डॉ. राम विलास वेदांती: रीवा से काशी, अयोध्या और प्रतापगढ़ — संन्यासी से संसद तक की पूरी दास्तान (Dr. Ram Vilas Vedanti Biography, Pratapgarh Lok Sabha MP 1998, Ram Mandir Movement Ayodhya, Sampurnanand Ph.D.)
वेदांत के जानकार, राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख चेहरे और 1998 में प्रतापगढ़ से भाजपा के पहले सांसद बनने का प्रामाणिक इतिहास
ज़रा सोचिए, क्या कोई ऐसा संन्यासी हो सकता है जिसने काशी के प्राचीन गुरुकुल में वेदों और दर्शन पर डॉक्टरेट (Ph.D.) की पढ़ाई पूरी की हो, अयोध्या में रामलला के मंदिर के लिए अपनी पूरी जवानी लगा दी हो, और फिर साल 1998 के चुनावी दंगल में उतरकर प्रतापगढ़ के पुराने राजघराने के मजबूत गढ़ में पहली बार कमल खिला दिया हो!
यह कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के रीवा जिले से निकलकर काशी में पढ़ाई करने वाले, अयोध्या के वशिष्ठ कुंड में रहने वाले और सन् 1998 में प्रतापगढ़ लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीतने वाले डॉ. राम विलास वेदांती के जीवन की असली दास्तान है। उन्होंने धार्मिक मंचों पर श्रीमद्भागवत और रामकथा सुनाई और संसद में पहुँचकर किसानों, ग्रामीण विकास व जनहित के मुद्दों पर अपनी बात रखी।
सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय (काशी) से वेदांत दर्शन में एम.ए. और 1983 में डॉक्टरेट (Ph.D.) की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें 'वेदांती' कहा जाने लगा।
1998 के लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी बनकर उन्होंने कांग्रेस की मौजूदा सांसद राजकुमारी रत्ना सिंह को 68,460 वोटों के बड़े अंतर से हराया था।
वे 1984 से 1992 तक आंदोलन से जुड़े प्रमुख संतों में थे। श्रीराम जन्मभूमि न्यास के सदस्य के रूप में उन्होंने कई राज्यों में जनसभाएं कीं।
वे अयोध्या में संतों के साथ रहे और काशी के संस्कृत विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में 1983 में डॉक्टरेट (Ph.D.) की डिग्री हासिल की।
1998 में केंद्र सरकार के दौरान उन्होंने संसद की ग्रामीण विकास समिति में रहकर प्रतापगढ़ के देहाती इलाकों में सड़कों, बिजली और नलकूपों की योजनाओं पर काम कराया।
आंदोलन से जुड़े मामले में 30 सितंबर 2020 को सीबीआई की विशेष अदालत ने सबूत न होने के कारण उन्हें लालकृष्ण आडवाणी सहित सभी लोगों के साथ बरी कर दिया।
"ज्ञान सिर्फ किताबों में बंद रहने के लिए नहीं है। जब समाज, संस्कृति और गाँव-गरीब के हक की बात आए, तो एक संन्यासी का कर्तव्य बनता है कि वह आगे आकर सच के लिए खड़ा हो।"
— डॉ. राम विलास वेदांती (पूर्व सांसद प्रतापगढ़ एवं सदस्य, श्रीराम जन्मभूमि न्यास)गुढ़वा रीवा में जन्म: बालक राम विलास का सीधा-सादा बचपन
मध्य प्रदेश के विंध्य इलाके का रीवा जिला अपनी सादगी और धार्मिक परंपराओं के लिए जाना जाता है। इसी रीवा जिले के एक छोटे से गाँव गुढ़वा में 7 अक्टूबर 1958 को एक ब्राह्मण परिवार में बालक का जन्म हुआ। पिता राम सेवक दास सीधे-सादे किसान थे और सच्चे मन से पूजा-पाठ करते थे। परिवार वालों ने बच्चे का नाम रखा — राम विलास।
गाँव के खुले खेतों, बबूल और नीम की छांव में बालक राम विलास का बचपन बीता। घर में सुबह-शाम रामायण का पाठ होता और गाँव के बुजुर्ग जब चौपाल पर बैठकर भजन गाते, तो नन्हा राम विलास घंटों एकटक उन्हें सुनता रहता। वे बचपन से ही पढ़ाई और धार्मिक बातों को सीखने में बहुत होशियार थे।
गाँव के पुराने लोग याद करते हैं कि जब बाकी बच्चे गाँव की गलियों में गुल्ली-डंडा खेलते, तब राम विलास अपने पिता के पास बैठकर रामचरितमानस की चौपाइयों का पाठ दोहराते थे। उनकी जुबान साफ और आवाज बुलंद थी, जिससे गाँव के मंदिर में आरती के वक्त लोग उन्हें आगे खड़ा कर देते थे।
प्राइमरी स्कूल में मास्टर साहब ने देखा कि यह बालक संस्कृत के श्लोकों को बहुत तेजी से याद कर लेता है। गाँव के सीधे-सादे माहौल ने उनके मन में पढ़ाई और धर्म की समझ के ऐसे संस्कार दिए, जिन्होंने आगे चलकर उनके जीवन को नई दिशा दी।
12 साल की उम्र में घर छोड़ा: काशी और अयोध्या का सफर
जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, बालक राम विलास का मन घर की चारदीवारी और खेती-किसानी के रोजमर्रा के कामों में नहीं रमा। उनका मन कहता था कि असली ज्ञान तो पवित्र नगरी काशी की पाठशालाओं और अयोध्या के संतों की संगत में मिलेगा।
मात्र 12 साल की छोटी सी उम्र में, एक दिन उन्होंने अपने माता-पिता के चरण छुए और साधु बनने व उच्च शिक्षा पाने की धुन में घर छोड़ दिया। उस कच्ची उम्र में अकेले पैदल और रेलगाड़ी के डिब्बों में सफर करते हुए वे सीधे काशी (वाराणसी) पहुँच गए।
"बेटा! इतनी कम उम्र में घर-बार छोड़कर बनारस क्यों चले आए? यहाँ तो सिर्फ गंगा का पानी और शास्त्रों की कठिन पढ़ाई है!"
बालक राम विलास ने हाथ जोड़कर कहा था — "महाराज! मुझे दुनियादारी के झगड़ों में नहीं पड़ना, मुझे वेदों की पढ़ाई करनी है और भगवान की भक्ति में जीवन बिताना है!"
काशी में गंगा किनारे रहकर उन्होंने संस्कृत व्याकरण की ककहरा सीखी, अखाड़ों में संतों की सेवा की और फिर श्रीराम की पावन नगरी अयोध्या धाम पहुँचे। अयोध्या के वशिष्ठ कुंड पर उन्होंने अपना आश्रम बनाया और वहीं रहकर अपनी साधना और पढ़ाई आगे बढ़ाई।
सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से Ph.D. व 'वेदांती' नाम
काशी के सबसे मशहूर सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में राम विलास जी ने विधिवत दाखिला लिया। यहाँ उन्होंने संस्कृत साहित्य, न्याय दर्शन और वेदों का कई वर्षों तक गहरा अध्ययन किया।
उनकी तेज बुद्धि और लगन देखकर काशी के शिक्षक और विद्वान बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने वेदांत दर्शन में एम.ए. की परीक्षा अच्छे अंकों से पास की और उन्हें 'वेदांताचार्य' की पदवी मिली। इसके बाद उन्होंने इसी विश्वविद्यालय से 'विद्या वारिधि' (Ph.D. / डॉक्टरेट) की डिग्री सन् 1983 में पूरी की।
- वेदांत के जानकार: आदि शंकराचार्य के वेदांत दर्शन पर गहरी समझ होने के कारण काशी के विद्वानों ने उनके नाम के साथ आदर से 'वेदांती' जोड़ दिया।
- डॉक्टरेट की डिग्री (1983): साधु-संतों में बहुत कम लोग विश्वविद्यालय से विधिवत Ph.D. करते हैं। इसलिए समाज और राजनीति में वे 'डॉ. राम विलास वेदांती' के नाम से पहचाने गए।
- शास्त्रों की चर्चा में आगे: चाहे उपनिषद की कठिन बातें हों या दर्शन के सवाल, वे पुरानी किताबों के हवाले से बहुत सरल भाषा में जवाब देते थे।
इस तरह रीवा के एक सीधे-सादे गाँव से निकलकर उन्होंने अपनी मेहनत के बल पर काशी से डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की और धार्मिक मंचों पर अपनी जगह बनाई।
राम मंदिर आंदोलन (1984-1992): संतों के साथ सक्रिय भूमिका
1980 के दशक में जब पूरे उत्तर भारत में श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति का आंदोलन शुरू हुआ, तब अयोध्या के युवा संत डॉ. राम विलास वेदांती भी इस आंदोलन में शामिल हो गए। वे श्रीराम जन्मभूमि न्यास और विश्व हिंदू परिषद के वरिष्ठ संतों (महंत परमहंस रामचंद्र दास, महंत नृत्य गोपाल दास और अशोक सिंघल) के प्रमुख सहयोगियों में शामिल रहे।
वे एक अच्छे वक्ता थे, इसलिए आंदोलन के दौरान होने वाली सभाओं में उनके भाषणों को सुनने बड़ी संख्या में लोग जुटते थे।
अक्टूबर-नवंबर 1990 में जब अयोध्या में कारसेवकों पर पुलिस कार्रवाई हुई और लाठियां-गोलियां चलीं, तब डॉ. वेदांती भी संतों के साथ आगे रहे और जेल गए। 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा गिराए जाने के समय वे अयोध्या के मंच पर मौजूद नेताओं में शामिल थे और इस मामले में उन पर भी मुकदमा दर्ज हुआ।
वे श्रीराम जन्मभूमि न्यास के वरिष्ठ सदस्य और बाद में कार्यकारी अध्यक्ष बने। उन्होंने कई जिलों में जाकर सभाएं कीं और रामशिला पूजन जैसे कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया।
1996 मछलीशहर चुनाव: पहली बार संसद में प्रवेश
राम मंदिर आंदोलन में सक्रिय रहने के कारण भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने उन्हें चुनावी राजनीति में उतारने का फैसला किया। 1996 के 11वीं लोकसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें उत्तर प्रदेश की मछलीशहर लोकसभा सीट (जौनपुर और प्रतापगढ़ सीमा क्षेत्र) से अपना उम्मीदवार बनाया।
भगवा वस्त्र पहने एक संन्यासी जब गाँव-गाँव पगडंडियों पर प्रचार के लिए निकला, तो लोगों ने उनका समर्थन किया। उन्होंने बड़े अंतर से चुनाव जीता और पहली बार लोकसभा के सांसद बने।
संसद में जब डॉ. वेदांती ने अपनी बात रखी, तो उन्होंने गाँव-देहात की समस्याओं, खेती-किसानी, संस्कृत पाठशालाओं की स्थिति और भारतीय संस्कृति के संरक्षण पर सरकार का ध्यान खींचा। उन्होंने दिखाया कि एक कथावाचक संन्यासी भी संसदीय नियमों के तहत जनता के मुद्दे उठा सकता है।
हालांकि 1996 की केंद्र सरकार लंबे समय तक नहीं चल पाई और राजनीतिक अस्थिरता के कारण दो साल के भीतर ही 1998 में देश में दोबारा आम चुनाव कराने पड़े।
1998 प्रतापगढ़ चुनाव: भाजपा की पहली ऐतिहासिक जीत
साल 1998 का 12वीं लोकसभा चुनाव प्रतापगढ़ की राजनीति का एक बड़ा और चर्चित चुनाव था। आजादी के बाद से ही इस सीट पर कालाकांकर राजघराने (राजा दिनेश सिंह का परिवार) और पुराने राजनीतिक घरानों का मजबूत प्रभाव रहा था।
कांग्रेस पार्टी ने अपनी उस समय की सांसद राजकुमारी रत्ना सिंह (राजा दिनेश सिंह की सुपुत्री) को मैदान में उतारा था, जबकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने मछलीशहर से डॉ. राम विलास वेदांती को प्रतापगढ़ भेजकर चुनावी मुकाबले को आमने-सामने का बना दिया।
- विजेता: डॉ. राम विलास वेदांती (भारतीय जनता पार्टी) — 2,64,360 वोट
- निकटतम प्रतिद्वंद्वी: राजकुमारी रत्ना सिंह (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस) — 1,95,900 वोट
- जीत का अंतर: 68,460 वोटों का बड़ा अंतर!
- चुनावी महत्व: यह आजादी के बाद प्रतापगढ़ लोकसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) की पहली जीत थी।
गाँव-गाँव में नारा चला — "संसद में संन्यासी, विकास की काशी!" प्रतापगढ़ की जनता ने 68,460 वोटों के बड़े अंतर से डॉ. वेदांती को जिताकर लोकसभा भेजा।
प्रतापगढ़ में सांसद कार्यकाल: गाँव, सड़कें और विकास के काम
1998 में केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनी। डॉ. राम विलास वेदांती ने लोकसभा में पहुँचकर संसद की शहरी एवं ग्रामीण विकास समिति और वन एवं पर्यावरण समिति के सदस्य के रूप में काम किया।
एक साल के अपने इस कार्यकाल में उन्होंने प्रतापगढ़ के ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं को सुधारने के लिए कई काम शुरू कराए:
- ग्रामीण संपर्क मार्ग: जिले के देहाती क्षेत्रों में कच्ची सड़कों पर खड़ंजा लगवाने और मुख्य रास्तों के डामरीकरण के प्रस्ताव स्वीकृत कराए।
- बिजली व नलकूप सुविधा: किसानों की खेती के लिए खराब पड़े सरकारी नलकूपों की मरम्मत और नए ट्रांसफॉर्मर लगवाने का काम आगे बढ़ाया।
- हैंडपंप और रोशनी की व्यवस्था: पिछड़े मजरों में पीने के पानी के लिए इंडिया मार्का हैंडपंप लगवाए।
- सीधी जनसुनवाई: प्रतापगढ़ प्रवास के दौरान वे सीधे जमीन पर बैठकर गाँव वालों की समस्याएं सुनते थे और अधिकारियों को तुरंत काम पूरा करने को कहते थे।
"सांसद जी! हमार गाँव मा बिजली क खंभा कई साल से टूटा पड़ा रहा, कोई सुनत नाहीं रहा!"
डॉ. वेदांती ने तुरंत बिजली विभाग के अधिकारी को फोन करके कहा — "अधिकारी जी, किसान की फसल सूखनी नहीं चाहिए, फौरन नया खंभा लगवाकर बिजली चालू करवाइए!" और अगले ही दिन वहाँ नया खंभा लगा दिया गया।
1999 का सियासी मोड़: 13 महीने में लोकसभा भंग होना
अप्रैल 1999 में केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार संसद में विश्वास मत के दौरान केवल एक वोट से गिर गई। सरकार गिरने के साथ ही 12वीं लोकसभा भंग हो गई और डॉ. वेदांती का प्रतापगढ़ में सांसद कार्यकाल मात्र 13 महीने में ही समाप्त हो गया।
सन् 1999 के दोबारा हुए आम चुनाव में प्रतापगढ़ सीट पर फिर से कड़ा मुकाबला हुआ। इस बार राजकुमारी रत्ना सिंह ने वापसी की और नजदीकी मुकाबले में जीत हासिल की।
चुनाव के बाद भी उनका प्रतापगढ़ आना-जाना बना रहा। वे बेल्हा देवी धाम, हौदेश्वरनाथ और जिले के धार्मिक सम्मेलनों में अक्सर शामिल होते रहे।
कथावाचक के रूप में पहचान: भागवत और रामकथा का वाचन
राजनीति के अलावा डॉ. राम विलास वेदांती की मुख्य पहचान एक लोकप्रिय कथा व्यास के रूप में रही। उन्होंने देश के अलग-अलग राज्यों में सैकड़ों बार गाँव-शहरों में नौ-नौ दिन की श्रीमद्भागवत महापुराण और श्रीरामचरितमानस की कथाएं सुनाईं।
वे संस्कृत के कठिन श्लोकों को बहुत ही सरल देशी भाषा और उदाहरणों से समझाते थे, जिससे गाँव के आम लोग भी उनकी बातों को बड़े ध्यान और रुचि से सुनते थे।
"धर्म का मतलब किसी से नफरत करना नहीं, बल्कि हर इंसान में अच्छाई देखना है। भगवान राम ने शबरी के बेर खाकर और निषादराज को गले लगाकर सिखाया कि समाज में सब बराबर हैं!"
— डॉ. राम विलास वेदांती (प्रवचन से सीख)अयोध्या के वशिष्ठ कुंड स्थित उनके आश्रम में हमेशा बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं और संस्कृत पढ़ने वाले छात्रों के लिए भोजन और रहने की व्यवस्था रहती थी।
लिब्राहन आयोग, अदालत की सुनवाई और 2020 में बरी
6 दिसंबर 1992 की घटना के बाद सीबीआई ने जिन 32 प्रमुख लोगों पर मुकदमा दर्ज किया था, उनमें डॉ. राम विलास वेदांती का नाम भी शामिल था। इस मामले में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और कल्याण सिंह जैसे नेता भी शामिल थे।
वे कई वर्षों तक लिब्राहन आयोग और लखनऊ की सीबीआई अदालत में पेश होते रहे। उन्होंने हमेशा यही कहा कि वे कानून का सम्मान करते हैं और अदालत के फैसले को मानेंगे।
- सभी 32 लोग बरी: अदालत ने अपने विस्तृत फैसले में माना कि घटना पहले से रची गई कोई पूर्व-नियोजित साजिश नहीं थी।
- अदालत से बरी: पुख्ता कानूनी सबूत न होने के कारण अदालत ने डॉ. राम विलास वेदांती सहित सभी आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
- फैसले पर वेदांती जी का बयान: फैसले के बाद उन्होंने कहा — "सत्य परेशान हो सकता है लेकिन पराजित नहीं हो सकता। हमें न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा था।"
लगभग 28 वर्षों तक चले इस लंबे कानूनी मामले का 2020 में पटाक्षेप हुआ और वे अदालत से पूरी तरह बरी हुए।
अयोध्या राम मंदिर निर्माण और अंतिम समय
9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने सर्वसम्मति से अयोध्या में राम मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया। इसके बाद अयोध्या में मंदिर निर्माण का काम शुरू हुआ और 22 जनवरी 2024 को भव्य मंदिर का उद्घाटन व रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा हुई।
मंदिर निर्माण पर वेदांती जी ने कहा था कि जिस उद्देश्य के लिए संतों और भक्तों ने दशकों तक संघर्ष किया, वह सपना अब पूरा हो गया है और यह पूरे देश के लिए ऐतिहासिक अवसर है।
अपने जीवन के अंतिम दौर में वे अयोध्या के वशिष्ठ कुंड आश्रम में ही रहे। 15 दिसंबर 2025 को 67 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। अयोध्या में सरयू तट पर संतों और स्थानीय लोगों की उपस्थिति में उनका अंतिम संस्कार किया गया।
यूपी तक वीडियो रिपोर्ट: जब राजा के परिवार से भिड़े राम विलास वेदांती
डॉ. राम विलास वेदांती के अयोध्या आंदोलन से लेकर 1998 में प्रतापगढ़ के चुनावी दंगल में उतरने और राजकुमारी रत्ना सिंह के खिलाफ ऐतिहासिक चुनावी मुकाबले की पूरी पड़ताल को नीचे दी गई 'यूपी तक' (UP Tak) की आधिकारिक वीडियो रिपोर्ट में दिखाया गया है:
यह वीडियो रिपोर्ट प्रतापगढ़ में 1998 के उस ऐतिहासिक चुनावी मुकाबले की जानकारी देती है, जिसने जिले की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ा था।
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- 💎 जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज: मनगढ़ की माटी से विश्व फलक तक — प्रेम व भक्ति की अमर गाथा
- 📚 उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद: लमही से प्रतापगढ़ प्रवास (1900) व गोदान तक की सच्ची दास्तान
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