प्रतापगढ़ (बेल्हा) की अनमोल लोक-कलाएं: धोबी नृत्य, नौटंकी, अहिरउवा, लिल्ली घोड़ी और आल्हा की जीवंत विरासत
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किसी भी कार्ड पर क्लिक करें1. धोबी नृत्य: पाँव में घुंघरू, कमर में घंटियाँ और बाँसुरी की मीठी तान
बेल्हा के लोक जीवन में धोबी नृत्य का स्थान बहुत ही खास रहा है। पहले के समय में जब भी किसी घर में शादी-ब्याह होता था या किसी बच्चे का जन्म होता था, तो खुशियों के इस मौके पर धोबी नृत्य की महफ़िल जरूर सजती थी। इस नृत्य को देखने के लिए पूरा गाँव चौपाल पर इकट्ठा हो जाता था।
आमतौर पर इस नृत्य में 4 से 5 कलाकारों का एक दल होता है। इसमें दो मुख्य नर्तक होते हैं, जो बेहद खूबसूरत और रंग-बिरंगे परिधान पहनते हैं। यह परिधान महिलाओं के घाघरे जैसा बड़ा और घेरदार होता है, जिस पर तरह-तरह के रंगीन कपड़ों की बारीक सिलाई और गोटे का काम होता है। यह पोशाक काफी भारी होती है। जब कलाकार चक्कर लेकर नाचते हैं, तो यह घाघरा हवा में पूरा फैल जाता है, जो देखने में बेहद मनमोहक लगता है।
कलाकार अपनी कमर में चमड़े की चौड़ी बेल्ट पर बंधी घंटियों की लंबी लड़ी पहनते हैं और दोनों पैरों में भारी घुंघरू बांधते हैं। हाथ में बाँसुरी होती है, जबकि साथी कलाकार ढोलक और मंजीरा संभालते हैं। जब बाँसुरी की मीठी धुन के साथ कमर की घंटियों की खनक और पाँव के घुंघरुओं की झंकार एक साथ गूँजती है, तो दूर खड़े व्यक्ति को भी बिना देखे पता चल जाता है कि धोबी नृत्य शुरू हो चुका है।
नृत्य के दौरान मुख्य कलाकार पहले एक पंक्ति गाता है और फिर उसी लय पर थिरकता है। दूसरा साथी उसके पीछे-पीछे नाचते हुए बाँसुरी बजाता है और सुर में सुर मिलाता है। आज के समय में इस पारंपरिक कला के कलाकार बहुत कम बचे हैं। जिले में अब मुश्किल से 8 से 9 टीमें ही बची हैं। हालांकि खुशी की बात यह है कि पिंटू उपाध्याय जैसे कुछ नौजवानों ने इस कला को सीखकर इसे आज भी मंचों पर जीवित रखा हुआ है।
2. लिल्ली घोड़ी नृत्य: सजीव घोड़े का भ्रम और तलवारबाज़ी का अद्भुत करतब
लिल्ली घोड़ी नृत्य लोक मंच की एक ऐसी नायाब विधा है, जो दर्शकों को एक पल में चकित कर देती है। यह किसी एक जाति विशेष तक सीमित नहीं है, लेकिन मुख्य रूप से हमारे दलित समाज के कलाकारों ने इसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी संभाल कर रखा है।
इस कला में लकड़ी, बाँस की खपच्चियों या गत्ते से घोड़े के शरीर का एक खोखला ढाँचा (मुखौटा) तैयार किया जाता है। इसके बीच में इतनी जगह होती है कि कलाकार उसके अंदर खड़ा होकर उस घोड़े को अपनी कमर पर रस्सियों या पट्टों से कसकर बाँध लेता है। घोड़े के चारों तरफ रंगीन और चमकदार कपड़ों का ऐसा पर्दा लटकता है कि कलाकार के पैर पूरी तरह छिप जाते हैं।
जब कलाकार कदम आगे बढ़ाता है, तो देखने वाले को ऐसा लगता है मानो कोई वीर योद्धा सचमुच किसी सजीव घोड़े पर सवार होकर आ रहा हो। कलाकार के पैर ही घोड़े के पैर बन जाते हैं। सिर पर बाँधी पगड़ी, हाथ में चमकती नंगी तलवार और चेहरे पर वीर रस का तेज लिए जब कलाकार तंबूरा, ढोल, घंटे-घंटियों और क्लार्चन (शहनाईनुमा बाजा) की धुन पर कदमताल करता है, तो दृश्य देखने लायक होता है।
पहले शादी-ब्याह की बारात के आगे लिल्ली घोड़ी नचाना शान की बात मानी जाती थी। लेकिन समय बदलने के साथ लोगों ने इसे पिछड़ा मानकर बुलाना कम कर दिया, जिससे इसके कलाकारों ने भी दूसरे काम अपना लिए। आज यह कला केवल 'बेल्हा लोक महोत्सव' जैसे गिने-चुने आयोजनों में ही कभी-कभार देखने को मिलती है।
3. टिकटिकिया (सरवन): लकड़ी की थाप पर आशुकाव्य और कुरीतियों पर चोट
अवध और बेल्हा के देहाती इलाकों में टिकटिकिया अथवा सरवन गायन की एक बेहद सादी लेकिन असरदार विधा रही है। इसमें लगभग 6 इंच लंबी चपटी लकड़ियों की दो पट्टियों को उंगलियों के बीच फंसाकर आपस में बजाया जाता है। लकड़ियों के टकराने से 'टिक-टिक' की एक अनोखी लय निकलती है, जिसके कारण ही इसका नाम 'टिकटिकिया' पड़ा।
यह गायन मुख्य रूप से चमरमंगता समुदाय द्वारा किया जाता रहा है। चमार जाति के जो लोग मांग-खाकर अपना जीवन गुजारते थे, उन्हें 'चमरमंगता' कहा जाने लगा। लेकिन हकीकत में ये कलाकार संत शिरोमणि रविदास जी की ऋषि परंपरा के सच्चे संवाहक रहे हैं। ये कलाकार आशु कवि (तुरंत कविता और तुकबंदी गढ़ने वाले) होते हैं। लकड़ी की 'टिक-टिक' के बीच वे समाज में फैली ऊँच-नीच, ढोंग, अंधविश्वास और शोषण पर इतने तीखे और चुटीले अंदाज़ में चोट करते हैं कि सुनने वाले हँसते-हँसते भी सोचने पर मजबूर हो जाते हैं।
4. किंगरी: सूफियों जैसी सादगी, तार की झंकार और जीवन की सीख
किंगरी एक बहुत ही प्राचीन तार वाला वाद्ययंत्र है, जिसे एक हाथ से थामकर उंगलियों से छेड़ा जाता है। इस वाद्य को बजाने वाले कलाकारों को ही किंगरी कहा गया। ये कलाकार फकीरों और सूफियों की तरह सादा जीवन जीते थे और गाँव-गाँव घूमकर सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए गीत गाते थे।
किंगरी के कलाकार भी आशु कवि होते हैं। इनकी गायकी में गहरा व्यंग्य भी होता था और जीवन का सच्चा सबक भी। दुखद पहलू यह है कि आज आधुनिकता के दौर में पूरे जनपद प्रतापगढ़ में इस विधा के मुश्किल से 2 या 4 कलाकार ही शेष बचे हैं, जिन्हें सहेजने की सख्त आवश्यकता है।
5. जोगिया सारंगी: राग से वैराग्य की ओर ले जाने वाली अमर आवाज़
जब भोर के समय सारंगी के तारों से दर्द भरी तान निकलती है, तो मन खुद-ब-खुद सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठने लगता है। इसी विधा को 'जोगिया सारंगी' कहा जाता है। इसे गाने और बजाने वाले जोगी भगवान शिव (भूत-भावन महादेव) को अपना आराध्य मानते हैं। वे गुरु गोरखनाथ की नाथ परंपरा और संत कबीर साहब की साखियों को अपने कंठ में बसाए रखते हैं।
जोगिया सारंगी के गीतों में 'बिदेसिया', 'बटोहिया' और 'जोगिया' जैसी शैलियाँ गाई जाती हैं। इनके गीत इंसान को याद दिलाते हैं कि यह दुनिया कितनी फानी है—"एक तरफ किसी घर में बेटे के जन्म की बधाई और खुशियाँ मनाई जाती हैं, तो उसी समय कहीं किसी जवान बेटे की मौत का मातम छाया होता है; किसी के नए महल का गृह-प्रवेश हो रहा होता है, तो उसी वक्त किसी गरीब की घास-फूस की कुटिया जलकर राख हो रही होती है।" यह कला इंसान को स्वार्थ से निकालकर पूरे समाज के दर्द को महसूस करना सिखाती है।
6. रामलीला: अवधी रामचरितमानस की विरासत और बेल्हा का गौरा क्षेत्र
रामलीला केवल एक धार्मिक मंचन नहीं, बल्कि भारतीय लोक जीवन की आत्मा है। 16वीं सदी में जब संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी ने लोक भाषा अवधी में 'रामचरितमानस' की रचना की, तो रामकथा जन-जन के हृदय में उतर गई। गुप्त काल से ही पत्थरों और शिल्प में रामकथा के दृश्य मिलते हैं, और वर्तमान स्वरूप का पहला विधिवत मंचन मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के दौर में माना जाता है।
यह गर्व की बात है कि रामलीला आज भारत के अलावा फिजी, मॉरीशस, त्रिनिदाद, गुयाना, कनाडा, अमेरिका के साथ-साथ दक्षिण-पूर्व एशिया में इंडोनेशिया (लखोन), कंबोडिया (लखोन खोल), म्यांमार (यागप्वे), थाईलैंड (रगौन) और मलेशिया (वेयांग) में भी अत्यंत लोकप्रिय है।
रामलीला के मंचन की चार प्रमुख शैलियाँ देखने को मिलती हैं:
- झाँकी शैली: इसमें कलाकार बिना बोले केवल मूक अभिनय और भाव-भंगिमाओं से दृश्य दिखाते हैं।
- संवाद शैली: इसमें पात्र आपस में धाराप्रवाह और ओजस्वी संवाद बोलते हैं।
- काव्य व गेय शैली: इसमें चौपाइयों और दोहों को गाकर पूरी कथा आगे बढ़ाई जाती है।
- क्षेत्रीय लोक संगीत शैली: इसमें स्थानीय धुनों और लोक वाद्यों (ढोलक, हारमोनियम, मंजीरा) की प्रधानता होती है।
प्रतापगढ़ जनपद के गौरा विकास क्षेत्र के गाँवों में आज भी यह पुरानी परंपरा बेहद आदर और उत्साह के साथ निभाई जाती है। रात के समय पंडालों में जब स्थानीय कलाकार मुकुट और वेशभूषा पहनकर मंच पर उतरते हैं, तो पूरा वातावरण राममय हो जाता है।
7. कृष्ण लीला: देहाती अंचलों में सुर-ताल और भक्ति रस का जीवंत प्रवाह
उत्तर प्रदेश और विशेष रूप से बेल्हा के ग्रामीण अंचलों में कृष्ण लीला की एक बेहद समृद्ध परंपरा है। इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि यह लोक मानस के हृदय में सीधे उतरती है।
गाँव-देहात के वे सीधे-सादे किसान और मजदूर, जो दिनभर खेतों में हाड़-तोड़ मेहनत करते हैं और जिन्हें मोटी-मोटी किताबें पढ़ने का समय या साधन नहीं मिलता, वे कृष्ण लीला का जीवंत मंचन देखकर भगवान श्रीकृष्ण के विराट व्यक्तित्व, बाल-लीलाओं और गीता के संदेश को सहजता से आत्मसात कर लेते हैं। यह लीला उन्हें कठिन से कठिन समय में भी कर्मठ रहने का हौसला देती है।
8. गोड़ी नृत्य: प्राचीन गोंड़ जाति और मातृसत्तात्मक समाज की झलक
प्रतापगढ़ के इतिहास में गोड़ी नृत्य का एक बहुत ही गहरा और रहस्यमयी महत्व है। ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, जब यहाँ सोमवंशी क्षत्रियों का आगमन भी नहीं हुआ था, उससे बहुत पहले जिला मुख्यालय के पास स्थित 'गोंड़े' गाँव में गोंड़ जाति के लोग बड़ी संख्या में रहते थे। बाद के वर्षों में वे जिले के अलग-अलग कोनों में बिखर गए और उनका अलग वजूद धीरे-धीरे कम होता गया, लेकिन उनकी संस्कृति इस 'गोड़ी नृत्य' में आज भी महफूज़ है।
इस नृत्य की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसकी भाव-भंगिमाएँ एक मातृसत्तात्मक समाज (जहाँ स्त्री की प्रधानता हो) का संकेत देती हैं। इसमें दिखाया जाता है कि कैसे पुरुष, स्त्री की इच्छाओं और शर्तों के आगे खुद को समर्पित करता है। आधुनिक समाज को यह भले ही थोड़ा अजीब लगे, लेकिन लोक संस्कृति के जानकारों के अनुसार यह आदिम गोंड़ समाज की एक बेहद अनमोल और दुर्लभ सांस्कृतिक निशानी है।
9. अहिरउवा नृत्य: जांघों पर बंधे घुंघरू, आल्हा की तर्ज और रसखान के सवैये
अहिरउवा नृत्य बेल्हा के सबसे रोमांचक और ऊर्जा से भरे लोक नृत्यों में गिना जाता है। इसका संबंध द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण और ब्रज की गोपियों के प्रसंगों से माना जाता है। पौराणिक मान्यता है कि जब बालकृष्ण ने सखियों से माखन माँगा, तो सखी ने शर्त रख दी कि केवल पैरों की पैंजनी से काम नहीं चलेगा, जब तुम अपनी कछौटी (कमर और काँछ) पर घुंघरू बाँधकर नाचोगे, तभी माखन की हाँडी मिलेगी।
खेलत, खात फिरैं अँगना, पग पैंजनि बाजत पीरी कछौटी।।
वा छवि को रसखानि बिलोकत, वारत काम कला निज कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सो लै गयो माखन रोटी।।
शेष, महेश, गणेश, दिनेश, सुरेशहु जाहि निरन्तर ध्यावैं।
ताहि अहीर की छोहरिया छछिया भरि छाछ पे नाच नचावैं।।
अहिरउवा नृत्य में कलाकार लाल, नीले और काले रंग की चुस्त पोशाक पहनते हैं। वे अपने पैरों के साथ-साथ अपनी जांघों पर बड़े-बड़े घुंघरू कसकर बाँधते हैं। जब वे अखाड़े में उतरकर आल्हा की वीर रस भरी तर्ज पर तेजी से थिरकते हुए हैरतअंगेज कलाबाजियाँ और करतब दिखाते हैं, तो देखने वाले दाँतों तले उँगलियाँ दबा लेते हैं। बेल्हा लोक महोत्सव में यह नृत्य हमेशा से सबसे बड़ा आकर्षण रहा है।
10. मशक शहनाई: सपेरों की बीन और बैगपाइप का देसी अजूबा
मशक शहनाई (जिसे मशक बीन भी कहा जाता है) हमारी लोक वाद्य परंपरा का एक अत्यंत दुर्लभ रत्न है। यह सपेरों की बीन और पारंपरिक शहनाई का एक अद्भुत मेल है। इसमें सूखी लौकी की जगह मोर की आकृति का कपड़े व पतले चमड़े का थैला (मशक) इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें कई छोटी-छोटी नलियाँ (पाइप) जुड़ी होती हैं।
वादक इस चमड़े के थैले को अपनी बाईं काँख (बगल) में हल्के से दबाकर रखता है और मुँह से उसमें हवा भरता है। जैसे ही हवा से थैला फूलता है, उसके सिरों से एक ऐसी लगातार और मधुर गूँज निकलती है जैसे सैकड़ों भौंरे एक साथ गुनगुना रहे हों। इसके बाद वादक मुख्य नली के छेदों पर उंगलियाँ फिराकर ऐसी सम्मोहक धुन छेड़ता है कि सुनने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता है। इसे अक्सर 'भारतीय बैगपाइप' भी कहा जाता है।
अंग्रेजी हुकूमत और रियासती दौर में शादियों में मशक शहनाई बजाना प्रतिष्ठा की निशानी माना जाता था। लेकिन पिछले कुछ दशकों में डीजे और आधुनिक लाउडस्पीकरों के शोर में यह मीठा बाजा लगभग खो चुका है, जिसे केवल कुछ बुजुर्ग कलाकार ही संभाल पाए हैं।
11. बिरहा और फरवाही: हल के फार की खनक और हिंदू-मुस्लिम साझी विरासत
भोजपुरी और अवधी इलाके में बिरहा लोक गीतों का सिरमौर रहा है। बिरहा का एक रूप 'फरवाही' भी कहलाता है। इसका नाम फरवाही इसलिए पड़ा क्योंकि इसमें किसान के हल में लगने वाले लोहे के नुकीले 'फार' जैसे दो छोटे टुकड़ों को दोनों हाथों में लेकर खट-खट की लयबद्ध आवाज के साथ बजाया जाता है।
शुरुआत में इसमें प्रेमी-प्रेमिका के विरह और वियोग का दर्द गाया जाता था, जिससे इसका नाम 'बिरहा' पड़ा। लेकिन धीरे-धीरे इसमें सामाजिक घटनाएँ, ऐतिहासिक प्रसंग और आज़ादी की कहानियाँ भी शामिल हो गईं।
बिरहा की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसने जात-पात और धर्म की हर दीवार को तोड़ दिया। अहीर समुदाय से शुरू हुई यह विधा जब आगे बढ़ी, तो मुस्लिम समाज के कलाकारों ने भी इसे अपने सीने से लगा लिया। हैदर अली और हफ़ीज़ चंचल जैसे महान गायकों ने जब बिरहा गाया, तो हिंदू और मुसलमान दोनों उनकी तानों पर झूम उठे। इसके अलावा बुल्लू यादव, हीरा लाल यादव, राम अधार यादव, राम कैलाश यादव, मंगल यादव, बेचन यादव और बालेश्वर यादव ने अपनी गायकी से पूरे उत्तर भारत में इसका परचम लहराया।
12. आल्हा: सावन की रिमझिम फुहारें, नगाड़े की चोट और वीरों का खौलते लहू का इतिहास
जब सावन के महीने में आसमान से फुहारें गिरती हैं और शाम ढलते ही चिड़ियाँ अपने घोंसलों में लौट आती हैं, तब बेल्हा के गाँवों की चौपालों पर आल्हा की महफ़िल जमती है। ढोलक और मंजीरे की तेज थाप पर जब 'अल्हैत' (आल्हा गायक) अपनी गूँजती आवाज में टेक उठाता है, तो बुजुर्गों के चेहरे पर भी जवानी का जोश तैरने लगता है।
आल्हा का इतिहास 12वीं सदी में महोबा के चंदेल साम्राज्य से जुड़ा है। चंदेल राजा परमाल के दरबारी महाकवि जगनिक ने 'आल्हा-खंड' (परमाल रासो) की रचना की थी। इसमें महोबा के दो अमर सेनापतियों—आल्हा और ऊदल के अदम्य पराक्रम और उनकी 52 लड़ाइयों की दास्तान है। इसमें पिता दसराज (रासराज), चाचा बच्छराज, मलखान, सुलखान, ब्रह्मा (ब्रह्मजित) और तालहन जैसे वीरों की तलवारबाजी का ऐसा रोंगटे खड़े कर देने वाला वर्णन है कि सुनने वालों की भुजाएँ फड़कने लगती हैं। आल्हा की शुरुआत हमेशा देवी-देवताओं के 'सुमिरन' से होती है।
आल्हा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम में क्रांतिकारियों का सबसे बड़ा हथियार भी था। अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद, भाई परमानन्द और दीवान शत्रुघ्न जैसे देशभक्त अपनी टोलियों में बैठकर आल्हा गाते थे ताकि नौजवानों के सीने में गुलामी के खिलाफ आग धधकती रहे। आल्हा को सदियों से गुरु-शिष्य परंपरा के तहत 'अल्हैतों' ने अपने कंठों में सुरक्षित रखा है।
13. नृत्य-मृदंगा: जानवरों के सींग का बाजा और कोड़े की कड़कती मार
नृत्य-मृदंगा हमारे दलित समुदाय की एक बहुत ही अनोखी लोक परंपरा है। इसमें जानवरों के सींग से बना एक खास तरह का वाद्ययंत्र अनिवार्य रूप से बजाया जाता है, जिसकी आवाज बहुत भारी और गूँजने वाली होती है।
इस नृत्य में एक विदूषक (मसखरा) पात्र होता है, जो दर्शकों को खूब हँसाता है। इस पात्र की पीठ पर गोल आकार का मजबूत चमड़े का सुरक्षात्मक कवच बँधा होता है। जब वह मजाक-मस्ती करता है, तो दूसरा साथी पात्र एक बड़े कोड़े (चाबुक) से उसकी पीठ पर जोरदार वार करता है। कोड़े के टकराने से हवा में बंदूक जैसी तेज कड़ाकेदार आवाज गूँजती है, जिससे देखने वालों की साँसें थम जाती हैं। लेकिन पीठ पर चमड़ा बँधा होने की वजह से कलाकार को जरा भी चोट नहीं लगती। इसके साथ कुछ पुरुष कलाकार महिलाओं की वेशभूषा पहनकर देवी-देवताओं के भजन गाते हुए ताल मिलाते हैं।
14. भाव नृत्य: बिना शब्दों का मूक जादू और आँखों के इशारे
भाव नृत्य में कोई गीत या बोल नहीं गाए जाते। इसमें नर्तक केवल तबले और वाद्ययंत्रों की लय पर अपने चेहरे के भावों, आँखों के इशारों और शरीर की मुद्राओं से पूरी की पूरी कहानी दर्शकों के सामने जीवंत कर देता है।
कथानक की दृष्टि से ही कलाकार की वेशभूषा होती है। दर्शक बिना एक भी शब्द सुने पूरी कहानी और उसके दर्द या उल्लास को समझ जाते हैं और कलाकारों की इस मूक अभिनय क्षमता की दाद देते हैं।
15. नौटंकी: 36 ग्राम की राजकुमारी, आईन-ए-अकबरी और नगाड़े की धमक
सिनेमा और टीवी आने से पहले पूरे उत्तर भारत में मनोरंजन का सबसे बड़ा बादशाह 'नौटंकी' ही थी। नौटंकी नाम पड़ने के पीछे एक बहुत ही दिलचस्प लोककथा है। कहा जाता है कि पुराने जमाने में 'नौटंकी' नाम की एक बेहद रूपवती और सुकोमल राजकुमारी थी। उसका वजन केवल 'नौ टकी' था—यानी उस समय चलने वाले 4 ग्राम चांदी के एक सिक्के (टकी) के हिसाब से कुल 36 ग्राम (9 × 4 = 36 ग्राम)। उसे तराजू में फूलों से तौला जाता था। उसी राजकुमारी के किस्से पर जब नाटक रचा गया, तो उस नाट्य विधा का नाम ही 'नौटंकी' पड़ गया।
इतिहास में देखें तो 16वीं सदी में अबुल फज़ल की किताब 'आईन-ए-अकबरी' में 'भगति व्यास' का जिक्र मिलता है, जो असल में नौटंकी का ही पुराना रूप था। आगे चलकर उत्तर प्रदेश के हाथरस और कानपुर नौटंकी के सबसे बड़े केंद्र बने, जहाँ से इसकी दो अलग-अलग शैलियाँ निकलीं।
1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में नौटंकी के कलाकारों ने गाँव-गाँव जाकर अंग्रेजों के जुल्मों के खिलाफ नाटक खेले और आम जनता के दिलों में बगावत की चिंगारी सुलगाई। अंग्रेजों ने इससे डरकर कई नौटंकी अखाड़ों के प्रमुखों को लालच देकर भड़काने की कोशिश की ताकि देशभक्ति के बजाय फूहड़ नाटक दिखाए जाएँ, लेकिन सच्चे लोक कलाकारों ने अपनी राष्ट्रीय चेतना को कभी झुकने नहीं दिया।
नौटंकी का शिल्प: दोहा, चौबोला, उड़ान और नगाड़े की धमक
नौटंकी का संगीत और लेखन बहुत ही वैज्ञानिक और समृद्ध है। इसके हर छंद को तीन प्रमुख हिस्सों में बाँटा जाता है:
- दोहा: यह मुक्त छंद होता है, जिसे अभिनेता बिना किसी खास लय के दमदार आवाज में बोलता है।
- चौबोला: यह पद का मुख्य हिस्सा होता है, जो कहानी के मुख्य प्रसंग को आगे बढ़ाता है।
- दौड़ / चलती / उड़ान: इसे बहुत तेज गति से गाया जाता है और इसका अंत एकदम धीमे सुर पर होता है।
हर हिस्से के खत्म होते ही जब नगाड़े पर 'धड़ाक-धूम' की चोट पड़ती है, तो पंडाल में बैठे हजारों दर्शकों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। नौटंकी में दोहे और चौबोले के अलावा सोरठा, आल्हा, कड़ा, झूलना, दादरा, कव्वाली, ग़ज़ल और फिल्मी धुनों का भी सुंदर मेल किया जाता है।
16. कहला गाँव: क्रांतिकारियों की पावन धरती और बेल्हा में नौटंकी की राजधानी
प्रतापगढ़ जनपद का कहला गाँव जहाँ एक तरफ आजादी की लड़ाई में अपने जाँबाज शहीदों की शहादत के लिए जाना जाता है, वहीं दूसरी तरफ यह पूरे उत्तर भारत में नौटंकी विधा का सिरमौर केंद्र रहा है।
कहला गाँव में एक दर्जन (12) से अधिक पंजीकृत नौटंकी कंपनियाँ रही हैं और यहाँ के 200 से अधिक लोक कलाकार कई पीढ़ियों से इस रंगमंच से जुड़े हुए हैं। कहला की नौटंकी मंडलियाँ न केवल पूरे उत्तर प्रदेश, बल्कि बिहार, मध्य प्रदेश और नेपाल की सीमा तक जाकर अपनी कला का डंका बजाती रही हैं। आज जरूरत इस बात की है कि इस समृद्ध विधा को फूहड़ता से बचाकर इसके पुराने गौरव को वापस लौटाया जाए।
17. प्रतापगढ़ (बेल्हा) की लोक कलाओं का तुलनात्मक विवरण
नीचे दी गई सारणी में बेल्हा की सभी प्रमुख लोक कलाओं, उनके वाद्ययंत्रों और उनकी खास विशेषताओं को संक्षेप में समझा जा सकता है:
| लोक कला का नाम | मुख्य समुदाय / मूल क्षेत्र | प्रमुख साज़ (वाद्ययंत्र) | अवसर एवं मुख्य विषय | सबसे खास पहचान |
|---|---|---|---|---|
| धोबी नृत्य | धोबी समुदाय / बेल्हा देहात | बाँसुरी, कमर की घंटियाँ, घुंघरू, ढोलक, मंजीरा | विवाह, जन्मोत्सव, शुभ मांगलिक अवसर | घेरदार घाघरेनुमा भारी परिधान और कमर की घंटियों की खनक |
| लिल्ली घोड़ी नृत्य | दलित समुदाय / बेल्हा ग्रामीण | तंबूरा, ढोल, क्लार्चन, घंटे-घंटियाँ | शादी की बारात, सांस्कृतिक मेले | कमर पर बँधा खोखला घोड़ा और तलवार लिए वीर योद्धा का भ्रम |
| टिकटिकिया (सरवन) | चमरमंगता समुदाय / अवध क्षेत्र | 6 इंच की चपटी लकड़ियों की दो पट्टियाँ | आशुकाव्य, सामाजिक कुरीतियों पर चोट | लकड़ी की 'टिक-टिक' की लयबद्ध थाप और संत रविदास परंपरा |
| किंगरी | किंगरी फकीर / सूफी परंपरा | किंगरी (प्राचीन तार वाला वाद्य) | भिक्षाटन, जन-जागरण, शिक्षाप्रद गीत | सूफियों जैसी सादगी और चुटीला सामाजिक संदेश (केवल 2-4 कलाकार शेष) |
| जोगिया सारंगी | नाथ पंथी जोगी / शिव उपासक | सारंगी | बिदेसिया, बटोहिया, कबीर साखियाँ | राग से वैराग्य की ओर यात्रा और संसार की क्षणभंगुरता का बोध |
| रामलीला | सर्वसमाज / गौरा विकास क्षेत्र | हारमोनियम, ढोलक, मंजीरा, नगाड़ा | दशहरा, आश्विन माह, धार्मिक उत्सव | तुलसीकृत रामचरितमानस पर आधारित 4 शैलियों का अवधी मंचन |
| कृष्ण लीला | ग्रामीण अंचल / किसान-मजदूर | हारमोनियम, ढोलक, झांझ | भक्ति रस, लोक मंचन | श्रमजीवी जनता के जीवन में कृष्ण भक्ति और कर्म का संदेश |
| गोड़ी नृत्य | प्राचीन गोंड़ जाति / गोंड़े गाँव | पारंपरिक देहाती ढोल व वाद्य | प्राचीन सांस्कृतिक अनुष्ठान | सोमवंशी काल से पूर्व की परंपरा व मातृसत्तात्मक समाज का संकेत |
| अहिरउवा नृत्य | अहीर समुदाय / द्वापर युगीन परंपरा | जांघों के भारी घुंघरू, ढोलक, मंजीरा | माखन लीला, कृष्ण भक्ति, बेल्हा महोत्सव | कछौटी पर घुंघरू बाँधकर आल्हा की तर्ज पर साहसिक करतब |
| मशक शहनाई | पारंपरिक शहनाई वादक | मशक बीन (मोरनुमा चमड़े का थैला व शहनाई) | शादी-ब्याह, रजवाड़ों की महफ़िल | काँख में दबाकर बजने वाला 'भारतीय बैगपाइप' (भौंरे जैसी गुंजन) |
| बिरहा / फरवाही | अहीर व मुस्लिम साझी विरासत | हल के लोहे का फार, ढोलक, करताल | खेत-खलिहान, मेले, सामाजिक प्रसंग | हैदर अली, हीरा लाल यादव की साझी हिंदू-मुस्लिम विरासत |
| आल्हा | अल्हैत परंपरा / चौपाल | बड़ा ढोलक, झांझ, मंजीरा | सावन मास, वर्षा ऋतु, वीर रस | महोबा के आल्हा-ऊदल की 52 लड़ाइयाँ व 1857 क्रांति की प्रेरणा |
| नृत्य-मृदंगा | दलित समुदाय / ग्रामीण अंचल | जानवरों के सींग का बाजा, कोड़ा | मनोरंजन, हास-परिहास, उत्सव | पीठ पर बंधे चमड़े पर कोड़े बरसाने का हैरतअंगेज दृश्य |
| भाव नृत्य | पारंपरिक नर्तक | तबला, तानपूरा / हारमोनियम | कथा मंचन | बिना शब्दों के केवल आँखों व चेहरे के मूक अभिनय से पूरी कहानी |
| नौटंकी | हाथरस-कानपुर शैली / रंगमंच | नगाड़ा, शहनाई, हारमोनियम, ढोलक | मेले, जलसे, गाँव के बाग-बगीचे | दोहा, चौबोला, उड़ान और नगाड़े की गूँजती चोट (36 ग्राम की राजकुमारी) |
| कहला गाँव नौटंकी | कहला गाँव मंडलियाँ (200+ कलाकार) | नगाड़ा, ढोलक, हारमोनियम | अंतरराज्यीय रंगमंच व मेले | 1 दर्जन से अधिक कंपनियाँ और पीढ़ियों से चला आ रहा नाट्य संसार |
18. प्रतापगढ़ की लोक कलाओं से जुड़े जरूरी सवाल-जवाब (FAQs)
प्रतापगढ़ में अहिरउवा नृत्य को सबसे ज्यादा ऊर्जावान और रोमांचक माना जाता है। इसमें कलाकार अपनी जांघों पर बड़े-बड़े घुंघरू बाँधते हैं और आल्हा की वीर रस भरी तर्ज पर अखाड़े में उतरकर हैरतअंगेज कलाबाजियाँ दिखाते हैं।
लोक मान्यता के अनुसार, पुराने दौर में 'नौटंकी' नाम की एक अत्यंत रूपवती और सुकोमल राजकुमारी थी, जिसका वजन मात्र नौ टकी यानी 36 ग्राम चांदी के सिक्के के बराबर था और उसे फूलों से तौला जाता था। उसी राजकुमारी के जीवन पर आधारित नाटक की अपार लोकप्रियता के कारण इस पूरी नाट्य विधा का नाम 'नौटंकी' पड़ गया।
मशक शहनाई में स्कॉटलैंड के बैगपाइप की तरह ही मोर की आकृति का चमड़े का थैला होता है। वादक इसे अपनी काँख में दबाकर मुँह से हवा भरता है, जिससे भौंरे की गुंजन जैसी सम्मोहक तान निकलती है। इसलिए इसे देसी या भारतीय बैगपाइप कहा जाता है।
बिरहा विधा ने धर्म और जाति के बंधनों को पूरी तरह तोड़ दिया। हिंदू गायकों (जैसे हीरा लाल यादव, बुल्लू यादव, बालेश्वर यादव) के साथ-साथ हैदर अली और हफ़ीज़ चंचल जैसे महान मुस्लिम गायकों ने भी इसे नई ऊँचाइयाँ दीं और दोनों समुदायों के श्रोताओं ने उन्हें दिल से प्यार दिया।
कहला गाँव स्वतंत्रता सेनानियों की शहादत के साथ-साथ नौटंकी का बहुत बड़ा केंद्र रहा है। यहाँ 12 से अधिक नौटंकी मंडलियाँ और 200 से अधिक लोक कलाकार कई पीढ़ियों से इस रंगकर्म को देश भर में मंचित करते आ रहे हैं।
बेल्हा की ये लोक कलाएं केवल नाच-गाने या मनोरंजन का जरिया नहीं हैं, बल्कि ये हमारे पुरखों के संघर्ष, उनकी खुशियों, उनके आंसुओं और उनकी गहरी समझ का निचोड़ हैं। आज के डिजिटल दौर में जब मोबाइल और इंटरनेट ने लोगों की दुनिया को छोटा कर दिया है, हमारी ये अनमोल विधाएं दम तोड़ रही हैं। किंगरी के केवल दो-चार कलाकार बचे हैं, धोबी नृत्य की कुछ ही टोलियाँ रह गई हैं और मशक शहनाई की आवाज चौपालों से गायब होती जा रही है।
इन लोक कलाकारों ने तंगहाली और उपेक्षा झेलते हुए भी हमारी संस्कृति की लौ को जलाए रखा। अब यह हम सब का और आने वाली पीढ़ियों का कर्तव्य है कि हम केवल सरकारी मदद के भरोसे न रहकर, अपने सामाजिक उत्सवों, शादी-ब्याहों और सांस्कृतिक मंचों पर इन कलाकारों को ससम्मान बुलाएं, उनकी कला की कद्र करें और बेल्हा की इस अनमोल विरासत को हमेशा-हमेशा के लिए जिंदा रखें।
लेखकीय सहयोग: डॉ. पीयूष कान्त शर्मा, निर्झर प्रतापगढ़ी, सुनील प्रभाकर, डॉ. बृजभानु सिंह
प्रकाशन एवं संकलन: प्रतापगढ़ HUB (Pratapgarh HUB) — अवध व बेल्हा की लोक धरोहर को समर्पित