प्रतापगढ़ के उद्योग और पारंपरिक दस्तकारी: 1980 के सरकारी गजेटियर की प्रामाणिक पड़ताल
प्रतापगढ़ केवल लहलाते खेतों और आंवले के बागों का जिला नहीं रहा, बल्कि यहां की चौपालों, बस्तियों और कसबों में पारंपरिक दस्तकारी और हुनर की एक ऐसी समृद्ध दुनिया बसती थी, जिसकी गूंज बनारस के रेशम बाजार से लेकर कलकत्ता, दिल्ली और पंजाब तक सुनाई देती थी। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 1980 में प्रकाशित आधिकारिक 'प्रतापगढ़ जिला गजेटियर' का अध्याय-5 'Industries' (उद्योग, पृष्ठ 123 से 137) इस माटी के कारीगरों और उनके गौरवशाली इतिहास का सजीव गवाह है।
1896 में राजा रामपाल सिंह द्वारा कालाकांकर में स्थापित ऐतिहासिक रेशम कारखाना, सई नदी के किनारे खारी मिट्टी से नमक का निर्माण, 40 नील के कारखाने, अंतू और चिलबिला की प्रसिद्ध टाट-पट्टी, कुंडा के देशी कंबल, कटरा मेदनीगंज की प्रसिद्ध मिश्री, लोहारों के कलात्मक सरोते और 1958 में बिजली के आगमन से शुरू हुए आधुनिक लघु उद्योग—आइए गजेटियर के पन्नों से बिल्कुल आसान और आम बोलचाल की भाषा में समझें प्रतापगढ़ का औद्योगिक इतिहास।
🏺 1. प्राचीन व पारंपरिक उद्योग: जब गांव-गांव में बसता था हुनर
अंग्रेजी हुकूमत के आने से पहले प्रतापगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह आत्मनिर्भर थी। लोहे के औजार, लकड़ी का सामान, चमड़े की वस्तुएं, मिट्टी के बर्तन, ईंटें और सूती वस्त्र सब कुछ स्थानीय स्तर पर तैयार होता था। लेकिन 1856 में अवध पर अंग्रेजों के कब्जे के बाद जब ब्रिटेन की मिलों का सस्ता कपड़ा और विदेशी सामान आने लगा, तो जिले के पारंपरिक उद्योग संकट में घिर गए। इसके बावजूद हमारे हुनरमंद कारीगरों ने कई अनोखे उद्योगों को जीवित रखा:
राजा रामपाल सिंह और कालाकांकर का ऐतिहासिक रेशम उद्योग (1896)
जिले के औद्योगिक इतिहास का सबसे स्वर्णिम अध्याय 1896 में कालाकांकर के राजा रामपाल सिंह ने लिखा। उन्होंने कालाकांकर और धारूपूर में रेशम की आधुनिक फैक्ट्रियां लगाईं। बंगाल और मद्रास से रेशम के कीड़े मंगाए गए, जिन्हें शहतूत (Morus nigra और Morus alba) के पत्तों पर पाला गया। बाद में असम से अरंडी पर पलने वाले कीड़े भी मंगाए गए।
कालाकांकर का शहतूती रेशम इतना उम्दा था कि बनारस के रेशम बाजार में इसकी भारी मांग थी। यह 12.50 से 15.50 रुपये प्रति सेर के शानदार भाव पर बिकता था, जिससे 3 रुपये प्रति सेर का शुद्ध मुनाफा होता था। राजा ने जाजूमूर, रामपुर, धारूपूर और पुराहसी में रेशम कीट पालन केंद्र खोले, जहां स्थानीय बच्चों और बुजुर्ग महिलाओं को धागा कातने का सम्मानजनक रोजगार मिला। राजा साहब के निधन के बाद यह उद्योग धीरे-धीरे थम गया।
1902 में जिले में 4,000 एकड़ में नील बोई जाती थी और 40 कारखाने चलते थे (कुंडा में 19, सदर में 12, पट्टी में 9)। राजा रामपाल सिंह और बेंती के कैप्टन चैपमैन ने इसे बढ़ावा दिया। 1920 में यूरोप से कृत्रिम (केमिकल) रंग आने के बाद यह धंधा बंद हुआ।
पुराने समय में सई नदी के कछारों पर कुएं बनाकर नमकीन (खारी) मिट्टी से खाने का नमक बनाया जाता था। अंग्रेजों ने नमक पर सरकारी एकाधिकार जमाकर स्थानीय नमक बनाने वालों पर भारी जुर्माना और सजाएं लगानी शुरू कर दीं।
पट्टी तहसील का सुवांसा गांव मनिहार और चुड़ीहार समाज द्वारा कांच की शीशियां, मनके और चूड़ियां बनाने के लिए विख्यात था। विदेशी कांच के सामान की बाढ़ के चलते 1920 तक यह सिमट गया।
प्रतापगढ़ के लोहार सुपारी काटने के ऐसे कलात्मक और नक्काशीदार सरोते और चाकू बनाते थे, जिनकी मांग प्रयागराज (इलाहाबाद) और जौनपुर की मंडियों तक रहती थी।
कटरा मेदनीगंज में गन्ने के रस से चपटी टिकिया के रूप में विशेष रवेदार मिश्री (Crystallised Sugar Cakes) बनाई जाती थी, जो अपनी शुद्धता के लिए आसपास के जिलों में निर्यात होती थी।
कुंडा में गड़ेरिया समाज स्थानीय भेड़ों की ऊन से 30 सेमी चौड़ी पट्टियां बुनकर 1.80x1.20 मीटर के कंबल बनाता था। जौनपुर और आजमगढ़ के व्यापारी जून में आकर पेशगी देते थे और नवंबर में कंबल ले जाते थे।
⚡ 2. बिजली का आगमन: अंधेरे से उजाले और मशीनों की ओर
आजादी के एक दशक बाद तक प्रतापगढ़ पूरी तरह हाथ के औजारों और बैलों के दम पर चलता था। जिले के आधुनिक औद्योगिकीकरण का असली सूर्योदय 16 जून 1958 को हुआ, जब प्रतापगढ़ शहर में पहली बार बिजली का तार पहुंचा।
उस समय शहर में बिजली आपूर्ति का जिम्मा 'रोहतक एंड हिसार कंपनी प्राइवेट लिमिटेड' को लाइसेंस पर दिया गया था, जबकि बाकी जिले की देखरेख उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत परिषद (UPSEB) के पास थी।
ग्रामीण विद्युतीकरण की धीमी शुरुआत और तेजी
1961 तक स्थिति यह थी कि ग्रामीण क्षेत्र की केवल 2 औद्योगिक इकाइयों और शहरी क्षेत्र की 21 इकाइयों में ही बिजली का उपयोग होता था। जिले के कुल 2,195 गांवों में से तीसरी पंचवर्षीय योजना के अंत तक मात्र 30 गांवों में बिजली पहुंच पाई थी।
लेकिन 1971 के बाद ग्रामीण विद्युतीकरण ने रफ्तार पकड़ी। अप्रैल 1972 तक 313 गांवों (14.2%) तक बिजली के खंभे गड़ चुके थे। 1971-72 के केंद्रीय लोड सर्वे में जिले में 14 मेगावाट बिजली की मांग दर्ज की गई, जिसके लिए मैरानी में 1,500 केवी का सबस्टेशन और 229 किमी लंबी 33 केवी हाईटेंशन लाइनें बिछाई गईं।
🏭 3. लघु उद्योग (Small-Scale Industries): 1971-72 की अधिकृत स्थिति
सरकारी परिभाषा के अनुसार उस जमाने में लघु उद्योग वह इकाई थी जिसमें अधिकतम 7.50 लाख रुपये का निवेश हो और 50 या उससे कम कामगार काम करते हों। 1951 से 1960 के दशक में जिले में पंजीकृत कारखाने गिने-चुने (सालाना 1 या 2) थे।
गजेटियर के अनुसार 1971-72 में जिले में 124 लघु औद्योगिक इकाइयां सक्रिय थीं। इनमें कुल 23.35 लाख रुपये का पूंजी निवेश था और 609 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिला हुआ था। इन इकाइयों से कुल 13.55 लाख रुपये मूल्य का उत्पादन होता था।
| उद्योग का नाम | इकाइयों की संख्या | कुल निवेश (रुपये) | वार्षिक उत्पादन मूल्य | प्रमुख उत्पादित वस्तुएं | कच्चा माल एवं स्रोत |
|---|---|---|---|---|---|
| कोल्ड स्टोरेज (शीतगृह) | 3 | 14,00,000 | 4,00,000 | आलू भंडारण व संरक्षण | स्थानीय आलू की पैदावार |
| जनरल इंजीनियरिंग | 18 | 2,00,000 | 3,00,000 | थ्रेशर, हल, बाल्टी, गन्ना क्रशर, गाड़ी मरम्मत | लोहा, स्टील (कोलकाता व कानपुर से) |
| लकड़ी का फर्नीचर | 30 | 1,50,000 | 2,00,000 | खिड़कियां, दरवाजे, तख्त, मेज-कुर्सी | स्थानीय शीशम, महुआ, आम की लकड़ी |
| सॉ-मिल्स (आरा मशीनें) | 25 | 1,30,000 | 2,00,000 | इमारती लकड़ी की चिराई | जिले के लट्ठे व बोटा |
| पावरलूम वस्त्र उद्योग | 18 | 1,00,000 | 3,00,000 | मशीनी सूती कपड़ा | सूत (कानपुर व दिल्ली से) |
| तम्बाकू निर्माण | 2 | 1,00,000 | 80,000 | खाने व हुक्के की तम्बाकू | स्थानीय तम्बाकू के पत्ते |
| ऑप्टिकल फ्रेम (चश्मे के फ्रेम) | 3 | 80,000 | 50,000 | प्लास्टिक चश्मा फ्रेम | प्लास्टिक शीट व लेंस |
| चमड़े के जूते-चप्पल | 5 | 25,00,0 | 50,000 | देशी जूते, बूट व चप्पल | कमाया हुआ चमड़ा (प्रयागराज से) |
| चूना निर्माण (Lime) | 4 | 30,000 | 40,000 | इमारती कंकर चूना | स्थानीय कंकर व सुर्खी |
| बेकरी उद्योग | 3 | 30,000 | 80,000 | बिस्कुट व टोस्ट | मैदा व चीनी |
| होजरी वस्त्र | 5 | 30,000 | 60,000 | बनियान, मोजे व अंडरवियर | सूती धागा |
| धुलाई साबुन (Washing Soap) | 3 | 20,000 | 30,000 | कपड़े धोने का देशी साबुन | कास्टिक सोडा व तेल (प्रयागराज से) |
| टेलीफोन बल्ब (Telephone Bulbs) | 1 | 20,000 | 30,000 | टेलीफोन एक्सचेंज के विशेष बल्ब | कांच की नली व फिलामेंट (कोलकाता से; ITI नैनी भेजा जाता था) |
| फाउंटेन पेन निर्माण | 1 | 10,000 | 20,000 | लिखने वाले देशी फाउंटेन पेन | प्लास्टिक शीट व रबर ट्यूब |
| कपड़ा छपाई (Cloth Printing) | 2 | 10,000 | 15,000 | रंगाई व छपाई कार्य | रासायनिक रंग (डाइज) |
🧵 4. ग्रामोद्योग एवं कुटीर शिल्प: 95% कामगारों की जीवनरेखा
गजेटियर इस सच्चाई को बड़े गर्व से दर्ज करता है कि पूंजी और मशीनों के मामले में भले ही बड़े शहर आगे हों, लेकिन प्रतापगढ़ की असली ताकत उसके ग्रामोद्योग और कुटीर शिल्प में थी।
1971-72 में जिले के कुल औद्योगिक कामगारों का 94.7% हिस्सा (11,060 लोग) कुटीर उद्योग में अपनी आजीविका कमा रहा था। पूरे जिले के औद्योगिक निवेश का 65.6% (44.62 लाख रुपये) और कुल उत्पादन मूल्य का 85.9% (1.13 करोड़ रुपये से अधिक) इन्हीं छोटे-छोटे दस्तकारों की झोपड़ियों और चौपालों से निकलता था।
| पारंपरिक व्यवसाय / शिल्प | संबद्ध जाति या समुदाय | 1961 में कार्यरत कारीगरों की संख्या | उत्पादित वस्तुएं व कार्यक्षेत्र |
|---|---|---|---|
| मिट्टी के बर्तन व खिलौने | कुम्हार (Kumhar) | 3,152 | हंडिया, सुराही, कुल्हड़, नाद, दीये व मेलों के खिलौने |
| सूती हथकरघा वस्त्र | जुलाहा / अंसारी (Julaha) व जरिया | 2,894 | धोती, साड़ी, चादर, गाढ़ा, अंगोछा |
| रेशम वस्त्र बुनाई | जुलाहा (Julaha) | 485 | रेशमी वस्त्र व जरी का काम |
| चर्मशिल्प व देशी जूते | चमार / मोची (Chamar) | 490 | जूते, चप्पल, पानी खींचने का मोट व नाल |
| बांस व मूंज की टोकरी शिल्प | धरकार, बांसफोर व कुरीन | 268 | डलची, डलिया, टोपा, गागरा, पंखे |
| ऊनी कंबल बुनाई | गड़ेरिया (Gadaria) | 42 (पारंपरिक परिवार) | कुंडा के प्रसिद्ध देशी मोटे कंबल |
| तांबे-पीतल के बर्तन (कांसा शिल्प) | कसेरा व ठठेरा (Thathera/Kansera) | 12 | पीतल की बटुली, लोटा, थाली व कढ़ाई |
🧶 5. हथकरघा वस्त्र उद्योग: 9,000 बुनकरों की खट-खट
प्रतापगढ़ के कुटीर उद्योग की सबसे बड़ी धड़कन हथकरघा (Handloom) था। जिले के कुल 5,569 कुटीर उद्योग प्रतिष्ठानों में से 4,339 इकाइयां अकेले वस्त्र उद्योग से जुड़ी थीं।
1971-72 में जिले में 2,339 हथकरघे और 2,000 चरखे दिन-रात चलते थे, जिनमें 9,000 बुनकर, कातने वाले और रंगरेज काम करते थे। इसके प्रमुख केंद्र डेरवा, बाबूगंज, गोपालगंज, कटरा, परियावां और कुंडा थे।
1956 का 15 लाख का कपड़ा निर्यात और बुनकरों का संघर्ष
गजेटियर बताता है कि 1956 में प्रतापगढ़ से 15 लाख रुपये मूल्य का हथकरघा कपड़ा जौनपुर, प्रयागराज और सुल्तानपुर के बाजारों में निर्यात होता था। लेकिन 1960 के दशक में मिलों के सूत की भारी किल्लत और बढ़ती कीमतों के कारण बुनकरों पर भारी मार पड़ी। कई कुशल बुनकर रोजी-रोटी के लिए कानपुर और अहमदाबाद की कपड़ा मिलों में चले गए। इसके बाद 1970 के दशक में सूत डिपो और सरकारी सहायता मिलने पर यह उद्योग फिर संभला और सालाना 1.08 करोड़ रुपये का कपड़ा तैयार करने लगा।
🪢 6. अंतू की प्रसिद्ध टाट-पट्टी (कैनवास) और कुंडा की मूंज की रस्सियां
प्रतापगढ़ के दो स्थानीय उत्पाद ऐसे थे जिन्होंने अंतरराज्यीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई:
1. अंतू और चिलबिला की सनई टाट-पट्टी (Canvas & Strings)
जिले में प्रचुर मात्रा में सनई (Sunn-hemp) उगाई जाती थी। इसके रेशों से हाथ से बारीक सुतली काती जाती थी। 1 किलो सनई से लगभग 850 ग्राम सुतली बनती थी। गांव की बुजुर्ग महिलाएं, बहुएं और मवेशी चराने वाले चरवाहे बच्चे तक फुर्सत के पलों में तकली या चरखे से सुतली कातते दिखाई देते थे।
इस सुतली से मजबूत टाट-पट्टी और कैनवास बुनने का मुख्य केंद्र अंतू, जगेश्वरगंज, चिलबिला, महुली और कोहंडौर था, जहां पारंपरिक रूप से कुर्मी समाज इस शिल्प में निपुण था। यह कैनवास मालगाड़ियों के तिरपाल, अनाज की बोरियों और तंबुओं के लिए मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब और दिल्ली तक निर्यात किया जाता था।
2. कुंडा की गंगातटीय मूंज की बान और रस्सियां
कुंडा तहसील में गंगा नदी के कछारों और नम ताल-तलैयों के किनारे प्राकृतिक रूप से ऊंची-ऊंची मूंज (Moonj grass) उगती थी।
कुंडा के गुटनी, करैथी, मौदारी, बनेमऊ, दिलेरगंज और शाहपुर गांवों में मूंज को कूटकर उससे खाट बुनने का बान और मजबूत रस्सियां बनाई जाती थीं। सालाना लगभग 2,176 क्विंटल मूंज की खपत रस्सियां बनाने में होती थी। हालांकि बाद में प्लास्टिक और जूट की रस्सियों से इस पारंपरिक काम को कड़ी टक्कर मिली।
| कुटीर उद्योग का नाम | कुल पूंजी निवेश (रुपये) | वार्षिक उत्पादन मूल्य (रुपये) | प्रमुख उत्पाद | उपयोग होने वाला कच्चा माल |
|---|---|---|---|---|
| हथकरघा सूती वस्त्र | 37,88,000 | 1,08,00,000 | धोती, साड़ी, चादर, गमछा, शर्ट का कपड़ा | सूत (कानपुर व दिल्ली से) |
| सनई टाट-पट्टी (कैनवास) | 1,05,000 | 1,20,000 | मजबूत कैनवास, टाट, सुतली | स्थानीय सनई के रेशे |
| बढ़ईगिरी (काष्ठ शिल्प) | 1,00,000 | 1,00,000 | खिड़की, चौखट, किवाड़, बैलगाड़ी के पहिए | स्थानीय लकड़ी व कीलें |
| लोहारगिरी (धातु शिल्प) | 1,00,000 | 1,00,000 | बाल्टी, हंडी, हंसिया, कुदाल, कलात्मक सरोते | लोहा, पीतल व इस्पात |
| ऊनी कंबल निर्माण | 1,00,000 | 95,000 | कुंडा के देशी भारी कंबल | स्थानीय भेड़ों की ऊन |
| चर्मशिल्प व जूते | 80,000 | 90,000 | देशी जूते, चप्पल, पानी का मोट | कमाया हुआ चमड़ा |
| मूंज की रस्सियां | 70,000 | 70,000 | मूंज का बान, खाट की रस्सी | गंगा किनारे की मूंज घास |
| कोल्हू से तेल पिराई | 60,000 | 28,000 | सरसों का तेल व खली | सरसों व राई |
| बांस की टोकरियां | 10,000 | 39,000 | डलिया, डलची, टोपा, पंखे | स्थानीय हरा बांस |
| मिट्टी के बर्तन व दीये | 20,000 | 18,000 | हंडिया, कुल्हड़, सुराही, नाद | स्थानीय पियारा मिट्टी |
| पत्थर तराशी (Stone Work) | 20,000 | 17,000 | सिल-लोढ़ा, जांता, चक्की के पाट | मिर्जापुर का लाल-धूसर पत्थर |
| दवात की स्याही (Ink) | 6,000 | 6,000 | लिखने की नीली-काली स्याही | सॉलिड इंक पाउडर |
| मोमबत्ती निर्माण | 5,000 | 7,000 | घरेलू मोमबत्तियां | मोम (प्रयागराज से) |
💰 7. वित्तीय सहायता, ऋण और औद्योगिक सुविधाएं
गजेटियर दर्ज करता है कि चूंकि प्रतापगढ़ राज्य के आर्थिक रूप से पिछड़े जनपदों की श्रेणी में आता था, इसलिए सरकार ने नए उद्योग लगाने और पुराने कारखानों के आधुनिकीकरण के लिए कई विशेष रियायतें दी थीं:
- लंबी अवधि के ऋण: 15 वर्षों की आसान किस्तों में वापसी की सुविधा।
- सस्ती ब्याज दरें: सालाना मात्र 7% से 7.5% का मामूली ब्याज।
- किस्त में छूट: ऋण लेने के पहले 1 से 2 साल तक किस्त चुकाने में पूरी छूट (Moratorium), जिसे जरूरत पड़ने पर 3 से 4 साल तक बढ़ाया जा सकता था।
- 1965-68 के दौरान: राज्य सरकार ने 73 लघु इकाइयों को कुल 2,45,000 रुपये का औद्योगिक ऋण बांटा।
- उत्तर प्रदेश वित्तीय निगम (UPFC Kanpur): 'उदार ऋण योजना' (Liberalised Loan Scheme) के तहत उद्यमियों को मशीनरी खरीदने के लिए सीधा ऋण मुहैया कराया गया।
📈 8. औद्योगिक संभावनाएं: कच्चे माल का खजाना और विकास की राह
1980 के जिला गजेटियर के अंत में प्रतापगढ़ की भावी औद्योगिक तरक्की का एक ऐसा शानदार खाका खींचा गया है, जो आज के 'एक जनपद एक उत्पाद' (ODOP) की बुनियाद बना:
जिले का रेल, सड़क और बाजार नेटवर्क
प्रतापगढ़ उत्तर रेलवे के मुख्य रेल नेटवर्क पर 105 किमी में फैला था, जहां 15 रेलवे स्टेशन थे। यहां से सीधे कोलकाता, पटना, वाराणसी, अमृतसर, दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, मुंबई और चेन्नई के लिए सीधी गाड़ियां थीं। जिले में 400 किमी पक्की सड़कें और सैकड़ों ट्रक उपलब्ध थे।
रेलवे से जिले से बाहर भेजी जाने वाली मुख्य वस्तुएं थीं—आंवला, आम और मुलायम इमारती लकड़ी; जबकि बाहर से अनाज, नमक, कोयला, सीमेंट, लोहा और मशीनें उतारी जाती थीं।
गजेटियर द्वारा आकलित प्रचुर कच्चा माल
गजेटियर के अनुसार जिले में उद्योगों के लिए सालाना उपलब्ध कच्चे माल का आधिकारिक आंकड़ा इस प्रकार था:
| कच्चा माल | वार्षिक औसत उपलब्धता | संभावित उद्योग (गजेटियर के अनुसार) |
|---|---|---|
| आंवला (Aonla) | 3,500 टन सालाना | आंवला मुरब्बा, अचार, हेयर ऑयल, च्यवनप्राश, जैम व आयुर्वेदिक दवाएं |
| अमरूद (Guavas) | 6,000 टन सालाना | अमरूद की जेली, जैम व फ्रूट जूस प्रोसेसिंग |
| आम (Mangoes) | 7,500 टन सालाना | आम पापड़, अचार, अमचूर व फ्रूट पल्प |
| सनई (Sunn-hemp) | 50,740 क्विंटल सालाना | कैनवास, टाट-पट्टी, पैकेजिंग बैग, रस्सी व पेपर पल्प |
| पशुओं की खालें (Hides & Skins) | 32,000 नग सालाना | आधुनिक चमड़ा शोधन (Tanning) व जूता-चप्पल उद्योग |
| भेड़ों की ऊन (Wool) | 400 क्विंटल सालाना | आधुनिक पावरलूम से हल्के व गर्म ऊनी कंबल |
| सरसों व तिलहन | हजारों क्विंटल | तहसील स्तर पर आधुनिक पावर ऑयल एक्सपेलर व तेल मिलें |
| गन्ना व गुड़ (Jaggery) | प्रचुर मात्रा में | खांडसारी चीनी मिलें व डिस्टिलरी |
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (प्रतापगढ़ उद्योग व दस्तकारी FAQs)
1980 के सरकारी गजेटियर का यह पांचवां अध्याय हमें यह एहसास कराता है कि प्रतापगढ़ की पहचान केवल एक शांत कृषि जिला होने की नहीं, बल्कि अपने हुनर और उद्यम से देश-दुनिया में अपनी जगह बनाने की रही है।
कालाकांकर के रेशम से लेकर अंतू की टाट-पट्टी, कुंडा के कंबल और हमारे विश्वविख्यात आंवले तक—यह इतिहास हमें याद दिलाता है कि यदि स्थानीय कच्चे माल और हुनरमंद हाथों को आधुनिक तकनीक और प्रोत्साहन मिले, तो प्रतापगढ़ की यह धरती औद्योगिक मानचित्र पर भी अपना परचम लहरा सकती है।
यह आलेख उत्तर प्रदेश सरकार (Government of Uttar Pradesh) द्वारा 1980 में प्रकाशित आधिकारिक 'Uttar Pradesh District Gazetteers: Pratapgarh' के Chapter V - 'Industries' (पृष्ठ 123 से 137) में दर्ज ऐतिहासिक व्यापारिक अभिलेखों, उद्योग विभाग के सर्वेक्षणों, 1961/1971 की औद्योगिक जनगणना और उत्तर प्रदेश वित्तीय निगम के आधिकारिक आंकड़ों पर पूर्णतः आधारित है।