प्रतापगढ़ की राजनीति का इतिहास (Pratapgarh Political History)

प्रतापगढ़ में सार्वजनिक जीवन, चुनावी इतिहास और पत्रकारिता: 1883 के दैनिक 'हिंदुस्तान' से 1969 के राजनीतिक भूचाल तक

प्रतापगढ़ केवल वीरों और किसानों की धरती ही नहीं रहा, बल्कि यह उत्तर भारत की राजनीतिक चेतना और आधुनिक पत्रकारिता का अग्रदूत (Pioneer) भी रहा है। जब देश में प्रेस और अखबारों की शुरुआत हो रही थी, तब 1883 में कालाकांकर के राजा रामपाल सिंह ने प्रतापगढ़ की पावन माटी से हिंदी का दैनिक अखबार 'हिंदुस्तान' शुरू किया था, जिसके संपादक खुद भारत रत्न पंडित मदन मोहन मालवीय बने थे।

आजादी के बाद 1952 के पहले आम चुनाव में जब कांग्रेस ने जिले की सभी 8 विधानसभा सीटों पर एकतरफा जीत हासिल की, वहीं 1962 में जनसंघ ने पहली बार कांग्रेस को हराकर लोकसभा सीट जीती। इसके बाद 1969 के मध्यावधि चुनाव में सोशलिस्ट लहर ने जिले के राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह बदलकर रख दिया। आइए, उत्तर प्रदेश जिला गजेटियर (1980) के प्रामाणिक पन्नों से जानें प्रतापगढ़ के सार्वजनिक जीवन, चुनावों और पत्रकारिता का गौरवशाली सफर।

प्रेस का सुनहरा दौर
1883 ई.
राजा रामपाल सिंह द्वारा प्रतापगढ़ से ऐतिहासिक हिंदी दैनिक 'हिंदुस्तान' का भव्य प्रकाशन शुरू हुआ।
महामना का संपादन
पं. मदन मोहन मालवीय
कालाकांकर में रहकर मालवीय जी ने 'हिंदुस्तान' का संपादन किया; साथ में प्रतापनारायण मिश्र और बालमुकुंद गुप्त जुड़े।
पहला आम चुनाव 1952
8/8 सीटें कांग्रेस
विधानसभा की सभी 8 सीटों और लोकसभा की दोनों सीटों (कुल 3 सांसदों) पर कांग्रेस ने ऐतिहासिक क्लीन स्वीप किया।
पहला चुनावी बदलाव
1962 लोकसभा
भारतीय जनसंघ के प्रत्याशी ने 96,483 वोट हासिल कर कांग्रेस को हराकर पहली बार संसदीय सीट पर भगवा लहराया।
1969 का राजनीतिक भूचाल
5 सीटें संयुक्त सोशलिस्ट
मध्यावधि चुनाव में कांग्रेस 6 सीटों से घटकर मात्र 1 सीट पर सिमट गई, सोशलिस्ट पार्टी ने 5 सीटों पर भारी जीत दर्ज की।
मतदाताओं का विस्तार
7.91 लाख वोटर
1952 में 5.67 लाख मतदाताओं से बढ़कर 1969 तक जिले में वोटरों की संख्या 7,91,675 तक पहुंच गई।

🏛️ 1. प्रतापगढ़ का राजनीतिक परिदृश्य और सक्रिय राजनीतिक दल

आजादी के बाद प्रतापगढ़ जिले में मुख्य रूप से राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक दलों की स्थानीय इकाइयां सक्रिय थीं। समय के साथ कुछ दलों का विलय हुआ, कुछ के नाम बदले, तो कुछ में विभाजन हुए। जिले के राजनीतिक इतिहास में सबसे बड़ा विभाजन 1969-70 में कांग्रेस पार्टी में हुआ, जिसके बाद पार्टी दो धड़ों—कांग्रेस (आर) और कांग्रेस (ओ / जे) में बंट गई।

गजेटियर के अनुसार जिले में मुख्य रूप से निम्नलिखित राजनीतिक दल और संगठन सबसे ज्यादा प्रभावी रहे:

  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Congress): आजादी के आंदोलन से जुड़ी सबसे पुरानी पार्टी, जिसकी पकड़ जिले के हर कस्बे और गांव तक मजबूत थी।
  • भारतीय जनसंघ (Bharatiya Jan Sangh): 1950 के दशक में उभरी राष्ट्रवादी पार्टी, जिसने 1962 के आम चुनाव में प्रतापगढ़ में ऐतिहासिक प्रदर्शन किया।
  • सोशलिस्ट और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (SSP): किसान आंदोलनों, बाबा रामचंद्र की विरासत और डॉ. राममनोहर लोहिया के विचारों से प्रेरित दल, जिसने 1969 के चुनावों में पूरे जिले में परचम लहराया।
  • किसान मजदूर प्रजा पार्टी (KMPP) व स्वतंत्र पार्टी: किसानों, छोटे दुकानदारों और व्यापारियों के बीच सक्रिय वैकल्पिक राजनीतिक धाराएं।
  • भारतीय क्रांति दल (BKD): चौधरी चरण सिंह द्वारा गठित किसानों का दल, जिसने 1969 में प्रतापगढ़ में अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज कराई।
  • अन्य दल: रिवोल्यूशनरी रिपब्लिकन पार्टी, राम राज्य परिषद, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M)।

🗳️ 2. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव: 1952 से 1969 का ऐतिहासिक सफर

प्रतापगढ़ में विधानसभा सीटों का स्वरूप समय-समय पर परिसीमन (Delimitation) के कारण बदलता रहा। शुरुआती चुनावों में एक ही सीट से दो-दो विधायक (एक सामान्य और एक अनुसूचित जाति आरक्षित) चुने जाने की दोहरे सदस्य निर्वाचन क्षेत्र (Double Member Constituency) व्यवस्था लागू थी, जिसे 1962 में पूरी तरह खत्म कर दिया गया।

क. 1952 का पहला आम चुनाव: कांग्रेस का ऐतिहासिक क्लीन स्वीप

1952 में जब स्वतंत्र भारत का पहला आम चुनाव हुआ, तो प्रतापगढ़ को 6 विधानसभा क्षेत्रों में बांटा गया था। इनमें से दो क्षेत्र दोहरे सदस्य वाले थे, जिसके कारण कुल 8 सीटें बनीं:

  • प्रतापगढ़ (पूर्व) - एकल सदस्य सीट।
  • प्रतापगढ़ (उत्तर-पश्चिम) सह पट्टी (उत्तर-पश्चिम) - दोहरा सदस्य सीट (1 सामान्य + 1 अनुसूचित जाति आरक्षित)।
  • पट्टी (दक्षिण) - एकल सदस्य सीट।
  • पट्टी (पूर्व) - एकल सदस्य सीट।
  • कुंडा (दक्षिण) - दोहरा सदस्य सीट (1 सामान्य + 1 अनुसूचित जाति आरक्षित)।
  • प्रतापगढ़ (पश्चिम) सह कुंडा (उत्तर) - एकल सदस्य सीट।

इन 8 सीटों के लिए कुल 40 उम्मीदवारों ने पर्चा भरा (कांग्रेस 8, सोशलिस्ट 7, केएमपीपी 4, जनसंघ 2, रिवोल्यूशनरी रिपब्लिक 3 और 16 निर्दलीय)। चुनाव का नतीजा एकतरफा रहा—कांग्रेस ने सभी 8 की 8 सीटें जीत लीं। इस चुनाव में कुल 5,67,600 मतदाता थे और 8,32,871 वैध मत पड़े (दोहरे सदस्य क्षेत्र में मतदाता दो वोट डालते थे)।

ख. 1957 का दूसरा आम चुनाव: निर्दलीयों का खाता खुला

1957 के चुनाव में क्षेत्रों के नाम बदले गए: पट्टी, कोहंडौर, प्रतापगढ़ (दक्षिण), प्रतापगढ़ (उत्तर), अठेहा और कुंडा। इनमें से पट्टी और कुंडा दोहरे सदस्य क्षेत्र रहे (1-1 सीट अनुसूचित जाति हेतु आरक्षित)। कुल 8 सीटों में से कांग्रेस ने 6 सीटें जीतीं, जबकि 2 सीटें निर्दलीय उम्मीदवारों के खाते में गईं। इस चुनाव में मतदाताओं की संख्या बढ़कर 6,24,201 हो गई थी।

ग. 1962 का तीसरा आम चुनाव: दोहरे सदस्य सीटों का अंत और जनसंघ का उभार

1962 के चुनाव में भारत निर्वाचन आयोग ने दोहरे सदस्य वाले क्षेत्रों को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। प्रतापगढ़ में सभी 8 सीटों को एकल सदस्य बना दिया गया: कुंडा, ढींगवास (आरक्षित), प्रतापगढ़ दक्षिण, बीरापुर, पट्टी (आरक्षित), कोहंडौर, प्रतापगढ़ और अठेहा

यह चुनाव जिले के इतिहास का सबसे कड़ा मुकाबला साबित हुआ। 41 प्रत्याशियों के बीच हुए इस घमासान में कांग्रेस का दबदबा कमजोर पड़ा:

  • कांग्रेस: 4 सीटें (वोट: 1,15,516)
  • भारतीय जनसंघ: 3 सीटें (वोट: 94,563)
  • सोशलिस्ट पार्टी: 1 सीट (वोट: 65,142)

घ. 1967 का चौथा चुनाव: 7 सीटें और रामपुर खास का उदय

1967 में परिसीमन के बाद जिले में कुल सीटें 8 से घटकर 7 सीटें हो गईं। नए निर्वाचन क्षेत्र बने: कुंडा, बिहार (आरक्षित), रामपुर खास, लक्ष्मणपुर, प्रतापगढ़, बीरापुर और पट्टी (आरक्षित)

इस चुनाव में 39 उम्मीदवारों ने भाग्य आजमाया। कांग्रेस ने जोरदार वापसी करते हुए 7 में से 6 सीटें जीत लीं, जबकि 1 सीट संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के खाते में गई। लेकिन राजनीतिक अस्थिरता के कारण यह विधानसभा अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। 25 फरवरी 1968 को विधानसभा भंग कर दी गई और उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया।

1969 का मध्यावधि चुनाव: प्रतापगढ़ में सोशलिस्ट क्रांति

राष्ट्रपति शासन हटने के बाद 26 फरवरी 1969 को हुए मध्यावधि चुनाव ने पूरे उत्तर प्रदेश को चौंका दिया। प्रतापगढ़ में सत्ता विरोधी लहर और किसान आंदोलन चरम पर था। कांग्रेस, जो 1967 में 6 सीटें जीती थी, मात्र 1 सीट पर सिमट गई! संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (SSP) ने 7 में से 5 सीटों पर प्रचंड जीत हासिल की, और नवगठित भारतीय क्रांति दल (BKD) ने 1 सीट जीती। यह चुनाव प्रतापगढ़ के चुनावी इतिहास का सबसे बड़ा उलटफेर माना जाता है।

📊 सारणी 1: प्रतापगढ़ विधानसभा चुनावों का ऐतिहासिक तुलनात्मक सफर (1952 - 1969)

चुनाव वर्ष कुल क्षेत्र / सीटें कुल मतदाता वैध मत (Polled) दलवार सीटें (विजेता) प्रमुख राजनीतिक प्रभाव
1952 (पहला) 6 क्षेत्र / 8 सीटें 5,67,600 8,32,871 कांग्रेस: 8 आजादी के बाद कांग्रेस की एकतरफा लहर; सभी 8 सीटों पर एकमुश्त जीत।
1957 (दूसरा) 6 क्षेत्र / 8 सीटें 6,24,201 9,17,935 कांग्रेस: 6 निर्दलीय: 2 निर्दलीय उम्मीदवारों का खाता खुला; प्रजा सोशलिस्ट व जनसंघ ने उपस्थिति दर्ज कराई।
1962 (तीसरा) 8 क्षेत्र / 8 सीटें 6,38,869 2,86,814 कांग्रेस: 4 जनसंघ: 3 सोशलिस्ट: 1 दोहरे सदस्य सीटों का अंत; जनसंघ ने 3 सीटें जीतकर कांग्रेस के वर्चस्व को तोड़ा।
1967 (चौथा) 7 क्षेत्र / 7 सीटें 6,13,888 2,70,952 कांग्रेस: 6 संयुक्त सोशलिस्ट: 1 रामपुर खास और लक्ष्मणपुर का उदय; 1968 में सरकार भंग होकर राष्ट्रपति शासन लगा।
1969 (मध्यावधि) 7 क्षेत्र / 7 सीटें 7,91,675 3,04,150 संयुक्त सोशलिस्ट: 5 कांग्रेस: 1 भा. क्रांति दल: 1 जिले का सबसे बड़ा चुनावी भूचाल; सोशलिस्ट पार्टी की आंधी में कांग्रेस 1 सीट पर सिमटी।

📊 सारणी 2: विधानसभा चुनावों में राजनीतिक दलों को मिले वैध मत (Votes Polled: 1952-1969)

राजनीतिक दल 1952 मत 1957 मत 1962 मत 1967 मत 1969 मध्यावधि
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस 1,65,195 1,68,946 1,15,516 1,36,781 99,375
संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (SSP) 92,833 1,10,413
सोशलिस्ट पार्टी 36,298 65,142
भारतीय जनसंघ 5,747 10,670 94,563 34,254 36,057
भारतीय क्रांति दल (BKD) 45,139
प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP) 19,100 2,348 1,652 1,365
राम राज्य परिषद 14,564 18,859 7,176 763
कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) 2,096 3,018
स्वतंत्र पार्टी / अन्य 5,250 2,116 1,960
निर्दलीय (Independents) 40,583 1,39,459 15,781 26,914 21,964

🏛️ 3. उत्तर प्रदेश विधान परिषद (Legislative Council) में प्रतिनिधित्व

गजेटियर के अनुसार, उच्च सदन यानी उत्तर प्रदेश विधान परिषद के द्विवार्षिक चुनावों के लिए प्रतापगढ़ जिला तीन अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों का हिस्सा था:

  • गोरखपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र (Gorakhpur Graduates Constituency): जिले के सभी पंजीकृत स्नातक मतदाता इस क्षेत्र के तहत अपना एमएलसी चुनते थे।
  • लखनऊ शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र (Lucknow Teachers Constituency): माध्यमिक व उच्च शिक्षण संस्थानों के शिक्षक प्रतिनिधि इस क्षेत्र के माध्यम से उच्च सदन पहुंचते थे।
  • प्रतापगढ़-सह-सुल्तानपुर-सह-बाराबंकी स्थानीय प्राधिकारी क्षेत्र: जिला परिषद, नगर पालिकाओं और टाउन एरिया के चुने हुए जनप्रतिनिधि इस संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र के तहत विधान परिषद सदस्य का चुनाव करते थे।

🇮🇳 4. लोकसभा चुनाव: 1952 से 1971 तक संसदीय राजनीति का इतिहास

संसद के निचले सदन यानी लोकसभा में प्रतापगढ़ का प्रतिनिधित्व बहुत प्रभावशाली रहा है। 1952 के पहले चुनाव से लेकर 1971 के ऐतिहासिक चुनाव तक जिले की संसदीय राजनीति में कई रोचक मोड़ आए:

क. 1952: दो संसदीय क्षेत्र और तीन सांसद

1952 में प्रतापगढ़ जिला दो लोकसभा क्षेत्रों में विभाजित था:

  1. प्रतापगढ़ जिला (पूर्व): यह एकल सदस्य संसदीय क्षेत्र था।
  2. प्रतापगढ़ जिला (पश्चिम) सह रायबरेली जिला (पूर्व): यह दोहरा सदस्य संसदीय क्षेत्र था, जिससे दो सांसद (एक सामान्य और एक अनुसूचित जाति) चुने जाते थे।

इस प्रकार 1952 में प्रतापगढ़ से जुड़े क्षेत्रों से कुल 3 सांसद चुने गए और तीनों सीटों पर कांग्रेस ने भारी मतों से विजय प्राप्त की। कुल मतदाताओं की संख्या 10,59,000 थी और कांग्रेस उम्मीदवारों को कुल 3,75,722 वोट मिले।

ख. 1957: स्वतंत्र एकल संसदीय क्षेत्र का गठन

1957 के दूसरे आम चुनाव में परिसीमन के बाद जिले को एक स्वतंत्र एकल सदस्य सीट बना दिया गया, जिसे 'प्रतापगढ़ संसदीय क्षेत्र' नाम दिया गया। इस चुनाव में केवल दो प्रत्याशी मैदान में थे—कांग्रेस और एक निर्दलीय। कांग्रेस ने 78,399 वोट पाकर यह सीट जीत ली, जबकि निर्दलीय उम्मीदवार को 65,773 वोट मिले।

ग. 1962: जनसंघ की पहली ऐतिहासिक विजय

1962 का चुनाव प्रतापगढ़ की संसदीय राजनीति का युगांतरकारी मोड़ था। भारतीय जनसंघ के प्रत्याशी ने कांग्रेस के उम्मीदवार को कड़े मुकाबले में हरा दिया:

  • भारतीय जनसंघ: 96,483 मत (विजेता)
  • कांग्रेस: 72,779 मत (उपविजेता)
  • सोशलिस्ट पार्टी: 31,870 मत

यह पहली बार था जब प्रतापगढ़ लोकसभा सीट पर कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा था।

घ. 1967 और 1971: कांग्रेस की जोरदार वापसी

1967 के चौथे आम चुनाव में कांग्रेस ने अपनी सीट वापस छीन ली। कांग्रेस प्रत्याशी को 1,02,825 वोट मिले, जबकि संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी 81,133 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रही। जनसंघ को मात्र 10,053 वोट मिले।

1971 के आम चुनाव में कांग्रेस के विभाजन के बाद कांग्रेस (जे / आर) ने प्रतापगढ़ में रिकॉर्ड जीत दर्ज की। कांग्रेस प्रत्याशी को 1,56,902 वोट मिले, जबकि संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी को 76,716 वोट प्राप्त हुए। इस समय तक जिले में कुल मतदाताओं की संख्या 5,42,156 पहुंच चुकी थी।

📊 सारणी 3: प्रतापगढ़ लोकसभा चुनावों का प्रामाणिक लेखा-जोखा (1952 - 1971)

चुनाव वर्ष संसदीय क्षेत्र का स्वरूप कुल मतदाता विजेता पार्टी विजेता को मिले मत मुख्य प्रतिद्वंद्वी दल व मत
1952 2 क्षेत्र (1 एकल + 1 दोहरा सदस्य) = 3 सीटें 10,59,000 कांग्रेस (तीनों सीटें) 3,75,722 सोशलिस्ट (77,883), जनसंघ (65,956)
1957 1 एकल सदस्य क्षेत्र (प्रतापगढ़) 3,84,272 कांग्रेस 78,399 निर्दलीय (65,773)
1962 1 एकल सदस्य क्षेत्र (प्रतापगढ़) 3,94,871 भारतीय जनसंघ 96,483 कांग्रेस (72,779), सोशलिस्ट (31,870)
1967 1 एकल सदस्य क्षेत्र (प्रतापगढ़) 4,91,406 कांग्रेस 1,02,825 संयुक्त सोशलिस्ट (81,133), जनसंघ (10,053)
1971 1 एकल सदस्य क्षेत्र (प्रतापगढ़) 5,42,156 कांग्रेस (जे) 1,56,902 संयुक्त सोशलिस्ट (76,716), निर्दलीय (7,435)

📰 5. पत्रकारिता का स्वर्णिम इतिहास: 1883 में राजा रामपाल सिंह और मालवीय जी का 'हिंदुस्तान'

गजेटियर बड़े गर्व के साथ दर्ज करता है कि "पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतापगढ़ एक अग्रणी जिला (Pioneer District) रहा है।" जब देश के अधिकांश हिस्सों में आधुनिक समाचार पत्रों की कल्पना भी नहीं थी, तब प्रतापगढ़ के गंगा तीरे बसे कालाकांकर राजभवन ने भारतीय प्रेस जगत में क्रांति ला दी थी।

🖋️ 1883: हिंदी का पहला दैनिक 'हिंदुस्तान' और कालाकांकर की देन

1883 में कालाकांकर के देशभक्त और विद्वान राजा रामपाल सिंह ने प्रतापगढ़ से हिंदी दैनिक 'हिंदुस्तान' (Hindustan) का ऐतिहासिक प्रकाशन शुरू किया। राजा साहब ने इसके संपादन की बागडोर देश के महान सपूत पंडित मदन मोहन मालवीय को सौंपी। मालवीय जी ने कालाकांकर में रहकर कई वर्षों तक इस पत्र का संपादन किया और ब्रिटिश हुकूमत के सामने देश की आवाज को निर्भीकता से उठाया।

इसके साथ ही राजा रामपाल सिंह ने अंग्रेजी भाषा में भी सप्ताह में तीन दिन निकलने वाला 'हिंदुस्तान' अखबार प्रकाशित किया। इस अखबार से हिंदी साहित्य और पत्रकारिता के शिखर पुरुष—पंडित प्रतापनारायण मिश्र, बालमुकुंद गुप्त और गोपाल राम जैसे मूर्धन्य पत्रकार जुड़े रहे। यह ऐतिहासिक पत्र विपरीत परिस्थितियों के कारण 1908 में बंद हुआ। बाद में कालाकांकर के ही राजा सुरेश सिंह ने 'सम्राट' नामक साहित्यिक एवं वैचारिक पत्रिका का प्रकाशन कर इस परंपरा को आगे बढ़ाया।

ख. आजादी के दौर और उसके बाद के स्थानीय समाचार पत्र

गजेटियर के संकलन (1970 के दशक) के समय जिले से कई साप्ताहिक पत्र नियमित रूप से प्रकाशित हो रहे थे:

  • साप्ताहिक 'अवध' (Avadh): यह प्रतापगढ़ से प्रकाशित होने वाला सबसे पुराना हिंदी साप्ताहिक था, जो 1932 से लगातार प्रकाशित हो रहा था। इसमें मुख्य रूप से जिले की स्थानीय खबरें और समसामयिक घटनाएं छपती थीं और इसकी प्रसार संख्या लगभग 1,000 प्रतियां थी।
  • साप्ताहिक 'विकास' (1943): आजादी की लड़ाई के दौरान 1943 में यह पत्र शुरू हुआ, लेकिन कुछ समय बाद बंद हो गया।
  • साप्ताहिक 'लोकमित्र' (1956): 1956 में शुरू हुआ यह साप्ताहिक अखबार उस दौर का सबसे लोकप्रिय पत्र बन गया। इसकी प्रसार संख्या 1,200 प्रतियों से अधिक थी और यह जनसमस्याओं को उठाने में सबसे आगे रहता था।
  • साप्ताहिक 'अतुल' और 'प्रतापगढ़ पत्रिका' (1961): 1960 के दशक में शुरू हुए ये दोनों साप्ताहिक अखबार 1,000-1,000 प्रतियों की प्रसार संख्या के साथ जिले के सुदूर गांवों तक समाचार पहुंचाते थे।
  • ग्रामीण पत्रकारिता के अल्पकालिक प्रयास: 1960 में ग्राम रेंडी (डाकघर जेठवारा) से 'चैलीगाड़ी' नामक अनूठा पत्र शुरू हुआ, जो 1970 तक चला। 1964 में शुरू हुआ 'अजय' 1970 में और 'इलेक्शन' 1972 में बंद हो गया।

📊 सारणी 4: प्रतापगढ़ के स्थानीय समाचार पत्र एवं पत्रिकाएं (1883 से 1972)

समाचार पत्र / पत्रिका प्रकाशन वर्ष प्रकाशन स्थल प्रकार व भाषा संपादक / संस्थापक / प्रसार स्थिति (1970 के दशक तक)
हिंदुस्तान (दैनिक) 1883 कालाकांकर / प्रतापगढ़ दैनिक (हिंदी) राजा रामपाल सिंह / पं. मदन मोहन मालवीय 1908 में बंद (ऐतिहासिक धरोहर)
हिंदुस्तान (अंग्रेजी) 1883 कालाकांकर / प्रतापगढ़ त्रि-साप्ताहिक (अंग्रेजी) राजा रामपाल सिंह 1908 में बंद
सम्राट उत्तरार्ध कालाकांकर पत्रिका राजा सुरेश सिंह साहित्यिक वैचारिक पत्रिका
अवध (Avadh) 1932 बेल्हा प्रतापगढ़ साप्ताहिक (हिंदी) स्थानीय संपादकीय (प्रसार: ~1,000) सबसे पुराना अनवरत साप्ताहिक
विकास 1943 प्रतापगढ़ साप्ताहिक (हिंदी) स्थानीय मंडल अल्पकालिक रहा
लोकमित्र 1956 प्रतापगढ़ साप्ताहिक (हिंदी) प्रसार: 1,200 प्रतियां सर्वाधिक लोकप्रिय साप्ताहिक
अतुल 1961 प्रतापगढ़ साप्ताहिक (हिंदी) प्रसार: ~1,000 प्रतियां नियमित समाचार व विचार
प्रतापगढ़ पत्रिका 1961 प्रतापगढ़ साप्ताहिक (हिंदी) प्रसार: ~1,000 प्रतियां जिले का प्रमुख स्थानीय मुखपत्र
चैलीगाड़ी 1960 ग्राम रेंडी (जेठवारा) साप्ताहिक (हिंदी) ग्रामीण आंचलिक पत्र 1970 में बंद
अजय 1964 प्रतापगढ़ साप्ताहिक (हिंदी) सामयिक समाचार 1970 में बंद
इलेक्शन 1964 प्रतापगढ़ साप्ताहिक (हिंदी) राजनीतिक विश्लेषण 1972 में बंद

📚 6. जिले की पठन संस्कृति: बाहर से आने वाले राष्ट्रीय समाचार पत्र व पत्रिकाएं

गजेटियर इस बात का भी सजीव ब्यौरा देता है कि 1960-70 के दशक में प्रतापगढ़ के शिक्षित नागरिक, शिक्षक, छात्र, वकील और अधिकारी किन राष्ट्रीय और प्रादेशिक अखबारों व पत्रिकाओं को चाव से पढ़ते थे। इसने जिले की बौद्धिक सोच को राष्ट्रीय फलक से जोड़े रखा:

  • हिंदी दैनिक समाचार पत्र: वाराणसी और लखनऊ से छपने वाले 'आज' (Aj), 'भारत', 'नवजीवन' और 'स्वतंत्र भारत' जिले के कस्बों और कचहरी में सुबह-सुबह रेल और बसों से पहुंचते थे।
  • हिंदी की लोकप्रिय पत्रिकाएं: 'धर्मयुग', 'साप्ताहिक हिंदुस्तान', 'सरिता', 'निहारिका', 'मुक्ता' और 'कादंबिनी' घर-घर पढ़ी जाती थीं, जबकि बच्चों में 'चंदामामा' सबसे अधिक लोकप्रिय थी।
  • अंग्रेजी दैनिक व पत्रिकाएं: शिक्षित वर्ग में द नेशनल हेराल्ड (National Herald), द पायनियर (The Pioneer), नॉर्दर्न इंडिया पत्रिका और हिंदुस्तान टाइम्स पढ़े जाते थे। पत्रिकाओं में ब्लिट्ज़ (Blitz), इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया, कारवां (Caravan), रीडर्स डाइजेस्ट (Reader's Digest), मिरर और इंप्रिंट की मांग थी।
  • उर्दू दैनिक व साहित्य: जिले की गंगा-जमुनी तहजीब में उर्दू अखबारों का बड़ा सम्मान था। दिल्ली और लखनऊ से आने वाले 'तेज', 'कौमी आवाज', और साहित्यिक पत्रिकाएं 'शमा' तथा 'बीसवीं सदी' शायरों और बुजुर्गों की चौपालों की जान हुआ करती थीं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) - प्रतापगढ़ का सार्वजनिक एवं राजनीतिक जीवन

प्रतापगढ़ से पहला हिंदी दैनिक समाचार पत्र कब और किसने निकाला था?
1883 में कालाकांकर के देशभक्त राजा रामपाल सिंह ने प्रतापगढ़ से हिंदी दैनिक 'हिंदुस्तान' शुरू किया था। इसके पहले संपादक महामना पंडित मदन मोहन मालवीय थे और इसके साथ प्रतापनारायण मिश्र और बालमुकुंद गुप्त जैसे मूर्धन्य पत्रकार जुड़े थे।
1952 के पहले आम चुनाव में प्रतापगढ़ विधानसभा का क्या परिणाम रहा था?
1952 के पहले आम चुनाव में प्रतापगढ़ में 6 निर्वाचन क्षेत्र और कुल 8 सीटें थीं (कुंडा और पट्टी क्षेत्र दोहरे सदस्य थे)। कांग्रेस ने एकतरफा प्रदर्शन करते हुए सभी 8 सीटों पर शानदार जीत हासिल की थी।
प्रतापगढ़ लोकसभा सीट पर पहली बार कांग्रेस कब हारी थी?
1962 के तीसरे लोकसभा चुनाव में भारतीय जनसंघ के उम्मीदवार ने 96,483 वोट पाकर कांग्रेस प्रत्याशी (72,779 वोट) को पराजित किया था। यह पहली बार था जब जिले में गैर-कांग्रेसी सांसद चुना गया।
1969 के विधानसभा मध्यावधि चुनाव में प्रतापगढ़ में क्या ऐतिहासिक परिवर्तन हुआ?
1969 के मध्यावधि चुनाव में भारी राजनीतिक उलटफेर हुआ। कांग्रेस पार्टी 6 सीटों से लुढ़ककर मात्र 1 सीट पर सिमट गई, जबकि संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (SSP) ने 7 में से 5 सीटों पर प्रचंड जीत हासिल की और 1 सीट भारतीय क्रांति दल (BKD) को मिली।
आजादी के बाद प्रतापगढ़ से प्रकाशित होने वाले सबसे लोकप्रिय स्थानीय अखबार कौन से थे?
1932 से लगातार प्रकाशित होने वाला 'अवध' जिले का सबसे पुराना हिंदी साप्ताहिक था। इसके अलावा 1956 का 'लोकमित्र' (1,200 प्रसार संख्या के साथ सर्वाधिक लोकप्रिय), तथा 1961 में शुरू हुए 'अतुल' और 'प्रतापगढ़ पत्रिका' प्रमुख स्थानीय पत्र थे।
🌾 आखिर में एक बात...

प्रतापगढ़ का सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि यहाँ के लोग कभी भी सत्ता के अंधानुकरण में नहीं रहे। 1883 में जब अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बोलने का साहस कम ही लोग जुटा पाते थे, तब कालाकांकर से पंडित मदन मोहन मालवीय के संपादन में 'हिंदुस्तान' ने राष्ट्रवाद की अलख जगाई थी। आजादी के बाद यदि 1952 में जनता ने कांग्रेस को सिर-आंखों पर बिठाया, तो 1962 में जनसंघ और 1969 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी को चुनकर यह भी बता दिया कि जनता की आवाज और किसानों के सरोकारों की अनदेखी कोई भी दल नहीं कर सकता।

प्रामाणिक संदर्भ (Official Reference): यह आलेख उत्तर प्रदेश शासन द्वारा 1980 में प्रकाशित आधिकारिक 'उत्तर प्रदेश जिला गजेटियर: प्रतापगढ़' (Uttar Pradesh District Gazetteers: Pratapgarh) के अध्याय 18 (Chapter XVIII: Public Life and Voluntary Social Service Organisations, पृष्ठ 304 से 308) में दर्ज ऐतिहासिक, निर्वाचन और प्रेस आंकड़ों पर आधारित है।
संबद्ध खोज शब्द व संदर्भ (Google SEO Search Keywords)
Pratapgarh Political History प्रतापगढ़ चुनावी इतिहास Raja Rampal Singh Kalakankar Hindustan Hindi Daily 1883 Madan Mohan Malviya Pratapgarh Journalism 1952 First General Election Pratapgarh 1969 Vidhan Sabha Mid Term Poll Pratapgarh Samyukta Socialist Party Pratapgarh Jan Sangh 1962 Lok Sabha Pratapgarh Avadh Weekly Newspaper Pratapgarh Lokmitra Weekly 1956 Pratapgarh Pratapgarh Patrika Atul Newspaper Rampur Khas Bihar Kunda Patti Vidhan Sabha Pratapgarh District Gazetteer Chapter 18 कालाकांकर राजा सुरेश सिंह सम्राट पत्रिका प्रतापनारायण मिश्र बालमुकुंद गुप्त पत्रकारिता UP Vidhan Parishad Pratapgarh Representation Pratapgarh Electoral History 1952 to 1971 Double Member Assembly Constituencies Pratapgarh Bharatiya Kranti Dal Pratapgarh 1969 प्रतापगढ़ समाचार पत्र इतिहास Pratapgarh HUB History Features

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Accept !