प्रतापगढ़ के सोमवंशी राजा पृथ्वीपत सिंह के अनुज (छोटे भाई) बाबू हिंदूपति सिंह के राज्याश्रय में रहे।
भिखारी दास केवल कवि नहीं, बल्कि हिंदी काव्यशास्त्र के सर्वोच्च सैद्धांतिक आचार्य थे। उन्होंने छंद, रस, अलंकार, रीति, गुण, दोष और शब्द-शक्ति का जैसा विशद और सटीक विवेचन किया, वैसा पूरे रीतिकाल में दुर्लभ है:
काव्यशास्त्र का अमर ग्रंथ।
रस सिद्धांत की सांगोपांग व्याख्या।
छंद शास्त्र का महासागर।
नायिका-भेद व सौंदर्य का चरम।
अन्य कृतियां: नाम प्रकाश (कोष - 1738), विष्णु पुराण भाषा, छंद प्रकाश, शतरंज शतिका और अमर प्रकाश (संस्कृत)।
भिखारी दास जी की भाषा अत्यंत परिष्कृत, व्याकरणसम्मत और साहित्यिक ब्रजभाषा है। वे शब्द-जाल और तुकबंदी के आडंबर से दूर रहकर भावों की गहराई पर जोर देते थे। उनकी पंक्तियां "आगे के सुकवि रीझिहैं तो कविताई, न तु राधिका कन्हाई सुमिरन को बहानो है" आज भी साहित्य जगत में अमर हैं।
🌿 पद्मश्री सुरेश सिंह (कालाकांकर): बाल साहित्य और जीव-जगत के चितेरे
कालाकांकर के राजकुमार सुरेश सिंह ने बच्चों और प्रकृति के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने सरल और चित्रात्मक हिंदी में दर्जनों रोचक पुस्तकें लिखीं। उनके इस अप्रतिम योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें साल 1971 में 'पद्मश्री' से अलंकृत किया। उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं: 'हमारी चिड़ियां', 'हमारा जानवर', 'जीव जगत', 'शिकार के पक्षी', 'पशु-पक्षी', 'समुद्री जीव-जंतु', 'चिड़िया खाना', 'जीवन की कहानी', 'खेती के शत्रु', 'असली मुर्गा छाप' और 'भारतीय पक्षी'।
🐎 राजा बजरंग बहादुर सिंह (भदरी): बहुमुखी प्रतिभा के धनी लेखक
भदरी रियासत के राजा और हिमाचल प्रदेश के पूर्व उप-राज्यपाल राजा बजरंग बहादुर सिंह अंग्रेजी और उर्दू के प्रकांड विद्वान और लेखक थे। कृषि, पशु विज्ञान और वन्यजीवों पर उनके शोधपरक ग्रंथ आज भी प्रासंगिक हैं। उनकी प्रमुख रचनाओं में शामिल हैं: 'हिंदुस्तान में जानवरों की तरक्की' (उर्दू), 'Train Your Dog', 'Manual for Police Dog Squad', 'The Dying Cow', 'Water Plants', 'Practical Rose Growing in India', 'Paddy Wheat Rotation' और 'Culture in Himachal and Other Hills'।
इसके अलावा, कालाकांकर की माटी का संबंध भारतेंदु युग के अमर पत्र 'हिंदुस्तान' (1885) से रहा, जिसे राजा रामपाल सिंह ने मालवीय जी के संपादन में प्रकाशित कराया था। बाद में छायावाद के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत ने भी कालाकांकर के 'नक्षत्र कुटीर' में वर्षों रहकर अपनी कालजयी कविताओं की रचना की, जिसने प्रतापगढ़ को विश्व साहित्य के नक्शे पर स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज करा दिया।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रतापगढ़ में पहला हाईस्कूल वर्ष 1859 में चंदे और सरकारी अनुदान से खोला गया था। 1864 में यहाँ सिर्फ 12 छात्र थे, लेकिन राजा चितपाल सिंह और बाबू महेश बख्श के प्रयासों से यह आगे बढ़ा और बाद में राजकीय इंटर कॉलेज (GIC प्रतापगढ़) बना।
1. अजीत सोमवंशी एंग्लो-वर्नाक्युलर स्कूल (1893), जिसे राजा प्रताप बहादुर सिंह ने स्थापित किया (वर्तमान पी.बी. इंटर कॉलेज), 2. हनुमंत एंग्लो-वर्नाक्युलर स्कूल कालाकांकर (राजा रामपाल सिंह द्वारा), और 3. भदरी एंग्लो-वर्नाक्युलर स्कूल।
जिले का पहला डिग्री कॉलेज वर्ष 1961 में स्वतंत्रता सेनानी पं. मुनीश्वर दत्त उपाध्याय द्वारा 'प्रतापगढ़ डिग्री कॉलेज' (वर्तमान एम.डी.पी.जी. कॉलेज) के नाम से स्थापित किया गया था।
महाकवि भिखारी दास का जन्म प्रतापगढ़ सदर तहसील के टेऊँगा (Teonga) गांव के कायस्थ परिवार में हुआ था। उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति 'काव्य निर्णय' (1746) है, जिसे हिंदी काव्यशास्त्र का मानक ग्रंथ माना जाता है।
25 जुलाई 1972 को पारित बेसिक शिक्षा अधिनियम द्वारा प्राथमिक व जूनियर स्कूलों का प्रबंधन ज़िला परिषद से छीनकर सीधे राज्य सरकार के बेसिक शिक्षा परिषद (BSA) को सौंप दिया गया, जिससे शिक्षकों के वेतन और पढ़ाई की सीधी सरकारी गारंटी मिली।
उत्तर प्रदेश जिला गजेटियर (1980) का यह 15वां अध्याय हमें यह सिखाता है कि प्रतापगढ़ की पहचान केवल राजनीतिक हलचलों से नहीं, बल्कि इसकी समृद्ध शैक्षिक और सांस्कृतिक थाती से है। 1859 में 12 छात्रों से शुरू होकर 2 लाख से अधिक विद्यार्थियों तक का सफर, 22 संस्कृत पाठशालाओं से वैदिक परंपरा का संरक्षण, भदरी महल का 9,000 ग्रंथों का पुस्तकालय और महाकवि भिखारी दास की अमर काव्य-साधना—यह सब साबित करता है कि बेल्हा की मिट्टी में सरस्वती का वरदान हमेशा से रचा-बसा रहा है।