प्रतापगढ़ में कानून, पुलिस और न्याय व्यवस्था का इतिहास: कोतवाली, कचहरी और 1867 की जेल
अमन-चैन और इंसाफ किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। मध्यकालीन दौर में जब मुगल फौजदार और कोतवाल सुरक्षा संभालते थे, अवध के नवाबों के ढलते दौर में जब ताल्लुकदारों की निजी तोपों और डाकू गिरोहों का खौफ था, और फिर 1856 में जब अंग्रेजों ने आधुनिक पुलिस महकमे व कचहरी की नींव रखी—प्रतापगढ़ की सुरक्षा और न्याय व्यवस्था ने बड़े दिलचस्प मोड़ देखे हैं।
उत्तर प्रदेश के आधिकारिक गजेटियर (अध्याय-12: Law and Order and Justice, पेज 220 से 238) के पन्नों से आइए जानें कि बेल्हा में थाने कैसे बने, 1867 में स्थापित जिला जेल की क्या कहानी है, न्याय पंचायतों ने कैसे गांव-गांव इंसाफ पहुंचाया और 1915 में स्थापित बार एसोसिएशन ने कैसे न्याय की मशाल जलाई।
🛡️ 1. प्राचीन काल से मुगल सल्तनत तक: चौकीदार, कोतवाल और फौजदार
प्राचीन काल में सुरक्षा और शांति की जिम्मेदारी केवल राजा की नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझी होती थी। प्रत्येक गांव में ग्राम चौकीदार होता था जो गांव के मुखिया (ग्राम प्रधान) की मदद करता था। वह फसलों की रखवाली करता था, रातों में पहरा देता था और गांव के बाहर से आने वाले संदिग्ध व्यक्तियों पर नजर रखता था। उस दौर में चौकीदार पूरे ग्रामीण समुदाय का सेवक माना जाता था और उसे गांव की ओर से अनाज व लगान-मुक्त जमीन दी जाती थी।
मुगल काल में कानून-व्यवस्था की त्रिस्तरीय व्यवस्था लागू हुई—ग्राम पुलिस, जिला पुलिस और नगर पुलिस। गांवों की सुरक्षा व्यवस्था पर मुगलों ने बहुत कम सीधा हस्तक्षेप किया और यह काम पुरानी पंचायत व्यवस्था पर ही छोड़ा। वहीं जिले (सरकार या परगने) में शांति व्यवस्था का मुखिया 'फौजदार' (Faujdar) होता था, जो प्रांतीय गवर्नर (सिपहसालार) के प्रतिनिधि के रूप में काम करता था।
मानिकपुर और प्रतापगढ़ जैसे प्रमुख कस्बों और नगरों में शांति बनाए रखने के लिए 'कोतवाल' नियुक्त होता था। कोतवाल को सरकार से एक निश्चित मासिक रकम मिलती थी, जिससे वह अपने मातहत प्यादे और चौकीदार रखता था। अपराधियों को पकड़ना, चोरी का माल बरामद करना और बाजारों की निगरानी करना कोतवाल का काम था। देहाती परगनों में उसकी मदद के लिए 'थानेदार' तैनात रहते थे, जो अपने-अपने थानों (चौकियों) की देखरेख करते थे।
⚔️ 2. नवाबी दौर की अव्यवस्था और 1861 का ब्रिटिश पुलिस एक्ट
18वीं सदी के उत्तरार्ध में जब अवध के नवाबों का शासन कमजोर पड़ा, तो पूरे क्षेत्र में अव्यवस्था फैल गई। नवाबों के चकलादारों और स्थानीय ताल्लुकदारों ने अपनी-अपनी निजी सेनाएं खड़ी कर लीं। ताल्लुकदारों ने जंगलों के बीच मजबूत मिट्टी की गढ़ी (किले) बनवा लीं और तोपें चढ़ा लीं। ऐसे में कानून का राज कमजोर पड़ गया और मार्ग-डकैती (Highway Robbery), ठगी और मवेशी चोरी आम बात हो गई थी।
फरवरी 1856 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने अवध पर कब्जा किया, तो उन्होंने सबसे पहले एक नियमित पुलिस बल (Constabulary) का गठन किया। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों ने पूरे देश में पुलिस व्यवस्था को एक केंद्रीय ढांचे में ढालने के लिए ऐतिहासिक पुलिस एक्ट, 1861 (Act V of 1861) लागू किया। इसी कानून के तहत प्रतापगढ़ में पुलिस अधीक्षक (Superintendent of Police - SP) का पद सृजित हुआ और पूरे जिले में नियमित थानों का जाल बिछाया गया।
🔍 3. अपराधों का स्वरूप: सेंधमारी से लेकर संगठित डकैत गिरोहों तक
गजेटियर के अनुसार, प्रतापगढ़ की आबादी सामान्यतः शांतिप्रिय और खेती-किसानी से जुड़ी रही है। लेकिन भौगोलिक स्थिति (गंगा और सई नदी के बीहड़ कछार और घने जंगल) के कारण समय-समय पर यहाँ विशेष प्रकार के अपराध देखने को मिले:
- सेंधमारी और नकबजनी (Burglary / House-breaking): 19वीं और 20वीं सदी में यह जिले का सबसे आम अपराध था। कच्चे मिट्टी के घरों की दीवारों में रात के वक्त कुंबल या सेंध काटकर अनाज, बर्तन और जेवरात चुरा लिए जाते थे।
- मवेशी चोरी (Cattle Theft): किसानों के बैल और भैंस चुराकर सीमावर्ती जिलों (इलाहाबाद, जौनपुर, सुल्तानपुर या फतेहपुर) में बेच देना एक संगठित अपराध था।
- खेतों की मेड़ पर लाठीबाजी और दंगे (Rioting): सिंचाई के पानी, चक की मेड़ और जमींदारी रंजिशों को लेकर गांवों में लाठी-डंडों से खूनी संघर्ष होते थे, जो अक्सर हत्या में बदल जाते थे।
गजेटियर में दर्ज है कि 1960 के दशक के अंतिम वर्षों और 1970 के आसपास प्रतापगढ़ पुलिस को संगठित डकैत गिरोहों (Organised Dacoit Gangs) की भीषण चुनौती का सामना करना पड़ा। ये डकैत आधुनिक हथियारों से लैस होकर रात में गांवों के संपन्न व्यापारियों और किसानों की हवेलियों पर धावा बोलते थे।
वर्ष 1970 में जिले में डकैती के रिकॉर्ड 151 मामले और लूट के 148 मामले दर्ज हुए। लेकिन जिला पुलिस और विशेष कार्यबल ने कड़े अभियान चलाकर इन कुख्यात गिरोहों के सरगनाओं को मुठभेड़ों में मार गिराया और अधिकांश गिरोहों का पूरी तरह सफाया कर दिया।
| प्रमुख अपराध का प्रकार | 1968 (दर्ज / सजा / बरी) | 1969 (दर्ज / सजा / बरी) | 1970 (दर्ज / सजा / बरी) | अपराध की प्रकृति व पुलिस कार्रवाई |
|---|---|---|---|---|
| हत्या (Murder) | 43 दर्ज | 8 सजा | 10 बरी | 29 दर्ज | 12 सजा | 5 बरी | 29 दर्ज | 13 सजा | 16 बरी | पारिवारिक विवाद, भूमि रंजिश और पुरानी दुश्मनी। |
| डकैती (Dacoity) | 59 दर्ज | 11 सजा | 10 बरी | 51 दर्ज | 7 सजा | 7 बरी | 151 दर्ज | 11 सजा | 26 बरी | सीमावर्ती कछारों से सक्रिय हथियारबंद डकैत गिरोह। |
| लूट (Robbery) | 22 दर्ज | 3 सजा | 7 बरी | 29 दर्ज | 2 सजा | 1 बरी | 148 दर्ज | 6 सजा | 8 बरी | सड़कों और मेलों से लौटते व्यापारियों पर हमले। |
| दंगा व बलवा (Riot) | 117 दर्ज | 17 सजा | 37 बरी | 139 दर्ज | 15 सजा | 39 बरी | 339 दर्ज | 23 सजा | 84 बरी | पंचायती चुनाव, राजनीतिक प्रदर्शन व जमीनी विवाद। |
| सेंधमारी (Burglary) | 608 दर्ज | 26 सजा | 12 बरी | 628 दर्ज | 19 सजा | 7 बरी | 692 दर्ज | 20 सजा | 12 बरी | गांवों में रात के समय मिट्टी की दीवार काटकर चोरी। |
🚔 4. प्रतापगढ़ पुलिस का ढांचा: सर्किल, थाने और चौकियां
जिले में पुलिस व्यवस्था का विकास बड़े योजनाबद्ध तरीके से हुआ। वर्ष 1869 में पूरे जिले में केवल 7 थाने थे। इसके बाद पुलिस हल्कों का पुनर्गठन हुआ और 20वीं सदी की शुरुआत (1902 के भारतीय पुलिस आयोग की सिफारिशों के बाद) जिले में कुल 12 थाने बना दिए गए—यानी प्रत्येक तहसील (सदर, कुंडा और पट्टी) में 4-4 थाने।
1 अप्रैल 1970 को फैजाबाद में पुलिस उप-महानिरीक्षक (DIG) की अध्यक्षता में नई पुलिस रेंज बनी, जिसके सीधे नियंत्रण में प्रतापगढ़ के पुलिस अधीक्षक (SP) कार्य करने लगे। जिला पुलिस बल को तीन प्रमुख शाखाओं में बांटा गया:
- नागरिक पुलिस (Civil Police): थानों और चौकियों पर तैनात बल, जो गश्त, जांच और अपराध नियंत्रण करता है।
- सशस्त्र पुलिस (Armed Police): रिजर्व पुलिस लाइन में तैनात बल, जो दंगों, आपात स्थितियों, खजाने की सुरक्षा और कैदियों की एस्कॉर्टिंग में काम आता है।
- अभियोजन इकाई (Prosecution Unit): अदालतों में मुकदमों की पैरवी करने वाले सरकारी वकील और पैरोकार।
| पुलिस सर्किल | थाने का नाम (Police Station) | संबंधित चौकियां (Police Outposts) | तैनात बल (दरोगा / हेड कांस्टेबल / सिपाही) |
|---|---|---|---|
| कोतवाली सर्किल (सदर व पट्टी तहसील) | कोतवाली (बेल्हा सदर) | मैकएंड्रूगंज, दहिलामऊ, चिलबिला, भांगवा, प्रतापगढ़ कस्बा | 3 सब-इंस्पेक्टर, 2 एएसआई, 2 हेड कांस्टेबल, 16 सिपाही (+चौकियों का बल) |
| अंतू (Antu) | ग्रामीण क्षेत्र चौकी | 1 सब-इंस्पेक्टर, 1 एएसआई, 1 हेड कांस्टेबल, 13 सिपाही | |
| कंधई (Kandhai) | स्थानीय क्षेत्र | 2 सब-इंस्पेक्टर, 1 एएसआई, 1 हेड कांस्टेबल, 14 सिपाही | |
| रानीगंज (Raniganj) | जासमऊ व बाजार क्षेत्र | 2 सब-इंस्पेक्टर, 1 एएसआई, 1 हेड कांस्टेबल, 14 सिपाही | |
| पट्टी (Patti) | तहसील मुख्यालय | 2 सब-इंस्पेक्टर, 1 एएसआई, 1 हेड कांस्टेबल, 14 सिपाही | |
| कुंडा सर्किल (कुंडा उप-प्रभाग) | कुंडा (Kunda) | तहसील मुख्यालय व गंगा तटीय क्षेत्र | 2 सब-इंस्पेक्टर, 1 एएसआई, 1 हेड कांस्टेबल, 16 सिपाही |
| मानिकपुर (Manikpur) | ऐतिहासिक कस्बा चौकी | 1 सब-इंस्पेक्टर, 4 सिपाही | |
| संग्रामगढ़ (Sangramgarh) | रामपुर खास क्षेत्र | 1 सब-इंस्पेक्टर, 1 एएसआई, 1 हेड कांस्टेबल, 14 सिपाही | |
| जेठवारा (Jethwara) | बाजार क्षेत्र | 2 सब-इंस्पेक्टर, 1 एएसआई, 1 हेड कांस्टेबल, 14 सिपाही | |
| कटरा गुलाब सिंह | बाजार चौकी | 2 हेड कांस्टेबल, 4 सिपाही | |
| बाघराय (Baghrai) | दक्षिणी कुंडा क्षेत्र | 2 सब-इंस्पेक्टर, 1 एएसआई, 1 हेड कांस्टेबल, 14 सिपाही |
गांवों में कानून-व्यवस्था की सबसे जमीनी और विश्वसनीय कड़ी ग्राम चौकीदार था। नॉर्थ-वेस्टर्न प्रोविंसेज विलेज एंड रोड पुलिस एक्ट, 1873 के तहत चौकीदार को ₹10 मासिक सरकारी मानदेय मिलता था। गांव में कोई भी हत्या, चोरी, संक्रामक बीमारी या संदिग्ध हलचल होने पर चौकीदार सीधे थाने जाकर रपट लिखाता था।
इसके अलावा गांवों में शांति व्यवस्था और अपराध नियंत्रण में सहयोग के लिए प्रांतीय रक्षक दल (PRD) और ग्राम रक्षा समितियां (Village Defence Societies) गठित की गईं, जो रात में लाठी-टॉर्च लेकर गश्त करती थीं।
⛓️ 5. 1867 की जिला जेल और कैदियों के मानवीय सुधार
प्रतापगढ़ जिला कारागार (District Jail) की स्थापना ब्रिटिश हुकूमत के दौरान वर्ष 1867 में की गई थी। यह जेल जिला मुख्यालय बेल्हा में स्थित है और इसका प्रशासनिक प्रमुख जेल अधीक्षक (Superintendent of Jail) होता है, जिसकी मदद डिप्टी जेलर, असिस्टेंट जेलर और वार्डर करते हैं।
गजेटियर के अनुसार इस जेल की आधिकारिक क्षमता 329 कैदियों की थी, जिसमें 310 पुरुष और 19 महिला कैदियों के लिए अलग-अलग बैरकें थीं। इसके अतिरिक्त जेल परिसर में एक सुसज्जित अस्पताल भी था जिसमें बीमार कैदियों के इलाज के लिए एक डॉक्टर और फार्मासिस्ट तैनात रहते थे।
आजादी से पहले कैदियों को राजनीतिक और सामाजिक आधार पर 'A', 'B' और 'C' तीन श्रेणियों में बांटा जाता था। लेकिन 1948 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस भेदभाव को खत्म कर केवल दो श्रेणियां रखीं—'विशिष्ट' (Superior) और 'साधारण' (Ordinary)।
- श्रम का मेहनताना: जेल में बढ़ईगीरी, बागवानी, कपड़ा बुनाई और खेती करने वाले कैदियों को उनके काम का नियमित सरकारी वेतन दिया जाने लगा।
- शिक्षा और साक्षरता: अनपढ़ कैदियों को पढ़ना-लिखना सिखाने के लिए 'थ्री-आर' (Reading, Writing, Arithmetic) अभियान चलाया गया।
- पुस्तकालय व मनोरंजन: जेल में एक समृद्ध लाइब्रेरी बनाई गई जहाँ कैदियों को दैनिक समाचार-पत्र, धार्मिक पुस्तकें और पत्रिकाएं दी जाती थीं। साथ ही कैरम, वॉलीबॉल, नाटक, भजन-कीर्तन और संगीत के कार्यक्रम भी शुरू किए गए।
- जेल पुनरीक्षण बोर्ड (Revising Board): जिन कैदियों को 3 साल या उससे अधिक की सजा हुई थी, उनके अच्छे आचरण को देखकर समय से पहले रिहाई की सिफारिश के लिए जिला जज की अध्यक्षता में पुनरीक्षण बोर्ड बनाया गया।
- हवालात (Lock-ups): कलेक्ट्रेट, सत्र न्यायालय और प्रत्येक थाने में अलग हवालात थी। इसके अलावा तहसील स्तर पर मालगुजारी न चुकाने वाले बकायेदारों के लिए विशेष राजस्व हवालात होती थी, जहाँ अधिकतम 14 दिन तक हिरासत में रखने का नियम था।
⚖️ 6. कचहरी और न्यायपालिका का विकास: मुंसिफ से लेकर जिला जज तक
अवध विलय के शुरुआती दिनों (1856 से 1871) में जिले में कार्यपालिका और न्यायपालिका अलग नहीं थीं। डिप्टी कमिश्नर के पास ही लगान वसूली, पुलिस नियंत्रण, मजिस्ट्रेट और सेशन जज—सारे अधिकार केंद्रित थे। वे मुकदमों की सुनवाई कर फांसी तक की सजा सुना सकते थे।
लेकिन अवध सिविल कोर्ट्स एक्ट, 1871 और 1879 के लागू होने के बाद दीवानी न्यायपालिका को कलेक्ट्रेट से अलग किया गया। प्रतापगढ़ में एक सबऑर्डिनेट जज और दो मुंसिफ (प्रतापगढ़ और कुंडा) नियुक्त किए गए।
आधुनिक अदालतों का ताना-बाना
पहले प्रतापगढ़ न्यायिक रूप से 'अवध चीफ कोर्ट, लखनऊ' के अधीन आता था। 1948 में जब चीफ कोर्ट का इलाहाबाद हाईकोर्ट में विलय हुआ, तो यह सीधे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार में आ गया। जिले में न्याय व्यवस्था दो मुख्य धाराओं में काम करती थी:
- दीवानी अदालतें (Civil Courts): दीवानी मामलों की सर्वोच्च अदालत जिला न्यायाधीश (District Judge) की होती थी। उनके नीचे दो सिविल जज और दो मुंसिफ कोर्ट (प्रतापगढ़ व कुंडा) काम करती थीं। लघुवाद न्यायालय (Small Causes Court) के मुकदमे भी जिला जज और अतिरिक्त जिला जज सुनते थे।
- आपराधिक अदालतें (Criminal Courts): जिले की मुख्य आपराधिक अदालत जिला एवं सत्र न्यायाधीश (District & Sessions Judge) की थी। वे हत्या, डकैती जैसे संगीन सत्र मुकदमों की सुनवाई करते थे और आजीवन कारावास या फांसी की सजा सुना सकते थे। उनकी सहायता के लिए दो अपर सत्र न्यायाधीश (Additional Sessions Judges) और न्यायिक मजिस्ट्रेट तैनात थे।
| वर्ष | कुल चलाए गए मुकदमे (Persons Tried) | कठोर कारावास (Rigorous Imprisonment) | साधारण कारावास (Simple Imprisonment) | केवल जुर्माना (Fined Only) | अन्य सजाएं / बरी |
|---|---|---|---|---|---|
| 1970 | 4,219 व्यक्ति | 157 व्यक्ति | 4 व्यक्ति | 77 व्यक्ति | 52 व्यक्ति (+अधिकांश बरी) |
| 1971 | 4,843 व्यक्ति | 94 व्यक्ति | 2 व्यक्ति | 12 व्यक्ति | 29 व्यक्ति |
| 1972 | 4,708 व्यक्ति | 76 व्यक्ति | 1 व्यक्ति | 10 व्यक्ति | 29 व्यक्ति |
🌱 7. 171 न्याय पंचायतें: गांव की चौपाल पर सस्ता और त्वरित न्याय
गरीब किसानों को कचहरी की लंबी दौड़ और वकीलों की भारी फीस से बचाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने यूपी पंचायत राज अधिनियम, 1947 के तहत वर्ष 1949 में प्रतापगढ़ जिले में 171 न्याय पंचायतें स्थापित कीं:
- कुंडा तहसील: 59 न्याय पंचायतें
- प्रतापगढ़ सदर तहसील: 58 न्याय पंचायतें
- पट्टी तहसील: 54 न्याय पंचायतें
प्रत्येक न्याय पंचायत में 5 से 10 ग्राम सभाएं शामिल होती थीं। इसके पंचों का चुनाव ग्राम पंचायतों के पढ़े-लिखे और सम्मानित सदस्यों में से जिला मजिस्ट्रेट की सलाह पर होता था। पंच अपने में से एक सरपंच और एक सहायक सरपंच चुनते थे।
न्याय पंचायतों को छोटे-मोटे झगड़े, गाली-गलौज, साधारण मारपीट (आईपीसी धारा 323, 504, 506), ₹50 से कम की चोरी, मवेशियों द्वारा खेत चरने (Cattle Trespass Act) और सार्वजनिक जुआ अधिनियम के मामलों की सुनवाई का अधिकार था।
वे किसी को जेल नहीं भेज सकती थीं, केवल अधिकतम ₹100 तक का जुर्माना लगा सकती थीं। साथ ही ₹500 तक के छोटे दीवानी लेन-देन के मामलों को चौपाल पर दोनों पक्षों को बैठाकर आपसी सुलह से निपटा देती थीं। इनके फैसलों के खिलाफ अपील संबंधित मुंसिफ या एसडीएम के यहां की जा सकती थी।
| वर्ष | वर्ष की शुरुआत में लंबित वाद | सालभर में दर्ज नए मुकदमे | कुल निस्तारित वाद (Disposed of) | न्यायिक प्रभाव व टिप्पणी |
|---|---|---|---|---|
| 1966-67 | 372 | 1,558 | 1,917 | कचहरी पर मुकदमों का बोझ काफी हद तक घटा। |
| 1967-68 | 13 | 970 | 808 | गांव स्तर पर त्वरित सुलह-समझौता हुआ। |
| 1968-69 | 115 | 1,550 | 1,532 | पारिवारिक व मेड़ के विवाद चौपाल पर सुलझे। |
| 1969-70 | 133 | 1,009 | 1,013 | शत-प्रतिशत मामलों का रिकॉर्ड समय में निपटारा। |
| 1970-71 | 189 | 1,081 | 1,110 | सस्ता, सुलभ और पारदर्शी ग्रामीण न्याय। |
📜 8. बेल्हा बार एसोसिएशन (1915): वकीलों की गरिमामयी संस्था
कचहरी में आम जनता के कानूनी अधिकारों की रक्षा करने और न्याय की लड़ाई लड़ने के लिए बेल्हा के अधिवक्ताओं ने दो प्रमुख संगठन बनाए:
- बार एसोसिएशन (Bar Association): इसकी स्थापना वर्ष 1915 में हुई थी। यह जिले का सबसे पुराना और प्रतिष्ठित कानूनी संगठन है।
- वकील संघ (Vakil Sangh): इसकी स्थापना वर्ष 1960 में कनिष्ठ और स्थानीय अधिवक्ताओं के सहयोग हेतु की गई थी।
गजेटियर के अनुसार वर्ष 1971 में बार एसोसिएशन के कुल 400 पंजीकृत सदस्य थे। बार एसोसिएशन कलेक्ट्रेट और जिला जज कचहरी परिसर में एक समृद्ध पुस्तकालय और वाचनालय (Library-cum-Reading Room) चलाती थी, जिसमें कानून की दुर्लभ नजीरें, ऑल इंडिया रिपोर्टर (AIR) और ब्रिटिश कालीन कानून की किताबें उपलब्ध थीं।
यह संस्था अधिवक्ताओं के बीच आपसी भाईचारा बनाए रखने, बेंच (न्यायाधीशों) और बार (वकीलों) के बीच सम्मानजनक तालमेल स्थापित करने और मुवक्किलों को निष्पक्ष कानूनी सहायता दिलाने में आज भी मील का पत्थर बनी हुई है।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रतापगढ़ जिला जेल की स्थापना ब्रिटिश हुकूमत के दौरान वर्ष 1867 में बेल्हा में हुई थी। गजेटियर के अनुसार इसकी आधिकारिक क्षमता 329 कैदियों (310 पुरुष और 19 महिलाएं) की थी। इसमें अपना अस्पताल और पुस्तकालय भी था।
जिले में आधुनिक पुलिस का गठन पुलिस एक्ट, 1861 (Act V of 1861) के तहत हुआ। 1869 में जिले में केवल 7 थाने थे, जो 1902 के पुलिस आयोग के बाद बढ़कर 12 हो गए (सदर, कुंडा और पट्टी तीनों तहसीलों में 4-4 थाने)।
उस दौर में गंगा और सई नदी के कछारी इलाकों में सक्रिय संगठित डकैत गिरोहों (Organised Dacoit Gangs) का आतंक सबसे बड़ी चुनौती था। वर्ष 1970 में 151 डकैतियां दर्ज हुईं, जिसके बाद पुलिस ने विशेष अभियान चलाकर इन गिरोहों का सफाया किया।
वर्ष 1949 में जिले में कुल 171 न्याय पंचायतें स्थापित की गईं (कुंडा 59, सदर 58, पट्टी 54)। इन्हें छोटे-मोटे फौजदारी मामलों में ₹100 तक जुर्माना लगाने और ₹500 तक के दीवानी विवादों को चौपाल पर सुलझाने का अधिकार था।
बेल्हा बार एसोसिएशन की स्थापना वर्ष 1915 में हुई थी। वर्ष 1971 में इसके 400 पंजीकृत अधिवक्ता सदस्य थे। यह संस्था कचहरी में अपनी कानूनी लाइब्रेरी और बार-बेंच समन्वय के लिए प्रसिद्ध रही है।
प्रतापगढ़ का कानून, पुलिस और न्यायिक इतिहास यह दिखाता है कि एक बदलते समाज में शांति और न्याय की जड़ें कितनी गहरी रही हैं। मुगल दौर के कोतवाल से लेकर 1867 की जिला जेल, कुख्यात डाकुओं के खिलाफ पुलिस का अदम्य साहस, चौपालों पर न्याय बांटने वाली 171 न्याय पंचायतें और कचहरी में संविधान की रक्षा करने वाली बेल्हा बार एसोसिएशन—इन सभी ने मिलकर प्रतापगढ़ को एक सुरक्षित, मर्यादित और लोकतांत्रिक पहचान दी है।