बेल्हा के पारंपरिक खेल: झाबर, शोरां, चिल्होर, चौवा-मग्धा और गुल्ली-डंडा की जीवंत ग्रामीण विरासत
खेल केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि अनुशासन और प्रेम सिखाने वाली पाठशाला हैं। कभी-कभी खिलाड़ी स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के बजाय द्वेष और वैमनस्य का शिकार हो जाते हैं, जो खेल और समाज दोनों के लिए घातक है। एक सच्चे खिलाड़ी के लिए एकाग्रता, स्फूर्ति, सौहार्द और निरंतर अभ्यास अनिवार्य है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में भगवान श्री राम और उनके भाइयों के बचपन के खेलों का अत्यंत सुंदर वर्णन किया है, जहाँ प्रभु श्री राम अपने सखाओं और भाइयों को जिताने के लिए स्वयं हार जाते थे ताकि किसी का मन न दुखे:
शिशुपन ते परिहरेहु न संगू। कबहुँ न कीन मोर मनभंगू॥
मैं प्रभु कृपा रीति जिय जोही। हारेहु खेल जितावहिं मोही॥
यही उदात्त खेल भावना बेल्हा की माटी में रचे-बसे इन देहाती खेलों की आत्मा रही है। आइए, अब हम अपने लोक जीवन के इन अनमोल 12 प्रमुख खेलों और उनकी दिलचस्प नियमावली के बारे में विस्तार से जानते हैं।
पारंपरिक खेल अनुक्रमणिका: सीधे किसी भी खेल पर पहुँचें
किसी भी कार्ड पर क्लिक करें1. झाबर: जुते हुए खेतों का महामुकाबला, गोलों की व्यूहरचना और पाल्हे की दौड़
बेल्हा के ग्रामीण अंचलों में झाबर एक ऐसा रोमांचक मैदानी खेल रहा है जो आज के कबड्डी और खो-खो की तरह ही खिलाड़ियों की फुर्ती, गति और रणनीतिक समझ की कठिन परीक्षा लेता है। इस खेल का आयोजन विशेष रूप से बढ़िया जुते हुए और समतल किए गए खुले खेतों में किया जाता है, जहाँ मिट्टी की सोंधी खुशबू के बीच गाँव के नौजवान दो टोलियों में बँटकर उतरते हैं।
इस खेल में खिलाड़ियों की कोई निश्चित संख्या नहीं होती, फिर भी आमतौर पर प्रत्येक गोल (टोली) में 10 से 15 खिलाड़ी होते हैं। मैदान में भीतरी और बाहरी दो गोले बनाए जाते हैं। खेत की तीन दिशाओं की मेड़ों को 'पाल्हा' निश्चित कर लिया जाता है।
बाहरी गोल के खिलाड़ी भीतरी गोल के खिलाड़ियों को छूकर तेजी से पाल्हे की ओर भागते हैं और उनकी पूरी कोशिश होती है कि वे बिना पकड़े गए पाल्हे को छू लें। वहीं भीतरी गोल के लोग अत्यधिक सतर्क रहते हैं कि बाहरी खिलाड़ी उन्हें छूकर पाल्हे तक सुरक्षित न पहुँच सके और उसे रास्ते में ही दबोच लिया जाए।
जीवन और मृत्यु का अनूठा चक्र: यदि बाहरी गोल का खिलाड़ी भीतरी गोल के किसी सदस्य को छूकर पाल्हे तक पहुँच जाता है, तो जिस व्यक्ति को उसने छुआ था वह 'मर' जाता है यानी खेल से अलग होकर बाहर बैठ जाता है। इसके विपरीत, यदि बाहरी खिलाड़ी पाल्हा छूने से पहले ही पकड़ लिया जाता है, तो वह 'मरा' घोषित होकर बाहर बैठ जाता है। खेल की सबसे खूबसूरत बात यह है कि जिस गोल का खिलाड़ी पहले मर चुका होता है, विपक्षी गोल के खिलाड़ी के मरते ही वह तुरंत 'जीवित' होकर पुनः खेल की मुख्य धारा में शामिल हो जाता है! जिस गोल के सभी खिलाड़ी पहले आउट (समाप्त) हो जाते हैं, वह गोल पराजित माना जाता है। एक चक्र पूरा होने पर दोनों टीमें आपस में स्थान बदल लेती हैं।
2. शोरां: 10×10 फीट का चौकोर चक्रव्यूह, लकीर के पहरेदार और समवेत विजय घोष
शोरां एकाग्रता, संतुलन और अचानक चकमा देकर भीतर प्रवेश करने की कला का बेहतरीन खेल है। इस खेल में कुल 8 खिलाड़ी भाग लेते हैं। मैदान की साफ ज़मीन पर लगभग 10 फीट लंबी और 10 फीट चौड़ी वर्गाकार आकृति खींची जाती है।
वर्ग की चारों लकीरों पर एक-एक खिलाड़ी पहरेदार की तरह खड़ा होता है, जबकि बाकी चार खिलाड़ी वर्ग के बाहर खड़े होते हैं। बाहर के खिलाड़ियों का लक्ष्य होता है कि वे किसी भी तरह लकीर के रक्षकों से बचते हुए वर्ग के भीतर पहुँचें।
यदि भीतर प्रवेश करते समय लकीर पर खड़ा खिलाड़ी बाहर वाले को छू लेता है, तो वह खिलाड़ी 'मर' जाता है और खेल से बाहर बैठ जाता है। यदि चारों बाहरी खिलाड़ी आउट हो जाते हैं, तो खेल दोबारा शुरू होता है जिसमें बाहर वाले लकीर पर आ जाते हैं और लकीर वाले बाहर।
लेकिन यदि बाहर के चारों खिलाड़ी अपनी चालाकी और तेजी से लकीर के पहरेदारों को चकमा देकर उस 10×10 के वर्ग के भीतर सुरक्षित पहुँच जाते हैं, तो वे सब मिलकर एक साथ समवेत उच्च-स्वर में विजय शब्द का उच्चारण करते हैं। इस समवेत जयघोष के साथ ही उन्हें आधिकारिक रूप से विजयी घोषित कर दिया जाता है। यह खेल बच्चों में टीम वर्क और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता का विकास करता है।
3. चिल्होर: आम के बगीचे, 2 फीट का डंडा, टाँगों के बीच से फेंकना और डालियों पर चढ़ना
गर्मियों की छुट्टियों में गाँव के आम और महुए के बगीचों में दोपहर बिताने का सबसे पसंदीदा खेल चिल्होर हुआ करता था। पेड़ों की घनी छांव में खेले जाने वाले इस खेल में खिलाड़ियों की कोई निश्चित सीमा नहीं होती थी; टोली में जितने भी बच्चे शामिल हो जाएँ, खेल उतना ही रोमांचक हो जाता था।
खेल की शुरुआत पेड़ के नीचे ज़मीन पर 2 से 3 फीट व्यास का एक गोल घेरा (वृत्त) बनाकर होती है। इस गोले के ठीक बीच में 2 फीट लंबा एक मजबूत डंडा रखा जाता है। एक खिलाड़ी 'डंडा रक्षक' (चोर) बनकर डंडे के पास खड़ा होता है, जबकि अन्य खिलाड़ी चारों तरफ घेरा बनाकर उस डंडे को चुराने का प्रयास करते हैं।
टाँगों के बीच से डंडा फेंकने का रोमांच: डंडा रक्षक की कोशिश होती है कि वह किसी खिलाड़ी को छू ले और तुरंत जाकर डंडे को चूम ले। यदि वह किसी को छूकर डंडा चूम लेता है, तो जिस खिलाड़ी को छुआ गया था वह नया चोर (डंडा रक्षक) बन जाता है। लेकिन यदि बाहरी खिलाड़ियों में से कोई खिलाड़ी रक्षक को चकमा देकर डंडा उठा लेता है, तो वह उस डंडे को अपनी दोनों टाँगों के बीच से पीछे की ओर दूर फेंक देता है!
डंडा दूर गिरते ही डंडा रक्षक दौड़कर उसे लाने भागता है। ठीक इसी समय अन्य सभी खिलाड़ियों को फुर्ती से पेड़ की डालियों पर चढ़ जाना अनिवार्य होता है। जब तक रक्षक डंडा उठाकर वापस गोले के केंद्र में न रख दे, तब तक पेड़ पर चढ़ने की छूट होती है। यदि डंडा रखने से पहले कोई खिलाड़ी पेड़ पर नहीं चढ़ पाया और रक्षक ने उसे छू लिया, तो वह चोर बन जाता है। यदि सभी पेड़ पर सुरक्षित चढ़ जाते हैं, तो वे एक-एक कर नीचे कूदते हैं और फिर से डंडा उठाने का प्रयास करते हैं। इस तरह यह खेल घंटों तक बिना थके चलता रहता है।
4. धुक्कुल (लुकाछिपी): अट्टा-पट्टा का फैसला, पुआल के ढेर और 'कू-कू' की रहस्यमयी आवाज़
शाम ढलते ही बेल्हा के हर पुरवे और चौपाल में नन्हे बच्चों का सबसे प्रिय खेल शुरू होता था—धुक्कुल, जिसे आम बोलचाल में लुकाछिपी या आँख-मिचौनी भी कहा जाता है। यह खेल बच्चों के सहज भोलेपन और खोजबीन की प्रवृत्ति का दर्पण है।
खेल की शुरुआत में सभी सहभागी बच्चे इकट्ठा होकर 'अट्टा-पट्टा' (हाथ की हथेलियों को उलट-पुलट कर करने वाली देशी लॉटरी) करते हैं, जिससे एक 'चोर खिलाड़ी' तय होता है। चोर को आँखें बंद कर किसी दीवार या पेड़ पर सिर झुकाकर खड़ा कर दिया जाता है, जबकि बाकी सभी बच्चे गाँव के अलग-अलग कोनों में छुपने दौड़ते हैं।
छुपने की जगहें पूरी तरह देहाती परिवेश की होती हैं—खलिहान में रखे पुआल (पैरा) के ढेर, कड़बी (ज्वार-बाजरे के लकठे), छप्पर की ओट, या घर के कोठों के पीछे।
जब सभी बच्चे सुरक्षित छुप जाते हैं, तो वे चोर को संकेत देने के लिए किसी गुप्त जगह से जोर से 'कू-कू!' की आवाज़ निकालकर तुरंत खामोश हो जाते हैं। चोर खिलाड़ी उस गूँजती आवाज़ के सहारे दिशा का अनुमान लगाकर एक-एक बच्चे को ढूंढने निकलता है। इस क्रम में जो बच्चा सबसे पहले पकड़ा जाता है, अगले चक्र में उसे चोर की भूमिका निभानी पड़ती है। इस प्रकार यह खेल रात के अँधेरे तक हँसी-ठिठोली के साथ चलता रहता है।
5. चौवा-मग्धा: बरसात कराने की लोक आस्था, खपड़े का 'मामा' और 5 गोटियों की बाज़ी
चौवा-मग्धा बेल्हा के घरेलू और शांत लोक खेलों में विशेष स्थान रखता है। यह खेल मुख्य रूप से गाँव की छोटी बच्चियों और किशोरियों में अत्यधिक लोकप्रिय रहा है। इस खेल के साथ गाँव की एक गहरी लोक आस्था जुड़ी हुई है कि चौवा-मग्धा खेलने से आकाश से मेघ बरसते हैं और धरती की प्यास बुझती है।
इस खेल में केवल 2 या 4 खिलाड़ी भाग ले सकते हैं। आंगन या दालान की चिकनी ज़मीन पर लगभग 1 फीट लंबा और 1 फीट चौड़ा वर्ग बनाया जाता है। चारों कोनों को अंदर से मिलाती हुई दो तिरछी लकीरें खींची जाती हैं और ठीक बीचो-बीच एक छोटा गोल घेरा बनाया जाता है। यह गोला भी चार बराबर भागों में बँटा रहता है।
सभी खिलाड़ी टूटे हुए मिट्टी के खपड़े (खपड़ैल) का एक बड़ा चपटा टुकड़ा लेते हैं, जिसे बड़े आदर से 'मामा' कहा जाता है। खिलाड़ी अपने 'मामा' को सामने की लकीर पर रखते हैं।
हथेली पर गोटियों का संतुलन: खेल के लिए खपड़े की ही पाँच छोटी-छोटी चपटी गोटियाँ ली जाती हैं। खिलाड़ी इन पाँचों गोटियों को हथेली पर रखकर ऊपर हवा में उछालता है और फिर हाथ को उलटकर हथेली के ऊपरी भाग पर उन्हें रोकता (लोकता) है। जितनी गोटियाँ हाथ के पिछले हिस्से पर टिक जाती हैं, खिलाड़ी अपने 'मामा' को लकीर पर उतने ही अंगुल आगे खिसकाता है।
'मामा' को पूरे वर्ग के चारों ओर घुमाते हुए अंत में केंद्र के अंदरूनी गोले तक पहुँचाना होता है। जो खिलाड़ी अपने 'मामा' को सबसे पहले बीच के गोले में पहुँचा देता है, वह प्रथम विजयी होता है। दूसरे और तीसरे स्थान के बाद जो चौथा खिलाड़ी रह जाता है, वह स्वतः पराजित मान लिया जाता है। यह खेल बालिकाओं में एकाग्रता और हाथ की उंगलियों के सूक्ष्म संतुलन को निखारता है।
6. घोघो रानी: 'केत्ता पानी... एत्ता पानी', गोलाकार घेरा और दुनिया बुड़ाव पानी का उल्लास
घोघो रानी छोटे बच्चों का एक अत्यंत संगीतमय, लयबद्ध और आनंददायक सामूहिक खेल है। यह खेल बच्चों में शरीर के विभिन्न अंगों की पहचान कराने के साथ-साथ उनके भीतर भाषा और लय का गहरा संस्कार डालता है।
सभी बच्चे आपस में एक-दूसरे का हाथ पकड़कर एक बड़ा गोलाकार घेरा बना लेते हैं। एक बच्चा उस घेरे के ठीक बीच में खड़ा होता है। घेरे में घूमते हुए सभी बच्चे एक लय और सुर में बीच वाले बच्चे से पूछते हैं:
बीच में खड़ा बच्चा सबसे पहले नीचे झुककर अपने पैरों को छूता है और गाकर जवाब देता है—'एत्ता पानी!' (यानी टखने भर पानी)।
इसके बाद घेरा फिर घूमता है और बच्चे दोबारा वही सवाल पूछते हैं। बीच वाला बच्चा धीरे-धीरे नीचे से ऊपर की ओर बढ़ते हुए क्रमशः घुटने, कमर, छाती, गले और चेहरे को छूते हुए हर बार कहता है—'एत्ता पानी!'
जब पानी का स्तर बढ़ते-बढ़ते सिर से ऊपर पहुँच जाता है, तब बच्चा अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर पूरे उल्लास से चिल्लाता है—'दुनिया बुड़ाव पानी!' (यानी अब पूरी दुनिया पानी में डूब गई है, यहाँ तक कि सिर की चोटी का छोर भी डूब गया है)। यह सुनते ही सभी बच्चे अपनी पकड़ छोड़कर खिलखिलाते हुए इधर-उधर भागते हैं। फिर बारी-बारी से दूसरा बच्चा बीच में आता है और यह आनंदमयी क्रिया देर तक दोहराई जाती है।
7. काल-कलौटी: जब सूखा पड़ता था, बच्चों का मिट्टी में लोटना और बादलों से गुहार
काल-कलौटी केवल एक खेल नहीं, बल्कि बेल्हा और अवध के ग्रामीण समाज का एक अत्यंत भावपूर्ण, आध्यात्मिक और प्रकृति से जुड़ा पारंपरिक अनुष्ठान है। जब आषाढ़-सावन में भी आसमान में बादल नहीं उमड़ते थे, खेत प्यासे सूखने लगते थे और अकाल का साया मंडराने लगता था, तब गाँव की सामूहिक चेतना बच्चों के इस खेल के रूप में जाग्रत होती थी।
गाँव के नन्हें बच्चे निर्वस्त्र होकर और बड़े बच्चे आधे वस्त्रों में एक समूह बनाकर घर-घर जाते थे। प्रत्येक गृहस्थ के दरवाजे पर पहुँचकर बच्चे मिट्टी और धूल में लोटते थे। घर की माताएं-बहनें अपने बर्तनों से उन लोटते हुए बच्चों के ऊपर पानी उंडेलती थीं, जिससे बच्चे कीचड़ और गीली मिट्टी से नहा उठते थे। लोटते समय बच्चे एक सुर में यह मार्मिक और लोक-प्रसिद्ध गीत गाते थे:
नाही आपन नानी दे, पानी दे गुड़ धानी दे।
बीज बोवइया का उज्ज्र साफा, गोरिया क चूनर धानी दे।
काले मेघा पानी दे॥
इस गीत में किसान के उजले साफे की गरिमा, खेतों में हरियाली और धानी चुनरी की आशा छिपी होती थी। जब बच्चे पूरे गाँव के सभी दरवाजों पर काल-कलौटी खेल लेते थे, तब बड़े और बच्चे सब मिलकर गाँव के किसी बड़े पेड़ के नीचे या चौपाल पर एकत्र होते थे। वहाँ सबके सहयोग से लिट्टी, दाल और भात बनाया जाता था और पूरा गाँव एक साथ बैठकर इस सामूहिक प्रीतिभोज का आनंद उठाता था। यह खेल विपत्ति के समय पूरे समाज को एकजुट करने का अद्भुत माध्यम था।
8. गुल्ली-डंडा: 2 फीट का डंडा, 4 इंच की नुकीली गुल्ली, 20 डंडे की 'भूस' और क्रिकेट की जन्मकथा
भारत के ग्रामीण अंचलों में शायद ही ऐसा कोई किशोर होगा जिसने गुल्ली-डंडा न खेला हो। बेल्हा में यह किशोर वय के बच्चों का सबसे पसंदीदा खेल रहा है। खेल विश्लेषक और इतिहासकार यह मानते हैं कि आधुनिक क्रिकेट का जन्म वास्तव में इसी प्राचीन देशी खेल गुल्ली-डंडा से हुआ है।
इस खेल के दो मुख्य उपकरण होते हैं—लगभग 2 फीट लंबा एक मजबूत लकड़ी का डंडा और 4 से 5 इंच लंबी लकड़ी की छोटी गुल्ली, जिसके दोनों सिरे तराशकर नुकीले बनाए जाते हैं।
यह खेल आमतौर पर दो खिलाड़ियों या दो टोलियों के बीच खेला जाता है। पहला खिलाड़ी ज़मीन पर छोटा सा गड्ढा (खत्ता) बनाकर उस पर गुल्ली टिकाता है और डंडे से गुल्ली के नुकीले सिरे पर मारता है। चोट पड़ते ही गुल्ली हवा में उछलकर ऊपर जाती है, और उसी क्षण खिलाड़ी हवा में ही डंडे से पूरी ताकत से उस पर प्रहार करता है ताकि गुल्ली कई फीट दूर जाकर गिरे।
कैच और नाप का गणित: दूसरा खिलाड़ी सामने मुस्तैद खड़ा रहता है। यदि हवा में उड़ती हुई गुल्ली को उसने लपक (कैच कर) लिया, तो मारने वाला खिलाड़ी तुरंत बाहर (आउट) हो जाता है। यदि गुल्ली ज़मीन पर गिर जाती है, तो दूसरा खिलाड़ी उसे उठाकर डंडे की ओर फेंकता है। यदि गुल्ली डंडे पर लग जाती है, तो दोनों खिलाड़ियों की भूमिका बदल जाती है।
यदि गुल्ली डंडे पर नहीं लगती, तो मारने वाला खिलाड़ी गुल्ली जहाँ गिरी होती है, वहाँ से खत्ते तक डंडे से ज़मीन को नापता है। बीस (20) डंडे पूरे होने पर एक 'भूस' (कोट या अंक) बनती है। इस तरह हार-जीत का रोमांचक सिलसिला घंटों चलता रहता है। हाथ-आँख का अद्भुत तालमेल और दूरी का सटीक अनुमान इस खेल की जान है।
9. बेल्हा के अन्य 5 लोकप्रिय खेल: चिंगिड्डी, छिछली, लेदी-बेदी, ओक्का-बोक्का और कंचा
उपरोक्त प्रमुख खेलों के अलावा भी बेल्हा के गाँव-गलियारों में दर्जनों ऐसे छोटे-छोटे खेल खेले जाते रहे हैं, जो बच्चों के रोज़मर्रा के जीवन में खुशियों के रंग भरते थे:
- चिंगिड्डी (Chingiddi): एक पैर पर कूदते हुए ज़मीन पर बने खानों को पार करने और खपड़े की गोटी को पैर के अँगूठे से सरकाने का खेल, जो शारीरिक संतुलन का बेजोड़ अभ्यास है।
- छिछली (Chhichhli): तालाब या पोखरे के शांत पानी पर चपटे गोल पत्थरों को इस कोण से फेंकना कि पत्थर पानी की सतह पर तैरते हुए कई बार छलांगें (टप्पे) लगाए। जिसके पत्थर ने सबसे ज्यादा टप्पे खाए, वह विजयी होता था।
- लेदी-बेदी (Ledi-Bedi): मिट्टी के ढेलों या पुराने कपड़ों की गेंद बनाकर एक-दूसरे को छूने और निशानेबाजी का रोमांचक खेल।
- ओक्का-बोक्का (Okka-Bokka): हथेली की उंगलियों और पीठ पर बैठकर गाया जाने वाला बालगीत आधारित खेल ('ओक्का बोक्का तीन तलोक्का...'), जो छोटे बच्चों के बीच हास-परिहास जगाता था।
- कंचा या गोली (Glass Marbles): रंग-बिरंगी शीशे की गोलियों से ज़मीन पर गड्ढा (पिल्ला) बनाकर उंगली के दबाव से सटीक निशाना साधने का खेल। यह बच्चों में दृष्टि और ध्यान की एकाग्रता का सर्वोत्तम साधन था।
10. खेल दर्शन: शून्य व्यय से शुरुआत और आज का अमीर-गरीब विभाजन
आज के बदलते समय में जब हम अपने चारों तरफ देखते हैं, तो एक कड़वी सच्चाई सामने आती है। ऊपर वर्णित हमारे ये सभी पारंपरिक लोक खेल धीरे-धीरे स्मृति के पन्नों में सिमटते जा रहे हैं। नई पीढ़ी मोबाइल, वीडियो गेम, इंटरनेट या फिर टीवी पर दिखाए जाने वाले क्रिकेट, टेनिस, बैडमिंटन और फुटबॉल के ग्लैमर में खोती जा रही है।
ध्यातव्य है कि लोक जीवन से जुड़े हमारे ये सभी पारंपरिक खेल शून्य व्यय (Zero Expense) से प्रारंभ हो सकते हैं। इनके लिए न तो किसी महँगे बैट, बॉल या किट की ज़रूरत है और न ही किसी विशेष जूते या जर्सी की। खेत की मिट्टी, पेड़ की लकड़ी और खपड़े का टुकड़ा ही खेल की दुनिया सजाने के लिए पर्याप्त थे।
इसके विपरीत, आज के बाज़ारीकृत खेलों ने हमारे बच्चों और खिलाड़ियों को 'गरीब और अमीर' के खांचों में बाँट दिया है। क्रिकेट की महंगी किट, टेनिस के रैकेट और बैडमिंटन के महंगे संसाधन आज भी गाँव के आम गरीब बच्चों के बस की बात नहीं हैं।
कृष्ण और सुदामा की साझी गेंद: हमारा भारत वह देश है जहाँ द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण और निर्धन ब्राह्मण सुदामा एक साथ यमुना के किनारे कपड़े की बनाई हुई साधारण गेंद से खेला करते थे! वही कपड़े की गेंद यमुना के गहरे पानी में गिर जाने पर कालिया नाग के मर्दन की अमर लीला का आधार बनी थी। उस खेल में अमीरी और गरीबी की कोई दीवार नहीं थी। आज ज़रूरत इस बात की है कि हम अपने इन पारंपरिक लोक खेलों को केवल बीती बात न समझें, बल्कि स्कूलों और ग्रामीण आयोजनों में इन्हें पुनर्जीवित करें ताकि हमारा बचपन फिर से मिट्टी की गोद में मुस्कुरा सके।
11. बेल्हा के पारंपरिक खेलों का तुलनात्मक विवरण
नीचे दी गई सारणी में बेल्हा के सभी प्रमुख पारंपरिक खेलों, उनके खेलने के स्थान, आवश्यक सामग्री और उनकी सबसे खास पहचान को संक्षेप में समझा जा सकता है:
| खेल का नाम | खिलाड़ियों की संख्या | खेल का स्थल | आवश्यक सामग्री | सबसे खास पहचान |
|---|---|---|---|---|
| झाबर | 10 से 15 खिलाड़ी (दो गोल) | जुता व समतल किया हुआ खुला खेत | खेत की मिट्टी, पाल्हा (मेड़) | भीतरी-बाहरी गोल, छूकर पाल्हे तक दौड़ना व मरे खिलाड़ी का जीवित होना |
| शोरां | कुल 8 खिलाड़ी (4 रक्षक, 4 आक्रामक) | साफ मैदान में 10×10 फीट का वर्ग | ज़मीन पर खींची गई लकीरें | वर्ग में बिना छुए प्रवेश करना और चारों के पहुँचने पर समवेत जयघोष |
| चिल्होर | अनिश्चित (जितने भी बच्चे हों) | आम या महुए के बगीचे का पेड़ | 2-3 फीट व्यास का वृत्त व 2 फीट का डंडा | टाँगों के बीच से डंडा फेंकना, डंडा चूमना और डालियों पर चढ़ना |
| धुक्कुल (लुकाछिपी) | 4 से 10 बच्चे | घर के कोठे, दालान व खलिहान | पुआल के ढेर, कड़बी के लकठे | अट्टा-पट्टा द्वारा चोर का चयन, छुपकर 'कू-कू' की आवाज़ लगाना |
| चौवा-मग्धा | 2 या 4 बच्चियाँ | आंगन या दालान की चिकनी ज़मीन | 1×1 फीट का वर्ग, खपड़े का 'मामा' व 5 गोटियाँ | हथेली के पिछले भाग पर गोटी साधना व वर्षा आह्वान की लोक मान्यता |
| घोघो रानी | छोटे बच्चों का समूह | खुला आँगन या दालान | सामूहिक गोलाकार घेरा | अंगों को छूकर 'एत्ता पानी' बताना व अंत में 'दुनिया बुड़ाव पानी' का उल्लास |
| काल-कलौटी | गाँव के बच्चों का सामूहिक दल | गाँव के सभी घरों के दरवाजे | मिट्टी, पानी, सामूहिक लिट्टी-दाल-भात | सूखे में मिट्टी में लोटकर मेघ से पानी माँगना ('काले मेघा पानी दे') |
| गुल्ली-डंडा | 2 खिलाड़ी या दो टोलियाँ | गाँव का खुला मैदान या सड़क | 2 फीट का डंडा व 4-5 इंच की नुकीली गुल्ली | हवा में गुल्ली मारना, कैच लपकना, 20 डंडे की 'भूस' व क्रिकेट का आदिम रूप |
| चिंगिड्डी | 2 से 6 बच्चे | ज़मीन पर बने चौकोर खाने | चपटा खपड़ा (गोटी) | एक पैर पर संतुलन साधकर खानों को पार करना |
| छिछली | 2 या अधिक किशोर | तालाब, पोखरा या सई नदी का किनारा | चपटे गोल पत्थर | पानी की सतह पर पत्थर से अधिकतम टप्पे (छलांगें) लगवाना |
12. बेल्हा के पारंपरिक खेलों से जुड़े जरूरी सवाल-जवाब (FAQs)
इन खेलों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि ये शून्य लागत (Zero Expense) पर खेले जाते हैं। इनके लिए किसी महँगे उपकरण या खेल मैदान की ज़रूरत नहीं होती; आसपास के ग्रामीण परिवेश की सहज सामग्रियाँ जैसे लकड़ी, खपड़ा, कंकड़, पानी और धूल-मिट्टी ही पर्याप्त होते हैं।
जब गाँव में भीषण सूखा या अकाल पड़ता था, तब इंद्रदेव और बादलों को प्रसन्न कर बारिश कराने के लिए बच्चे मिट्टी में लोटते हुए 'काल कलौटी खेली थी, काले मेघा पानी दे' गाते हुए प्रत्येक द्वार पर पानी की गुहार लगाते थे। खेल के अंत में पूरा गाँव मिलकर लिट्टी-दाल-भात का सामूहिक भोज करता था।
इतिहासकारों और खेल जानकारों के अनुसार, आधुनिक क्रिकेट का मूल बीज हमारे देहाती खेल 'गुल्ली-डंडा' में ही छिपा है। डंडे से गुल्ली को हवा में उछालकर मारना, सामने खड़े खिलाड़ी द्वारा कैच लपकना और दूरी को डंडे से नापना क्रिकेट की बल्लेबाजी, फील्डिंग और रनों के गणित का ही आदिम रूप है।
गाँव में ऐसी गहरी लोक मान्यता है कि चौवा-मग्धा खेलने से बरसात होती है। यह खेल मुख्य रूप से छोटी बच्चियों और किशोरियों में बहुत लोकप्रिय रहा है, जिसे ज़मीन पर 1×1 फीट के चौकोर खाने, खपड़े के 'मामा' और 5 छोटी गोटियों को हथेली पर साधकर खेला जाता है।
इन खेलों से बच्चों में एकाग्रता, स्फूर्ति, शारीरिक स्वास्थ्य और सबसे बढ़कर सहयोग, सौहार्द तथा खेल भावना का विकास होता है। रामचरितमानस में वर्णित भगवान श्री राम की खेल भावना की तरह, ये खेल सिखाते हैं कि जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण परस्पर प्रेम और भाईचारा है।
बेल्हा की धूल-भरी पगडंडियों और अमराइयों में खेले जाने वाले ये खेल केवल मनोरंजन या समय बिताने का साधन नहीं थे, बल्कि ये हमारे समाज के स्वास्थ्य, सामाजिक समरसता और भाईचारे की मजबूत नींव थे। आज का बचपन चारदीवारी के भीतर मोबाइल स्क्रीन्स और महंगे गैजेट्स में कैद होकर एकाकीपन और तनाव का शिकार हो रहा है।
हमारे ये देहाती खेल हमें प्रकृति से जोड़ते हैं, हार में मुस्कुराना और जीत में सबको साथ लेकर चलना सिखाते हैं। आज समय की सबसे बड़ी मांग है कि हम अपने विद्यालयों, ग्रामीण मेलों और उत्सवों में इन पारंपरिक खेलों को पुनः स्थान दें, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ भी मिट्टी की इस अनमोल सुगंध और जीवनदायिनी ऊर्जा से वंचित न रह सकें।
संकलन एवं सांस्कृतिक प्रस्तुति: प्रतापगढ़ HUB (Pratapgarh HUB) — अवध व बेल्हा की लोक धरोहर को समर्पित