प्रतापगढ़ का राजस्व और मालगुजारी इतिहास: अकबर काल से जमींदारी उन्मूलन तक
ज़मीन किसकी है? जो जोतता है उसकी, या जो लगान वसूलता है उसकी? यह सवाल सदियों से प्रतापगढ़ की मिट्टी में गूंजता रहा है। राजा टोडरमल की नाप-जोख से लेकर अवध के नवाबों की बेरहम इज़ारेदारी, ब्रिटिश हुकूमत के पाँच बड़े बंदोबस्त, ताल्लुकदारों की हनक, और फिर बाबा रामचंद्र के किसान आंदोलन से लेकर आज़ादी के बाद हुए ऐतिहासिक ज़मींदारी उन्मूलन तक—प्रतापगढ़ का राजस्व इतिहास संघर्ष और न्याय की एक महागाथा है।
सरकारी गजेटियर (अध्याय-11: Revenue Administration, पेज 196 से 219) के प्रामाणिक आंकड़ों के आधार पर आइए समझें कि बेल्हा में सदियों तक लगान कैसे तय हुआ, किसानों को ज़मीन का मालिकाना हक़ कैसे मिला, और आबकारी, स्टाम्प व बिक्री कर से सरकारी ख़ज़ाना कैसे भरता था।
🌾 1. प्राचीन काल से मुगल दौर तक: राजा टोडरमल की जरीब और अकबर की व्यवस्था
प्राचीन भारत में राजा को ज़मीन की उपज का छठा हिस्सा (षष्ठांश यानी 1/6) कर के रूप में दिया जाता था, जिसे प्रजा की सुरक्षा के बदले दिया जाने वाला अंश माना जाता था। दिल्ली सल्तनत में अलाउद्दीन खिलजी (1296 ई.) पहला शासक था जिसने पटवारियों के कागजात की जांच करवाई और कुल पैदावार का आधा हिस्सा (1/2) लगान तय किया।
लेकिन राजस्व व्यवस्था में सबसे बड़ा वैज्ञानिक और क्रांतिकारी बदलाव मुगल सम्राट अकबर और उनके काबिल वित्त मंत्री राजा टोडरमल ने किया। टोडरमल ने शेरशाह सूरी की पैमाइश प्रणाली को आगे बढ़ाते हुए पूरे इलाके की ज़मीन को तीन श्रेणियों में बांटा—उत्तम (Good), मध्यम (Middling), और निम्न (Inferior)। इसके बाद औसत पैदावार का एक-तिहाई (1/3) हिस्सा नकद मालगुजारी के रूप में तय किया गया। किसानों से सीधा संपर्क साधने के लिए सरकारी 'अमिल' (कलेक्टर) नियुक्त किए गए।
अकबर के काल में आज का प्रतापगढ़ इलाका मुख्यतः इलाहाबाद सूबे की मानिकपुर सरकार के अधीन था। आईन-ए-अकबरी के अनुसार:
- मानिकपुर सरकार का कुल रकबा: 6,66,222 बीघा 5 बिस्वा ज़मीन।
- कुल निर्धारित मालगुजारी: 3,39,16,527 दाम (और 84,46,173 दाम सुयूरघल यानी धर्मार्थ अनुदान)।
- सैनिक सहायता: इस इलाके से 2,040 घुड़सवार और 2,900 पैदल सैनिक शाही फौज के लिए रखे जाते थे।
- प्रतापगढ़ महाल: इसमें 76,517 बीघा खेती की जमीन थी, जिस पर 39,13,017 दाम मालगुजारी तय थी। यहाँ के लड़ाकू बचगोती राजपूत शाही सेना को 400 घुड़सवार और 5,000 पैदल सैनिक उपलब्ध कराते थे।
- मानिकपुर महाल: 1,29,830 बीघा रकबा और 67,37,729 दाम का भारी लगान।
इसके अलावा कुंडा और सलोन में फैले 262 'गुज़ारा गांव' और 256 'पैगाह गांव' थे, जिनके कानूनगो की अदालतें करहेती, बिहार और रामपुर के जोनइन में लगती थीं। उनके वंशज आगे चलकर 'पैगाहवाले' कहलाए।
⚔️ 2. अवध के नवाबों का दौर: इज़ारेदारी, चकलादार और ताल्लुकदारों का उभार
वर्ष 1759 के बाद जब यह क्षेत्र पूरी तरह अवध के नवाबों के अधिकार में आया, तो व्यवस्था धीरे-धीरे बिगड़ने लगी। नवाबों के कमजोर पड़ते ही उनके मातहत चकलादार, नाजिम और स्थानीय ताल्लुकदार बेलगाम हो गए। नवाबों को केवल अपने खजाने में तय रकम आने से मतलब था, जिसके लिए उन्होंने इज़ारेदारी (ठेकेदारी या मुस्तजिरी प्रथा) शुरू कर दी।
इज़ारेदार ठेकेदार ऊंची बोली लगाकर पूरे इलाके की लगान वसूली का ठेका ले लेते थे और फिर किसानों से अपनी मर्जी से मनमाना लगान और अवैध लाग-बाग (Cesses) वसूलते थे। चकलादारों ने अपनी निजी फौजें रख लीं और मजबूत गढ़ी (मिट्टी के किले) बना लिए। जो किसान या छोटा जमींदार लगान नहीं चुका पाता, उसकी ज़मीन छीन ली जाती थी।
चकलादारों और शाही सैनिकों के जुल्म से बचने के लिए प्रतापगढ़ के छोटे-छोटे जमींदारों और काश्तकारों ने इलाके के बड़े और ताकतवर ताल्लुकदारों (जैसे राजा प्रतापगढ़, राजा कालाकांकर, भदरी, रायगोपालपुर आदि) की शरण ले ली। उन्होंने अपनी जमीनें ताल्लुकदारों के हवाले कर दीं ताकि बदले में उन्हें जान-माल की हिफाजत मिल सके। इस तरह जिले में शक्तिशाली 'ताल्लुकदारी व्यवस्था' ने जन्म लिया, जिसने आगे चलकर अंग्रेजों के दौर में किसानों की जिंदगी को पूरी तरह बंधक बना लिया।
📑 3. ब्रिटिश काल के 5 बड़े बंदोबस्त (Settlements 1856-1926)
फरवरी 1856 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने अवध का विलय कर लिया, तो प्रतापगढ़ में अंग्रेजों की नई राजस्व व्यवस्था की शुरुआत हुई। जमीन की नाप-जोख कराकर लगान तय करने की इस पूरी प्रक्रिया को 'बंदोबस्त' (Settlement) कहा जाता था। जिले में कुल 5 प्रमुख बंदोबस्त हुए:
1. प्रथम संक्षिप्त बंदोबस्त (First Summary Settlement - 1856)
अंग्रेजों का मानना था कि ताल्लुकदार केवल बिचौलिए हैं और असली मालिक गांव के किसान हैं। इसलिए उन्होंने ताल्लुकदारों को दरकिनार कर सीधे गांव के पुराने जमींदारों और काश्तकारों से ₹9,82,044 का लगान तय किया। लेकिन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में यह व्यवस्था बिखर गई और सारे सरकारी रिकॉर्ड जला दिए गए।
2. द्वितीय संक्षिप्त बंदोबस्त (Second Summary Settlement - 1858-59)
1857 की गदर शांत होने के बाद वायसराय लॉर्ड कैनिंग ने अपनी नीति 180 डिग्री बदल दी। अंग्रेजों ने विद्रोह दबाने में मदद करने वाले अवध के ताल्लुकदारों को खुश करने के लिए उनके पुराने इलाके और जागीरें वापस 'सनद' देकर लौटा दीं। प्रतापगढ़ का राजस्व ₹9,97,358 तय हुआ, जो बाद में संशोधित होकर ₹10,48,771 हो गया।
3. प्रथम नियमित बंदोबस्त (First Regular Settlement - 1860-1871)
यह बंदोबस्त कैप्टन डब्ल्यू. ई. फोर्ब्स (Capt. W. E. Forbes) द्वारा बड़ी वैज्ञानिक बारीकी से 1871 में पूरा किया गया। इसमें जिले के एक-एक खेत की पैमाइश हुई और 30 साल के लिए ₹9,97,789 का वार्षिक लगान तय किया गया। इस बंदोबस्त में खास बात यह रही कि विशेष बंदोबस्त अदालतों ने कुल 23,268 मुकदमों का निपटारा किया और ताल्लुकदारों के अधीन 18.6% रकबे पर पुराने जमींदारों को 'अंडर-प्रॉपराइटरी राइट्स' (Sub-Settlement) का कानूनी हक दिलाया।
4. द्वितीय नियमित बंदोबस्त (Second Regular Settlement - 1892-1896)
जे. सी. मैकडोनाल्ड और जे. सैंडर्स द्वारा किए गए इस बंदोबस्त में खेती के विस्तार और सिंचाई सुविधाओं को आधार बनाकर राजस्व मांग को सीधे ₹13,31,048 कर दिया गया। यानी मालगुजारी में एक झटके में 33.4% की भारी वृद्धि कर दी गई, जिसका सीधा बोझ बेल्हा के गरीब किसानों की कमर पर पड़ा।
5. तृतीय नियमित बंदोबस्त (Third Regular Settlement - 1922-1926)
यह बंदोबस्त बंदोबस्त अधिकारी आर. एफ. मूडी (R. F. Mudie) की देखरेख में हुआ। जिले की कुल शुद्ध परिसंपत्ति ₹38,37,247 आंकी गई और सरकारी मालगुजारी ₹16,33,365 तय की गई। मूडी ने इसे 40 वर्षों के लिए लागू करने की सिफारिश की। यह बंदोबस्त 3,053 महालों में लागू हुआ और इसके संचालन पर उस समय सरकार के ₹3,83,091 खर्च हुए थे।
| बंदोबस्त का नाम | अवधि / वर्ष | बंदोबस्त अधिकारी / मुख्य नीति | निर्धारित सरकारी मालगुजारी | प्रमुख प्रभाव व परिणाम |
|---|---|---|---|---|
| प्रथम संक्षिप्त बंदोबस्त | 1856 | विलय पश्चात सीधे काश्तकारों से करार | ₹9,82,044 | ताल्लुकदारों के अधिकार छीने गए; 1857 के संग्राम में रिकॉर्ड नष्ट। |
| द्वितीय संक्षिप्त बंदोबस्त | 1858-59 | कैनिंग की घोषणा, ताल्लुकदारों को सनद | ₹10,48,771 | ताल्लुकदारों को ज़मीनों का सर्वेसर्वा मालिक स्वीकार किया गया। |
| प्रथम नियमित बंदोबस्त | 1860-1871 | कैप्टन डब्ल्यू. ई. फोर्ब्स (30 साल अवधि) | ₹9,97,789 | वैज्ञानिक पैमाइश; 18.6% इलाके में अंडर-प्रॉपराइटरी अधिकार मिले। |
| द्वितीय नियमित बंदोबस्त | 1892-1896 | मैकडोनाल्ड व जे. सैंडर्स | ₹13,31,048 | मालगुजारी में 33.4% की जबर्दस्त बढ़ोतरी; किसानों पर लगान का बोझ बढ़ा। |
| तृतीय नियमित बंदोबस्त | 1922-1926 | आर. एफ. मूडी (40 साल अवधि) | ₹16,33,365 | 3,053 महालों में पुनर्मूल्यांकन; ₹38.37 लाख की कुल संपत्ति पर कर। |
🔥 4. अवध रेंट एक्ट, बेदखली का आतंक और बाबा रामचंद्र का किसान आंदोलन
अंग्रेजों ने ताल्लुकदारों को खुश रखने के लिए काश्तकारों को पूरी तरह उनके रहमो-करम पर छोड़ दिया था। अवध रेंट एक्ट 1868 और 1886 बनाए तो गए थे, लेकिन इनमें किसानों को कोई पक्का हक नहीं मिला। वे केवल 'इच्छाधीन काश्तकार' (Tenants-at-will) थे, जिन्हें ताल्लुकदार जब चाहते बेदखल कर देते थे।
ताल्लुकदार और उनके कारिंदे किसानों से लगान के अलावा भारी 'नज़राना' (पगड़ी), 'मुरासा' (नवीनीकरण शुल्क), 'हाथियाना' (हाथी खरीदने का चंदा), और बेगार वसूलते थे। जो किसान नज़राना नहीं दे पाता, उसकी जोत छीनकर दूसरे को दे दी जाती थी।
इसी अन्याय और बेदखली के खिलाफ वर्ष 1920 में प्रतापगढ़ की धरती पर भारत का पहला संगठित किसान आंदोलन भड़का। बाबा रामचंद्र, झिंगुरी सिंह और सहदेव सिंह के नेतृत्व में 'अवध किसान सभा' का गठन हुआ। किसानों ने नज़राना देने और बेगार करने से साफ इनकार कर दिया।
पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वयं रूरे और बेल्हा के गांवों में आए और किसानों के दर्द को समझा। इस जबर्दस्त जन-दबाव के कारण अंग्रेजों को अवध रेंट (अमेंडमेंट) एक्ट 1921 पास करना पड़ा, जिससे किसानों को जीवनभर के लिए जोत की सुरक्षा (Life Tenancy) मिली। बाद में 1939 में पहली कांग्रेस सरकार ने यूपी टेनेंसी एक्ट 1939 लागू कर काश्तकारों के अधिकारों को पुश्तैनी (Hereditary) बना दिया।
| खेत का आकार (एकड़ में) | किसानों / काश्तकारों की संख्या (30 जून 1945) | कुल धारित रकबा (एकड़ में) | सामाजिक व आर्थिक विश्लेषण |
|---|---|---|---|
| 0.5 एकड़ से कम | 39,208 | 13,469 | बेहद सीमांत किसान; केवल गुजारे लायक भी जमीन नहीं। |
| 0.5 से 1 एकड़ | 37,791 | 30,039 | छोटे किसान जो मजदूरी पर भी निर्भर थे। |
| 1 से 2 एकड़ | 40,075 | 63,767 | जिले का सबसे बड़ा काश्तकार वर्ग। |
| 2 से 3 एकड़ | 25,491 | 64,269 | पारिवारिक खेती करने वाले मध्यम परिवार। |
| 3 से 5 एकड़ | 29,792 | 1,17,178 | अपेक्षाकृत आत्मनिर्भर किसान परिवार। |
| 5 एकड़ से अधिक | 25,684 | 1,77,000+ | बड़ी जोत वाले समृद्ध किसान व पूर्व छोटे जमींदार। |
📜 5. आजादी का सूर्योदय: ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम 1950 (1 जुलाई 1952)
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ, लेकिन खेतों की असली आजादी 1 जुलाई 1952 को आई, जब ऐतिहासिक उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 (U.P. Zamindari Abolition and Land Reforms Act, 1950) पूरे प्रदेश के साथ प्रतापगढ़ में भी लागू हुआ।
इस कानून ने सदियों पुरानी ताल्लुकदारी और बिचौलिए वाली ज़मींदारी प्रथा को जड़ से उखाड़ फेंका। प्रतापगढ़ गजेटियर के अनुसार इस कानून से:
- जिले के कुल 86,696 बिचौलिए (ताल्लुकदार व जमींदार) सीधे प्रभावित हुए और उनके विशेषाधिकार समाप्त कर दिए गए।
- ज़मींदारों को उनकी संपत्ति के बदले कुल ₹1,22,25,757 (1.22 करोड़ रुपये) का मुआवजा आंका गया।
- 1971 तक जिले के 59,482 पूर्व जमींदारों को ₹11,44,631 नकद और ₹91,38,000 बांड्स (सरकारी ऋणपत्रों) के रूप में मुआवजे का भुगतान किया गया।
- गांव की सभी बंजर जमीनें, चारागाह, तालाब, पोखर, रास्ते, हाट-बाजार और जंगल ग्राम समाज (अब ग्राम सभा) के अधीन कर दिए गए, जिनका प्रबंधन भूमि प्रबंधक समिति (Land Management Committee) को सौंपा गया।
🌱 6. नए भू-अधिकार: भूमिधर, सीरदार और असामी की व्यवस्था
ज़मींदारी उन्मूलन कानून ने अंग्रेजों के जमाने के दर्जनों पेचीदा और शोषणकारी काश्तकारी नामों (जैसे सिर, खुदकाश्त, दखीलकार, गैर-दखीलकार, शिकमी) को पूरी तरह समाप्त कर दिया और उनकी जगह केवल तीन सरल भू-अधिकार बनाए:
- 1. भूमिधर (Bhumidhar): यह जमीन का सर्वोच्च और पूर्ण मालिक होता है। उसे अपनी जमीन पर स्थाई, पुश्तैनी (Heritable) और बिक्री/हस्तांतरण (Transferable) का पूरा कानूनी अधिकार होता है। उसे कभी बेदखल नहीं किया जा सकता।
- 2. सीरदार (Sirdar): सीरदार को अपनी जमीन पर पुश्तैनी अधिकार तो होता है, लेकिन वह अपनी जमीन किसी को बेच नहीं सकता। वह इसका उपयोग केवल खेती, बागवानी या पशुपालन के लिए कर सकता है। हालांकि, सरकार को अपने सालाना लगान का 20 गुना जमा करके कोई भी सीरदार भूमिधरी अधिकार हासिल कर सकता था।
- 3. असामी (Asami): यह एक तरह का अस्थाई पट्टेदार होता है, जिसे ग्राम सभा या किसी असहाय/फौजी भूमिधर द्वारा सीमित समय के लिए खेती करने की अनुमति दी जाती है। इसे जमीन बेचने का कोई हक नहीं होता।
| भू-अधिकार का प्रकार | कुल रकबा (हेक्टेयर में - 1971) | वार्षिक निर्धारित मालगुजारी (रुपये में) | कानूनी स्थिति व विशेषताएं |
|---|---|---|---|
| भूमिधर (Bhumidhars) | 1,10,400 हे. | ₹36,029 | पूर्ण मालिकाना हक; जमीन बेचने, वसीयत करने व दान देने का अधिकार। |
| सीरदार (Sirdars) | 1,65,500 हे. | ₹56,693 | पुश्तैनी काश्तकार; लगान का 20 गुना देकर भूमिधर बनने की सुविधा। |
| असामी (Asamis) | सीमित रकबा | न्यूनतम | अस्थाई पट्टेदार; ग्राम सभा या अक्षम भूमिधर की जमीन पर काश्त। |
| कुल सरकारी मांग (1972) | 2,75,900+ हे. | ₹27,25,263 | 3 नायब तहसीलदारों और 29 अमीन द्वारा सीधे किसानों से वसूली। |
📐 7. चकबंदी (1970) और विनोबा भावे का भूदान आंदोलन
आजादी के बाद किसानों की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि उनकी जमीन कई जगह छोटे-छोटे टुकड़ों (Plots) में बिखरी हुई थी, जिससे न तो नलकूप लग पाते थे और न ही सही ढंग से जुताई हो पाती थी। इस समस्या को सुलझाने के लिए उत्तर प्रदेश जोत चकबंदी अधिनियम, 1953 बनाया गया।
प्रतापगढ़ में चकबंदी का वास्तविक काम 16 मई 1970 से युद्धस्तर पर शुरू हुआ। पहले चरण में 354 गांवों के 9,699 एकड़ रकबे में फैले 3,23,095 छोटे-छोटे टुकड़ों (प्लॉट्स) को नापकर एक जगह बड़े चकों में बदला गया। चकबंदी से गांवों में चक रोड (रास्ते), नालियां और सार्वजनिक उपयोग की जमीनें (जैसे स्कूल, खाद के गड्ढे, खेल का मैदान) छोड़ी गईं, जिससे खेती की उत्पादकता में क्रांतिकारी उछाल आया।
वर्ष 1951 में शुरू हुए संत विनोबा भावे के भूदान आंदोलन का असर बेल्हा में भी दिखा। उत्तर प्रदेश भूदान यज्ञ अधिनियम, 1952 के तहत जिले के कई उदार जमींदारों ने अपनी अतिरिक्त जमीनें स्वेच्छा से दान कीं। इस दान की गई जमीन को जिले की भूदान समिति द्वारा भूमिहीन दलितों और गरीब खेतिहर मजदूरों में बांटकर उन्हें समाज की मुख्यधारा में सम्मानपूर्वक बसाया गया।
💰 8. अन्य राजस्व के स्रोत: आबकारी, बिक्री कर, स्टाम्प और मनोरंजन कर
मालगुजारी (भू-राजस्व) के अलावा सरकार के खजाने में विभिन्न अन्य राज्य और केंद्रीय करों से भी भारी आय होती थी। गजेटियर में 1960 और 70 के दशक के कर संग्रह का विस्तृत ब्योरा दर्ज है:
1. आबकारी (Excise Revenue)
जिले का आबकारी प्रशासन इलाहाबाद के सहायक आबकारी आयुक्त के अधीन था। जिले में 3 आबकारी सर्किल थीं (सदर, कुंडा, पट्टी), जिनमें प्रत्येक पर एक आबकारी निरीक्षक तैनात था:
- देसी शराब: जिले में सबसे ज्यादा आय देसी शराब से होती थी, जो 1964-65 में ₹5.85 लाख से बढ़कर 1968-69 में ₹15.20 लाख तक पहुंच गई।
- अफीम (Opium): पहले लोग 'चंदू' और 'मदक' के रूप में अफीम पीते थे। यूपी अफीम धूम्रपान अधिनियम 1934 के तहत इसे अपराध घोषित किया गया और अप्रैल 1959 से अफीम की खुली बिक्री पूरी तरह बंद कर दी गई। 1972 में पूरे जिले में अफीम का एक भी परमिट धारक नहीं था।
- चरस, गांजा और भांग: चरस पर 1943-44 में और गांजे पर 1948 में रोक लगा दी गई। 1972 में पूरे जिले में केवल 4 गांजा दुकानें थीं (सभी सदर में, केवल मेडिकल परमिट पर)। वहीं भांग की 102 दुकानें थीं (43 सदर, 31 पट्टी, 28 कुंडा), जिनकी नीलामी से सरकार को सालाना ₹1.25 लाख से अधिक की कमाई होती थी। ताड़ी से भी सालाना ₹4,000 से ₹6,000 का टैक्स मिलता था।
2. बिक्री कर (Sales Tax)
यूपी बिक्री कर अधिनियम 1948 के तहत जिले के व्यापारियों से बिक्री कर वसूला जाता था। प्रतापगढ़ में बिक्री कर का संग्रह 1959-60 में ₹2.30 लाख से बढ़कर 1969-70 में ₹6.15 लाख हो गया था।
3. मनोरंजन कर (Entertainment Tax)
सिनेमा हॉल, सर्कस, नौटंकी, नाटक और मेलों से मनोरंजन कर लिया जाता था। डिप्टी कलेक्टर को मनोरंजन कर अधिकारी बनाया गया था। जिले में मनोरंजन कर से होने वाली आय 1966 में ₹65,002 से बढ़कर 1970 में ₹1,26,912 हो गई थी।
4. स्टाम्प और निबंधन (Stamps & Registration)
भारतीय स्टाम्प अधिनियम 1899 के तहत अदालती कोर्ट फीस (Judicial Stamps) और बैनामा/दस्तावेजों (Non-Judicial Stamps) से राजस्व मिलता था। 1972 में जिले में 26 अधिकृत स्टाम्प वेंडर थे। वहीं पंजीकरण अधिनियम 1908 के तहत जमीनों की रजिस्ट्री से 1971 में सरकार को ₹2.15 लाख की शुद्ध आय हुई थी और सालभर में 8,839 दस्तावेजों का पंजीकरण हुआ था।
5. मोटर वाहन कर और आयकर
मोटर गाड़ियों और मालकर से होने वाली वसूली 1962 में मात्र ₹104 से बढ़कर 1972 में ₹61,682 हो गई। वहीं आयकर (Income Tax) इलाहाबाद के आयकर अधिकारी द्वारा वसूला जाता था, जहाँ 1970-71 में जिले के 705 करदाताओं से ₹1.08 लाख का आयकर जमा कराया गया था।
| राजस्व का मुख्य स्रोत | 1964-65 (रुपये में) | 1967-68 (रुपये में) | 1970-71 / 1972 (रुपये में) | विशेष विवरण |
|---|---|---|---|---|
| देसी शराब (Country Spirit) | ₹5,85,581 | ₹12,95,221 | ₹15,00,000+ | आबकारी राजस्व का सबसे बड़ा घटक। |
| भांग (Bhang Duty) | ₹64,667 | ₹85,224 | ₹1,25,000+ | जिले में कुल 102 अधिकृत दुकानों की नीलामी। |
| बिक्री कर (Sales Tax) | ₹2,23,416 | ₹5,26,895 | ₹5,68,135 | व्यापारिक वस्तुओं व खुदरा कारोबार पर टैक्स। |
| मनोरंजन कर (Cinemas & Nautanki) | ₹60,000 (लगभग) | ₹82,513 | ₹1,26,912 | सिनेमाघरों और पारसी/स्थानीय नौटंकी से कर। |
| दस्तावेज निबंधन (Registration) | ₹1,40,000 (लगभग) | ₹1,76,178 (1968) | ₹2,15,035 (1971) | सालाना 7,000 से 9,000 बैनामे व रजिस्ट्री। |
| मोटर वाहन कर (Motor Vehicles) | ₹10,623 | ₹21,104 | ₹61,682 (1972) | सड़क परिवहन विस्तार का स्पष्ट प्रमाण। |
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
आईन-ए-अकबरी के अनुसार, प्रतापगढ़ इलाका इलाहाबाद सूबे की मानिकपुर सरकार के अधीन था। इसमें मानिकपुर और प्रतापगढ़ मुख्य महाल थे। इस सरकार का कुल रकबा 6,66,222 बीघा और निर्धारित मालगुजारी 3,39,16,527 दाम थी।
जिले में कुल 5 बड़े बंदोबस्त हुए: 1856 का प्रथम संक्षिप्त बंदोबस्त, 1858-59 का द्वितीय संक्षिप्त बंदोबस्त (सनद व्यवस्था), 1860-1871 का प्रथम नियमित बंदोबस्त (कैप्टन फोर्ब्स द्वारा), 1892-1896 का द्वितीय नियमित बंदोबस्त, और 1922-1926 का तृतीय नियमित बंदोबस्त (आर. एफ. मूडी द्वारा)।
ताल्लुकदारों द्वारा किसानों से मनमाना नज़राना, बेगार और आए दिन खेतों से बेदखली के विरोध में बाबा रामचंद्र, झिंगुरी सिंह और सहदेव सिंह के नेतृत्व में 'अवध किसान सभा' बनी। इस आंदोलन के दबाव में ही अंग्रेजों को अवध रेंट अमेंडमेंट एक्ट 1921 पास करना पड़ा था।
1 जुलाई 1952 से ज़मींदारी प्रथा समाप्त कर किसानों को तीन श्रेणियां दी गईं: भूमिधर (पूर्ण मालिक, बिक्री का अधिकार), सीरदार (पुश्तैनी काश्तकार, 20 गुना लगान देकर भूमिधर बनने का हक), और असामी (अस्थाई पट्टेदार)।
जिले में जोत चकबंदी का वास्तविक काम 16 मई 1970 को शुरू हुआ। शुरुआत में 354 गांवों के 9,699 एकड़ रकबे में मौजूद 3,23,095 बिखरे हुए खेत के टुकड़ों को एक चक में समेटकर किसानों को दिया गया।
प्रतापगढ़ का राजस्व प्रशासन केवल लगान की वसूली का ब्योरा नहीं है, बल्कि यह हमारे पुरखों के पसीने, संघर्ष और धरती पर अपने हक की लड़ाई का जीवंत दस्तावेज है। टोडरमल की जरीब से लेकर नवाबों की मनमानी, ताल्लुकदारों की हनक और फिर किसान आंदोलन की ज्वाला से तपकर निकला जमींदारी उन्मूलन—यह इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में अंततः हल चलाने वाला ही धरती का सच्चा स्वामी बनता है।