राजा बजरंग बहादुर सिंह की पूरी कहानी: 16 साल की उम्र में आजादी की लड़ाई, आसमान में हवाई जहाज, हिमाचल के उप-राज्यपाल और देश का पहला कृषि कॉलेज!
ज़रा सोचिए, एक ऐसा राजा जो महलों के ऐशो-आराम में बैठने के बजाय खुद हवाई जहाज उड़ाकर बादलों से बातें करता था! जिसने सिर्फ 16 साल की उम्र में अंग्रेजों के विदेशी कपड़ों की होली जला दी थी। जो लगातार 8 साल तक बर्फ से ढके हिमाचल प्रदेश का सबसे बड़ा हाकिम रहा, जिसने पंडित जवाहरलाल नेहरू के पालतू कुत्ते तक को ट्रेनिंग दी, और जब देश में भारी भुखमरी फैली, तो देश का पहला कृषि विश्वविद्यालय बनाकर भारत के किसानों की तकदीर बदल दी!
यह किसी उपन्यास या फिल्म की काल्पनिक कहानी नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की मशहूर भदरी रियासत के राजा बजरंग बहादुर सिंह ('राजा भदरी') की सच्ची दास्तान है। एक ऐसा अनोखा राजा, जिसने जागीरदारी के पुराने तौर-तरीकों को छोड़कर देश की आजादी, हवाई जहाज उड़ाने, बर्फीले पहाड़ों में सड़कें बनाने और किसानों को नए बीज देने में अपनी पूरी जिंदगी लगा दी। आइए, इस अनोखे जननायक की पूरी जिंदगी को एक बेहद दिलचस्प कहानी की तरह शुरू से अंत तक जानते हैं।
वे प्रतापगढ़ की प्रसिद्ध भदरी रियासत के राजा, आजादी की लड़ाई के सिपाही, हिमाचल प्रदेश के दूसरे उप-राज्यपाल (1955-1963) और देश के पहले कृषि विश्वविद्यालय (पंतनगर) के पहले कुलपति थे।
1920 में जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन छेड़ा, तो सिर्फ 16 साल की उम्र में उन्होंने भदरी किले के सामने अंग्रेजी और विदेशी कपड़ों का बड़ा अलाव जलाकर उनका बहिष्कार किया था।
वे 1955 से 1963 तक हिमाचल के उप-राज्यपाल रहे। उन्होंने चीन सीमा तक हिंदुस्तान-तिब्बत सड़क बनवाई, रोहड़ू में ट्राउट मछली का पालन शुरू कराया और अलग से मछली पालन विभाग बनाया।
17 नवंबर 1960 को जब भारत का पहला कृषि विश्वविद्यालय (पंतनगर - GBPUAT) बना, तो पंडित नेहरू और गोविंद बल्लभ पंत ने उन्हें इसका पहला संस्थापक कुलपति (वाइस चांसलर) बनाया था।
वे खुद ट्रेनिंग लिए हुए लाइसेंसशुदा पायलट थे। उन्होंने युवाओं को जहाज उड़ाना सिखाने के लिए लखनऊ और कानपुर में 'हिन्द फ्लाइंग क्लब' (Hind Flying Club) की शुरुआत की थी।
वे कुत्तों के मिजाज को खूब समझते थे। उन्होंने हिमाचल पुलिस में पहला डॉग स्क्वॉड शुरू कराया और 1961 में कुत्तों को सिखाने पर मशहूर किताब 'How to Train Your Dog' लिखी।
"बड़े पद और ताकत का असली मतलब सिर्फ हुकूमत चलाना नहीं होता, बल्कि लोगों की जिंदगी आसान बनाना है—चाहे वह सीमा पर जवानों के लिए रास्ता बनाना हो, खेत में किसान के लिए अच्छे बीज तैयार करना हो, या नौजवानों को नई विद्या सिखाना।"
— राजा बजरंग बहादुर सिंह के जीवन और काम का मूल मंत्र🏰 कुंडा का भदरी किला, राजा किशन प्रसाद के घर जन्म और सिर पर रियासत की जिम्मेदारी
बात शुरू होती है उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में गंगा नदी के किनारे बसे कुंडा इलाके से। यहीं पर सदियों पुरानी एक ऐतिहासिक गढ़ी और जागीर है, जिसे दुनिया भदरी रियासत के नाम से जानती है। इस रियासत में बिसेन राजपूत परिवार का राज था, जिनकी धाक पूरे इलाके में मानी जाती थी।
इसी भदरी किले में सन् 1905 (कुछ पुराने कागजात में 1906) में राजा किशन प्रसाद सिंह के घर एक बेटे का जन्म हुआ। परिवार ने बड़े लाड़-प्यार से उनका नाम रखा—बजरंग बहादुर सिंह। पिता ने बचपन से ही उन्हें रियासत के तौर-तरीके सिखाए—घोड़े की सवारी, निशानेबाजी और तलवार चलाने के साथ-साथ हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी की अच्छी पढ़ाई भी कराई।
भदरी रियासत का माहौल हमेशा से अंग्रेजों के दबाव में दबने वाला नहीं था। जब 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ पहली बड़ी लड़ाई छिड़ी थी, तब भी भदरी के पुराने लोगों ने अंग्रेजों का कड़ा विरोध किया था। घर के बुजुर्गों से अंग्रेजों से मुकाबले की कहानियां सुनते-सुनते बालक बजरंग बहादुर बड़े हुए थे।
बजरंग बहादुर सिंह के दो छोटे भाई थे—भद्रेश्वर प्रताप सिंह और त्रिलोचन प्रताप सिंह। तीनों भाइयों में बहुत प्यार था। लेकिन घर के सबसे बड़े बेटे होने के नाते, पिता के बाद भदरी रियासत की गद्दी और जमीन-जायदाद संभालने की पूरी जिम्मेदारी बजरंग बहादुर सिंह के कंधों पर आ गई। इलाके के किसान और ग्रामीण उन्हें आदर से 'राजा साहब' या 'राय साहब' कहकर बुलाते थे।
🔥 जब 16 साल के किशोर राजा ने भदरी में फूंकी अंग्रेजों के विलायती कपड़ों की होली!
सन् 1920 का साल था। पंजाब के जलियांवाला बाग में अंग्रेजों की गोलियों से सैकड़ों बेगुनाह लोग मारे जा चुके थे। पूरे मुल्क में गुस्सा खौल रहा था। महात्मा गांधी ने अंग्रेजी हुकूमत को झुकाने के लिए 'असहयोग आंदोलन' का ऐलान किया। गांधी जी ने साफ कहा कि अंग्रेजों के स्कूल, कचहरी और खासकर उनके बनाए विदेशी कपड़े छोड़ दो, अपने देश का बना खादी पहनो।
उस दौर में देश के ज्यादातर राजा-महाराजे अंग्रेजों के बड़े अफसरों को सलाम ठोंकते थे, पार्टियां देते थे ताकि उनकी गद्दी सलामत रहे। लेकिन भदरी के इस 16 साल के नौजवान राजा के दिल में कुछ और ही चल रहा था। उन्होंने तय कर लिया कि वे गांधी जी के साथ खड़े होंगे।
"जब तक देश पर अंग्रेजों की हुकूमत है, तब तक विलायती रेशम और मखमल पहनना शर्म की बात है। आज से हम सिर्फ अपने देश का कपड़ा पहनेंगे!"
— 1920 में भदरी किले के सामने नौजवान राजा बजरंग बहादुर सिंह की बात
एक दिन भदरी किले के बाहर सैकड़ों गांव वाले और किसान इकट्ठा हो गए। राजा बजरंग बहादुर सिंह ने अपने खुद के विदेशी कपड़े उतारे और राजमहल के कमरों से अंग्रेजों के मैनचेस्टर और लंदन से आए महंगे रेशमी और ऊनी कपड़ों के बड़े-बड़े गट्ठर बाहर निकलवा दिए।
किले के सामने मैदान में इन कपड़ों का बड़ा ढेर लगाया गया और उसमें आग लगा दी गई! लपटें ऊंची उठीं और विदेशी कपड़े जलकर खाक होने लगे। वहां मौजूद भीड़ ने 'भारत माता की जय' और 'वंदे मातरम' के नारे लगाए। आसपास के अंग्रेज थानेदार और अफसर यह देखकर हैरान रह गए कि एक ताल्लुकेदार का बेटा खुलेआम हुकूमत को चुनौती दे रहा है।
🤝 आनंद भवन का फेरा और पंडित नेहरू से 'भदरी' की पक्की दोस्ती
इलाहाबाद (प्रयागराज) में नेहरू परिवार का घर 'आनंद भवन' आजादी की लड़ाई का सबसे बड़ा अड्डा था। भदरी से इलाहाबाद की दूरी सिर्फ 50-60 किलोमीटर थी। राजा बजरंग बहादुर सिंह अक्सर आनंद भवन जाते थे। वहीं उनकी मुलाकात पंडित मोतीलाल नेहरू, पंडित जवाहरलाल नेहरू और गोविंद बल्लभ पंत जैसे बड़े नेताओं से हुई।
- नेहरू जी का प्यार भरा नाम: दिल्ली के राष्ट्रीय अभिलेखागार में आज भी पंडित नेहरू की चिट्ठियां रखी हैं, जिनमें वे राजा साहब को हमेशा प्यार से 'My dear Bhadri' या सिर्फ 'भदरी' लिखकर शुरुआत करते थे।
- आजादी के सिपाहियों को पनाह: जब इलाहाबाद में अंग्रेजों की पुलिस पीछे पड़ती, तो कई नेता और कार्यकर्ता छिपने के लिए भदरी और बेंती के जंगलों और कोठियों में आते थे।
- गाड़ियां और राशन की मदद: जब भी कांग्रेस के बड़े जलसे या किसानों की सभाएं होतीं, राजा साहब अपनी गाड़ियां, राशन और पैसे से खुलकर मदद करते थे।
पंडित नेहरू राजा साहब की सादगी, काम करने के ढंग और निडर स्वभाव को बहुत पसंद करते थे। यही वजह थी कि आजादी मिलने के बाद जब देश को मजबूत और भरोसेमंद हाथों की जरूरत पड़ी, तो नेहरू जी ने राजा बजरंग बहादुर सिंह को कई बड़े काम सौंपे।
✈️ हवा से बातें करता राजा: जब खुद उड़ाया हवाई जहाज और बना दिया 'हिन्द फ्लाइंग क्लब'
उस जमाने में राजा-महाराजाओं के शौक क्या होते थे? महंगी विदेशी कारें खरीदना, नाच-गाना देखना या शिकार खेलना। लेकिन राजा बजरंग बहादुर सिंह का मिजाज बिल्कुल अलग था। उन्हें आसमान में उड़ते परिंदों को देखकर लगता था कि इंसान को भी बादलों में उड़ना सीखना चाहिए।
जब हिंदुस्तान में हवाई जहाज देखना भी बहुत बड़ा अजूबा माना जाता था, तब राजा साहब ने बाकायदा हवाई जहाज उड़ाने की कठिन ट्रेनिंग ली और पायलट का सरकारी लाइसेंस हासिल किया। वे खुद कॉकपिट में बैठते, इंजन स्टार्ट करते और आसमान में उड़ जाते। वे लखनऊ, कानपुर और इलाहाबाद के बीच खुद जहाज उड़ाकर सफर करते थे।
"जब आसमान में जहाज की गड़गड़ाहट होती, तो बच्चे और बूढ़े दौड़कर छत पर आते थे। सब कहते थे—देखो, हमारे राजा साहब आसमान में उड़ रहे हैं!"
— कुंडा और भदरी के पुराने बुजुर्गों की यादें
राजा साहब सिर्फ खुद उड़कर खुश नहीं थे। वे चाहते थे कि देश के आम नौजवान भी जहाज उड़ाना सीखें। इसलिए उन्होंने लखनऊ और कानपुर की हवाई पट्टियों पर 'हिन्द फ्लाइंग क्लब' (Hind Flying Club) की शुरुआत करवाई। इस क्लब में कई नौजवानों ने बहुत कम खर्च में पायलट की ट्रेनिंग ली, जो आगे चलकर भारतीय वायुसेना में देश के रक्षक बने।
🏔️ जब 8 साल तक संभाला हिमाचल: शिमला के दफ्तर छोड़ घोड़ों से नापे बर्फीले पहाड़
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। 1950 के दशक में हिमाचल प्रदेश एक नया-नया पहाड़ी राज्य बना था। वहां 30 से ज्यादा छोटी-छोटी रियासतों को मिलाकर एक किया गया था। लेकिन हालात बहुत कठिन थे—न पक्की सड़कें थीं, न बसें चलती थीं, और भारी बर्फबारी की वजह से किन्नौर, लाहौल और पांगी जैसे इलाके साल में 6 महीने बाकी दुनिया से कट जाते थे। उधर चीन सीमा पर भी सुरक्षा का बड़ा खतरा था।
ऐसे मुश्किल वक्त में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को किसी ऐसे हाकिम की तलाश थी जो सिर्फ कुर्सियों पर न बैठे, बल्कि खुद पहाड़ों में जाकर काम कराए। नेहरू जी ने 1 जनवरी 1955 को राजा बजरंग बहादुर सिंह को हिमाचल प्रदेश का दूसरा उप-राज्यपाल (लेफ्टिनेंट गवर्नर) बना दिया।
- हिंदुस्तान-तिब्बत सड़क (NH-5): उन्होंने शिमला से लेकर किन्नौर और चीन सीमा तक पक्की सड़क बनवाने का काम बहुत तेजी से करवाया। इसी सड़क की वजह से 1962 में सीमा तक रसद और फौज आसानी से पहुंच सकी।
- घोड़े पर बैठकर गांवों का दौरा: वे शिमला के बड़े राजभवन में कम ही बैठते थे। घोड़े की पीठ पर सवार होकर चंबा, लाहौल, पांगी और भरमौर की दुर्गम घाटियों में जाते और लोगों के दुख-दर्द सुनते थे।
- पहाड़ी मेलों को सरकारी मदद: रामपुर बुशहर के मशहूर 'लवी मेले' और चंबा के 'मिंजर मेले' को उन्होंने बढ़ावा दिया ताकि पहाड़ी बुनकरों और किसानों की ऊन व सामान अच्छे दामों पर बिक सके।
वे 13 अगस्त 1963 तक लगातार 8 साल 7 महीने से ज्यादा समय तक हिमाचल के उप-राज्यपाल रहे। हिमाचल के लोग आज भी मानते हैं कि उनके दौर में ही पहाड़ों में सड़कों और पुलों का असली काम शुरू हुआ था।
🐟 रोहड़ू की पब्बर नदी, ठंडे पानी में ट्राउट मछली, मछली विभाग की नींव और सेब के बाग
राजा बजरंग बहादुर सिंह को जंगलों, बहती नदियों और कांटे से मछली पकड़ने (एंगलिंग) का बड़ा शौक था। हिमाचल में रहते हुए जब वे शिमला जिले के दूरदराज कस्बे रोहड़ू (Rohru) पहुंचे, तो वहां बहने वाली पब्बर नदी (Pabbar River) का ठंडा और शीशे जैसा साफ पानी देखकर बहुत खुश हुए।
"इस बर्फीले पानी में दुनिया की सबसे अच्छी ट्राउट मछली पाली जा सकती है। अगर यहां मछली पालन शुरू हो जाए, तो स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिलेगा और दुनिया भर से सैलानी भी आएंगे।"
— रोहड़ू दौरे के समय राजा बजरंग बहादुर सिंह की बात
उस समय हिमाचल में अलग से मछली पालन का कोई सरकारी विभाग नहीं था। राजा साहब ने अपने उप-राज्यपाल पद का इस्तेमाल करते हुए हिमाचल प्रदेश में पहली बार अलग से 'मछली पालन विभाग' (Fisheries Department) बनवाया।
रोहड़ू के पास चिरगांव (Chirgaon) में उन्होंने एशिया की सबसे बेहतरीन ट्राउट मछली की नर्सरी (हैचरी) शुरू कराई। वहां 'ब्राउन ट्राउट' और 'रेनबो ट्राउट' मछलियों के बच्चे तैयार किए जाने लगे। इसके साथ ही, उन्होंने कोटगढ़, जुब्बल और रोहड़ू के किसानों को सेब के बगीचे लगाने के लिए सरकारी पौधे और खाद दिलवाई, जिससे आगे चलकर हिमाचल पूरे देश का 'सेब का कटोरा' बन गया।
🌾 17 नवंबर 1960: जब देश भूखा था, तब पंतनगर में बनाया भारत का पहला कृषि विश्वविद्यालय!
1950 के आखिर में भारत के सामने पेट भरने का बहुत बड़ा संकट था। हमारे देश में इतना अनाज पैदा नहीं होता था कि सबको खाना मिल सके। भारत को अमेरिका से लाल गेहूं (PL-480) जहाज में भरकर मंगाना पड़ता था। प्रधानमंत्री पंडित नेहरू और गृह मंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने सोचा कि अगर भारत को सचमुच आजाद रहना है, तो किसानों को खेती की नई तकनीक और बढ़िया बीज देने होंगे।
- नेहरू जी ने सौंपी कमान: पंडित नेहरू और गोविंद बल्लभ पंत ने इस पहले कृषि विश्वविद्यालय की शुरुआत के लिए राजा बजरंग बहादुर सिंह को चुना और उन्हें पहला संस्थापक कुलपति (Founding Vice-Chancellor) बनाया।
- तराई के 16,000 एकड़ का फार्म: नैनीताल के पास पंतनगर के दलदली और जंगली इलाके को साफ करवाकर 16 हजार एकड़ में विशाल खेती फार्म, प्रयोगशालाएं और बीज बनाने के प्लांट लगवाए।
- हरित क्रांति की शुरुआत: इसी पंतनगर विश्वविद्यालय से गेहूं और धान के नए बीजों पर शोध हुआ, जिसने कुछ ही सालों बाद भारत में 'हरित क्रांति' (Green Revolution) ला दी और देश में अनाज की कमी हमेशा के लिए खत्म हो गई।
राजा साहब ने इस विश्वविद्यालय की ऐसी मजबूत नींव रखी कि आज भी पंतनगर को एशिया का सबसे बड़ा और भारत का सिरमौर कृषि विश्वविद्यालय माना जाता है।
🐕 कुत्तों के मिजाज के उस्ताद: नेहरू जी का कुत्ता 'मधु', पुलिस का डॉग स्क्वॉड और वो अनोखी किताब
राजा बजरंग बहादुर सिंह की एक और ऐसी खूबी थी जो बहुत कम लोगों में मिलती है। वे कुत्तों के स्वभाव और उनके दिमाग को बहुत गहराई से समझते थे। वे किसी भी जिद्दी या गुस्सैल कुत्ते को प्यार और सही इशारों से कुछ ही पलों में अपना बना लेते थे।
खुद देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पास 'मधु' नाम का एक बहुत सुंदर कुत्ता (गोल्डन रिट्रीवर) था। नेहरू जी उस कुत्ते को गर्मियों में ट्रेनिंग और नई आदतें सीखने के लिए शिमला में राजा भदरी के पास भेजा करते थे!
— 'द ट्रिब्यून' अखबार के पुराने अभिलेखों में दर्ज सच्चा किस्सा
हिमाचल में जब घने जंगलों और पहाड़ों में चोर-डाकुओं को पकड़ने में पुलिस को दिक्कत होती थी, तो राजा साहब ने हिमाचल प्रदेश पुलिस में पहली बार 'डॉग स्क्वॉड' (कुत्तों का खोजी दस्ता) बनवाया।
इतना ही नहीं, कुत्तों को सिखाने के अपने सालों के तजुर्बे को उन्होंने एक किताब में लिखा। सन् 1961 में हिमाचल प्रदेश पुलिस ने उनकी किताब छापी, जिसका नाम था—"हाउ टू ट्रेन योर डॉग" (How to Train Your Dog)। इस किताब में उन्होंने समझाया कि कुत्ते को डंडे या डर से नहीं, बल्कि प्यार, सम्मान और सही इशारों से सिखाया जाता है। यह किताब आज भी पुलिस और फौज में कुत्तों को सिखाने के लिए बहुत काम आती है।
👑 अजयगढ़ की राजकुमारी गिरिजा देवी से शादी, कोई औलाद न होना और भतीजे उदय प्रताप को गोद लेना
सन् 1926 में राजा बजरंग बहादुर सिंह की शादी बुंदेलखंड की मशहूर अजयगढ़ (Ajaigarh) रियासत के राजा पुण्य प्रताप सिंह की बेटी रानी गिरिजा देवी के साथ हुई। रानी साहिबा बहुत शांत, धार्मिक और सीधे स्वभाव की थीं।
- भतीजे को बनाया वारिस: राजा बजरंग बहादुर सिंह की अपनी कोई संतान नहीं हुई। इसलिए उन्होंने अपने छोटे भाई भद्रेश्वर प्रताप सिंह के बड़े बेटे कुंवर उदय प्रताप सिंह को विधिवत गोद ले लिया और भदरी का वारिस तय किया।
- देहरादून के दून स्कूल में पढ़ाई: उन्होंने बालक उदय प्रताप को देश के सबसे नामी बोर्डिंग स्कूल 'द दून स्कूल' भेजा, जहां उन्होंने कड़ा अनुशासन, खेल और घुड़सवारी सीखी।
- जापान भेजा खेती सीखने: बाद में उन्होंने उदय प्रताप को नई खेती और पर्यावरण की पढ़ाई के लिए जापान भेजा, जिससे उन्हें पेड़ों, जंगलों और झीलों से गहरा लगाव हुआ।
वही बालक आगे चलकर भदरी के राजा बने, जिन्हें आज दुनिया राजा उदय प्रताप सिंह ('बड़े राजा') के नाम से जानती है। और उनके सुपुत्र कुंवर रघुराज प्रताप सिंह 'राजा भैया' आज कुंडा विधानसभा से लगातार 7 बार विधायक चुने जाकर इसी परिवार का नाम रोशन कर रहे हैं।
🌟 1973 में दुनिया को आखिरी सलाम: एक अनोखा राजा, जिसकी कहानी आज भी जिंदा है!
आजादी की लड़ाई में 16 साल की उम्र में कूदना, आसमान में हवाई जहाज उड़ाना, 8 साल से ज्यादा समय तक हिमाचल के बर्फीले पहाड़ों में सड़कें और मछली घर बनवाना, और पंतनगर में देश का पहला कृषि कॉलेज खड़ा करना—इन सारे बड़े कामों के बाद राजा बजरंग बहादुर सिंह अपने आखिरी दिनों में वापस अपनी पैतृक भदरी रियासत आ गए।
सन् 1970 के बाद उनकी तबीयत लगातार खराब रहने लगी। जिंदगी भर की कड़ी मेहनत और भागदौड़ ने उनके शरीर को थका दिया था। आखिरकार, सन् 1973 में (लगभग 68 साल की उम्र में) इस अनोखे राजा ने अपनी अंतिम सांस ली और दुनिया को अलविदा कह दिया।
उनके जाने पर कुंडा और भदरी के हजारों किसान और मजदूर अपनी आंखों में आंसू लिए उनके अंतिम दर्शन करने पहुंचे। शिमला के पहाड़ों से लेकर पंतनगर के खेतों तक, जिन-जिन लोगों के साथ उन्होंने काम किया था, सबने एक सादे, ईमानदार और मेहनती साथी को नम आंखों से याद किया।
📋 राजा बजरंग बहादुर सिंह: जीवन के जरूरी आंकड़े व तथ्य तालिका (Factsheet)
पाठकों, छात्रों और शोधकर्ताओं की सुविधा के लिए राजा बजरंग बहादुर सिंह के जीवन से जुड़ी सभी मुख्य जानकारियां नीचे तालिका में दी गई हैं:
| विषय / जानकारी | मुख्य तथ्य |
|---|---|
| पूरा नाम | राजा बजरंग बहादुर सिंह (Raja Bajrang Bahadur Singh) |
| लोकप्रिय नाम | 'राजा भदरी' (Raja Bhadri), 'राजा साहब', 'राय साहब' |
| जन्म वर्ष व स्थान | सन् 1905 (या 1906), भदरी किला, कुंडा (प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश) |
| निधन का साल | सन् 1973 (लंबी बीमारी के बाद; लगभग 68 वर्ष की आयु में) |
| रियासत व घराना | अवध की प्रसिद्ध भदरी रियासत (बिसेन राजपूत वंश) |
| पिता का नाम | राजा किशन प्रसाद सिंह (भदरी के पूर्व ताल्लुकेदार) |
| सगे भाई | कुंवर भद्रेश्वर प्रताप सिंह और कुंवर त्रिलोचन प्रताप सिंह |
| धर्मपत्नी (रानी) | रानी गिरिजा देवी (बुंदेलखंड के अजयगढ़ राजघराने के राजा पुण्य प्रताप सिंह की पुत्री, विवाह 1926) |
| दत्तक पुत्र (वारिस) | भतीजे राजा उदय प्रताप सिंह (गोद लिए गए पुत्र, भदरी) |
| प्रपौत्र (वर्तमान पीढ़ी) | कुंवर रघुराज प्रताप सिंह 'राजा भैया' (कुंडा से लगातार 7 बार विधायक) |
| उप-राज्यपाल कार्यकाल | हिमाचल प्रदेश के दूसरे उप-राज्यपाल — 1 जनवरी 1955 से 13 अगस्त 1963 (लगातार 8+ वर्ष) |
| कृषि कॉलेज का पद | पहले संस्थापक कुलपति — गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (पंतनगर, 17 नवंबर 1960) |
| हवाई जहाज का शौक | लाइसेंस प्राप्त ट्रेंड पायलट, लखनऊ व कानपुर में 'हिन्द फ्लाइंग क्लब' (Hind Flying Club) की शुरुआत |
| कुत्तों की ट्रेनिंग व किताब | हिमाचल पुलिस डॉग स्क्वॉड के संस्थापक; मशहूर किताब: 'How to Train Your Dog' (1961) |
| मछली पालन व सेब | हिमाचल में मछली पालन विभाग बनाया; रोहड़ू में एशिया की प्रसिद्ध चिरगांव ट्राउट हैचरी शुरू कराई |
| पैतृक निवास व गढ़ | पैतृक किला: भदरी किला | पारिवारिक आवास: बेंती कोठी, कुंडा (पिन 230204) |
🎬 भदरी किला, वीडियो डाक्यूमेंट्री और गूगल लाइव मैप
राजा बजरंग बहादुर सिंह की भदरी रियासत, उनके परिवार और कुंडा से जुड़े इतिहास के बारे में ये वीडियो डाक्यूमेंट्री देखी जा सकती हैं:
🎥 वीडियो 1: 30 वर्षों का राजनीतिक सफर व भदरी विरासत
राजा बजरंग बहादुर सिंह के प्रपौत्र कुंवर रघुराज प्रताप सिंह 'राजा भैया' के राजनीतिक सफर और भदरी के जुड़ाव की डाक्यूमेंट्री:
🏰 वीडियो 2: भदरी कुंडा ऐतिहासिक दीर्घचित्र व दास्तान
राजा बजरंग बहादुर सिंह के दत्तक पुत्र राजा उदय प्रताप सिंह व भदरी राजमहल के इतिहास पर PK Pramas द्वारा निर्मित वृत्तचित्र:
📍 भदरी किला (Bhadari Fort) गूगल लाइव मैप
यदि आप कुंडा में राजा बजरंग बहादुर सिंह के ऐतिहासिक पैतृक निवास भदरी किला देखना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए गूगल लाइव मैप के जरिए सीधे पहुंच सकते हैं:
⭐ राजा बजरंग बहादुर सिंह के 10 मुख्य रूप (Profile Dimensions)
राजा बजरंग बहादुर सिंह के जीवन और काम के 10 सबसे बड़े पहलू:
❓ राजा बजरंग बहादुर सिंह के बारे में गूगल पर पूछे जाने वाले सवाल
राजा बजरंग बहादुर सिंह के जीवन, आजादी की लड़ाई, हिमाचल के उप-राज्यपाल कार्यकाल, पंतनगर यूनिवर्सिटी और हवाई जहाज से जुड़े सबसे जरूरी सवाल और जवाब:
वे प्रतापगढ़ की भदरी रियासत के राजा, आजादी की लड़ाई के सेनानी, हिमाचल प्रदेश के दूसरे उप-राज्यपाल (1955-1963), देश के पहले कृषि विश्वविद्यालय (पंतनगर) के संस्थापक कुलपति और हवाई जहाज के ट्रेंड पायलट थे।
वे कुंडा विधायक कुंवर रघुराज प्रताप सिंह 'राजा भैया' के परदादा (दादा के ताऊ व दत्तक पिता) हैं। उन्होंने राजा भैया के पिता राजा उदय प्रताप सिंह को विधिवत गोद लिया था।
सन् 1920 में जब वे सिर्फ 16 साल के थे, तब महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में शामिल होकर उन्होंने भदरी में अंग्रेजों के विलायती कपड़ों का अलाव जलाकर बहिष्कार किया था।
वे 1 जनवरी 1955 से 13 अगस्त 1963 तक लगातार 8 साल 7 महीने से ज्यादा समय तक हिमाचल प्रदेश के उप-राज्यपाल रहे। इस दौरान उन्होंने चीन सीमा तक हिंदुस्तान-तिब्बत सड़क बनवाई।
17 नवंबर 1960 को शुरू हुए भारत के पहले कृषि विश्वविद्यालय (पंतनगर - GBPUAT) के वे पहले संस्थापक कुलपति थे। उन्होंने तराई के 16,000 एकड़ में फार्म और शोध की नींव रखी, जिससे देश में हरित क्रांति आई।
वे खुद एक ट्रेंड पायलट थे। उन्होंने युवाओं को पायलट बनाने के लिए लखनऊ और कानपुर में 'हिन्द फ्लाइंग क्लब' (Hind Flying Club) की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई थी।
वे कुत्तों के स्वभाव को बहुत अच्छी तरह समझते थे। उन्होंने हिमाचल पुलिस में पहला डॉग स्क्वॉड बनवाया और 1961 में कुत्तों को ट्रेनिंग देने पर 'How to Train Your Dog' किताब लिखी।
उन्होंने हिमाचल में पहली बार मछली पालन विभाग बनवाया और रोहड़ू (चिरगांव) में एशिया की आधुनिक ट्राउट हैचरी शुरू कराई, जिससे वहां मछली पालन का बड़ा काम शुरू हुआ।
उनकी शादी सन् 1926 में बुंदेलखंड के अजयगढ़ राजघराने के राजा पुण्य प्रताप सिंह की बेटी रानी गिरिजा देवी के साथ हुई थी।
सन् 1973 में (लगभग 68 साल की उम्र में) उनका निधन हुआ। उनका पैतृक गढ़ भदरी किला और कुंडा का बेंती आवास आज भी उनकी स्मृति का केंद्र है।
- प्रतापगढ़ जिला गजेटियर (District Gazetteer Pratapgarh): अवध तालुकेदारी, भदरी बिसेन राजपूत राजवंश व राजा बजरंग बहादुर सिंह के ऐतिहासिक अभिलेख।
- राष्ट्रीय अभिलेखागार एवं नेहरू मेमोरियल (NMML, New Delhi): पंडित जवाहरलाल नेहरू और राजा बजरंग बहादुर सिंह ('भदरी') के बीच हुई चिट्ठियां (1950-1963)।
- हिमाचल प्रदेश राज्य अभिलेखागार (Shimla): उप-राज्यपाल के रूप में प्रशासनिक आदेश, हिंदुस्तान-तिब्बत सड़क व मछली पालन विभाग की सरकारी अधिसूचनाएं।
- पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय (GBPUAT) आर्काइव्ज: 17 नवंबर 1960 को विश्वविद्यालय स्थापना व पहले संस्थापक कुलपति के रूप में राजा बजरंग बहादुर सिंह की नियुक्ति के दस्तावेज।
- द ट्रिब्यून आर्काइव्ज (The Tribune Archives, Chandigarh): उप-राज्यपाल कार्यकाल, रोहड़ू ट्राउट फिशरीज, पं. नेहरू के कुत्ते 'मधु' का प्रशिक्षण व 1973 के ऐतिहासिक संदर्भ।
- 'How to Train Your Dog' (1961): राजा बजरंग बहादुर सिंह द्वारा लिखी गई एवं हिमाचल प्रदेश पुलिस द्वारा प्रकाशित आधिकारिक श्वान प्रशिक्षण पुस्तक।