बेल्हा के पारंपरिक लोक-व्यंजन: दाल का दूल्हा, सनई का साग, फरा, रिकवछ और महुए की लप्सी का असली देहाती स्वाद
गाँव-देहात के खानपान की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि इसमें बाज़ार के डिब्बाबंद मसालों या केमिकल का कोई नामोनिशान नहीं था। खेत से टूटी ताजी सब्जियाँ, घर की दलहन, पेड़ से टपका महुआ और कोल्हू का शुद्ध सरसों का तेल। जब घर की महिलाएँ मिट्टी के चूल्हे पर उपलों (कंडों) की धीमी आँच पर खाना पकाती थीं, तो पूरे दालान और गली में हींग और भुने जीरे की ऐसी खुशबू फैलती थी कि भूख अपने-आप दोगुनी हो जाती थी। आइए, अपनी पुरानी थाली को याद करते हुए बेल्हा के इन 24 अनमोल पकवानों का स्वाद लेते हैं।
पारंपरिक व्यंजन अनुक्रमणिका: सीधे अपनी पसंद के पकवान पर पहुँचें
किसी भी कार्ड पर क्लिक करें1. मीठा बड़ा (बरा-पना): ब्याह-शादी की शान और गुड़ की लप्सी का मीठा मेल
गाँव में जब भी किसी बिटिया या बेटे का ब्याह पड़ता था, या कोई बड़ा न्योता-भोज होता था, तो घर की महिलाएँ सबसे पहले मीठा बड़ा (बरा-पना) बनाने की तैयारी करती थीं। उड़द और मटर की दाल को रात भर पानी में भिगोया जाता है। सुबह सिलबट्टे पर दरदरी पिसी दाल में हींग और देशी मसाले मिलाकर गोल-चपटी टिक्की बनाई जाती है और फिर खौलते सरसों के तेल में लाल-लाल कुरकुरा तल लिया जाता है।
बड़े को केवल तला ही नहीं जाता, बल्कि इसका असली मज़ा तब आता है जब चावल के आटे और देशी गुड़ की पतली खौलती हुई चाशनी (लप्सी जिसे देहात में 'पना' कहते हैं) तैयार की जाती है। तले हुए गरमा-गरम बड़ों को इस मीठी लप्सी में डुबोकर छोड़ दिया जाता है। जब बड़ा चाशनी पीकर रसीला और मुलायम हो जाता है, तो मुँह में रखते ही घुल जाता है। हमारी पुरानी पीढ़ी के बुजुर्ग आज भी इस सोंधे स्वाद को याद करके आहें भरते हैं।
2. दही बड़ा: मटके के ताजे गाढ़े दही में भुने जीरे और काले नमक की बहार
उड़द की दाल के तले हुए बड़ों को जब मीठे पना के बजाय मटके के ताजे, गाढ़े और मलाईदार दही में भिगोया जाता है, तो बनता है हमारा पारंपरिक दही बड़ा। ऊपर से तवे पर भुना हुआ जीरा, काला नमक और पिसी लाल मिर्च छिड़क कर जब मिट्टी के सकोरे में परोसा जाता है, तो शहर की चाट इसके आगे फीकी लगती है। होली का त्योहार हो या घर आए मेहमानों का सत्कार, बेल्हा के हर घर में दही बड़ा बड़े चाव से बनाया और खिलाया जाता है।
3. फरा (गोइठा / दाँत निकोसा / पनबुडा): जाड़े की पहली पसंद और भाप में पका बेजोड़ स्वाद
सर्दियों का मौसम आते ही अवध और बेल्हा के चूल्हों पर फरा बनना शुरू हो जाता है। इसे इलाके में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है—कोई इसे गोइठा कहता है, कोई दाँत निकोसा, तो कोई पनबुडा। चावल के आटे को गरम पानी से गूँथकर छोटी-छोटी पूरियाँ बनाई जाती हैं। इन पूरियों के बीच में उड़द या चने की दाल की तीखी, चटपटी और हींग-युक्त पीठी भरी जाती है।
जब पूरियों को आधा मोड़कर किनारे दबाए जाते हैं और बीच से पीठी झांकती दिखती है, तो ऐसा लगता है मानो कोई दाँत दिखा रहा हो, इसीलिए इसका नाम 'दाँत निकोसा' पड़ा। इसे तेल में तलने के बजाय खौलते पानी की भाप में पकाया जाता है, जिससे यह पेट के लिए बहुत हल्का और स्वास्थ्यवर्धक होता है। गरमा-गरम फरे पर गाय का शुद्ध घी, घर का बना आम का खट्टा अचार और हरी धनिया-मिर्च की चटनी लगाकर खाने का आनंद ही अलग है।
4. फुलौरी व कढ़ी: तेल में तैरती फूली-फूली पकौड़ी और खट्टी-मीठी कढ़ी की जुगलबंदी
गाँव में जब भी कोई उत्सव या पूजा-पाठ होता है, तो फुलौरी ज़रूर बनती है। मटर या चने के बेसन को पानी में गाढ़ा घोलकर उसमें जीरा, हींग और नमक मिलाया जाता है। हाथ की उंगलियों से जब छोटी-छोटी बूँदें गर्म तेल में टपकाई जाती हैं, तो वे फूलकर गोल-मटोल हो जाती हैं—इसी फूलने की वजह से इन्हें 'फुलौरी' कहा जाता है।
इन सादी और कुरकुरी फुलौरियों को बेसन और मट्ठे की खट्टी-मीठी कढ़ी में डुबोया जाता है। कढ़ी में पड़ते ही फुलौरियाँ रस पीकर एकदम नर्म हो जाती हैं। गरमा-गरम भात के साथ यह सादा पर स्वादिष्ट खाना हर किसी का मन मोह लेता है।
5. दाल का दूल्हा (दलटिक्की): जब दाल और रोटी का झंझट खत्म कर बना एक मुकम्मल भोजन
गाँव की कामकाजी जिंदगी में कभी-कभी ऐसा समय आता था जब खेतों में बुआई या कटाई का ज़ोर होता था और अलग-अलग दाल और रोटी बनाने की फुर्सत नहीं होती थी। इसी जरूरत से जन्म हुआ हमारे सबसे प्यारे व्यंजन का—दाल का दूल्हा, जिसे देहात में दलटिक्की या दलढोकली भी कहते हैं।
जब अरहर की दाल चूल्हे पर खौलकर आधी पक जाती है, तो गेहूँ के आटे की छोटी-छोटी पूरियाँ बनाकर उनके चारों कोनों को आपस में जोड़कर फूलों या नाव जैसी सुंदर टिकरियाँ बना ली जाती हैं। इन टिकरियों को सीधे खौलती दाल में छोड़ दिया जाता है। दाल के गाढ़े रस में पककर जब ये टिकरियाँ पूरी तरह तैयार हो जाती हैं, तो ऊपर से जीरा, हींग, लहसुन और लाल मिर्च का देशी घी में तड़का लगाया जाता है। थाली में परोसकर जब ऊपर से दो चम्मच शुद्ध घी डाला जाता है, तो इसका स्वाद लाजवाब होता है।
6. रिकवछ (रघुबर भाला): अरहर-उड़द की दाल का भाला और तीखी तरी की रंगत
सब्जियों के अभाव में या किसी खास महफ़िल में सब्जी का सबसे शानदार विकल्प रहा है—रिकवछ। बेल्हा के कुछ इलाकों में देहाती लोग इसे बड़े गर्व से 'रघुबर भाला' भी कहते हैं। उड़द की दाल को भिगोकर गाढ़ा पीसा जाता है और उसमें हींग, गरम मसाला, कटी हरी मिर्च और अदरक मिलाई जाती है।
हाथों से इसे लंबे और चपटे आकार (भाले जैसी नोक) में ढालकर सरसों के तेल में गहरा सुनहरा तला जाता है। फिर अलग से प्याज, लहसुन, टमाटर और गरम मसालों की तरी (कढ़ी जैसी गाढ़ी ग्रेवी) तैयार करके इन तले हुए भालों को उसमें पकाया जाता है। तरीदार रिकवछ का एक टुकड़ा तोड़कर जब रोटी या चावल से खाते हैं, तो इसका तीखा और चटपटा स्वाद मुँह में पानी ला देता है।
7. सहिना (कोरवर): अरबी (घुइयाँ) के पत्तों का रोल, नाश्ते की पकौड़ी और रसदार सालन
बरसात के दिनों में जब खेतों और बाड़ों में अरबी (घुइयाँ) के बड़े-बड़े हरे पत्ते लहलहाते हैं, तब हर घर में सहिना (जिसे कई जगह कोरवर या पात्रा कहा जाता है) बनता है। उड़द या चने की दाल की मसालेदार पीठी में खटाई (अमचूर) मिलाई जाती है ताकि गले में खराश न हो।
अरबी के पत्तों पर इस पीठी की परत दर परत लगाकर उसे कसकर लपेटा (रोल बनाया) जाता है। इस रोल को पहले भाप में उबाला जाता है ताकि पत्ते और दाल पक जाएँ। ठंडा होने पर चाकू से गोल-गोल टुकड़े काटकर तवे पर तेल में कुरकुरा सेका जाता है। इसे शाम की चाय के साथ नाश्ते में चटनी से भी खाया जाता है, और जब तरीदार सब्जी बनानी हो तो गरम मसाले के सालन में पकाकर मुख्य भोजन के रूप में परोसा जाता है।
8. रसाज: कड़ाही में जमाई गई बेसन की नमकीन बर्फी और शाही तरीदार सालन
रसाज गाँव की उन गृहिणियों की पाक-कला का कमाल है, जो बिना हरी सब्जी के भी ऐसी शाही डिश तैयार कर देती थीं जो पनीर को भी मात दे दे। बेसन के पतले घोल में नमक, अजवाइन, हींग और हल्दी मिलाकर लोहे की कड़ाही में धीमी आँच पर लगातार चलाया जाता है।
जब घोल गाढ़ा होकर हलवे जैसा हो जाता है, तो उसे तेल लगी थाली में एक बराबर फैलाकर जमा दिया जाता है। ठंडा होने पर चाकू से काजू-कतली या बर्फी के आकार के सुंदर टुकड़े काटे जाते हैं। इन टुकड़ों को तेल में तलकर सीधे नाश्ते के रूप में भी खाया जाता है और खड़े गरम मसालों की गाढ़ी रसेदार तरी में डालकर लजीज सब्जी भी बनाई जाती है। यह मुँह में जाते ही मलाई की तरह पिघल जाती है।
9. दाल भरी पूरी (बेढ़ई): नई बहू के आगमन, गंगा दशहरा और पितृपक्ष का पवित्र पकवान
बेल्हा के पारंपरिक संस्कारों में दाल भरी पूरी का बहुत बड़ा धार्मिक और सामाजिक महत्व है। घर में नई दुल्हन के पहली बार कदम रखने पर, गंगा दशहरा के पावन पर्व पर, और पितृपक्ष की नवमी (मातृ नवमी) पर दाल भरी पूरी बनाना अनिवार्य परंपरा रही है।
चना या मटर की दाल को उबालकर सिलबट्टे पर पीसा जाता है। इसमें भुना जीरा, हींग और गरम मसाले मिलाकर सूखा 'पूरन' तैयार होता है। गेहूँ के आटे की लोई में इस पूरन को भरकर तवे पर सरसों के तेल या देशी घी से पराठे की तरह सेका जाता है या कड़ाही में पूरी की तरह तला जाता है। यह पूरी इतनी खस्ता और खुशबूदार होती है कि इसके साथ सूखी आलू की सब्जी या दम आलू खाकर आत्मा तृप्त हो जाती है।
10. रसियाव (बखीर / गुड़ की खीर): दाल भरी पूरी की हमजोली और गन्ने के रस की मिठास
जहाँ दाल भरी पूरी बनी, वहाँ रसियाव (जिसे कई जगह बखीर भी कहते हैं) का बनना तय है। यह दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे माने जाते हैं। रसियाव वास्तव में गन्ने के ताजे रस या शुद्ध देशी गुड़ के घोल में नए चावल को पकाकर बनाई जाने वाली पारंपरिक खीर है।
जब चूल्हे पर गुड़ और चावल धीमी आँच पर एकसार होते हैं, तो उसकी सोंधी महक पूरे घर में फैल जाती है। पकने के बाद इसमें थोड़ा सा दूध मिला देने से इसका रंग सुनहरा और स्वाद अत्यंत मखमली हो जाता है। नमकीन दाल भरी पूरी के साथ मीठे रसियाव का यह संगम अवधी रसोई का सबसे बड़ा तोहफा है।
11. लगदावा: कद्दू, अरुई और चने की दाल का मसालेदार मेल
देहात की गृहस्थी में जब जल्दी में दाल और सब्जी का एक ही बर्तन में पूरा स्वाद लेना होता था, तब रसोई में लगदावा पकता था। चने या मटर की दाल के साथ कद्दू (कोहड़ा), अरुई (अरबी) या मौसमी सब्जियों को छोटे टुकड़ों में काटकर एक साथ पकाया जाता है।
जब दाल और सब्जी घुलकर एकदम गाढ़ी हो जाती है, तब लोहे की करछुल में सरसों का तेल, लहसुन की कलियाँ, कटी हरी मिर्च और हींग डालकर धुआँधार बघार (तड़का) लगाया जाता है। यह न तो पूरी तरह दाल होती है और न ही पूरी तरह सब्जी, बल्कि दोनों का मिला-जुला इतना जायकेदार रूप होता है कि इसके साथ सिर्फ मोटी रोटी मिल जाए तो किसी और चीज़ की ज़रूरत नहीं रहती।
12. सगपहिता: साग और पहिती (दाल) का जादुई मेल, जाड़े की सेहत का खजाना
सर्दियों में जब खेतों में हरा-भरा पालक, बथुआ, मेथी और पोई का साग लहलहाता है, तब अवध का सबसे सेहतमंद व्यंजन सगपहिता बनता है। 'सगपहिता' नाम ही दो शब्दों से मिलकर बना है—साग और पहिती (यानी उड़द की दाल)।
काली उड़द या चने की दाल में ताजे पालक के पत्तों को बारीक काटकर एक साथ उबाला जाता है। जब दाल और साग घुटकर एक हो जाते हैं, तब इसमें हींग, लहसुन और सूखी लाल मिर्च का तड़का लगता है। जाड़े की कड़कड़ाती ठंड में गरमा-गरम सगपहिता, चावल और ऊपर से एक चम्मच शुद्ध घी—यह शरीर को अंदर से गर्मी और भरपूर ताकत देता है।
13. देहाती मटर का निमोना: सिलबट्टे पर दरदरी पिसी हरी मटर, कोहड़ौरी और आलू का जलवा
अवध और पूर्वांचल की रसोई की पहचान अगर किसी एक व्यंजन से की जाए, तो वह है निमोना। जाड़े के दिनों में जब खेत से ताजी मीठी हरी मटर टूटकर आती है, तो घर-घर में निमोने की खुशबू गूँजने लगती है।
हरी मटर को मिक्सी में महीन नहीं पीसा जाता, बल्कि सिलबट्टे पर दरदरा (दरबर) पीसा जाता है। कुछ दाने साबुत भी रखे जाते हैं। लोहे की कड़ाही में तेल गरम करके उसमें उड़द की दाल की बनी कोहड़ौरी (बड़ी) और कटे हुए नए आलू तले जाते हैं। फिर पिसी मटर को तेल में तब तक भूनते हैं जब तक उसका कच्चापन खत्म होकर सोंधी महक न आने लगे। हरी धनिया, लहसुन और हरी मिर्च का हरा मसाला डालकर जब यह रसेदार पकता है, तो इसका सोंधा और चटपटा स्वाद दुनिया की किसी भी सब्जी से भारी पड़ता है। पुराने लोग जाड़े के बाद भी खाने के लिए हरी मटर को सुखाकर रख लेते थे।
14. मकरैला एवं बजरैला: मोटे अनाजों (मडुआ-बाजरा) की कचौड़ी, ताकत और पोषण का खजाना
आज जिसे दुनिया 'मिलेट्स' या सुपरफूड कहकर महंगे दामों पर बेच रही है, वह हमारे बेल्हा के पुरखों का रोज़मर्रा का आहार था। मकरा (रागी/मडुआ) के आटे से बनने वाली पूरी को मकरैला और बाजरे के आटे से बनने वाली पूरी को बजरैला कहा जाता था।
इन मोटे अनाजों के आटे की लोई बनाकर उसमें अंदर उड़द की दाल की चटपटी पीठी भरी जाती थी और फिर तेल में पूरी की तरह तला जाता था। यह पूरियाँ न केवल खाने में कुरकुरी और स्वादिष्ट होती थीं, बल्कि शरीर को कड़ाके की ठंड से लड़ने की भरपूर ऊर्जा देती थीं। इसे तीखे आम के अचार या आलू-टमाटर के रसे के साथ खाया जाता था।
15. मट्ठे की कढ़ी-भात: मीठी नीम, मेथी का तड़का और तृप्ति देने वाला अवधी भोजन
बेल्हा की हर चौपाल और रसोई में दोपहर के भोजन का सबसे लोकप्रिय पकवान रहा है—कढ़ी-भात। घर के मटके में जमे दही से जब मक्खन निकाल लिया जाता था, तो बचे हुए ताजे खट्टे मट्ठे में बेसन का गाढ़ा घोल मिलाया जाता था।
कड़ाही में मेथी के दाने, हींग, कटी हरी मिर्च और मीठी नीम (करी पत्ता) का तड़का देकर जब मट्ठे का घोल डाला जाता है और लगातार चलाया जाता है, तो उसकी खनकदार खुशबू पूरे घर को महका देती है। इसमें बेसन की नर्म पकौड़ियां डाली जाती हैं। गरमा-गरम चावल पर पीली कढ़ी डालकर जब खाया जाता है, तो जो तृप्ति मिलती है, वह किसी पकवान में नहीं।
16. गुड़-सोंठ की गुझिया: खोये से अलग देहाती स्वाद, पहला कौर खाते ही रस की धार
होली या दिवाली पर शहरों में मावे (खोये) की गुझिया का चलन है, लेकिन बेल्हा के गाँवों में पारंपरिक रूप से गुड़ और सोंठ की गुझिया बनती रही है। गेहूँ के आटे या मैदे की पूरियों में कद्दूकस किया हुआ देशी गुड़, सोंठ (सूखा अदरक पाउडर) और थोड़े तिल भरकर किनारों को गूँथ लिया जाता है।
जब इसे धीमी आँच पर तेल या घी में तला जाता है, तो अंदर का गुड़ पिघलकर चाशनी बन जाता है। जैसे ही आप पहला कौर (ग्रास) मुँह में लेते हैं, कुरकुरी परत टूटती है और अंदर से गरम मीठा सोंठ का रस मुँह में भर जाता है। यह स्वाद खोये की गुझिया से कहीं ज्यादा गहरा और पाचक होता है।
17. चना-गेहूँ की घुघरी: सुबह का सबसे सेहतमंद नाश्ता और हरी चटनी की जुगलबंदी
आजकल के ओट्स और कॉर्नफ्लेक्स के आने से बहुत पहले हमारे गाँव का सबसे पौष्टिक नाश्ता था—घुघरी। रात में भिगोए हुए काले चने, मटर, साबुत गेहूँ, ज्वार, बाजरा या मक्का को सुबह उबाल लिया जाता है।
लोहे की कड़ाही में ज़रा सा सरसों का तेल डालकर जीरा, हींग, कटी हरी मिर्च और बारीक लहसुन से उबले दानों को छौंका जाता है। ऊपर से हरी धनिया और नीबू निचोड़कर जब कटोरी में दिया जाता है, तो यह चबाने में इतना स्वादिष्ट और सुपाच्य होता है कि दिन भर शरीर में ताजगी और ऊर्जा बनी रहती है।
18. गुरम्मा: अमिया और गुड़ का खट्टा-मीठा जादू, गर्मियों में लू से बचाव
वैशाख और जेठ के महीने में जब पेड़ों पर टिकोरा (कच्ची अमिया) लटकने लगता है, तब दोपहर के खाने में गुरम्मा ज़रूर बनता है। कच्चे या अधपके आम के छिलके उतारकर फांकें काटी जाती हैं और उन्हें पानी में उबाला जाता है।
इसके बाद कड़ाही में सौंफ, मंगरैल (कलौंजी) और मेथी का छौंक देकर उबाली हुई अमिया और देशी गुड़ डाल दिया जाता है। गुड़ पिघलकर जब आम की फांकों में समा जाता है, तो गाढ़ा, चमकदार खट्टा-मीठा गुरम्मा तैयार होता है। गर्मियों में यह शरीर को ठंडक देता है और लू लगने से बचाता है।
19. ऊमी और होरहा (होला): खेत की झाखर में भुनी बालियाँ और सामूहिक चौपाल का आनंद
फागुन और चैत के महीने में जब खेत में चना और मटर की फलियाँ दानेदार हो जाती हैं और गेहूँ की बालियाँ दुधिया होने लगती हैं, तब खेतों में होरहा (होला) और ऊमी भूनने का मेला सजता है।
चने या मटर के पौधों को उखाड़कर सूखी घास और झाखर की आग में झुलसाया जाता है। भुनी हुई फलियों को हथेलियों से रगड़कर जब गर्म-गर्म काले-हरे दाने निकाले जाते हैं, तो उन्हें 'होरहा' कहते हैं। इसी तरह जब हरे गेहूँ की बालियों और मटर को भूनकर लहसुन-मिर्च की चटनी से खाते हैं, तो उसे 'ऊमी' कहा जाता है। खेत की मेड़ पर बैठकर दोस्तों और परिजनों के साथ होरहा खाने का जो सुख है, वह किसी पार्टी में नहीं मिल सकता।
20. महुए की लप्सी व गुलगुला: कल्पवृक्ष महुआ, मीठी लप्सी और फूले-फूले गुलगुले
बेल्हा और अवध के ग्रामीण जीवन में महुए का पेड़ किसी कल्पवृक्ष से कम नहीं रहा है। चैत-बैशाख की भोर में जब महुए टपकते हैं, तो पूरा गाँव टोकरी लेकर बीनने निकल पड़ता है। महुए के ताजे या सूखे फूलों को पानी में उबालकर उसका मीठा रस (शीरा) निकाला जाता है।
महुए की लप्सी: गेहूँ के भुने हुए आटे को महुए के रस में मिलाकर गाढ़ा पकाया जाता है। इसे गर्म-गर्म भी खाया जाता है और थाली में जमाकर बासी भी। गाँव के लोग इसमें मट्ठा, दही या दूध मिलाकर बड़े चाव से खाते हैं।
महुए का गुलगुला: महुए के रस में आटा मिलाकर गाढ़ा घोल बनाकर जब सरसों के तेल में तला जाता है, तो गोल-गोल, बेहद मुलायम और मीठे गुलगुले तैयार होते हैं। यह प्राकृतिक मिठास बच्चों और बड़ों सबको खूब भाती है।
21. महुए का लाटा और चरा: ओखली में कुटा हुआ सुपरफूड और बर्रे-कुसुम के लड्डू
पुराने समय में जब लोग लंबी यात्राओं पर जाते थे या खेतों में दिन भर हाड़तोड़ मेहनत करते थे, तो उनकी जेब और झोले में लाटा और चरा होता था। यह आज के प्रोटीन बार से कहीं ज्यादा ताकतवर देशी खुराक थी।
लाटा: सूखे महुए को भूनकर उसमें भुना हुआ तिल या अलसी (तीसी) मिलाई जाती है। फिर इसे गाँव की लकड़ी की ओखली में मूसल से तब तक कूटा जाता है जब तक कि तिल का तेल और महुए की मिठास आपस में मिलकर एक जान न हो जाएँ। यह कूटकर बना मीठा लाटा हड्डियों को लोहे जैसा मजबूत बनाता है।
चरा: भुने हुए महुए में बर्रे (कुसुम) के भुने दानों को मिलाकर बड़े-बड़े लड्डुओं के आकार में बांधा जाता है। पुराने जमाने में लोग इसे सुबह के जलपान (नाश्ते) के रूप में खाते थे, जिससे दोपहर तक भूख नहीं लगती थी।
22. सनई के फूलों का साग: पीले फूलों की कली, भुने बेसन का सोंधापन और वैज्ञानिक विधि
प्रतापगढ़ जनपद में सनई एक बहुत ही महत्वपूर्ण नकदी और पर्यावरण-हितैषी फसल रही है। इसके पौधे के रेशे से रस्सी, बाध, टाटपट्टी और मछली पकड़ने के जाल बनते हैं, जबकि इसका उच्च कोटि का रेशा नोट छापने और सिगरेट के पेपर में इस्तेमाल होता है। लेकिन इस उपयोगी पौधे का सबसे स्वादिष्ट पहलू है इसके पीले फूलों की कलियों से बनने वाला अनोखा साग, जिसकी प्रामाणिक विधि वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनोज कुमार त्रिपाठी (सनई अनुसंधान केन्द्र, प्रतापगढ़) की धर्मपत्नी श्रीमती कविता त्रिपाठी ने साझा की है।
- सनई के फूलों की कली: 1 छोटा कटोरा (उबली हुई)
- लहसुन: 3-4 कली (छिला हुआ)
- मेथी दाना: 1 छोटा चम्मच
- हरी मिर्च: 3-4 (कटी हुई)
- चने का बेसन: 2 बड़ा चम्मच (भुना हुआ)
- हल्दी: 1 छोटा चम्मच, हींग: 1 चुटकी, नमक: स्वादानुसार
1. सनई की फूल-कलियों को साफ पानी से अच्छी तरह धोकर कुकर में एक गिलास पानी डालकर रख दें। 2-3 सीटी आने के बाद गैस बंद कर दें।
2. कुकर ठंडा होने पर कलियों को बाहर निकालकर हाथ से हल्के से दबाकर अतिरिक्त पानी निकाल लें।
3. कड़ाही में दो छोटा चम्मच सरसों का तेल गरम करें। तेल गरम होने पर उसमें हींग, लहसुन, मेथी और हरी मिर्च डालकर सुनहरा भूनें।
4. अब उबली हुई सनई की कलियाँ डालकर चलाते हुए भूनें, साथ ही हल्दी और नमक भी मिला दें।
5. इसके बाद ऊपर से भुना हुआ चने का बेसन बुरक कर अच्छी तरह मिलाएँ। 2-3 मिनट धीमी आँच पर भूनने के बाद गैस से उतार लें। आपका स्वादिष्ट, सोंधा सनई का साग तैयार है! (आप चाहें तो बेसन की जगह गरम मसाला डालकर भी बना सकते हैं)।
23. बेल्हा के प्रमुख लोक-व्यंजनों की तुलनात्मक सारणी
नीचे दी गई सारणी में बेल्हा के प्रमुख व्यंजनों, उनकी मुख्य सामग्री, पकाने की विधि और उनके खास अवसर को संक्षेप में देखा जा सकता है:
| व्यंजन का नाम | मुख्य सामग्री | पकाने की विधि | मौसम या अवसर | सबसे खास पहचान |
|---|---|---|---|---|
| मीठा बड़ा (पना) | उड़द/मटर दाल, चावल आटा, गुड़ | तेल में तलकर गुड़ की लप्सी में डुबोना | विवाह उत्सव, न्योता-भोज | सोंधा मीठा स्वाद जो मुँह में घुल जाए |
| फरा (गोइठा) | चावल का आटा, उड़द पीठी, हींग | भाप में उबालना (स्टीमिंग) | जाड़े का मौसम, त्योहार | दाँत निकोसा रूप, घी-चटनी के साथ बिना तेल का खाना |
| दाल का दूल्हा | अरहर दाल, गेहूँ आटा, घी, हींग | खौलती दाल में आटे की टिकरी पकाना | त्वरित संपूर्ण भोजन | दाल-रोटी का एक ही बर्तन में मुकम्मल संगम |
| रिकवछ | उड़द दाल, खड़े मसाले, तरी | लंबे भालेनुमा तलकर तरी में पकाना | दावत, सब्जी विकल्प | 'रघुबर भाला' तीखी और चटपटी तरी |
| सहिना (कोरवर) | अरबी (घुइयाँ) पत्ते, उड़द पीठी | पत्तों पर दाल लेपकर रोल बनाना व तलना | बरसात का मौसम | नाश्ते में कुरकुरी पकौड़ी व तरीदार सब्जी |
| रसाज | बेसन, हींग, अजवाइन, मसाले | कड़ाही में पकाकर बर्फी काटना व तरी | विशेष अतिथि सत्कार | पनीर जैसी मुलायम बेसन की बर्फी |
| दाल भरी पूरी | गेहूँ आटा, चना दाल पूरन, जीरा | तवे पर सेंकना या तलना | गंगा दशहरा, पितृपक्ष, नई बहू आगमन | खस्ता बेढ़ई पूरी और रसियाव की हमजोली |
| सगपहिता | काली उड़द दाल, पालक/पोई साग | दाल-साग एकसाथ घोटना व हींग तड़का | सर्दियों का मौसम | आयरन और प्रोटीन का देहाती पावरहाउस |
| निमोना | ताजी हरी मटर, कोहड़ौरी, नए आलू | मटर दरदरी पीसकर भूनना व रसा लगाना | सर्दियों में रोजमर्रा का राजा | लोहे की कड़ाही में बना हरा सोंधा सालन |
| महुए की लप्सी | महुए का रस, भुना गेहूँ आटा | रस में आटा मिलाकर हलवा पकाना | चैत-बैशाख, गर्मी | बिना चीनी-गुड़ की प्राकृतिक मिठास |
| महुए का लाटा | भुना महुआ, भुना तिल या अलसी | ओखली में मूसल से कूटना | सर्दियों में यात्रा व नाश्ता | शरीर को फौलादी ताकत देने वाला मीठा कूट |
| सनई का साग | सनई फूल की कली, भुना बेसन, मेथी | उबालकर मेथी-हींग व बेसन में भूनना | शरद ऋतु (फूल खिलने पर) | प्रतापगढ़ का पेट-हितैषी अनोखा फूलों का साग |
24. बेल्हा के पारंपरिक खानपान से जुड़े जरूरी सवाल-जवाब (FAQs)
जब गाँव में काम की जल्दी होती थी और अलग से दाल और रोटी बनाने का समय नहीं होता था, तब अरहर की खौलती दाल में गूँथे हुए आटे की छोटी-छोटी टिकरियाँ डालकर पका ली जाती थीं। ऊपर से खूब सारा शुद्ध घी और हींग-जीरे का तड़का लगाकर खाया जाने वाला यह व्यंजन 'दाल का दूल्हा' या दलटिक्की कहलाया।
प्रतापगढ़ में सनई की फसल रेशे के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए उगाई जाती है। इसके पीले फूलों की कलियों को तोड़कर भाप में उबालकर, भुने चने के बेसन, हींग, मेथी और लहसुन के तड़के से जो साग बनाया जाता है, वह बेहद सोंधा, स्वादिष्ट और पेट के लिए अत्यंत गुणकारी होता है।
चावल के आटे की लोई में उड़द की मसालेदार पीठी भरकर जब आधा मोड़ा जाता है, तो बीच से झांकती पीठी ऐसी लगती है मानो कोई दाँत दिखा रहा हो। इसलिए देहात में लोग इसे प्यार से 'दाँत निकोसा' या 'पनबुडा' भी कहते हैं।
महुए से मीठी लप्सी, फूले-फूले गुलगुले, तिल और अलसी के साथ ओखली में कूटकर बनाया जाने वाला ताकतवर 'लाटा', और बर्रे-कुसुम के दानों से बनने वाला स्वादिष्ट 'चरा' प्रमुख हैं।
ये दोनों व्यंजन जाड़े (सर्दियों) के मौसम के सिरमौर हैं। ताजी हरी मटर को दरदरा पीसकर निमोना बनता है, और ताजे पालक या पोई के पत्तों को दाल में मिलाकर हींग-लहसुन से छौंककर सगपहिता बनाया जाता है।
ऊपर वर्णित बेल्हा के ये पारंपरिक व्यंजन आज भी हमारी संस्कृति और पुरखों के प्रेम की गवाही देते हैं। जब भी घर में कोई खास त्योहार या मांगलिक अवसर होता है, तो मेहमानों का सबसे सच्चा सत्कार इन्हीं सोंधे देशी पकवानों से होता है।
फास्ट फूड और बाजारू खाने की अंधी दौड़ में हम धीरे-धीरे अपने इन स्वास्थ्यवर्धक और पौष्टिक भोजनों के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं, जिससे ये हमारी स्मृति पटल से भी ओझल होने की कगार पर हैं। आइए, अपनी जड़ों की ओर लौटें, अपने घरों में इन पारंपरिक व्यंजनों को फिर से चाव से पकाएं और बेल्हा की इस सोंधी थाली का गौरव बनाए रखें।
सांस्कृतिक संकलन एवं प्रस्तुति: प्रतापगढ़ HUB (Pratapgarh HUB) — अवध व बेल्हा की लोक धरोहर को समर्पित