प्रतापगढ़ के पेड़-पौधे, जंगली जानवर, पक्षी और जलीय जीव: सरकारी गजेटियर से जानिए जिले का अद्भुत प्राकृतिक संसार
उत्तर प्रदेश डिस्ट्रिक्ट गजेटियर (District Gazetteer: Pratapgarh) का प्रामाणिक व रोचक अध्ययन: जानिए सई के कछारों में भेड़ियों की दहाड़, नवाबी बागों के फल, गंगा के घड़ियाल और हमारे गाँवों की समृद्ध जैव-विविधता!
🌳 प्रतापगढ़ के वन, पेड़-पौधे और नवाबी दौर के विशाल बाग-बगीचे (Flora)
सरकारी गजेटियर (पृष्ठ 11 व 12) के अनुसार, प्रतापगढ़ की मिट्टी इतनी उपजाऊ रही है कि यहाँ कभी बड़े-बड़े प्राकृतिक घने जंगल और बाग हुआ करते थे।
1. नवाबी दौर के बाग: जब पूरे जिले का 10% हिस्सा पेड़ों से ढका था!
गजेटियर में दर्ज एक अविश्वसनीय ऐतिहासिक आंकड़ा बताता है कि साल 1863 में प्रतापगढ़ जिले के कुल क्षेत्रफल का 7.51% भाग केवल फलों और छायादार पेड़ों के बागों (Groves) से घिरा था!
सदर प्रतापगढ़ में यह आंकड़ा 8.58% था, जबकि कुंडा तहसील के मानिकपुर परगने में तो रिकॉर्ड 9.90% भू-भाग हरे-भरे बागों से लहलहाता था। ये अधिकांश बाग अवध के नवाबों और स्थानीय राजाओं-ताल्लुकेदारों के समय लगाए गए थे। 1970-71 के सरकारी सर्वेक्षण में भी जिले में 26,118 हेक्टेयर भूमि बागों के अधीन दर्ज की गई थी।
गजेटियर बताता है कि इन बागों में मुख्य रूप से देसी लंगड़ा-दशहरी आम, जामुन और महुआ (Madhuca indica) के विशाल पेड़ होते थे। गाँवों के आसपास प्रतापगढ़ का अमृत फल आंवला (Emblica officinalis), कटहल, बेल, इमली, गूलर और नींबू-अमरूद के झुरमुट पाए जाते थे। महुआ का पेड़ गरीबों के लिए कल्पवृक्ष समान था, जिसके फूलों से मीठा भोजन और बीजों (कोइना) से तेल निकाला जाता था।
2. जिले के प्रमुख इमारती व औषधीय पेड़
जिले के जंगलों और ग्रामीण अंचलों में पाए जाने वाले मुख्य पेड़ों की सूची गजेटियर में इस प्रकार दर्ज है:
- ढाक / पलाश (Flame of the Forest): बंजर और ऊसर ज़मीनों पर बसंत में लाल-नारंगी फूलों से दहकने वाला पेड़, जिसके पत्तों से पत्तल-दोने बनते थे।
- शीशम (Dalbergia sissoo) व नीम (Azadirachta indica): सबसे मजबूत इमारती लकड़ी और प्राकृतिक औषधि का स्रोत।
- बबूल (Acacia arabica): सई नदी और अठेहा के कगारों पर बबूल के घने बीहड़ जंगल मिलते हैं।
- पवित्र त्रिमूर्ति: पीपल (Ficus religiosa), बरगद (Ficus bengalensis) और पाकर (Ficus infectoria)—जो हर गाँव के चौपाल और मंदिर परिसर की पहचान हैं।
- अर्जुन (Terminalia arjuna) व कचनार: नदियों के किनारे पाए जाने वाले औषधीय वृक्ष।
- स्थानीय घास: दूब (Cynodon dactylon), पशुओं के चारे के लिए स्पीयर घास, और छप्पर तथा मजबूत रस्सियां बटने के लिए इस्तेमाल होने वाली 'बैब' घास (Baib grass)।
🐺 प्रतापगढ़ के जंगली जानवर: सई के बीहड़ों का भेड़िया और गंगा के कछार (Fauna)
गजेटियर के पृष्ठ 12 पर दर्ज है कि पिछली एक सदी में जंगलों की कटाई और खेती का दायरा बढ़ने से जंगली जानवरों की संख्या में भारी कमी आई, लेकिन पुराने दौर में प्रतापगढ़ का वन्यजीवन बेहद रोमांचक था:
गजेटियर के अनुसार सई नदी के किनारे बने गहरे खड्डों, ऊंचे टीलों और कगारों (Ravines) में भेड़ियों की मांदें हुआ करती थीं। ये रात के अंधेरे में शिकार के लिए निकलते थे। भेड़ियों की घटती संख्या को देखते हुए इन्हें वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत संरक्षित किया गया।
गंगा नदी के किनारे फैले झाऊ (Tamarisk) के घने जंगलों में जंगली सूअर (Wild Pigs) और नीलगाय (Blue Bull) भारी तादाद में शरण लेते थे। धार्मिक आस्था के कारण स्थानीय लोग नीलगाय को नुकसान नहीं पहुंचाते थे, जिससे इनकी संख्या हमेशा बनी रही।
गजेटियर लिखता है—"Jackals and foxes abound" (सियार और लोमड़ियां जिले में प्रचुर संख्या में हैं)। शाम ढलते ही गाँवों के सीवान और झाड़ियों से सियारों का 'हुआं-हुआं' का शोर प्रतापगढ़ की रात की चिर-परिचित आवाज़ थी।
खेतों के मेड़ों पर तेज दौड़ने वाले खरगोश, कांटों वाली साही (Porcupine), लाल मुँह वाले बंदर (Rhesus Macaque) और झाड़ियों में घात लगाकर बैठने वाली फुर्तीली जंगली बिल्लियां (Wild Cat) जिले के जंगलों की सामान्य पहचान रहे हैं।
🦚 पक्षी संसार: झीलों के विदेशी मेहमान, मोर और सारस का पावन जोड़ा
प्रतापगढ़ की विशाल झीलों—जैसे कुंडा की बेंती झील, पट्टी की नौरेहरा झील, डेरवा, रंगाउली और रायबरेली सीमा के दलदलों ने जिले को पक्षियों का स्वर्ग बना दिया था (गजेटियर पृष्ठ 12-13):
- शीतकालीन प्रवासी बत्तखें व कलहंस (Migratory Ducks & Geese): सर्दियों के मौसम में साइबेरिया और मध्य एशिया से हजारों मील उड़कर प्रवासी बत्तखें और गीज़ प्रतापगढ़ की विशाल खुली झीलों में डेरा डालते थे। गजेटियर लिखता है कि ये पक्षी पानी के बीच इतने सतर्क रहते थे कि शिकारी आसानी से उनके पास नहीं पहुंच पाते थे।
- सारस क्रेन (Saras Crane - Grus antigone): उत्तर प्रदेश का राज्य पक्षी सारस प्रतापगढ़ के खेतों और उथली झीलों में सदा जोड़ों में प्रेम का प्रतीक बनकर विचरण करता है।
- राष्ट्रीय पक्षी मोर (Peacock): गाँवों के पुराने बागों, मंदिरों और खेतों में मोर स्वच्छंद विचरण करते हैं। हिंदू समाज में इन्हें पूज्य माना जाता है, इसलिए कोई इनका शिकार नहीं करता था।
- हरियल (Green Pigeon) व तीतर: पीपल और बरगद के फलों पर मंडराने वाला दुर्लभ तोते जैसा हरा कबूतर 'हरियल', भूरा तीतर (Brown Partridge) और गंगा के तटों पर कभी-कभार दिखने वाला अत्यंत दुर्लभ काला तीतर (Black Partridge)।
- बुनकर पक्षी बया (Weaver Bird - Ploceus philippinus): खजूर और बबूल के कांटों पर पत्तियों के रेशों से लटकते हुए खूबसूरत कारीगरी वाले लालटेन जैसे घोंसले बुनने वाली नन्हीं 'बया'।
- अन्य आम पक्षी: तोता (Parrot), मैना, गौरैया, नीलकंठ, किलहटी, सफेद बगुला, विशाल धनेश (Hornbill), कौवा, चील और मीठी तान छेड़ने वाली बुलबुल।
🐊 जलचर व सरीसृप: गंगा के मगरमच्छ, घड़ियाल और रहस्यमयी सांप
गजेटियर के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों और नदियों के कगारों पर कई प्रकार के सरीसृप पाए जाते हैं:
मानिकपुर, कालाकांकर और जहानाबाद के पास बहने वाली गंगा नदी में पुराने समय में विशाल मगरमच्छ (Crocodile) और लंबी थूथन वाले घड़ियाल (Gharial) धूप सेंकते देखे जाते थे। लेकिन अंधाधुंध शिकार और मछली पकड़ने के जालों के कारण इनकी संख्या बहुत तेजी से घटी। सरकार ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत मगरमच्छ और घड़ियाल को पूर्णतः संरक्षित जीव घोषित किया।
- जहरीले व हानिरहित सांप: जिले में सबसे जहरीले सांपों में काला नाग / कोबरा (Cobra) और बेहद शांत दिखने वाला जानलेवा करैत (Krait) पाया जाता है। वहीं खेतों में सबसे आम सांप धामिन / रैट-स्नेक (Rat Snake) है, जो पूरी तरह विषहीन होता है और चूहों को खाकर किसानों की फसल की रक्षा करता है।
- गोह और बिषकॉपड़ा: पेड़ों और खंडहरों में पाई जाने वाली बड़ी छिपकली गोह (Monitor Lizard), बिषकॉपड़ा (Gecko), जहरीले बिच्छू और गिरगिट।
🐟 मत्स्य संपदा: प्रतापगढ़ की नदियों और तालों की 30 देशी मछलियां
गजेटियर के पृष्ठ 13 और पृष्ठ 119-120 पर प्रतापगढ़ के जलतंत्र में पाई जाने वाली 30 से अधिक ताज़े पानी की मछलियों का वैज्ञानिक और स्थानीय नाम दर्ज है। भोजन के लिए यहाँ की मछलियां पूरे अवध क्षेत्र में स्वादिष्ट मानी जाती थीं:
| क्र.सं. | स्थानीय नाम | वैज्ञानिक नाम (Zoological Name) | प्रजाति वर्ग व स्वाद/विशेषता |
|---|---|---|---|
| 01 | रोहू (Rohu) | Labeo rohita | कार्प कुल, खाने के लिए सबसे लोकप्रिय व स्वादिष्ट |
| 02 | भाकुर / कतला (Bhakur) | Catla catla | बड़ा सिर, तेजी से बढ़ने वाली मीठे पानी की बड़ी मछली |
| 03 | नैन / मिरगल (Nain) | Cirrhina mrigala | तली में चरने वाली सुपाच्य कार्प मछली |
| 04 | करौंच (Karaunch) | Labeo calbasu | काले रंग की पौष्टिक कार्प प्रजाति |
| 05 | पढ़िन / पड़ाहन (Parahan) | Wallago attu | नदियों की बड़ी शिकारी कैटफिश (Freshwater Shark) |
| 06 | टेंगरा व टेंगा (Tengra) | Mystus aor / M. vittatus | कांटेदार मूंछों वाली कैटफिश, स्थानीय व्यंजनों में प्रसिद्ध |
| 07 | सौर / शौल (Saul) | Ophicephalus marulius | स्नेकहेड मछली, बिना पानी के भी घंटों जीवित रहने वाली |
| 08 | मांगुर (Mangur) | Clarias mangur | कीचड़ में रहने वाली अत्यधिक रक्तवर्धक व औषधीय मछली |
| 09 | सिंघी (Singhi) | Heteropneustes fossilis | कांटेदार डंक वाली देसी औषधीय कैटफिश |
| 10 | मोई / चीतल (Moi / Chitala) | Notopterus chitala | चांदी जैसी चमकदार पंखदार मछली (Featherback) |
| 11 | बामी / ईल (Bami) | Anguilla bengalensis | सांप जैसी लंबी मीठे पानी की ईल मछली |
| 12 | चैलवा (Chelwa) | Chela bacaila | सतह पर तैरने वाली छोटी चमकदार चांदी जैसी मछली |
गजेटियर दर्ज करता है कि 1966-67 में कालाकांकर ब्लॉक के पनिगो (Panigo) गाँव में 1.8 हेक्टेयर का सरकारी फिश सीड फार्म स्थापित किया गया, जिसमें 18 नर्सरी और 4 रियरिंग तालाब बनाए गए। गंगा से जीरा इकट्ठा कर रुनी ताल, लसर ताल और गुजवल ताल में मछली पालन को बढ़ावा दिया गया ताकि बच्चों और महिलाओं को भरपूर पोषण मिल सके।
🐄 पालतू जानवर और पशुधन: गाय, मुर्रा भैंस और कुंडा के कंबल (Livestock)
कृषि प्रधान प्रतापगढ़ में पशुधन हमेशा से किसानों की खुशहाली का पैमाना रहा है। गजेटियर के अनुसार 1900 के आसपास हर छोटे से छोटे काश्तकार के पास हल चलाने और कुओं से पुर (चरस) खींचने के लिए बैलों की जोड़ी होती थी।
1966 की आधिकारिक पशु गणना के आंकड़े (Livestock Census):
| पशु वर्ग | कुल संख्या (1966 जनगणना) | मुख्य नस्ल एवं उपयोगिता |
|---|---|---|
| गाय, बैल व सांड (Cattle) | 5,79,355 | खेती, हल चलाने और देशी दूध के लिए |
| बकरियां (Goats) | 2,43,135 | बरबरी और बीकानेरी नस्ल, दूध और मांस हेतु आम पशु |
| भैंसें (Buffaloes) | 1,70,669 | मुर्रा (Murrah) नस्ल, शुद्ध और गाढ़े घी के उत्पादन में अग्रणी |
| मुर्गियां (Poultry) | 1,06,640 | देसी मुर्गियां व सरकारी कुक्कुट प्रक्षेत्र प्रतापगढ़ |
| सुअर (Pigs) | 45,373 | कुंडा तहसील में पारम्परिक पालन |
| भेड़ें (Sheep) | 40,162 | कुंडा की प्रसिद्ध ऊनी भेड़ें (कंबल निर्माण हेतु) |
| घोड़े व टट्टू (Horses & Ponies) | 4,929 | सवारी, बग्घी और माल ढुलाई |
| ऊंट (Camels) | 2,814 | रेतीले कछारों और व्यापारिक मेलों में ढुलाई |
| गधे व खच्चर (Donkeys & Mules) | 2,395 | कुम्हारों और धोबियों द्वारा सामान ढोने में उपयोग |
गजेटियर में लिखा है कि कुंडा तहसील में उत्तम नस्ल की भेड़ें पाली जाती थीं। स्थानीय गडरिये इन्हें बेचते नहीं थे, बल्कि इनकी ऊन काटकर घर-घर में **देशी कंबल** बुनते थे। इन भेड़ों की खाद खेतों के लिए इतनी शक्तिशाली मानी जाती थी कि किसान इन्हें अपने खेतों में रात भर ठहराने के लिए होड़ लगाते थे! वहीं 1900 के आसपास भदरी रियासत (Bhadri Estate) में कोर्ट ऑफ वार्ड्स के तहत उन्नत नस्ल के घोड़े और खच्चर तैयार करने के विशेष प्रयास भी किए गए थे।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
हाँ, आधिकारिक गजेटियर (1980) के अनुसार सई नदी के ऊंचे बीहड़ों और कगारों में भारतीय भेड़िए (Wolves) प्रमुख शिकारी जानवर थे। बाद में जंगलों की कटाई से इनकी संख्या कम हुई और इन्हें 1972 के कानून के तहत संरक्षित किया गया।
नवाबी काल से ही महुआ, आम (दशहरी-लंगड़ा) और जामुन के विशाल बाग लगाए जाते थे। इसके अलावा प्रतापगढ़ का सुप्रसिद्ध आंवला, बेल, कटहल और अमरूद के पेड़ हर गाँव में बहुतायत से मिलते हैं।
गजेटियर में 30 से अधिक प्रजातियों का उल्लेख है, जिनमें रोहू, भाकुर (कतला), नैन, करौंच, पढ़िन (कैटफिश), टेंगरा, सौर, मांगुर, सिंघी, मोई और बामी मछली प्रमुख हैं।
गंगा के 48 किमी लंबे खादर में पाए जाने वाले झाऊ (Tamarisk) के जंगलों में जंगली सूअर और नीलगायों के बड़े-बड़े झुंड प्राकृतिक आवास बनाकर रहते थे।
कुंडा तहसील में उत्तम नस्ल की भेड़ें पाली जाती थीं, जिनसे प्राप्त ऊन से स्थानीय बुनकर उच्च कोटि के कंबल तैयार करते थे। खेतों के लिए इनकी खाद भी अत्यंत उपजाऊ मानी जाती थी।
प्रतापगढ़ का यह प्राकृतिक वैभव केवल किताबों का पन्ना नहीं, बल्कि हमारी माटी की धड़कन है। महुआ की भीनी-भीनी खुशबू, सई के कछार में सारस का जोड़ा, आम की डालियों पर कूकती कोयल और तालाबों में इठलाती मछलियां—यह सब मिलकर हमारे बेल्हा को स्वर्ग बनाते हैं। आधुनिक विकास की दौड़ में अपने इन पुराने पेड़ों, बागों और मासूम बेजुबानों को बचाकर रखना हम सब की साझी जिम्मेदारी है!
📚 प्रामाणिक ऐतिहासिक एवं सरकारी संदर्भ (Official Gazetteer Source):
- उत्तर प्रदेश डिस्ट्रिक्ट गजेटियर्स: "प्रतापगढ़ (Pratapgarh)" — संपादन: दांगली प्रसाद वरुण, आई.ए.एस. (State Editor, 1980), अध्याय 1: General (Flora, Forests, Fauna, Birds, Fish, Reptiles - पृष्ठ 11 से 14) एवं अध्याय 4: Agriculture & Animal Husbandry (पृष्ठ 118 से 122)।
- एच. आर. नेविल (H. R. Nevill, 1904), "Pratapgarh: A Gazetteer (Volume XLVII of the District Gazetteers of the United Provinces of Agra and Oudh)", गवर्नमेंट प्रेस, इलाहाबाद।
- वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट (Wild Life Protection Act, 1972) एवं उत्तर प्रदेश वन विभाग वार्षिक रिपोर्ट।
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