डॉ. तारा सिंह: जीवन परिचय, 'स्वर्गविभा' व साहित्य साधना (Dr. Tara Singh Biography, Swarg Vibha Portal & Hindi Poetry)
घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियों के बीच 30 किताबें लिखने वाली संवेदनशील कवयित्री और 'स्वर्गविभा' पोर्टल की संपादक।
कुंडा के परियावाँ की कला संगम अकादमी और आलापुर के ग्रामीण कवि सम्मेलनों से इनका गहरा जमीनी नाता रहा।
2005 में जब इंटरनेट पर हिंदी लिखना बहुत कठिन था, तब गाँव और विदेश के आम लेखकों को बिना पैसे लिए मंच दिया।
मुंबई की अनमोल प्रोडक्शन ने फौजी जवानों पर लिखी उनकी कविता 'जयहिंद सिपाई जी' को फिल्म का मुख्य गीत बनाया।
काव्य में 'एक बूँद की प्यासी', 'साँझ का सूरज' और ग़ज़लों में 'नगमें हैं मेरे दिल के' सबसे ज्यादा पढ़ी गईं।
ये सम्मान सरकारी साहित्य अकादमी नहीं, बल्कि देश भर की छोटे शहरों की साहित्यिक संस्थाओं का जन-प्रेम व आदर थे।
"कविता लिखने के लिए मुझे किसी शांत महल या एकांत की जरूरत नहीं पड़ी। दिन भर घर के काम निपटाकर जब रात को सब सो जाते, तब सफेद कागज पर मेरा सच्चा दर्द उतरता था।"
— डॉ. तारा सिंह | चौके-चूल्हे की मर्यादा में रहकर शब्दों की लौ जलाने वाली कलमकारसीधे-सादे घर में 10 अक्टूबर 1952 की सुबह और पुरानी कापियों में लिखी तुकबंदी
बात 10 अक्टूबर 1952 की है। उत्तर भारत के एक सीधे-सादे मध्यमवर्गीय परिवार में जब एक नन्ही बच्ची ने जन्म लिया, तो किसी ने यह सपने में भी नहीं सोचा था कि आगे चलकर यह लड़की किताबों की दुनिया में अपना नाम दर्ज कराएगी। घर में कोई बहुत बड़ी दौलत नहीं थी, बस बड़ों का कड़ा अनुशासन था और सीधे रास्ते पर चलने की सीख थी। बच्ची का नाम रखा गया—तारा।
उस जमाने में गाँव-कस्बों में बेटियों की जिंदगी बहुत सीमित दायरे में बंधी होती थी। लड़कियों का काम केवल घर-गृहस्थी का हुनर सीखना और समय पर ब्याह कर ससुराल चले जाना माना जाता था। लेकिन तारा जी का मन इन बंधनों में नहीं रमता था। जब घर के बाकी बच्चे आँगन में गिल्ली-डंडा या खेल-कूद में लगे रहते, तब तारा किसी कोने में बैठकर रेडियो पर बजने वाले पुराने लोकगीतों और कविताओं की धुन बड़े गौर से सुनती थीं।
प्राइमरी स्कूल में जब भी शनिवार को बाल-सभा होती थी, तो तारा जी बिना किसी डर के मंच पर खड़ी हो जाती थीं। वे अपनी पुरानी कापियों के पीछे बची खाली जगहों पर छोटी-छोटी तुकबंदियां लिखतीं और सबको सुना देतीं। मास्टरों और सहपाठियों ने जब उनकी इस लगन को देखा, तो वे उनकी पीठ थपथपाने लगे। यहीं से उनके मन में यह भरोसा बैठ गया कि चाहे जिंदगी में कितनी भी मुश्किलें आएं, वे अपनी कलम का साथ कभी नहीं छोड़ेंगी।
तारा जी के परिवार ने भी उस दौर के रूढ़िवादी रिवाजों के आगे हार नहीं मानी। उनके पिता ने देखा कि बेटी की रुचि पढ़ने-लिखने में है, इसलिए उन्होंने बेटियों को घर में बिठाने की जगह स्कूल जाने और पढ़ाई जारी रखने की पूरी छूट दी।
साहित्य रत्न की परीक्षा, देसी चिकित्सा की समझ और ओरिएंटल शोध की सच्चाई
तारा सिंह केवल शौक के लिए तुकबंदी नहीं कर रही थीं। वे हिंदी भाषा को कायदे से सीखना चाहती थीं। उस जमाने में हिंदी साहित्य सम्मेलन (प्रयाग) द्वारा कराई जाने वाली 'साहित्य रत्न' की परीक्षा बहुत कठिन मानी जाती थी। इसमें हिंदी के प्राचीन व्याकरण, काव्यशास्त्र और इतिहास की गहरी समझ परखी जाती थी। तारा जी ने पूरी लगन से मेहनत की और साहित्य रत्न की परीक्षा अच्छे अंकों से पास की।
इसके अलावा उन्होंने वैकल्पिक और बायोकेमिक चिकित्सा पद्धति में एम.बी.ई.एच. (M.B.E.H.) की पढ़ाई भी की। इस देसी चिकित्सा की जानकारी ने उन्हें यह सिखाया कि गरीब और बीमार लोगों का दर्द कैसा होता है। यही वजह है कि उनकी रचनाओं में आगे चलकर इंसानी शरीर और मन की बीमारी की सच्ची बातें नजर आईं।
- शोध कार्य: कोलकाता के 'इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ओरिएंटल हेरिटेज' से उन्होंने भारतीय परंपरा, दर्शन और साहित्य के आपसी जुड़ाव पर अध्ययन किया।
- विद्या वाचस्पति उपाधि: इसी अध्ययन के आधार पर उस संस्थान ने उन्हें 'विद्या वाचस्पति' (Ph.D. in Oriental Learning) की उपाधि दी।
- अकादमिक हकीकत: यह समझना जरूरी है कि यह कोई सरकारी केंद्रीय विश्वविद्यालय की पारंपरिक नौकरी वाली डिग्री नहीं थी, बल्कि प्राच्य विद्या (भारतीय संस्कृति) के निजी शोध संस्थान द्वारा दिया गया एक अकादमिक सम्मान था।
आगे चलकर भागलपुर और प्रयागराज के कुछ निजी हिंदी विद्यापीठों ने उन्हें 'विद्या सागर' जैसी मानद उपाधियां भी दीं। इन सभी अध्ययनों का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि उनकी भाषा में गहराई आई और वे केवल सतही बातें लिखने से बच गईं।
कलकत्ता के प्रोफेसर पति, घर का चौका-बर्तन और रात 11 बजे जागती खामोश मेज
तारा जी का विवाह डॉ. ब्रह्मदेव प्रसाद सिंह (Dr. B. P. Singh) के साथ हुआ। डॉ. बी. पी. सिंह कोलकाता विश्वविद्यालय से जुड़े प्रतिष्ठित 'आचार्य जगदीश चंद्र बसु कॉलेज' में रसायन विज्ञान (Chemistry) के विभागाध्यक्ष और बाद में प्रिंसिपल रहे। वे एक जाने-माने वैज्ञानिक और शिक्षक थे, जिनका पूरा जीवन विज्ञान की प्रयोगशाला और किताबों के बीच बीतता था।
शादी के बाद तारा जी गाँव और छोटे शहर की खुली हवा छोड़कर सीधे महानगर कलकत्ता (कोलकाता) के एक भरे-पूरे परिवार में पहुँचीं। एक वैज्ञानिक पति के घर में जहाँ हर चीज नाप-तौल और तर्क से चलती थी, वहाँ एक भावुक कवयित्री के लिए अपनी रचनात्मकता को बचाए रखना आसान नहीं था। लेकिन डॉ. बी. पी. सिंह ने कभी अपनी पत्नी के लिखने पर रोक नहीं लगाई, बल्कि उन्हें हमेशा आगे बढ़ने की हिम्मत दी।
कोलकाता के उस घर में दिन भर रिश्तेदारों की आवभगत, बच्चों की देखरेख और तीन वक्त की रसोई का भारी काम रहता था। सुबह से शाम तक हाथ में कलछी और बर्तन ही रहते। जब रात के 11 बजते, पूरा घर सो जाता और बाहर महानगर की सड़कें सुनसान हो जातीं, तब तारा जी अपनी मेज पर बैठती थीं। राशन की पर्चियों के पीछे, पुरानी डायरियों पर वे रात दो-तीन बजे तक लिखती रहती थीं। वे खुद कहती थीं: "अगर मैं घर के काम से मुंह मोड़ लेती तो शायद परिवार बिखर जाता, और अगर रात को कलम न पकड़ती तो मेरा दम घुट जाता।"
1992 में कलकत्ता दूरदर्शन और स्टार टीवी पर उनकी रचना को प्रसारित किया गया, जहाँ उन्हें काफी पसंद किया गया। धीरे-धीरे देश भर की पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएं और ग़ज़लें छपने लगीं और वे पाठकों के बीच जानी जाने लगीं।
'स्वर्गविभा' की असल कहानी: जब इंटरनेट पर हिंदी अजनबी थी और टाइप करना आफत
साल 2005 के आसपास भारत में कंप्यूटर और इंटरनेट बिल्कुल नया था। उस समय इंटरनेट की पूरी दुनिया पर सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी का कब्जा था। आज की तरह मोबाइल में हिंदी कीबोर्ड नहीं होते थे। कंप्यूटर पर हिंदी लिखना इतना मुश्किल था कि फॉन्ट बदल जाता था और अक्षर टूटकर अजीब दिखने लगते थे। बड़े-बड़े नामी लेखक भी कंप्यूटर छूने से कतराते थे।
ऐसे समय में डॉ. तारा सिंह ने एक अनोखी हिम्मत दिखाई। अपने बेटे और परिवार के तकनीकी सहयोग से उन्होंने 'स्वर्गविभा' (www.swargvibha.in) नाम से एक हिंदी वेब पोर्टल शुरू किया। यह किसी गैर-व्यावसायिक महिला लेखक द्वारा शुरू किया गया हिंदी का शुरुआती अंतरराष्ट्रीय वेब मंच था।
"हिंदी को अगर नई सदी में जिंदा रहना है, तो उसे कागजी किताबों की अलमारी से निकलकर कंप्यूटर की स्क्रीन और इंटरनेट तक पहुँचना ही होगा।"
— डॉ. तारा सिंह | 'स्वर्गविभा' शुरू करने के पीछे की सीधी सोच (2005)'स्वर्गविभा' का सबसे बड़ा काम यह था कि इसने किसी से कोई पैसा नहीं लिया। नेपाल, मॉरीशस, अमेरिका, ब्रिटेन और खाड़ी देशों में रहने वाले जो भारतीय अपनी भाषा में कुछ लिखना चाहते थे, लेकिन उनके पास कोई मंच नहीं था, 'स्वर्गविभा' ने उनकी रचनाएं मुफ्त में छापीं। बिहार और यूपी के छोटे-छोटे कस्बों के नौजवान जो दिल्ली के बड़े संपादकों की उपेक्षा से दुखी थे, उन्हें इस पोर्टल ने तुरंत पाठक दिला दिए।
'एक बूँद की प्यासी' से 'साँझ का सूरज': नारी मन का अकेलापन और रोजमर्रा का दर्द
तारा सिंह की कविताओं में कोई बनावटी बौद्धिक पहेलियां या भारी-भरकम शब्दजाल नहीं होता था। वे बहुत सहज और सीधी भाषा में लिखती थीं। दिल्ली के मीनाक्षी प्रकाशन से जब उनकी शुरुआती किताबें छपीं, तो पाठकों को लगा कि यह तो उनके अपने घर की कहानी है।
उनकी सबसे मशहूर किताब थी—'एक बूँद की प्यासी'। इस किताब में उन्होंने किसी सोने-चांदी की प्यास नहीं लिखी थी, बल्कि उस आम घरेलू औरत का दर्द लिखा था जो दिन भर सबके लिए खटती है लेकिन बदले में उसे सिर्फ दो मीठे बोल और थोड़ा सा सम्मान चाहिए होता है। इसी तरह 'सिसक रही दुनिया' में उन्होंने समाज में फैले स्वार्थ, भुखमरी और युद्ध के खतरों पर सीधी चोट की।
उनके तीसरे संग्रह 'हम पानी में भी खोजते रंग' की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें दुख के बीच भी जीने की उम्मीद दिखाई देती है। वे लिखती हैं कि एक गरीब या थके हुए इंसान की जिंदगी भले ही बेरंग पानी जैसी लगे, लेकिन अगर मन में हौसला हो तो वह उसी पानी में सात रंग ढूंढ लेता है। उनकी किताब 'साँझ का सूरज' बुढ़ापे के अकेलेपन और ढलती उम्र की शांति का एक सीधा दस्तावेज है।
तारा जी की कविताओं का विषय बहुत सीधा होता था—गाँव के खेत, मिट्टी की सोंधी खुशबू, खिड़की पर बैठी गौरैया, या बूढ़ी माँ का अपने परदेसी बेटे का इंतजार। इसी सीधेपन ने उनकी कविताओं को आम पाठकों के दिल के करीब पहुँचाया।
ग़ज़ल संसार: शराब और साकी की जगह घर-गृहस्थी, रिश्ते और समाज की कड़वी सच्चाई
आमतौर पर ग़ज़ल को शराब, मयखाने, हुस्न और महबूबा की जुल्फों की विधा माना जाता था। लेकिन तारा सिंह ने अपनी ग़ज़लों में इस ढर्रे को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने कुल 7 ग़ज़ल संग्रह लिखे, जिनमें उनका पहला संग्रह 'नगमें हैं मेरे दिल के' सबसे ज्यादा चर्चित रहा।
इसके बाद 'खिरमने गुल', 'बर्गे यासमन' और 'गुलिस्तान-ए-हयात' जैसी किताबों में उन्होंने अवध की सीधी-सादी हिन्दुस्तानी जुबान का इस्तेमाल किया। उन्होंने कठिन अरबी-फारसी शब्दों से परहेज किया ताकि गाँव का आम आदमी भी उनके शेरों को आसानी से समझ सके।
- दिखावे से दूरी: पारंपरिक मयखाने की बातों को छोड़कर उन्होंने घर-परिवार के ताने, रिश्तेदारों का दिखावा और बच्चों की फिक्र को शेर का विषय बनाया।
- आसान जुबान: गाँव-देहात की बोली से मिलते-जुलते शब्द चुने, जिन्हें मंच पर सुनते ही लोग सिर हिलाकर वाह-वाह कर उठते।
- साफ संदेश: उनका एक चर्चित शेर है: "चेहरों पे मुखौटे हैं यहाँ हर तरफ, किसे अपना कहें किसे बेगाना कहें।" यह शेर समाज के ढोंग पर सीधा तमाचा है।
जब वे देश के मुशायरों और सम्मेलनों में अपनी ग़ज़लें पढ़ती थीं, तो लोग उनकी सादगी और बिना किसी नखरे के सीधे बात कहने के अंदाज़ के कायल हो जाते थे।
प्रतापगढ़ की माटी से गहरा नाता: परियावाँ और आलापुर के देहाती चबूतरों की याद
भले ही डॉ. तारा सिंह की गृहस्थी का लंबा समय कलकत्ता और नवी मुंबई के फलैटों में गुजरा, लेकिन उनका दिल हमेशा अपने पैतृक जिले प्रतापगढ़ की माटी से ही जुड़ा रहा। वे महानगर की चकाचौंध में कभी अपने गाँव और अपनी जड़ों को नहीं भूलीं।
प्रतापगढ़ के कुंडा इलाके में गंगा किनारे बसे ऐतिहासिक कस्बे परियावाँ (कालाकांकर मार्ग) में एक संस्था चलती थी—'साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं कला संगम अकादमी'। तारा जी लंबे समय तक इस अकादमी की कार्यकारी अध्यक्ष रहीं। वे केवल कागजों पर अध्यक्ष नहीं थीं, बल्कि हर साल गाँव पहुँचती थीं।
प्रतापगढ़ के आलापुर स्थित 'ग्राम भारती संस्था' और परियावाँ में जब भी कवि सम्मेलन होते, तारा जी मुंबई से ट्रेन पकड़कर सीधी गाँव पहुँचती थीं। वे मिट्टी के चबूतरों पर दरी बिछाकर बैठ जातीं और गाँव के नौजवान लड़कों की कच्ची-पक्की कविताएं सुनतीं। अपनी जेब से पैसे निकालकर वे देहाती कवियों को इनाम और प्रमाण-पत्र देती थीं। उनका कहना था: "असली कविता दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में नहीं, बल्कि प्रतापगढ़ के इन खेतों और धूल भरे रास्तों में सांस लेती है।"
सई नदी के किनारे, माँ बेल्हा देवी के मंदिर और प्रतापगढ़ के आँवला के बागों का जिक्र उनकी कई कविताओं में बार-बार आया है। जिले के स्थानीय साहित्यिक प्रेमियों ने उन्हें 'साहित्य मार्तण्ड' और 'विवेकानंद सम्मान' जैसे आदर भरे अलंकरण दिए।
'जयहिंद सिपाई जी': जब एक घरेलू कवयित्री की रचना हिंदी फीचर फिल्म का मुख्य गीत बनी
तारा सिंह की कलम सिर्फ किताबों की अलमारी तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने मुंबई के सिनेमा जगत में भी अपनी पहचान बनाई। जब देश की सीमाओं पर जवान शहीद होते थे, तो उनका दिल भर आता था।
उनकी तीसरी किताब में एक बहुत सीधी और मर्मस्पर्शी कविता छपी थी—'जयहिंद सिपाई जी'। इस कविता में सरहद पर गोलियों के सामने सीना ताने खड़े एक आम जवान, घर में उसकी राह देखती बूढ़ी माँ और देश के नाम उसके आखिरी पैगाम का बहुत मार्मिक चित्रण था।
"तू सीमा पर जाग रहा है, तभी तो हम सब सोते हैं। तेरे खून से सींची माटी, हम नतमस्तक होते हैं। जयहिंद सिपाई जी!"
— 'जयहिंद सिपाई जी' कविता की सीधी और असरदार पंक्तियांमुंबई के प्रोडक्शन हाउस अनमोल प्रोडक्शन के लोगों ने जब यह कविता पढ़ी, तो वे इससे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इसे अपनी हिंदी फिल्म का मुख्य शीर्षक गीत (Title Song) बना लिया। इसके बाद तारा जी को मुंबई की जानी-मानी संस्था 'द फिल्म राइटर्स एसोसिएशन' (अंधेरी, मुंबई) की सदस्यता भी मिली। लेकिन उन्होंने कभी फिल्मों के पीछे भागकर अपनी सादगी और मर्यादा से समझौता नहीं किया।
30 स्वतंत्र किताबें, 114 साझा संकलन और साहित्यिक सीमाओं की प्रामाणिक तालिका
डॉ. तारा सिंह की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उन्होंने बिना किसी सहायक के, घर की जिम्मेदारियों के बीच 30 स्वतंत्र किताबें लिखीं और 114 से ज्यादा साझा संकलनों में अपनी रचनाएं दीं।
यहाँ एक निष्पक्ष बात समझना जरूरी है: उनकी सभी 30 किताबें बहुत भारी साहित्यिक प्रयोग नहीं थीं। उनमें से कई किताबें बहुत पतली थीं, जिनमें उनके समय-समय पर लिखे गए छोटे-छोटे गीत, ग़ज़लें और विचार संकलित थे। लेकिन एक घरेलू महिला के लिए इतना लिख पाना अपने आप में एक बड़ा रिकॉर्ड है। नीचे उनकी 10 प्रमुख किताबों का विवरण दिया जा रहा है:
| क्र.सं. | किताब का नाम | लिखने की विधा | किताब की मुख्य बात व विषय |
|---|---|---|---|
| 01 | एक बूँद की प्यासी | काव्य संग्रह | घर-परिवार में खटने वाली आम औरत के मन की व्यथा और आत्मसम्मान की चाह। |
| 02 | सिसक रही दुनिया | काव्य संग्रह | गरीबी, भुखमरी, समाज में फैली बेईमानी और वैश्विक शांति की पुकार। |
| 03 | हम पानी में भी खोजते रंग | काव्य संग्रह | कठिन से कठिन समय में भी हिम्मत न हारने और नई उम्मीद जगाने वाली कविताएं। |
| 04 | साँझ का सूरज | काव्य संग्रह | ढलती उम्र का अकेलापन, जीवन का सच और मन की गहरी शांति। |
| 05 | नगमें हैं मेरे दिल के | ग़ज़ल संग्रह | सीधी बोलचाल की भाषा में रची गई दिल को छू लेने वाली हिंदी ग़ज़लें। |
| 06 | गुलिस्तान-ए-हयात | ग़ज़ल संग्रह | रिश्तों की कड़वाहट, अपनों का दिखावा और समाज के दोहरे चरित्र पर शेर। |
| 07 | दूसरी औरत | उपन्यास | पुरुष प्रधान समाज में एक स्त्री के अस्तित्व और कानूनी-सामाजिक अधिकारों की लड़ाई। |
| 08 | तृषा | कहानी संग्रह | मध्यमवर्गीय परिवारों की रोजमर्रा की खींचतान और अनकहे दर्द की कहानियां। |
| 09 | रम्यतटी | ललित निबंध | प्रकृति, सई-गंगा की कछार और भारतीय लोक-संस्कृति पर लिखे गए सीधे आलेख। |
| 10 | जयहिंद सिपाई जी | गीत संग्रह | भारतीय फौजियों की बहादुरी और देशभक्ति पर लिखे गए जोशीले गीत। |
इन स्वतंत्र कृतियों के अलावा उन्होंने 'काव्य मंदाकिनी', 'शून्य से शिखर तक' और 'माटी के रंग' जैसे अनगिनत संकलनों में भाग लिया और इंटरनेट के आने पर उनकी रचनाएं देश-विदेश के कई पोर्टल्स पर पढ़ी गईं।
'स्वर्गविभा तारा सम्मान': अपनी निजी बचत से उपेक्षित और ग्रामीण लेखकों को हौसला
अक्सर देखा जाता है कि जब किसी लेखक का नाम हो जाता है, तो वह केवल अपनी किताबें बेचने और खुद सम्मान लेने में मशगूल हो जाता है। लेकिन तारा सिंह ने एक अलग रास्ता चुना। वे जानती थीं कि छोटे कस्बों और गाँवों में ऐसे बहुत से नौजवान और बुजुर्ग लेखक हैं जो बहुत अच्छा लिखते हैं, लेकिन उनके पास बड़े प्रकाशकों को देने के लिए पैसे नहीं हैं।
इसी सोच के तहत उन्होंने अपनी घरेलू बचत से 'स्वर्गविभा तारा सम्मान' की शुरुआत की। हर साल वे हिंदी के कुछ ऐसे लेखकों को चुनती थीं जिनका कोई गॉडफादर नहीं था, और उन्हें मंच पर बुलाकर सम्मानित करती थीं।
- कोई फीस नहीं: इस सम्मान के लिए कभी किसी लेखक से कोई पर्ची, चंदा या आवेदन शुल्क नहीं लिया गया।
- नकद राशि व अंगवस्त्र: चयनित लेखकों को सम्मान पत्र के साथ अपनी जेब से नकद पुरस्कार दिया जाता था ताकि उनका हौसला बढ़े।
- देहाती रचनाकारों को तरजीह: बिहार, यूपी और राजस्थान के उन गुमनाम रचनाकारों को खोजकर सम्मानित किया गया जिन्हें बड़े शहरों के मठाधीश पूछते भी नहीं थे।
यह काम बताता है कि वे केवल खुद बड़ा बनना नहीं चाहती थीं, बल्कि अपने साथ दूसरों को भी आगे ले जाने की नेक नीयत रखती थीं।
230 पुरस्कारों की हकीकत: छोटे शहरों की सोसायटियों का प्रेम बनाम सरकारी सम्मान
तारा सिंह के परिचय में अक्सर लिखा मिलता है कि उन्हें 230 से अधिक सम्मान और पदक मिले। एक जागरूक पाठक या समीक्षक के मन में तुरंत सवाल उठता है कि क्या ये सम्मान ज्ञानपीठ या साहित्य अकादमी जैसे थे?
यहाँ बिना किसी लाग-लपेट के सच लिखना जरूरी है: हिंदी पट्टी में यह एक आम परंपरा है कि समस्तीपुर, बलदेव, कटनी, गुना, पानीपत जैसे सैकड़ों कस्बों में गैर-सरकारी साहित्यिक मंडलियां, न्यास और सोसायटियां चलती हैं। ये संस्थाएं बड़े-बड़े नामों वाली उपाधियां—जैसे 'साहित्य मार्तण्ड', 'विद्या वारिधि', 'कवि कोकिल'—के मेडल और शॉल बांटती हैं। तारा जी को मिले 230 सम्मानों में से अधिकांश सम्मान इसी श्रेणी के थे।
भले ही इन 230 सम्मानों का कोई सरकारी या अंतरराष्ट्रीय वजन न हो, लेकिन ये इस बात का पक्का सबूत हैं कि हिंदी के जमीनी पाठक उनसे कितना प्यार करते थे। इसके अलावा कुछ ठोस सम्मान भी उन्हें मिले:
• बिहार सरकार (राष्ट्रभाषा परिषद): 'साहित्य सेवी सम्मान' (₹11,000 नकद)।
• राजस्थान रत्नाकर (दिल्ली): 'श्री दीपचंद जैन पुरस्कार' (₹15,000 नकद)।
• हिंदी साहित्य सम्मेलन (प्रयाग): 2010 के शताब्दी समारोह में 'साहित्य महोपाध्याय' की मानद उपाधि।
• सद्भावना सम्मान: काठमांडू में 'भारत-नेपाल सद्भावना अवार्ड' और दिल्ली में 'मदर टेरेसा अवार्ड'।
इन तमगों ने तारा जी के सिर पर कभी घमंड नहीं चढ़ने दिया। वे जानती थीं कि असली लेखक वह नहीं होता जिसके पास मेडल ज्यादा हों, बल्कि वह होता है जिसकी बात सीधे दिल में उतर जाए।
तटस्थ समीक्षक दृष्टि: न कोई विद्रोही देवी, न मठाधीश—सिर्फ एक आम औरत की सच्ची कलम
अगर आज की तारीख में एक निष्पक्ष समीक्षक की तरह डॉ. तारा सिंह के पूरे जीवन का हिसाब लगाया जाए, तो हमें बिना किसी चापलूसी के तीन बातें साफ-साफ कहनी होंगी:
"तारा सिंह की असली बड़ाई 230 मेडलों में नहीं है। उनकी असली ताकत इस बात में है कि उन्होंने घर के चौके-चूल्हे के बीच अपनी कलम नहीं मरने दी और जब बड़े-बड़े लेखक इंटरनेट से डरते थे, तब उन्होंने हिंदी का डिजिटल चबूतरा खड़ा कर दिया।"
— आधुनिक हिंदी साहित्य: निष्पक्ष पड़ताल1. वे कोई विद्रोही नहीं, पारंपरिक बहू थीं: उन्होंने कभी समाज की रूढ़ियों के खिलाफ कोई झंडा उठाकर विद्रोह नहीं किया। वे एक पारंपरिक मध्यमवर्गीय परिवार की सीधी-सादी बहू, पत्नी और माँ बनी रहीं। उन्होंने घर की मर्यादा और जिम्मेदारियों के भीतर रहकर ही रात की खामोशी में अपनी अभिव्यक्ति का रास्ता तलाशा।
2. बड़े आलोचकों ने क्यों नहीं पूछा?: दिल्ली या इलाहाबाद के बड़े नामी आलोचकों ने अपनी किताबों में तारा सिंह का नाम कभी नहीं लिखा। इसकी सीधी वजह यह थी कि वे किसी राजनीतिक गुट या साहित्यिक गिरोह का हिस्सा नहीं बनीं। उनकी भाषा बहुत सीधी और भावुक थी, जिसे तथाकथित विद्वान 'अति-सरल' कहकर नजरअंदाज कर देते थे।
3. असली और स्थायी देन क्या है?: जब हम सारे मेडल और प्रशस्तियां हटा देते हैं, तब भी तारा सिंह का नाम दो वजहों से हमेशा आदर से लिया जाएगा—पहला, 2005 में 'स्वर्गविभा' के जरिए दुनिया भर के हिंदी प्रेमियों को बिना पैसे लिए डिजिटल मंच देना; और दूसरा, प्रतापगढ़ जैसे ग्रामीण अंचल के नौजवानों को अपनी जेब से इनाम देकर लिखने के लिए प्रेरित करना।
उनका जन्म 10 अक्टूबर 1952 को एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। बाद में उनका विवाह कोलकाता के प्रोफेसर डॉ. बी. पी. सिंह से हुआ।
वे प्रतापगढ़ के परियावाँ (कुंडा) की 'साहित्यिक एवं कला संगम अकादमी' की कार्यकारी अध्यक्ष रहीं और आलापुर में नियमित सेवा दी।
यह 2005 में शुरू की गई एक अंतरराष्ट्रीय हिंदी साहित्यिक वेब पत्रिका (swargvibha.in) है, जिसने देश-विदेश के आम लेखकों को मुफ्त मंच दिया।
उन्होंने 30 स्वरचित पुस्तकें (20 काव्य संग्रह, 7 ग़ज़ल संग्रह, 1 उपन्यास, 1 कहानी संग्रह, 1 आलेख) और 114 साझा संकलनों में योगदान दिया।
उनका पहला प्रमुख काव्य संग्रह 'एक बूँद की प्यासी' (मीनाक्षी प्रकाशन नई दिल्ली) है, जिसमें नारी मन की सच्ची पीड़ा व्यक्त हुई है।
अनमोल प्रोडक्शन (मुंबई) द्वारा उनकी प्रसिद्ध देशभक्ति रचना 'जयहिंद सिपाई जी' को हिंदी फीचर फिल्म का मुख्य शीर्षक गीत बनाया गया।
उनके पति डॉ. ब्रह्मदेव प्रसाद सिंह कलकत्ता विश्वविद्यालय के 'आचार्य जगदीश चंद्र बसु महाविद्यालय' में रसायन के विभागाध्यक्ष व प्रिंसिपल रहे।
हाँ, उन्हें बिहार राष्ट्रभाषा परिषद (उच्च शिक्षा विभाग, पटना) द्वारा ₹11,000 नकद का 'साहित्य सेवी सम्मान' प्रदान किया गया था।
तारा जी अपनी निजी बचत से हर साल देश भर के उपेक्षित और ग्रामीण नवोदित लेखकों को बिना किसी फीस के नकद पुरस्कार व प्रशस्ति-पत्र देती थीं।
नहीं, इनमें से अधिकांश पुरस्कार देश भर के छोटे शहरों की गैर-सरकारी साहित्यिक संस्थाओं द्वारा प्रेम व आदर स्वरूप दी गई मानद उपाधियां थीं।
उनकी ग़ज़लों में शराब और साकी के बजाय घर-परिवार, बच्चों की चिंता और सामाजिक बुराइयों को सीधी हिन्दुस्तानी जुबान में ढाला गया।
यह कि सीमित साधन और चौके-बर्तन की जिम्मेदारियों के बीच भी अगर मन में सच्ची लगन हो, तो कोई भी औरत अपनी पहचान बना सकती है।