प्रतापगढ़ का बैंकिंग और व्यापार इतिहास: प्राचीन 'श्रेणी' से आधुनिक बैंक, गल्ला मंडियों और सिक्कों का प्रामाणिक सफर
जब आज हम अपनी जेब से डिजिटल फोन निकालकर एक सेकंड में यूपीआई (UPI) से पैसे भेजते हैं या बैंक एटीएम से नोट निकालते हैं, तो कभी सोचा है कि हमारे पुरखे लेनदेन कैसे करते थे? प्राचीन काल में जब बैंक नहीं थे, तब प्रतापगढ़ के लोग अपनी पूंजी व्यापारियों की 'श्रेणी' (Sreni) में जमा करते थे, जिसका ब्याज साल भर जनकल्याण और धार्मिक कार्यों में लगता था।
मुगल काल में जौनपुर की टकसाल से ढलकर आए सिक्के धातु के वजन पर परखे जाते थे और बड़े व्यापारियों को 'जगत सेठ' कहा जाता था। 1980 के आधिकारिक गजेटियर (अध्याय 6) के पन्नों में दर्ज यह सफर हमें सूदखोर महाजनों की 75% ब्याज की चंगुल, 1913 के जिला सहकारी बैंक, 1944 के पहले कमर्शियल बैंक, 1898 में रेल आने के बाद मैकएंड्रयूगंज व रानीगंज की गल्ला मंडियों और मन-पसेरी से किलोग्राम तक की पूरी दास्तान सुनाता है।
🏛️ 1. प्राचीन और मध्यकालीन साख: 'श्रेणी' से 'जगत सेठ' तक का सफर
प्रतापगढ़ की धरती पर व्यापार और लेनदेन की परंपरा हजारों साल पुरानी है। रामायण और महाभारत काल से ही गंगा और सई के कछारों में बसे गांवों में आंतरिक व्यापार और आसपास के जनपदों (कौशाम्बी, अयोध्या, काशी) के साथ लेन-देन खूब फला-फूला।
प्राचीन 'श्रेणियां' (Guilds): भारत की सबसे पहली बैंकिंग
प्राचीन काल में जब आधुनिक बैंक नहीं थे, तब व्यापारी और शिल्पी मिलकर अपनी संस्था बनाते थे जिसे 'श्रेणी' (Guilds) कहा जाता था। इतिहासकार रमेश चंद्र मजूमदार के संदर्भ से गजेटियर बताता है कि उस समय आम जनता अपनी जमा पूंजी इन श्रेणियों के पास सुरक्षित रखती थी।
यह व्यवस्था बहुत ही पवित्र और सामाजिक मानी जाती थी—जमाकर्ता यह शर्त तय करता था कि उसकी जमा राशि से जो ब्याज (Interest) मिलेगा, उससे हर साल किसी विशेष जनकल्याण, अनाथ सेवा या धार्मिक अनुष्ठान का खर्च चलाया जाएगा। मध्यकाल आते-आते ये प्राचीन श्रेणियां धीरे-धीरे समाप्त हो गईं।
मुगल काल: 'जगत सेठ' और जौनपुर की शाही टकसाल
मध्यकाल (सल्तनत और मुगल दौर) में पूरे भारत में मुद्रा का कारोबार बहुत विकसित हो गया था। यूरोपीय यात्रियों ने लिखा है कि भारत के हर व्यापारिक केंद्र में धातु और सिक्कों की परख करने वाले माहिर मुद्रा-व्यापारी (Money-dealers) मौजूद थे:
- सिक्के माल की तरह बिकते थे: उस दौर में सिक्के का मूल्य तय नहीं होता था, बल्कि सिक्के में कितनी शुद्ध चांदी, तांबा या सोना है, उसके वजन के हिसाब से वस्तु विनिमय (Barter) होता था। सौदा तभी पूरा माना जाता था जब जौहरी सिक्के की धातु की शुद्धता परख लेता था।
- जगत सेठ: जो बड़े व्यापारी इतने धनवान थे कि राजा-महाराजा और नवाब भी उनसे कर्ज लेते थे, उन्हें 'जगत सेठ' (Jagat Seth) कहा जाता था। ये व्यापारी कारीगरों को कच्चा माल खरीदने के लिए अग्रिम धन देते थे।
- कारीगरों का शोषण: स्वतंत्र बुनकर, बढ़ई और लोहार साधनविहीन थे। बिचौलिये और व्यापारी उन्हें इतना कम मुनाफा देते थे कि सूखे या अकाल के दिनों में कारीगर भुखमरी की कगार पर पहुंच जाते थे और कर्ज के बोझ तले एक जगह से दूसरी जगह पलायन करने को मजबूर होते थे।
- जौनपुर टकसाल से आपूर्ति: मुगल बादशाह अकबर ने वित्तीय सुधार किए और शाही खजानों की कमान जिम्मेदार अफसरों को सौंपी। गजेटियर के अनुसार प्रतापगढ़ के इलाके में चलने वाले सिक्के मुख्य रूप से जौनपुर की शाही टकसाल से ढलकर आते थे।
⚖️ 2. महाजनी राज, 75% ब्याज और किसानों को कर्जमुक्ति के ऐतिहासिक कानून
1856 में अवध पर अंग्रेजों के कब्जे के बाद प्रतापगढ़ में साहूकारों और ताल्लुकदारों का शिकंजा किसानों पर और कस गया। खेती बारिश पर निर्भर थी और लगान अंग्रेजों को नकद चाहिए था, जिससे किसान महाजनों के जाल में फंसते चले गए।
1901 में 33,138 बनिया-महाजन और 'एक रुपया पर एक आना' ब्याज
1901 की जनगणना के अनुसार जिले में 33,138 बनिया थे, जिनमें से ज्यादातर छोटे दुकानदार और साहूकार थे। इसके अलावा बड़े ताल्लुकदार भी किसानों को भारी ब्याज पर कर्ज देते थे:
- जमीन गिरवी (Mortgage): जब किसान जमीन या खेत रेहन (गिरवी) रखता था, तब ब्याज की दर 9% से 18% सालाना होती थी। कर्ज न चुका पाने पर ताल्लुकदार किसान की जमीन हथिया लेते थे।
- छोटे कर्ज पर 75% ब्याज: गरीब मजदूरों और छोटे किसानों को बिना गिरवी के मिलने वाले छोटे कर्जों पर ब्याज की दर 'एक रुपये पर एक आना प्रति महीना' वसूली जाती थी। इसका मतलब हुआ 16 आने के रुपये पर साल भर में 12 आने ब्याज—यानी 75% सालाना ब्याज!
गजेटियर दर्ज करता है कि 20वीं सदी की शुरुआत में कुर्मी किसान अपनी कड़ी मेहनत के कारण सबसे बेहतर स्थिति में थे और खराब मौसम में भी सरकारी मदद के बिना लगान चुका देते थे। 1894 में रबी फसल भारी बारिश से बर्बाद होने पर भी किसानों ने अनाज के लिए हाथ नहीं फैलाया। निचली जातियों के लोग सड़कों और 1898 की रेलवे लाइन निर्माण में मजदूरी करके आमदनी बढ़ाते थे, जबकि ब्राह्मण और क्षत्रिय युवा बड़ी संख्या में सेना और पुलिस में भर्ती होते थे।
1929 की वैश्विक महामंदी और ब्रिटिश काल के कर्ज राहत कानून
1929 से 1932 के बीच आई दुनिया भर की महामंदी (Great Depression) ने प्रतापगढ़ के किसानों की कमर तोड़ दी। अनाज के दाम आधे से भी कम रह गए, जिससे छोटे किसानों के लिए कर्ज की किस्त चुकाना नामुमकिन हो गया। किसानों के आक्रोश और बाबा रामचंद्र के किसान आंदोलन के दबाव में आकर अंग्रेजी हुकूमत को कर्ज नियंत्रण के कानून बनाने पड़े:
| कानून का नाम (Act) | वर्ष | मुख्य कानूनी प्रावधान व किसानों को राहत |
|---|---|---|
| यूज़ूरियस लोन्स एक्ट (Usurious Loans Act) | 1918 (संशोधन 1926, 1934) | अदालतों को यह अधिकार दिया गया कि अगर साहूकार ने अत्यधिक अनुचित ब्याज लगाया है, तो अदालत उस लेनदेन को दोबारा खोलकर अवैध ब्याज माफ कर सकती है। 1934 में ब्याज की अधिकतम सीमा तय कर दी गई। |
| यूपी कृषक राहत अधिनियम (UP Agriculturists' Relief Act) | 1934 | 1930 के दशक की महामंदी के बाद बना। किसानों को अपने पुराने कर्जों को आसान किस्तों में और बहुत कम ब्याज दर पर चुकाने की कानूनी सुविधा दी गई। |
| डिक्री निष्पादन स्थगन अधिनियम (Postponement of Decrees Act) | 1937 | 1,000 रुपये तक सालाना लगान देने वाले छोटे किसानों और काश्तकारों के खिलाफ अदालती डिक्री (कुर्की और नीलामी) पर बिना शर्त पूर्ण रोक लगा दी गई। |
| यूपी ऋण मोचन अधिनियम (UP Debt Redemption Act) | 1940 | गरीब किसानों और मजदूरों के पुराने कर्जों के ब्याज का पुनर्गणना (कम दर पर) अनिवार्य किया गया। कर्ज न चुकाने पर किसान की जमीन या संपत्ति नीलाम करने और जेल भेजने से कानूनी सुरक्षा मिली। |
सरकारी तकावी (Taqavi) ऋण का ऐतिहासिक सफर
अंग्रेजी हुकूमत में 1886 से सूखे और बाढ़ के समय किसानों को 'तकावी' कर्ज देने की व्यवस्था शुरू हुई थी। 1947 में आजादी मिलने के बाद तकावी का मकसद केवल आपदा राहत नहीं रहा, बल्कि खेती के विकास, नलकूप लगाने और मकान बनाने के लिए भी कम ब्याज पर कर्ज दिया जाने लगा।
| वित्तीय वर्ष | आपदा राहत तकावी (रु.) | कृषि विकास ऋण (रु.) | आवास निर्माण सहायता (रु.) | कुल महत्व |
|---|---|---|---|---|
| 1968-69 | 2,51,114 | 72,200 | — | फसल क्षति व खाद-बीज सहायता |
| 1969-70 | 1,37,400 | 40,600 | 47,000 | मकान निर्माण की नई शुरुआत |
| 1970-71 | 6,29,000 | 3,600 | 2,08,000 | 1970 की भयानक बाढ़ में राहत |
| 1971-72 | 2,08,137 | 5,41,200 | 25,65,000 | 1971 बाढ़ के बाद रिकॉर्ड पुनर्वास |
| 1972-73 | 2,15,060 | 8,12,114 | — | कृषि यंत्रीकरण और पम्पिंग सेट |
*नोट: 1971-72 में इसके अलावा कृषकों के बच्चों को शिक्षा सुविधाएं देने के लिए अलग से 7,86,636 रुपये का विशेष अग्रिम आवंटित किया गया था।
🤝 3. सहकारिता आंदोलन: 1913 का जिला सहकारी बैंक और भूमि विकास बैंक
साहूकारों के चंगुल से किसानों को बचाने के लिए सहकारिता सबसे बड़ा हथियार बनकर उभरी। जिले में सहकारिता की नींव 20वीं सदी के पहले साल में ही पड़ गई थी।
1901 के 12 ग्रामीण बैंक और 1913 का केंद्रीय सहकारी बैंक
1901 में जिले में सहकारी आधार पर 12 प्राथमिक ग्रामीण बैंक खोले गए। 1904 के सहकारी समिति अधिनियम के बाद यह आंदोलन तेजी से फैला। इन प्राथमिक समितियों को वित्तीय सहारा देने के लिए 24 फरवरी 1913 को बेला प्रतापगढ़ में 'सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड' (Central Co-operative Bank, Ltd) की स्थापना की गई।
- समितियों का एकीकरण: 1960-61 में जिले में 1,838 छोटी-छोटी सहकारी समितियां थीं। बाद में सरकार ने इन्हें मिलाकर 587 बड़ी व आर्थिक रूप से मजबूत समितियों में बदल दिया।
- सदस्यता में रिकॉर्ड उछाल: 1960-61 में जहां सदस्य संख्या 80,756 थी, वहीं 1972-73 तक यह बढ़कर 1,72,000 (1.72 लाख) किसान सदस्य हो गई और वितरित ऋण 47.24 लाख से उछलकर 1 करोड़ 9 लाख 73 हजार रुपये पहुंच गया।
- बैंक की वित्तीय प्रगति: 1970-71 में सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक की जमा पूंजी 67.26 लाख रुपये थी, जो 1971-72 में बढ़कर 85.19 लाख रुपये हो गई और बैंक ने 9.17 लाख रुपये का शुद्ध लाभ कमाया।
भूमि विकास बैंक (Land Development Bank, 1964-65)
किसानों को नलकूप लगाने, पम्पिंग सेट खरीदने और ट्रैक्टर आदि के लिए दीर्घकालिक (Long-term) ऋण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से 1964-65 में प्रतापगढ़ में भूमि विकास बैंक की स्थापना हुई।
- कुंडा और पट्टी में शाखाएं: किसानों की सुविधा के लिए 1970-71 में कुंडा और पट्टी तहसील मुख्यालयों पर बैंक की दो नई शाखाएं खोली गईं।
- कम ब्याज और 50 पैसे की विशेष छूट: यह बैंक 8.75% वार्षिक ब्याज पर पम्पिंग सेट व नलकूप लगाने हेतु कर्ज देता था। जो किसान समय पर किस्त जमा करते थे, उन्हें प्रति 100 रुपये पर 50 पैसे की विशेष छूट (Rebate) दी जाती थी।
- 1 करोड़ से ज्यादा का कर्ज: 1968-69 में जहां बैंक के सिर्फ 170 सदस्य थे और 1.42 लाख रुपये कर्ज बंटा था, वहीं 1971-72 में सदस्य संख्या 7,089 हो गई और वितरित ऋण 1 करोड़ 4 लाख 32 हजार रुपये के ऐतिहासिक आंकड़े को पार कर गया।
जिला सहकारी विकास संघ (DCDF, 1948)
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आवश्यक वस्तुओं की महंगाई से निपटने के लिए 1948 में 'डिस्ट्रिक्ट को-ऑपरेटिव डेवलपमेंट फेडरेशन' (DCDF) बनाया गया। साठ के दशक तक इसने जिले भर में सीमेंट और रासायनिक खाद की आपूर्ति की और सत्तर के दशक में ग्रामीण जनता को उचित मूल्य पर चीनी और कपड़ा उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाई। 1970-71 में फेडरेशन ने 3.27 लाख रुपये का सामान बेचा।
🏦 4. आधुनिक वाणिज्यिक बैंक: 1944 से लीड बैंक 'बैंक ऑफ बड़ौदा' का उदय
प्रतापगढ़ में आधुनिक वाणिज्यिक बैंकों (Commercial Banks) का आगमन काफी देर से हुआ। आजादी से ठीक पहले तक जिले में कोई बड़ा कमर्शियल बैंक नहीं था।
पहला बैंक: हिंदुस्तान कमर्शियल बैंक (1944) और स्टेट बैंक (1957)
जिले में सबसे पहला कमर्शियल बैंक 1 सितंबर 1944 को 'हिंदुस्तान कमर्शियल बैंक' के रूप में खुला। इसके बाद तेरह साल तक कोई दूसरा वाणिज्यिक बैंक नहीं आया।
11 नवंबर 1957 को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) ने प्रतापगढ़ में अपनी पहली शाखा शुरू की। 1969 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के समय तक पूरे जिले में केवल 5 बैंक शाखाएं थीं, यानी औसतन 3,02,000 की आबादी पर सिर्फ 1 बैंक शाखा उपलब्ध थी।
| बैंक का नाम (Commercial Bank) | शाखाओं की संख्या | शाखाओं के स्थान (Location) | भूमिका व विशेषताएं |
|---|---|---|---|
| भारतीय स्टेट बैंक (State Bank of India) | 4 शाखाएं | प्रतापगढ़ (बेला), कुंडा, लालगंज, पट्टी | चारों प्रमुख तहसीलों/कस्बों में करेंसी चेस्ट और सरकारी खजाने का संचालन। |
| बैंक ऑफ बड़ौदा (Bank of Baroda) | 2 शाखाएं | प्रतापगढ़ (बेला), अंतू | जिले का 'लीड बैंक' (Lead Bank): 1970 में जिले की औद्योगिक व कृषि ऋण आवश्यकताओं का पहला व्यापक क्रेडिट सर्वे किया। |
| बनारस स्टेट बैंक लिमिटेड (Benares State Bank) | 1 शाखा | प्रतापगढ़ (बेला) | स्थानीय व्यापारियों और आढ़तियों को कार्यशील पूंजी और साख सुविधा। |
| हिंदुस्तान कमर्शियल बैंक (Hindustan Commercial Bank) | 1 शाखा | प्रतापगढ़ (बेला) | जिले का सबसे पहला वाणिज्यिक बैंक (स्थापना: 1 सितंबर 1944)। |
बैंक जमा में जबरदस्त उछाल (1967 से 1972)
गजेटियर के आंकड़े बताते हैं कि राष्ट्रीयकरण के बाद प्रतापगढ़ के लोगों में बैंकों के प्रति विश्वास बहुत तेजी से बढ़ा:
- 31 दिसंबर 1967: बैंकों में कुल जमा 76 लाख रुपये थी (प्रति व्यक्ति जमा मात्र 5.30 रुपये)।
- 31 दिसंबर 1968: कुल जमा बढ़कर 95 लाख रुपये हुई (प्रति व्यक्ति 6.57 रुपये)।
- जून 1972 (अंतिम शुक्रवार): कुल बैंक जमा छलांग लगाकर 2 करोड़ 53 लाख रुपये (2.53 करोड़ रु.) पहुंच गई और प्रति व्यक्ति जमा 17.90 रुपये हो गई।
- ऋण वितरण: 1972 तक बैंक ऋण 14 लाख रुपये तक पहुंचा। बैंक ऑफ बड़ौदा ने लीड बैंक के रूप में ग्रामीण इलाकों में नई शाखाएं खोलकर किसानों और छोटे उद्योगों को सीधा कर्ज देने की योजनाएं बनाईं।
📮 5. डाकघर बचत बैंक, राष्ट्रीय रक्षा पत्र और एलआईसी (LIC)
जिन दूरदराज के गांवों में बैंक नहीं पहुंचे थे, वहां डाकघरों ने बचत की अलख जगाई। 20वीं सदी की शुरुआत से ही डाकघर बचत बैंक योजनाएं जिले में लोकप्रिय थीं।
1970-71 में 143 डाकघरों में बचत खाता सुविधा
1962 में चीन के आक्रमण के समय देश की रक्षा के लिए धन जुटाने हेतु राष्ट्रीय रक्षा बांड और राष्ट्रीय रक्षा पत्र (National Defence Certificates) शुरू किए गए। 1970-71 में जिले के 143 डाकघरों और शाखा डाकघरों में बचत खाते की सुविधा उपलब्ध थी:
- डाकघर बचत बैंक (Savings Bank): 5,733 खाते और 12.37 लाख रुपये की जमा पूंजी।
- संचयी सावधि जमा (Cumulative Time Deposits): 959 खाते और 2.40 लाख रुपये।
- आवर्ती जमा (Recurring Deposits - RD): 72 खाते और 17.49 लाख रुपये की भारी बचत।
- राष्ट्रीय बचत पत्र (NSC): 302 खाते और 5.57 लाख रुपये।
- कुल डाकघर बचत: दिसंबर 1971 तक कुल 7,076 खातों में 37.88 लाख रुपये आम जनता ने देश के विकास के लिए जमा किए थे।
भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) का विस्तार
1960 में भारतीय जीवन बीमा निगम ने सुल्तानपुर में अपना मंडल कार्यालय खोला, जिसके अधीन प्रतापगढ़ जिले का पूरा बीमा व्यवसाय संचालित होता था। जिले में 8 विकास अधिकारी (Development Officers) और 126 स्थानीय बीमा एजेंट काम कर रहे थे।
जिले में बीमा व्यवसाय में अभूतपूर्व प्रगति देखी गई: 1968-69 में जहां 56.61 लाख रुपये का बीमा हुआ था, वहीं 1971-72 में यह दोगुने से अधिक बढ़कर 1 करोड़ 13 लाख 16 हजार रुपये (1.13 करोड़ रु.) के पार पहुंच गया। 1969-70 में जिले में प्रति व्यक्ति बीमा औसत 5 रुपये आंका गया था।
🪙 6. सिक्के, मुद्रा और दशमलव प्रणाली: 'रत्ती' से 'गांधी चांदी के सिक्के' तक
प्रतापगढ़ की माटी ने प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक मुद्रा के हर ऐतिहासिक बदलाव को देखा है। गजेटियर में सिक्कों के वजन और मान का अद्भुत आधिकारिक विवरण मिलता है:
मनुस्मृति काल: 'रत्ती' (गुंजा) और तांबे का कार्षापण
भारत में सबसे पुराने सिक्कों का वजन मनुस्मृति (Manu-Samhita) की प्रणाली पर आधारित था:
- मूल इकाई: वजन की बुनियादी इकाई लाल-काले रंग की 'रत्ती' या गुंजा का बीज थी, जिसका वजन लगभग 1.83 ग्रेन (Grains) होता था।
- चांदी का 'पुराण' या 'धरण': 32 रत्ती वजन का चांदी का सिक्का चलता था।
- तांबे का 'कार्षापण': 80 रत्ती वजन का तांबे का सिक्का आम लेनदेन में इस्तेमाल होता था। इसके चौथाई और अठन्नी जैसे कई उप-विभाजन भी प्रचलित थे।
मुहम्मद बिन तुगलक से शेरशाह और अकबर के शाही सिक्के
1330 में दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने जब सांकेतिक तांबे के सिक्के चलाए, तो उत्तर भारत में भारी आर्थिक अव्यवस्था फैल गई थी। इसके बाद शेरशाह सूरी और अकबर ने मुद्रा प्रणाली को सुधारा:
- शेरशाह का चांदी का रुपया: शेरशाह सूरी (1540-1545) ने 175 से 178 ग्रेन वजन का शुद्ध चांदी का सिक्का चलाया, जिसे सबसे पहले 'रुपया' नाम दिया गया, साथ में तांबे का 'दाम' शुरू हुआ।
- अकबर का सुधार (दिसंबर 1577): अकबर ने मशहूर चित्रकार और सुलेखक ख्वाजा अब्दुस समद शीराज़ी को दिल्ली टकसाल का प्रमुख बनाया। टकसाल में दरोगा, मुशरिफ (लेखापाल), सराफ (धातु खरीदार), तौलने वाला और लोहार नियुक्त किए गए।
- अकबरी चांदी का रुपया: 172.5 ग्रेन का चांदी का रुपया चलता था, जो ब्रिटिश काल के 1914 वाले 6 रुपयों के बराबर माना जाता था।
- अकबर का तांबे का दाम: 323.5 ग्रेन का तांबे का सिक्का 'दाम', 'पैसा' या 'फुलूस' कहलाता था। 1 दाम में 25 जीतल होते थे और 40 दाम मिलकर 1 रुपया बनता था।
ब्रिटिश 16 आना, 1958 का दशमलव सिक्का और 1969 का गांधी चांदी का सिक्का
अंग्रेजी हुकूमत में 1 रुपये को 16 आने में, 1 आने को 4 पैसे या 12 पाई में बांटा गया (1 रुपया = 64 पैसे = 192 पाई)। अप्रैल 1935 में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की स्थापना हुई, जिसे नोट जारी करने और देश के वित्तीय नियंत्रण की जिम्मेदारी मिली।
- 1 अक्टूबर 1958 - नया पैसा (दशमलव प्रणाली): प्रतापगढ़ सहित पूरे देश में पुरानी आना-पाई प्रणाली समाप्त कर दशमलव सिक्का प्रणाली लागू की गई, जिसमें 1 रुपया = 100 नए पैसे बना। 1, 2, 3, 5, 10, 20, 25 और 50 पैसे के सिक्के चलन में आए। (हालांकि 70 के दशक तक गांव-देहात में पुराने 8 आने और चवन्नी खूब बोले जाते थे)।
- अक्टूबर 1969 - महात्मा गांधी जन्म शताब्दी चांदी का 10 रुपये का सिक्का: गांधी जी की 100वीं जयंती पर भारत सरकार ने सीमित संख्या में 10 रुपये का भारी चांदी का स्मारक सिक्का जारी किया था, जिसे प्रतापगढ़ के लोगों ने बड़े गर्व से सहेजा।
- कानपुर आरबीआई से करेंसी चेस्ट: जिले में करेंसी नोटों और सिक्कों की आपूर्ति आरबीआई की कानपुर शाखा द्वारा की जाती थी, जो भारतीय स्टेट बैंक की 4 शाखाओं (प्रतापगढ़, पट्टी, लालगंज और कुंडा) के करेंसी चेस्ट को सीधे नकदी भेजती थी।
🌾 7. व्यापार, गल्ला मंडियां और ग्रामीण हाट: 1898 की रेलवे क्रांति
1898 से पहले प्रतापगढ़ में व्यापार बहुत सीमित था। जो भी थोड़ा-बहुत अनाज बाहर भेजा जाता था, वह बैलगाड़ियों से गंगा पार करके इलाहाबाद जिले में ईस्ट इंडियन रेलवे के स्टेशनों तक ले जाया जाता था।
1898 की रेलवे क्रांति: अनाज का दोगुना निर्यात
1873 में जिले से लगभग 3 लाख मन (1.20 लाख क्विंटल) अनाज बाहर जाता था। लेकिन 1898 में अवध-रुहेलखंड रेलवे लाइन बेला प्रतापगढ़ से गुजरने के बाद अनाज का निर्यात दोगुना होकर 6 लाख मन (2.40 लाख क्विंटल) सालाना पहुंच गया और रेलवे स्टेशनों के पास बड़े-बड़े आढ़त बाजार बस गए।
- पुराने जमाने का निर्यात (1900 के आसपास): अनाज, तिलहन, अफीम, सनई का टाट, खालें, चमड़ा, सींग और हड्डियां (सींग और हड्डियां तो यूरोपीय बाजारों तक भेजी जाती थीं!)।
- आयात (Imports): नमक (बंबई से), सूती कपड़ा (इंग्लैंड और अहमदाबाद से), चीनी, धातु और लोहे का सामान।
- 1922 में चमड़ा व्यापार: प्रथम विश्व युद्ध के बाद बेला प्रतापगढ़ में कच्चे चमड़े और खाल के 6 बड़े निर्यातक सक्रिय थे, जो इलाहाबाद, सुल्तानपुर, जौनपुर, रायबरेली और रामपुर माल भेजते थे।
अनाज घाटा और नए निर्यातों का उदय (1956 के आंकड़े)
जैसे-जैसे जिले की आबादी बढ़ी, प्रतापगढ़ अनाज के मामले में आत्मनिर्भर से बदलकर घाटे (Deficit) वाला जिला बन गया। अब जिले से अनाज का निर्यात बंद हो गया और उसकी जगह बागवानी व कुटीर उद्योगों के उत्पादों ने ले ली:
- 1956 का प्रमुख निर्यात: महुआ बीज (7,446 क्विंटल), दशहरी व देशी आम (6,844 क्विंटल), तिलहन (5,087 क्विंटल), प्रतापगढ़ी आंवला (4,000 क्विंटल), हड्डियां (4,000 क्विंटल) और सनई (998 क्विंटल)।
- दूरदराज के राज्यों में माल: सनई का रेशा, मूंज का बान, सुतली, नीम की निबोली, महुआ और आंवला सीधे कलकत्ता, पंजाब और राजस्थान के बड़े औद्योगिक केंद्रों को भेजा जाता था।
- 1961 की व्यापारिक गणना: 1961 की जनगणना में जिले के 11,747 लोग व्यापार और वाणिज्य में लगे थे (144 थोक आढ़ती, 11,582 खुदरा दुकानदार व फेरीवाले, और 71 अन्य)।
जिले की दो सबसे बड़ी थोक गल्ला मंडियां
प्रतापगढ़ में कृषि उत्पादों के संकलन और वितरण के लिए दो प्रमुख थोक गल्ला मंडियां पूरे पूर्वांचल में प्रसिद्ध रहीं:
- मैकएंड्रयूगंज थोक मंडी (बेला प्रतापगढ़, स्थापना 1870): 1870 में तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर मिस्टर मैकएंड्रयू ने नजूल भूमि पर इस थोक मंडी की नींव रखी थी। शुरू में व्यापारियों को यहां दुकान और मकान बनाने के लिए मुफ्त जमीन दी गई, लेकिन वीराना होने के कारण लोग बसने से कतराते रहे। 1885 के बाद जब बस्ती बसी, तो यह पूरे जिले का सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र बन गया। 1971 में अकेले इस मंडी में 32,000 क्विंटल गेहूं, 20,000 क्विंटल चावल, 14,000 क्विंटल आलू, 13,500 क्विंटल गुड़, 13,000 क्विंटल सरसों और 11,000 क्विंटल चना बिका।
- रानीगंज मंडी (धान की सबसे बड़ी मंडी): रानीगंज जिला की सबसे बड़ी धान मंडी थी। 1971 में यहां अकेले 10,000 क्विंटल धान (Paddy), 6,000 क्विंटल गेहूं, 4,000 क्विंटल चावल और 3,000 क्विंटल मटर की थोक बिक्री दर्ज हुई।
| तहसील (Tahsil) | ग्रामीण हाट व बाजार का नाम | मुख्य व्यापारिक वस्तुएं | हाट के साप्ताहिक दिन |
|---|---|---|---|
| कुंडा | बेलागंज | मवेशी बाजार (Cattle Market) | मंगलवार, रविवार |
| कुंडा | डेरवा (Derwa) | मवेशी व गल्ला बाजार | मंगलवार, रविवार |
| कुंडा | कासनापुर | पशु हाट (Cattle Market) | मंगलवार, शुक्रवार |
| कुंडा | रानीगंज कैथौला | अनाज व गुड़ मंडी | बुधवार, शनिवार |
| प्रतापगढ़ (सदर) | अंतू (Antu) | सब्जी, अनाज व स्थानीय उत्पाद | गुरुवार, रविवार |
| प्रतापगढ़ (सदर) | अठेहा (Ateha) | सब्जी, दालें व अनाज | सोमवार, शुक्रवार |
| प्रतापगढ़ (सदर) | बाबूगंज | हरी तरकारी व किराना | मंगलवार, शुक्रवार |
| प्रतापगढ़ (सदर) | विश्वनाथगंज (Bishunathganj) | सब्जी, अनाज व गुड़ | मंगलवार, शुक्रवार |
| प्रतापगढ़ (सदर) | भोपिया मऊ (Bhopia Mau) | सब्जी, गल्ला व मेला स्थल | सोमवार, गुरुवार |
| प्रतापगढ़ (सदर) | चिलबिला (Chilbila) | अनाज, तेल व दैनिक वस्तुएं | सोमवार, गुरुवार |
| प्रतापगढ़ (सदर) | गड़वारा (Garwara) | सब्जी, गल्ला व मवेशी बाजार | मंगलवार, शनिवार |
| प्रतापगढ़ (सदर) | जगेसरगंज | सब्जी, गल्ला व स्थानीय सामान | मंगलवार, शुक्रवार |
| प्रतापगढ़ (सदर) | कोहंड़ौर (Kohndaur) | सब्जी, अनाज, भेड़ व बकरी हाट | मंगलवार, शनिवार |
| प्रतापगढ़ (सदर) | मानधाता (Mandhata) | सब्जी व देशी अनाज | गुरुवार, रविवार |
| प्रतापगढ़ (सदर) | रेहुआ लालगंज (Lalganj) | सब्जी, अनाज व किराना | मंगलवार, शनिवार |
| प्रतापगढ़ (सदर) | सांगीपुर (Sangipur) | हरी सब्जी व गल्ला | गुरुवार, रविवार |
| पट्टी | देल्हूपुर (Delhupur) | कपड़ा, सनई व अनाज | मंगलवार, शुक्रवार |
| पट्टी | कंडूरा (Kandura) | कपड़ा, किराना व अनाज | बुधवार, रविवार |
| पट्टी | लच्छीपुर (Lachhipur) | अनाज व दालें | बुधवार, शनिवार |
| पट्टी | महेशगंज कद्रिया | कपड़ा व खाद्यान्न | मंगलवार, शुक्रवार |
| पट्टी | रानीगंज (Raniganj) | कपड़ा, धान, गल्ला व पशु मेला | मंगलवार, शुक्रवार |
| पट्टी | सुनेहसा (Sunausa) | कपड़ा व ग्रामीण उत्पाद | बुधवार, शनिवार |
ऐतिहासिक मेले और व्यापार
जिले में लगने वाले मेले मुख्य रूप से धार्मिक आस्था के केंद्र थे, लेकिन वहां स्थानीय अर्थव्यवस्था भी फलती-फूलती थी:
- मानिकपुर का कार्तिक पूर्णिमा गंगा स्नान मेला: जिले का सबसे बड़ा ऐतिहासिक मेला मानिकपुर के गंगा घाटों पर लगता है। यहां लाखों श्रद्धालु स्नान के साथ मिट्टी के खिलौने, लोहे-लकड़ी के कृषि यंत्र, पीतल के बर्तन, हथकरघा वस्त्र और देशी मिठाइयों की भारी खरीदारी करते थे।
- भोपिया मऊ और रानीगंज के अश्विन पशु मेले: अश्विन (क्वार) के महीने में भोपिया मऊ और रानीगंज में बड़े पशु मेले लगते थे, जहां पंजाब और हरियाणा से व्यापारी उन्नत नस्ल की गाय, बैल और भैंसें बेचने के लिए प्रतापगढ़ लाते थे।
⚖️ 8. पारंपरिक बाट-माप: 'गंडा', सेर-पसेरी और मन से 'किलोग्राम' की क्रांति
आज हम सब एक किलो या एक लीटर में सामान तोलते हैं, लेकिन 1960 से पहले प्रतापगढ़ में तोलने और नापने का तरीका बहुत अनोखा, पेचीदा और तहसील दर तहसील अलग था!
वजन का पैमाना: 'मद्दूशाही पैसा', गंडा और पसेरी का गणित
20वीं सदी के प्रारंभ में जिले में वजन का कोई एक समान मानक नहीं था। वजन की बुनियादी इकाई 'गंडा' थी। एक गंडा का मतलब था पुराने जमाने के 4 मद्दूशाही तांबे के पैसे (Maddusahi Pice), जिनका कुल वजन 270 ग्रेन होता था:
- 24 और 26 गंडे की पसेरी: जिले के अधिकांश देहाती इलाकों में 24 या 26 गंडे की पसेरी चलती थी।
- 28 गंडे की पसेरी (प्रतापगढ़ व कुंडा): प्रतापगढ़ और कुंडा तहसील में 28 गंडे की पसेरी आम थी, जो सरकारी मानक के लगभग 2 सेर के बराबर बैठती थी।
- 30 गंडे की पसेरी: प्रतापगढ़ तहसील के कुछ विशेष व्यापारिक केंद्रों में 30 गंडे की पसेरी से तौल होती थी।
- 32 गंडे की पसेरी (पट्टी तहसील): पट्टी तहसील में 32 गंडे की सबसे भारी पसेरी चलती थी, जो लगभग ढाई (2.5) मानक सेर के बराबर होती थी।
- कच्चा सेर और पक्का सेर: देहात में 'कच्चा सेर' 28 से 36 तोले का होता था, जबकि सरकारी 'पक्का सेर' 80 तोले का माना जाता था। 5 सेर की एक पसेरी और 8 पसेरी (40 सेर) का एक मन (Maund) होता था।
तरल पदार्थ की नाप: मिट्टी का 'पउआ', 'बेल का बेटा' और लोहे की 'परी'
बीसवीं सदी के शुरुआती दशक तक दूध, तेल या शराब नापने के लिए कोई आधुनिक लीटर का पैमाना नहीं था। हर चीज वजन से या प्राकृतिक बर्तनों से नापी जाती थी:
- दूध और दही: मिट्टी के बर्तन से नापा जाता था जिसे 'पउआ' (1/4 सेर) या 'अधसेरा' (1/2 सेर) कहते थे।
- शराब की नाप: कलवार समाज पीतल के बर्तनों से शराब नापता था, जिसमें अधसेरा (1/2 सेर), पउआ (1/4 सेर), अधपई (1/8 सेर) और छटांकी (1/16 सेर) के पात्र होते थे।
- तेल की पारंपरिक नाप ('बेटा' और 'परी'): सरसों या तीली का थोड़ा तेल नापने के लिए 'बेटा' यानी बेल (Bel fruit) के सूखे खोल का इस्तेमाल होता था, जिसमें 1 से 2 छटांक तेल आता था। इससे भी कम मात्रा के लिए 'परी' नामक लोहे का उथला कटोरा इस्तेमाल किया जाता था जो 'बेटा' की आधी क्षमता का होता था।
लंबाई और जमीन की नाप: 'कदम', 'कोसी', 'गिरह' और मानक बीघा
दूरी और क्षेत्रफल नापने के लिए भी हमारे पुरखों के अपने व्यावहारिक पैमाने थे:
- दूरी: मील के अलावा बंदूक की गोली की आवाज की सीमा तक की दूरी को 'गोली' (Gali) कहा जाता था।
- कदम (Qadam): पिछले पैर के अंगूठे से लेकर अगले पैर की एड़ी तक की दूरी 'एक कदम' मानी जाती थी।
- कोसी (Kosi / Double Pace): दोनों पैरों की लंबाई सहित ढाई कदम के बराबर की दूरी को एक कोसी कहते थे।
- कपड़े की नाप (गिरह): एक गज के 16वें हिस्से (1/16 Yard) को 'गिरह' कहा जाता था (16 गिरह = 1 गज)।
- मानक बीघा (Standard Bigha): 55 गज लंबा और 55 गज चौड़ा वर्गाकार खेत यानी 3,025 वर्ग गज (Square Yards) का रकबा पूरे प्रतापगढ़ में पक्के बीघे के रूप में मान्य था।
1 अक्टूबर 1960: आधुनिक मीट्रिक प्रणाली (Metric System) का आगमन
सदियों पुरानी इस उलझन भरी मन, सेर, छटांक, पसेरी और बेटा-परी की प्रणाली को समाप्त करते हुए भारत सरकार ने 1 अक्टूबर 1960 से प्रतापगढ़ सहित पूरे देश में आधिकारिक रूप से मीट्रिक बाट और माप प्रणाली (Metric System of Weights and Measures) लागू की। इसके बाद से वजन के लिए किलोग्राम और क्विंटल, दूरी के लिए मीटर और किलोमीटर तथा तरल के लिए लीटर का सर्वमान्य आधुनिक नियम शुरू हुआ।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (प्रतापगढ़ बैंकिंग व व्यापार FAQs)
1980 के सरकारी गजेटियर का यह छठा अध्याय हमें यह अहसास कराता है कि प्रतापगढ़ की अर्थव्यवस्था ने कितना लंबा और संघर्षपूर्ण सफर तय किया है। एक समय था जब हमारे पूर्वज 75% ब्याज के महाजनी शिकंजे में पिसते थे, जौनपुर की टकसाल के सिक्कों को तौलकर सौदा होता था और सेर-पसेरी के फर्क में किसान ठगे जाते थे।
1913 के सहकारी आंदोलन, 1898 की रेलवे क्रांति, मैकएंड्रयूगंज व रानीगंज की ऐतिहासिक मंडियों और आधुनिक बैंकों की बदौलत ही हमारे जिले के किसान और व्यापारी स्वावलंबी बन सके। आज जब हम यूपीआई के दौर में हैं, तब अपनी इस आर्थिक विकास यात्रा और पुरखों के पसीने को याद रखना ही हमारी माटी के प्रति सच्चा सम्मान है।
यह आलेख उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 1980 में प्रकाशित आधिकारिक 'Uttar Pradesh District Gazetteers: Pratapgarh' के Chapter VI - 'Banking, Trade and Commerce' (पृष्ठ 138 से 153) में दर्ज प्रामाणिक बैंकिंग आंकड़ों, ऋण मोचन कानूनों, सहकारी समिति रिकॉर्ड, टकसाल इतिहास, व्यापारिक आंकड़ों और 1960 की बाट-माप बंदोबस्त रिपोर्ट पर आधारित है।