प्रतापगढ़ में स्थानीय स्वशासन का इतिहास: नगर पालिका, टाउन एरिया और पंचायती राज (गजेटियर 1980 की पड़ताल)
लोकतंत्र की असली खुशबू संसद या विधानसभा की बड़ी इमारतों से नहीं, बल्कि गांव की चौपाल पर लगने वाली पंचायत, कस्बे की गलियों में जलने वाले खंभे की बत्ती, और सुबह-सुबह घर के नल में आने वाले साफ पानी से महसूस होती है। जनता द्वारा अपने मोहल्ले, कस्बे और गांव का प्रबंध खुद अपने हाथों में लेना ही स्थानीय स्वशासन (Local Self-Government) कहलाता है।
उत्तर प्रदेश जिला गजेटियर (1980) का अध्याय 14 (Local Self-Government) इस बात का गवाह है कि कैसे प्रतापगढ़ में अंग्रेजों की बनाई गई 'चौकीदारी टैक्स' और 'डिप्टी कमिश्नर की मनमानी कमेटियों' से निकलकर एक संपूर्ण लोकतांत्रिक ढांचा खड़ा हुआ। 1867 में बनी बेला नगर पालिका, 1881-82 के तीन ऐतिहासिक टाउन एरिया, 15 क्षेत्र समितियां और 1,525 ग्राम पंचायतों की यह दास्तान हमारे अपने पुरखों के स्वशासन की सच्ची कहानी है।
1 नगर पालिका परिषद बेला प्रतापगढ़: छावनी से आधुनिक शहर तक का सफर (1867-1978)
जिले का एकमात्र नगर पालिका शहर बेला प्रतापगढ़ रहा है, जो जिला मुख्यालय भी है। इस शहर की शुरुआत बहुत दिलचस्प रही। साल 1802 में अवध की सहायक सेना (Avadh Auxiliary Force) के लिए सई नदी के किनारे 'बेला' को छावनी के रूप में चुना गया था। इसके बाद जब 1857 की महान क्रांति शांत हुई, तो अंग्रेजों ने पुराने प्रतापगढ़ किले की जगह इसी बेला छावनी को नए जिले का प्रशासनिक मुख्यालय बना दिया।
शहर इतनी तेजी से फला-फूला कि 1867 में एक्ट XV (Act XV of 1867) के तहत इसे आधिकारिक तौर पर 'नगर पालिका' घोषित कर दिया गया। आगे चलकर 1873 और 1900 के नगर पालिका अधिनियमों के तहत इसका विस्तार हुआ। साल 1900 में नगर पालिका बोर्ड में 12 मनोनीत सदस्य होते थे और जिले का डिप्टी कमिश्नर ही इसका पदेन चेयरमैन होता था। उस समय नगर पालिका की कमाई का मुख्य जरिया बाहर से आने वाले सामान पर चुंगी (Octroi), कांजी हाउस (Cattle pounds), बाजारों की फीस और जमीनों का किराया था।
गुलामी के दौर में भारतीयों को स्वशासन का पहला वास्तविक अधिकार संयुक्त प्रांत नगर पालिका अधिनियम 1916 (U.P. Municipalities Act, 1916) से मिला। इस कानून ने पहली बार कलेक्टर या किसी अंग्रेज अफसर की जगह शहर के ही किसी गैर-सरकारी नागरिक को चेयरमैन (अध्यक्ष) चुनने की इजाजत दी। अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष तय हुआ और पार्षदों को अविश्वास प्रस्ताव के जरिए अध्यक्ष को हटाने की लोकतांत्रिक शक्ति भी मिली।
🗺️ वार्ड, भूगोल और आबादी का विस्तार
गजेटियर के अनुसार नगर पालिका का कुल क्षेत्रफल 8.29 वर्ग किलोमीटर था। शहर की आबादी 1961 की जनगणना में 21,397 थी, जो 1971 में बढ़कर 27,909 हो गई। नगर पालिका क्षेत्र को 7 वार्डों में बांटा गया था। इनमें से 5 वार्डों से 2-2 सदस्य और 2 वार्डों से 3-3 सदस्य चुने जाते थे, जिससे बोर्ड में कुल 16 निर्वाचित सभासद (Members) शहर की सरकार चलाते थे।
🚰 1956 का ऐतिहासिक वाटरवर्क्स: 52 सार्वजनिक नल और पाइपलाइन
आज़ादी से पहले तक शहरवासी कुओं और बावलियों के पानी पर निर्भर थे। बेला शहर में आधुनिक पेयजल की शुरुआत साल 1956 में हुई, जब पहला वाटरवर्क्स बनकर तैयार हुआ:
- कैविटी ट्यूबवेल: 2,27,298 लीटर की विशाल क्षमता वाला नलकूप और ओवरहेड टैंक लगाया गया।
- पाइपलाइन संजाल: शहर की सड़कों और गलियों में 11.18 किलोमीटर लंबी लोहे की पाइपलाइन बिछाई गई।
- कनेक्शन: चौराहों पर 52 सार्वजनिक नल (Public Taps) लगाए गए ताकि राहगीर और गरीब बस्तियां मुफ्त पानी पी सकें, जबकि 1,498 घरों में निजी नल कनेक्शन दिए गए।
- पानी की आपूर्ति: वर्ष 1970-71 में कुल 44,16,44,354 लीटर पानी सप्लाई किया गया। रोजाना औसतन 7 घंटे पानी आता था, जो प्रति व्यक्ति प्रतिदिन लगभग 56 लीटर बैठता था।
- स्टाफ: जलकल की देखरेख एक वाटरवर्क्स इंजीनियर करते थे, जिनकी सहायता के लिए पंप अटेंडेंट, मीटर रीडर, पाइप फिटर, मीटर मैकेनिक और बेलदार तैनात थे।
💡 1957 में लालटेन युग का अंत: बिजली की पहली चकाचौंध
साल 1957 से पहले तक बेला शहर की शामें बड़ी अजीब होती थीं। नगर पालिका के कर्मचारी शाम ढलते ही सीढ़ी और मिट्टी का तेल (केरोसिन) लेकर निकलते थे और खंभों पर टंगे शीशे के लालटेन जलाते थे। साल 1957 में पहली बार केरोसिन लैंप को हटाकर शहर में बिजली के बल्ब लगाए गए। यह बिजली 'श्री रोहतक एंड हिसार डिस्ट्रिक्ट इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई कंपनी' द्वारा दी जाती थी। गजेटियर के अनुसार 1970-71 तक शहर की सड़कों पर 567 बिजली के बल्ब और 41 गैस लैंप जगमगा रहे थे।
🧹 स्वास्थ्य, नाली व्यवस्था और सुंदर बगीचे
शहर की सफाई का जिम्मा नगर स्वास्थ्य अधिकारी के पास था, जिनके अधीन 1 सेनेटरी इंस्पेक्टर, 3 सेनेटरी सुपरवाइजर और 95 सफाईकर्मी (स्वीपर्स) तैनात थे। महामारी रोकने के लिए चेचक का टीका लगाने वाला वैक्सीनेटर था। शहर में 7 किमी पक्के नाले और 12 किमी कच्चे नाले थे। शहर से निकलने वाले कूड़े-कचरे से वैज्ञानिक विधि से खाद (कंपोस्ट) बनाई जाती थी, जिसे बेचकर नगर पालिका राजस्व भी कमाती थी।
नागरिकों की सैर-सपाटे और हरियाली के लिए शहर में कई खूबसूरत पार्क बनाए गए, जिनमें नाना लाल मेहता पार्क (Nana Lal Mehta Park), प्रताप बहादुर पार्क, आज़ाद पार्क, सुभाष पार्क और 3 बाल उद्यान (चिल्ड्रेंस पार्क) प्रमुख थे। इसके अलावा शहर के ज्ञान-पिपासुओं के लिए महात्मा गांधी स्मारक पुस्तकालय एवं वाचनालय की स्थापना की गई थी।
2 तीन ऐतिहासिक टाउन एरिया: प्रतापगढ़ सिटी, कटरा मेदनीगंज और मानिकपुर
बेला नगर पालिका के अलावा जिले के तीन पुराने और ऐतिहासिक कस्बों को 'टाउन एरिया' (Town Area) का दर्जा हासिल था। इनकी कहानी 19वीं सदी के बंगाल चौकीदारी एक्ट 1856 (Bengal Chowkidari Act - Act XX of 1856) से शुरू होती है। उस दौर में अंग्रेजों ने बड़े बाजारों और कस्बों की सुरक्षा (Watch and Ward) के लिए चौकीदार रखने हेतु जनता पर 'सर्कमस्टेंस एंड प्रॉपर्टी टैक्स' लगाया था। जिन कस्बों पर यह कानून लागू हुआ, उन्हें सरकारी भाषा में 'Act XX Towns' कहा जाता था:
1914 का यूपी टाउन एरिया एक्ट (U.P. Town Areas Act, 1914): इस कानून ने इन तीनों कस्बों की तस्वीर बदल दी। अब कमेटियों का काम सिर्फ चौकीदार रखना नहीं रहा, बल्कि उन्हें सड़कें बनाने, पानी का इंतजाम करने, खड़ंजा बिछाने और सफाई कराने की सीधी जिम्मेदारी दी गई। चारों वर्षों के कार्यकाल के लिए कस्बे की वयस्क जनता सीधे अपना चेयरमैन और सदस्य चुनती थी। मानिकपुर और कटरा मेदनीगंज दोनों कस्बों का 1970 के दशक तक पूर्ण विद्युतीकरण हो चुका था।
3 पंचायती राज का पुनर्जन्म: 1,525 ग्राम पंचायतें और ग्राम स्वराज्य
भारत के गांवों में सदियों से पंचायतें ग्रामीण जीवन की आत्मा रही थीं, लेकिन अंग्रेजी हुकूमत के आने के बाद यह पुरानी व्यवस्था धीरे-धीरे खत्म हो गई। अंग्रेजों ने 1920 में 'विलेज पंचायत एक्ट' बनाकर जिले के कलेक्टर को 5 से 7 पंच मनोनीत करने की आधी-अधूरी छूट दी थी, जो केवल कागजी साबित हुई। 1938 में तत्कालीन स्थानीय स्वशासन मंत्री ए.जी. खेर (A.G. Kher) की अध्यक्षता में एक सुधार कमेटी बनी, लेकिन 1939 में कांग्रेस मंत्रिमंडल के इस्तीफे से मामला लटक गया।
आज़ादी की सुबह के साथ ही संयुक्त प्रांत पंचायती राज अधिनियम 1947 (U.P. Panchayat Raj Act, 1947) पास हुआ, जिसने गांवों को उनके ऐतिहासिक अधिकार वापस लौटा दिए। जिले में पंचायती राज को तीन स्तरों (Three-Tier System) में संगठित किया गया:
- ग्राम स्तर (आधार): गांव सभा और ग्राम पंचायत।
- प्रखंड / ब्लॉक स्तर (मध्यवर्ती): क्षेत्र समिति।
- जिला स्तर (शीर्ष): ज़िला परिषद।
जब 1949 में जिले में पंचायती राज लागू हुआ, तो शुरुआत में 741 गांव सभाएं बनाई गई थीं। जैसे-जैसे आबादी बढ़ी और गांवों का विस्तार हुआ, साल 1972 तक जिले में कुल 1,525 ग्राम पंचायतें बन चुकी थीं। गांव का प्रत्येक वयस्क नागरिक गांव सभा का सदस्य था, जो 5 साल के लिए अपने ग्राम प्रधान और पंचायत सदस्यों का चुनाव करता था।
⚖️ न्याय पंचायतें और भूमि प्रबंधक समिति (LMC)
गांव के छोटे-मोटे झगड़ों, मेड़ के विवाद और मामूली अपराधों को कचहरी की लंबी तारीखों से बचाने के लिए कई ग्राम सभाओं को मिलाकर न्याय पंचायतें बनाई गई थीं। इनमें एक सरपंच, सहायक सरपंच और पंच बैठते थे, जो बिना किसी वकील के मौके पर ही दूध का दूध और पानी का पानी कर देते थे।
इसके अलावा, अधिनियम की धारा 29 के तहत प्रत्येक पंचायत में भूमि प्रबंधक समिति (Land Management Committee - LMC) बनाई गई। ग्राम प्रधान इसके अध्यक्ष होते थे और हल्का लेखपाल इसका पदेन सचिव होता था। इस समिति के पास गांव समाज की परती, बंजर और सरप्लस जमीन को भूमिहीन दलित व पिछड़े कृषि मजदूरों को पट्टे पर देने, गांव के पोखरों, तालाबों और आम के बागों की नीलामी का अधिकार था, जिससे गांव का आर्थिक पहिया घूमता था।
4 क्षेत्र समितियां: 15 विकास खंडों में 1,808 जन-प्रतिनिधियों की संसद
गांव पंचायतों और जिले के बीच समन्वय बैठाने के लिए उत्तर प्रदेश क्षेत्र समिति एवं जिला परिषद अधिनियम 1961 लागू हुआ। इसके तहत पुरानी 'ब्लॉक डेवलपमेंट कमेटियों' को कानूनी रूप से मजबूत क्षेत्र समितियों (Kshettra Samitis) में बदल दिया गया।
साल 1973 तक प्रतापगढ़ की तीनों तहसीलों में 5-5 ब्लॉक बनाकर कुल 15 क्षेत्र समितियां स्थापित की गईं:
- प्रतापगढ़ सदर तहसील: 5 विकास खंड (सदर, संडवा चंद्रिका, लक्ष्मणपुर, आदि)।
- पट्टी तहसील: 5 विकास खंड (पट्टी, आसपुर देवसरा, मंगरौरा, बाबा बेलखरनाथ धाम, शिवगढ़)।
- कुंडा तहसील: 5 विकास खंड (कुंडा, बाबागंज, बिहार, कालाकांकर, रामपुर संग्रामगढ़)।
क्षेत्र समिति ब्लॉक स्तर की एक मिनी-संसद जैसी होती थी। इसमें उस ब्लॉक के सभी ग्राम प्रधान, टाउन एरिया के चेयरमैन, ब्लॉक से चुने गए ज़िला परिषद सदस्य, इलाके के विधायक और सांसद, सहकारी बैंकों के प्रतिनिधि (2 से 5), और कम से कम 5 महिला सदस्य शामिल होती थीं। साल 1973 में जिले की 15 क्षेत्र समितियों में कुल 1,808 सदस्य थे। ये सदस्य अपने में से गुप्त मतदान द्वारा ब्लॉक प्रमुख और उप-प्रमुख चुनते थे, जिनकी न्यूनतम आयु 30 वर्ष होना अनिवार्य था।
क्षेत्र समितियों का मुख्य काम गांवों की विकास योजनाओं को मंजूरी देना, खेती व पशु नस्ल सुधार, कांजी हाउस (Cattle Trespass Act 1871) का संचालन और ग्राम पंचायतों के बजट की जांच करना था।
5 ज़िला परिषद प्रतापगढ़: 1906 के डिस्ट्रिक्ट बोर्ड से विशाल ग्रामीण सरकार तक
जिले के पूरे देहाती इलाके की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक संस्था ज़िला परिषद (Zila Parishad) रही है। इसका इतिहास कई चरणों में विकसित हुआ:
ज़िला परिषद का काम केवल कागजी प्रस्ताव पास करना नहीं था, बल्कि ग्रामीण इलाकों में सड़कों, पुलों, घाटों, पशु अस्पतालों, एलोपैथिक औषधालयों और मेलों का प्रबंध करना था। परिषद ने जिले में 22 किमी पक्की सड़क, 3 किमी कच्ची सड़क, 17 पुलिया, 9 पक्के स्नान घाट और 241 स्कूल भवनों का खुद निर्माण कराया था। जनस्वास्थ्य के तहत परिषद 8 एलोपैथिक और 2 आयुर्वेदिक अस्पताल चलाती थी, जहां हर साल औसतन 92,067 मरीजों का मुफ्त इलाज होता था।
6 शिक्षा का विशाल साम्राज्य: जब ज़िला परिषद संभालती थी 913 स्कूल और 3,897 शिक्षक
आज भले ही बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) और बेसिक शिक्षा परिषद का नाम हर कोई जानता है, लेकिन जुलाई 1972 से पहले पूरे जिले के प्राथमिक और जूनियर हाईस्कूलों की मालिक ज़िला परिषद हुआ करती थी। गजेटियर में दर्ज आंकड़े उस समय के शिक्षा ढांचे की विशालता देखकर हैरान कर देते हैं:
| स्कूल की श्रेणी | स्कूलों की संख्या | नामांकित छात्र / छात्राएं | तैनात शिक्षक (महिलाएं शामिल) |
|---|---|---|---|
| जूनियर बेसिक स्कूल (बालक) | 681 स्कूल | 1,15,618 छात्र | 3,513 शिक्षक (जिनमें 294 महिला शिक्षिकाएं शामिल) |
| जूनियर बेसिक स्कूल (बालिका) | 153 स्कूल | 67,850 छात्राएं | |
| सीनियर बेसिक स्कूल (बालक) | 48 स्कूल | 11,203 छात्र | 384 शिक्षक (जिनमें 106 महिला शिक्षिकाएं शामिल) |
| सीनियर बेसिक स्कूल (बालिका) | 31 स्कूल | 5,215 छात्राएं | |
| सहायता प्राप्त / अन्य बेसिक स्कूल | 28 स्कूल (एडेड) + 35 गैर-सहायता | लगभग 1,000 छात्र | प्राइवेट व प्रबंधकीय शिक्षक |
| कुल योग (1970-71) | 913 सरकारी स्कूल | 1,99,886 विद्यार्थी | 3,897 कुल शिक्षक |
अकेले वर्ष 1970-71 में ज़िला परिषद ने अपने कुल बजट में से ₹53,81,007 (तिरेपन लाख इक्यासी हजार रुपये से अधिक) केवल बेसिक शिक्षा और शिक्षकों के वेतन पर खर्च किए थे।
जुलाई 1972 का ऐतिहासिक बदलाव: उत्तर प्रदेश सरकार ने महसूस किया कि ज़िला परिषदों पर शिक्षा का आर्थिक बोझ बहुत भारी हो गया है। इसलिए जुलाई 1972 में राज्य सरकार ने कानून बनाकर बेसिक शिक्षा को ज़िला परिषद से अलग कर दिया और सीधे अपने हाथ में ले लिया। राज्य स्तर पर 'बेसिक शिक्षा परिषद' और जिला स्तर पर 'जिला बेसिक शिक्षा समिति' (BSA के अधीन) तथा गांव स्तर पर ग्राम प्रधान की अध्यक्षता में 'गांव शिक्षा समिति' का गठन हुआ।
7 गजेटियर के प्रामाणिक वित्तीय आंकड़े और निर्माण कार्य (1964-1978)
📊 1. ग्राम पंचायतों द्वारा 5 वर्षों में कराए गए विकास कार्य (1967-1972)
1967 से 1972 के बीच जिले की ग्राम पंचायतों ने गांव-गांव जो निर्माण कार्य कराए, उनका आधिकारिक ब्योरा इस प्रकार है:
| कराए गए विकास कार्य | 1967-68 | 1968-69 | 1969-70 | 1970-71 | 1971-72 | कुल 5 वर्षों का योग |
|---|---|---|---|---|---|---|
| नई कच्ची सड़कें (किमी) | 52 किमी | 67 किमी | 61 किमी | 52 किमी | 73 किमी | 305 किमी |
| कच्ची सड़कों की मरम्मत (किमी) | 291 किमी | 228 किमी | 240 किमी | 330 किमी | 46 किमी | 1,135 किमी |
| नए पंचायत घर (संख्या) | 8 | 10 | 12 | 8 | 4 | 42 पंचायत भवन |
| नई पुलिया निर्माण (संख्या) | 76 | 71 | 95 | 77 | 37 | 356 पुलिया |
| पुलिया मरम्मत (संख्या) | 97 | 136 | 148 | 122 | 13 | 516 मरम्मत |
| नए पीने के पानी के कुएं | 635 | 358 | 324 | 281 | 204 | 1,802 नए कुएं |
| पुराने कुओं की मरम्मत | 70 | 150 | 303 | 356 | 99 | 978 कुएं |
| नए हैंडपंप स्थापना | 72 | 201 | 176 | 199 | 6 | 654 हैंडपंप |
| पीआरआई (PRI) शौचालय निर्माण | 106 | 113 | 121 | 118 | — | 458 पक्के शौचालय |
| पक्के खड़ंजे का निर्माण (किमी) | 1.34 किमी | 0.75 किमी | 4.48 किमी | 3.84 किमी | — | 10.41 किमी |
💰 2. नगर पालिका बेला प्रतापगढ़: 10 वर्षों का आय-व्यय (1968-1978)
| वित्तीय वर्ष | नगर पालिका टैक्स से आय (₹) | सरकारी अनुदान व मदद (₹) | कुल प्राप्तियां (₹) | जनस्वास्थ्य व सफाई खर्च (₹) | कुल वार्षिक खर्च (₹) |
|---|---|---|---|---|---|
| 1968-69 | ₹2,13,228 | ₹1,65,602 | ₹5,35,305 | ₹3,54,766 | ₹6,29,870 |
| 1970-71 | ₹2,58,203 | ₹2,97,212 | ₹9,50,184 | ₹5,36,517 | ₹9,61,364 |
| 1972-73 | ₹3,18,348 | ₹1,70,503 | ₹10,69,837 | ₹7,43,835 | ₹11,51,557 |
| 1974-75 | ₹4,19,452 | ₹1,24,233 | ₹9,37,108 | ₹5,41,330 | ₹10,07,469 |
| 1976-77 | ₹12,54,012 | ₹2,11,608 | ₹19,48,786 | ₹12,29,290 | ₹16,80,042 |
| 1977-78 | ₹13,35,301 | ₹2,06,025 | ₹19,46,525 | ₹13,43,647 | ₹19,79,089 |
🏛️ 3. ज़िला परिषद प्रतापगढ़: बजट का उतार-चढ़ाव (1964-1974)
| वित्तीय वर्ष | कुल प्राप्तियां / आय (₹) | शिक्षा पर व्यय (₹) | जनस्वास्थ्य व दवाएं (₹) | सड़कें व निर्माण कार्य (₹) | कुल वार्षिक खर्च (₹) |
|---|---|---|---|---|---|
| 1964-65 | ₹40,95,061 | ₹30,58,720 | ₹64,734 | ₹1,57,200 | ₹34,46,871 |
| 1967-68 | ₹64,29,842 | ₹55,67,697 | ₹77,461 | ₹4,49,745 | ₹63,09,776 |
| 1970-71 | ₹88,44,560 | ₹85,72,618 | ₹77,692 | ₹1,71,630 | ₹90,07,687 |
| 1971-72 | ₹1,48,34,946 | ₹81,41,609 | ₹1,02,279 | ₹13,50,739 | ₹97,21,190 |
| 1972-73* | ₹66,89,612 | ₹53,66,071 | ₹96,910 | ₹51,48,985 | ₹1,09,44,869 |
| 1973-74** | ₹10,38,909 | ₹3,42,498 | ₹1,07,048 | ₹8,56,864 | ₹20,75,324 |
*नोट: जुलाई 1972 में बेसिक शिक्षा विभाग के राज्य सरकार के पास जाने के बाद 1973-74 में ज़िला परिषद का शिक्षा बजट और कुल खर्च स्वतः कम हो गया।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
बेला प्रतापगढ़ में नगर पालिका की स्थापना ब्रिटिश हुकूमत के दौरान साल 1867 में एक्ट XV (Act XV of 1867) के तहत हुई थी। आगे चलकर 1916 के कानून के जरिए स्थानीय नागरिकों को गैर-सरकारी अध्यक्ष चुनने का हक मिला।
जिले में तीन ऐतिहासिक टाउन एरिया थे: प्रतापगढ़ सिटी और कटरा मेदनीगंज (दोनों 17 दिसंबर 1881 से) तथा मानिकपुर (22 अगस्त 1882 से)। ये कस्बे 1856 के चौकीदारी कानून से शुरू होकर 1914 के टाउन एरिया एक्ट द्वारा नागरिक निकायों में बदले।
शहर में पहला वाटरवर्क्स 1956 में शुरू हुआ, जिससे 11.18 किमी पाइपलाइन और 52 सरकारी नलों से पानी पहुंचा। वहीं सड़कों पर केरोसिन लालटेन की जगह 1957 में पहली बार बिजली के बल्ब लगाए गए।
जुलाई 1972 में बेसिक शिक्षा परिषद बनने से पहले जिले के सभी 913 बेसिक स्कूल और 3,897 शिक्षक सीधे ज़िला परिषद के अधीन थे। परिषद ही इनका पूरा प्रबंधन और 53 लाख रुपये से अधिक का बजट वहन करती थी।
गजेटियर के अनुसार जिले में 1972 तक कुल 1,525 ग्राम पंचायतें और तीनों तहसीलों (प्रतापगढ़, पट्टी, कुंडा) के 15 ब्लॉकों में 15 क्षेत्र समितियां (1,808 सदस्य) सक्रिय रूप से काम कर रही थीं।
उत्तर प्रदेश जिला गजेटियर (1980) का यह 14वां अध्याय हमें सिखाता है कि लोकतंत्र कोई ऊपर से थोपी गई व्यवस्था नहीं, बल्कि नीचे से उठी हुई जनशक्ति है। 1856 के चौकीदारी टैक्स से शुरू होकर 1947 के पंचायती राज तक का सफर इस बात की गवाही देता है कि बेल्हा के लोगों ने अपने गांव की पगडंडियों पर कुएं खोदने, खड़ंजा बिछाने, स्कूल चलाने और नगर में पानी-बिजली लाने के लिए कितना लंबा संघर्ष किया। आज की नगर पालिका और त्रि-स्तरीय पंचायतें उसी ऐतिहासिक विरासत की मजबूत शाखाएं हैं।