प्रतापगढ़ में सामाजिक सेवा और लोक कल्याण का इतिहास: श्रम सुरक्षा, वृद्धावस्था पेंशन और वीर चक्र विजेता (गजेटियर 1980)
किसी भी संवेदनशील और सभ्य समाज की असली पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर, बुजुर्ग, श्रमिक और असहाय नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। आज़ादी के बाद भारत जब एक 'कल्याणकारी राज्य' (Welfare State) बना, तो प्रतापगढ़ में भी समाज के हर दबे-कुचले तबके को सम्मान, सुरक्षा और न्याय दिलाने की एक नई शुरुआत हुई।
उत्तर प्रदेश जिला गजेटियर (1980) का अध्याय 17 (Other Social Services) लोक कल्याण की एक ऐसी मानवीय गाथा है जो दिल को छू लेती है। दुकानों और ईंट-भट्ठों पर काम करने वाले मजदूरों के हक, 1957 में शुरू हुई ₹20 की पहली वृद्धावस्था पेंशन, 1971 के भारत-पाक युद्ध में 'वीर चक्र' पाने वाले बेल्हा के सपूत लेफ्टिनेंट कर्नल सोम दत्त शर्मा, 1947 से 1962 तक जिले में रही 15 साल की पूर्ण शराबबंदी, और दलित-शोषित बस्तियों में विनोबा हॉस्टल व कुओं का निर्माण—आइए बहुत ही सरल और बोलचाल की भाषा में इस मानवीय इतिहास को जानें।
1 श्रम कल्याण: कारखानों, दुकानों और खेतों में पसीना बहाने वालों की कानूनी सुरक्षा
प्रतापगढ़ मूल रूप से एक कृषि प्रधान जिला रहा है। यहाँ कानपुर या बॉम्बे की तरह बड़े भारी उद्योग तो नहीं थे, लेकिन हथकरघा बुनकरों, बढ़ईगीरी, आटोमोबाइल रिपेयरिंग, बर्तन उद्योग, राइस मिलों, तेल कोल्हू और ईंट-भट्ठों में हजारों मजदूर दिन-रात मेहनत करते थे। आज़ादी से पहले इन असंगठित मजदूरों से 12 से 14 घंटे काम लिया जाता था और मजदूरी के नाम पर कौड़ियां थमा दी जाती थीं।
आज़ादी के बाद मजदूरों के शोषण पर रोक लगाने के लिए प्रतापगढ़ में श्रम निरीक्षक (Labour Inspector) का कार्यालय स्थापित किया गया, जो क्षेत्रीय सहायक श्रम आयुक्त (इलाहाबाद) के अधीन काम करता था। जिले में कई ऐतिहासिक श्रम कानून कड़ाई से लागू किए गए:
2 1957 की पहली वृद्धावस्था पेंशन: जब ₹20 ने बेसहारा बुजुर्गों को दी नई जिंदगी
आज़ादी के बाद ग्रामीण समाज में एक दर्दनाक बदलाव यह देखा गया कि पुरानी संयुक्त परिवार प्रणाली (Joint Family System) तेजी से टूटने लगी थी। बेटे-बहू अलग हो जाते थे और बूढ़े मां-बाप दाने-दाने को मोहताज हो जाते थे। इस सामाजिक त्रासदी को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने 1 दिसंबर 1957 को प्रतापगढ़ में 'वृद्धावस्था पेंशन योजना' लागू की।
यह पेंशन 65 वर्ष या उससे अधिक आयु के उन असहाय और निराश्रित बुजुर्गों को दी जाती थी जिनका कोई कमाने वाला वारिस या सहारा नहीं था (सड़कों पर भीख मांगने वालों को इसमें शामिल नहीं किया गया था):
- 1957 में हर बुजुर्ग को ₹20 प्रति माह का मनीऑर्डर भेजा जाता था। दिसंबर 1962 तक जिले में 82 बुजुर्गों को यह पेंशन मिल रही थी।
- जनवरी 1972 में महंगाई को देखते हुए पेंशन बढ़ाकर ₹30 प्रति माह कर दी गई और लाभार्थियों की संख्या बढ़कर 201 हो गई।
- दिसंबर 1972 तक जिले की तीनों तहसीलों से कुल 625 बुजुर्गों ने पेंशन के लिए आवेदन किया था।
📊 तहसीलवार वृद्धावस्था पेंशन आंकड़े (दिसंबर 1972 तक)
| तहसील का नाम | कुल प्राप्त आवेदन | जांच में निरस्त आवेदन | स्वीकृति हेतु अनुशंसित | पेंशन पाने वाले कुल लाभार्थी |
|---|---|---|---|---|
| सदर तहसील (प्रतापगढ़) | 241 | 165 | 76 | 66 बुजुर्ग |
| कुंडा तहसील | 209 | 129 | 80 | 75 बुजुर्ग |
| पट्टी तहसील | 175 | 108 | 67 | 60 बुजुर्ग |
| जिले का कुल योग | 625 आवेदन | 402 निरस्त | 223 संस्तुत | 201 पेंशनभोगी |
3 आज़ादी के 698 दीवाने: स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान और पेंशन
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 1920 के अवध किसान आंदोलन और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक—प्रतापगढ़ के वीरों ने अंग्रेजों की लाठियां और जेल की कालकोठरियां हंसते-हंसते सही थीं। आज़ादी के बाद इन सेनानियों के परिवारों की गरीबी और कर्ज को दूर करने के लिए विशेष प्रयास किए गए:
- गजेटियर के अनुसार जिले में कुल 698 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आधिकारिक रूप से दर्ज थे।
- इनमें से 173 सेनानियों को केंद्र सरकार द्वारा ₹100 से ₹200 प्रति माह की सम्मान पेंशन स्वीकृत की गई थी।
- बाकी सेनानियों और उनके आश्रितों को 'स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कल्याण परिषद' (लखनऊ) द्वारा बेटियों की शादी के लिए आर्थिक मदद, पुश्तैनी कर्ज चुकाने हेतु अनुदान, निशुल्क मेडिकल सुविधा और सरकारी नौकरियों में उनके बच्चों को आरक्षण दिया गया।
4 सैनिक कल्याण: 1919 का सैनिक बोर्ड, 1971 के 11 शहीद और वीर चक्र विजेता
प्रतापगढ़ की माटी का भारतीय सेना से खून का रिश्ता रहा है। प्रथम विश्व युद्ध (World War I) समाप्त होने के बाद सेना से लौटे जवानों और वीर नारियों की देखभाल के लिए साल 1919 में 'जिला सैनिक, नाविक एवं वायुसैनिक बोर्ड' (District Soldiers' Board) का गठन किया गया था।
प्रतापगढ़ सदर तहसील के शुकुलपुर (Shukulpur) गांव के वीर सपूत लेफ्टिनेंट कर्नल सोम दत्त शर्मा (Lt. Col. Som Datt Sharma) ने 1971 के भारत-पाक युद्ध में अदम्य साहस और युद्ध-कौशल का परिचय दिया। उनकी अद्भुत बहादुरी के लिए भारत के राष्ट्रपति द्वारा उन्हें सेना के प्रतिष्ठित 'वीर चक्र' (Vir Chakra) से सम्मानित किया गया। उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें ₹3,000 की विशेष मानद राशि भी प्रदान की।
1971 युद्ध के 11 अमर शहीद: उसी 1971 के मुक्ति संग्राम में प्रतापगढ़ के 11 वीर जवानों ने मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। 'उत्तर प्रदेश पुलिस एवं सशस्त्र बल संस्थान' (लखनऊ) द्वारा इन 11 अमर शहीदों के परिवारों को ₹22,000 की तात्कालिक आर्थिक सहायता दी गई।
🪖 भूतपूर्व सैनिकों को दी गई सहायता (1968 से 1972)
| वर्ष | सीधी नकद सहायता (सैनिक / राशि) | खेती हेतु जमीन आवंटन | सिलाई मशीनें व साइकिलें | बच्चों को वजीफा व पुस्तक सहायता |
|---|---|---|---|---|
| 1968 | 55 पूर्व सैनिक (₹7,195) | 4 सैनिकों को जमीन | — | 29 को पुस्तक मदद + 121 को ट्रस्ट वजीफा (₹14,724) |
| 1969 | 59 पूर्व सैनिक (₹9,299) | 2 सैनिकों को जमीन | — | 12 को पुस्तक मदद + 145 को ट्रस्ट वजीफा (₹13,280) |
| 1970 | 76 पूर्व सैनिक (₹11,230) | 3 सैनिकों को जमीन | 3 सिलाई मशीनें | 7 को पुस्तक मदद + 99 को ट्रस्ट वजीफा (₹10,272) |
| 1971 | 56 पूर्व सैनिक (₹9,900) | 8 सैनिकों को जमीन | 4 सिलाई मशीनें + 11 साइकिलें | 53 को पुस्तक मदद + 169 को ट्रस्ट वजीफा (₹20,196) |
| 1972 | 49 पूर्व सैनिक (₹10,283) | — | 6 सिलाई मशीनें | 209 को पुस्तक मदद + 190 को ट्रस्ट वजीफा (₹15,746) |
5 15 साल की पूर्ण शराबबंदी: जब प्रतापगढ़ बना 'ड्राई डिस्ट्रिक्ट' (1947-1962)
महात्मा गांधी का सपना था कि आज़ाद भारत का गरीब मजदूर अपनी कमाई शराब में न उड़ाए। जब 1946 में लोकप्रिय सरकार सत्ता में आई, तो उसने पूरे प्रदेश को नशा-मुक्त करने का संकल्प लिया।
साल 1947-48 में उत्तर प्रदेश के केवल 7 जिलों में पूर्ण शराबबंदी (Total Prohibition) लागू की गई थी, जिनमें प्रतापगढ़ भी शामिल था (अन्य 6 जिले: बदायूं, एटा, फर्रुखाबाद, जौनपुर, मैनपुरी और सुलतानपुर)। एक 'मद्यनिषेध अधिकारी' के नेतृत्व में प्रचार तंत्र बना। दिसंबर 1962 तक पूरे 15 साल तक प्रतापगढ़ पूर्णतः शराब-मुक्त (Dry District) रहा।
दिसंबर 1962 के बाद हालांकि शराब की दुकानें दोबारा खुलीं, लेकिन सरकार ने कड़े प्रतिबंध बनाए रखे:
- ड्राई डेज (Dry Days): प्रत्येक मंगलवार, महीने की 1 और 2 तारीख, तथा होली, दशहरा, दिवाली, 2 अक्टूबर (गांधी जयंती) और 26 जनवरी को शराब की बिक्री पूर्णतः प्रतिबंधित रही।
- सामाजिक जनजागरण: आर्य समाज ने अपने वार्षिकोत्सवों, भजनों और प्रभातफेरियों के जरिए शराब के खिलाफ जनचेतना जगाई। स्कूलों और गुरुद्वारों में वाद-विवाद प्रतियोगिताएं कराई गईं।
- कच्ची शराब पर शिकंजा: अवैध शराब बनाने वालों के खिलाफ आबकारी कानून के तहत सख्त कार्रवाई की गई (1958 में 244, 1959 में 204 और 1960 में 116 तस्करों को जेल भेजा गया)।
6 दलित, पिछड़े और वंचित वर्गों का सामाजिक व आर्थिक उत्थान
सदियों से छूआछूत और सामाजिक उपेक्षा का दंश झेल रहे दलितों, भूमिहीनों और कारीगरों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए 1947 का 'यूपी सामाजिक अक्षमता निवारण अधिनियम' पास हुआ। संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत अस्पृश्यता को गैर-कानूनी घोषित किया गया (अस्पृश्यता अपराध अधिनियम 1955 के तहत जिले में 10 जातिवादियों पर मुकदमे चलाए गए)।
🏛️ हरिजन एवं समाज कल्याण विभाग की स्थापना
अप्रैल 1957 में जिले में पहला 'जिला हरिजन कल्याण अधिकारी' नियुक्त हुआ। अगस्त 1961 में हरिजन कल्याण और समाज कल्याण विभागों का विलय कर 'जिला हरिजन एवं समाज कल्याण अधिकारी' का पद बना, जिन्होंने जमीन पर विकास की लकीर खींची:
7 शिक्षा क्रांति: 5 विशेष प्राथमिक स्कूल, विनोबा हॉस्टल और 3 हरिजन पुस्तकालय
जब तक दलित बस्तियों के बच्चे कलम नहीं थामते, तब तक सामाजिक बराबरी असंभव थी। इसके लिए समाज कल्याण विभाग ने विशेष शिक्षण संस्थाएं स्थापित कीं:
- 5 विशेष प्राथमिक विद्यालय: बालकों के लिए 3 स्कूल—पूरे पिताई (Poorepitai), पूरे गोसाईं (Pooregosain) और भिखनापुर (Bhikhanapur); तथा बालिकाओं के लिए 2 विशेष स्कूल—बरई (Barai) और सराय नानकार (Sarai Nankar) में स्थापित किए गए।
- आचार्य विनोबा छात्रावास (Acharya Vinoba Hostel): स्टेशन रोड, खुशखुशवापुर (प्रतापगढ़) में दलित व पिछड़े वर्ग के मेधावी छात्रों के लिए निशुल्क आवासीय छात्रावास बनाया गया, जहां रहकर वे इंटर व डिग्री की पढ़ाई करते थे।
- 3 ग्रामीण हरिजन पुस्तकालय: सुदूर देहात के गांवों—डेरवा, शेखपुर चौरास और जमताली में ज्ञानवर्धक पुस्तकें और पत्रिकाओं से सुसज्जित पुस्तकालय खोले गए, जिनसे 585 छात्र और 135 छात्राएं लाभान्वित हुईं।
- वजीफे: 1971-72 में अनुसूचित जाति के 1,546 छात्रों और पिछड़े वर्ग के 397 विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति और मुफ्त पुस्तकें दी गईं।
8 दान और परोपकार की परंपरा: 6 ऐतिहासिक धर्मार्थ ट्रस्ट और 43 सुन्नी वक्फ
प्रतापगढ़ के नागरिकों और राजा-महाराजाओं में गरीबों, अनाथों और मेधावी छात्रों की मदद के लिए अपनी निजी संपत्ति दान करने की पुरानी गौरवशाली परंपरा रही है। चैरिटेबल एंडोमेंट्स एक्ट 1890 के तहत जिले में 6 प्रमुख धर्मार्थ ट्रस्ट पंजीकृत थे, जिनकी संपत्तियां उत्तर प्रदेश के कोषाध्यक्ष (इलाहाबाद) में सुरक्षित थीं:
| ट्रस्ट का नाम व स्थापना | पंजीकरण तिथि | मूल पूंजी / निवेश | वार्षिक आय (₹) | परोपकारी उद्देश्य व सेवा |
|---|---|---|---|---|
| प्रतापगढ़ कोरोनेशन स्कॉलरशिप ट्रस्ट | 20 नवंबर 1903 | ₹1,700 | ₹49.98 | किंग एडवर्ड VII के राज्यारोहण चंदे से जीआईसी के मेधावी छात्रों को वजीफा। |
| मुसम्मात कुसुम कुंवरी व मुंशी जमुना प्रसाद अनाथालय ट्रस्ट | 9 फरवरी 1915 | ₹20,600 | ₹605.64 | अनाथालय के गरीब और बेसहारा बच्चों का भरण-पोषण व शिक्षा। |
| प्रताप बहादुर चैरिटेबल ट्रस्ट एस्टेट | 2 दिसंबर 1916 | विशाल अचल संपत्ति | — | राजा प्रताप बहादुर सिंह द्वारा मेधावी व निर्धन छात्रों की उच्च शिक्षा मदद। |
| मुंशी कल्याण राय व श्रीमती कल्याण राय ट्रस्ट | 26 अप्रैल 1926 | ₹1,500 | ₹58.80 | गरीब छात्रों को नियमित छात्रवृत्ति देना। |
| प्रतापगढ़ पीस सेलिब्रेशन स्कॉलरशिप ट्रस्ट | 25 मई 1933 | ₹1,700 | ₹66.64 | प्रथम विश्व युद्ध शांति समारोह की बचत से छात्रों को छात्रवृत्ति। |
| बी.डी. दुबे चैरिटेबल हॉस्पिटल ट्रस्ट, पहाड़पुर | 12 सितंबर 1941 | ₹20,000 | ₹588.00 | पहाड़पुर में धर्मार्थ अस्पताल व औषधालय का निशुल्क संचालन। |
इसके अलावा, मुस्लिम समुदाय के कल्याण और धार्मिक संस्थाओं की देखरेख के लिए उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में 43 धर्मार्थ वक्फ पंजीकृत थे, जिनकी वार्षिक आय से मस्जिदों, कब्रिस्तानों, यतीमों और मुसाफिरों की मदद की जाती थी।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रतापगढ़ सदर तहसील के शुकुलपुर (Shukulpur) गांव के निवासी लेफ्टिनेंट कर्नल सोम दत्त शर्मा (Lt. Col. Som Datt Sharma) को 1971 के भारत-पाक युद्ध में अदम्य साहस के लिए राष्ट्रपति द्वारा प्रतिष्ठित 'वीर चक्र' से सम्मानित किया गया था।
जिले में वृद्धावस्था पेंशन योजना 1 दिसंबर 1957 को ₹20 प्रति माह से शुरू हुई थी। यह 65 वर्ष या अधिक आयु के बेसहारा बुजुर्गों के लिए थी, जिसे जनवरी 1972 में बढ़ाकर ₹30 प्रति माह किया गया।
प्रतापगढ़ 1947 से दिसंबर 1962 तक (पूरे 15 वर्ष) पूर्ण रूप से शराब-मुक्त जिला रहा। दिसंबर 1962 के बाद भी मंगलवार, 1 व 2 तारीख, राष्ट्रीय पर्वों और प्रमुख त्योहारों पर शराबबंदी लागू रही।
स्टेशन रोड, खुशखुशवापुर (प्रतापगढ़) में 'आचार्य विनोबा छात्रावास' (Acharya Vinoba Hostel) स्थापित किया गया था, जहां अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग के छात्रों को निशुल्क आवास और सुविधाएं दी जाती थीं।
9 फरवरी 1915 को 'मुसम्मात कुसुम कुंवरी एवं मुंशी जमुना प्रसाद अनाथालय ट्रस्ट' स्थापित हुआ था, जिसकी ₹20,600 की पूंजी से गरीब और बेसहारा अनाथ बच्चों का पालन-पोषण किया जाता था।
उत्तर प्रदेश जिला गजेटियर (1980) का यह 17वां अध्याय यह साबित करता है कि बेल्हा की आत्मा हमेशा से सेवा, त्याग और राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत रही है। चाहे 1971 के युद्ध में प्राण न्यौछावर करने वाले 11 शहीद और वीर चक्र विजेता कर्नल सोम दत्त शर्मा का शौर्य हो, ₹20 की पेंशन से बेसहारा बुजुर्गों के चेहरे पर आई मुस्कान हो, 15 साल की नशाबंदी का नैतिक संकल्प हो या विनोबा हॉस्टल और अनाथालय ट्रस्टों से गरीबों को मिला संबल—प्रतापगढ़ ने हमेशा कमजोर की लाठी बनकर समाज को आगे बढ़ाया है।