डॉ. हरिवंश राय बच्चन: 'मधुशाला' के अमर शिल्पी, कैम्ब्रिज से पद्म भूषण और बाबू पट्टी की माटी का कालजयी सफर (Dr Harivansh Rai Bachchan Biography, Babu Patti Pratapgarh, Cambridge University, Madhushala, Agneepath, Saraswati Samman)
मिट्टी का तन, मस्ती का मन, क्षण भर जीवन — जिसने गरीबी और टीबी के दंश को चीरकर दुनिया को जीने का नया फलसफा दिया
सन् 1935 की एक कड़कड़ाती सर्द रात थी। इलाहाबाद के एक सीलन भरे, आधे अंधेरे कमरे में 28 साल का एक दुबला-पतला मास्टर अपनी 24 साल की बीमार पत्नी के सिरहाने बैठा था। पत्नी श्यामा टीबी (तपेदिक) से तड़प रही थी, हर खांसी के साथ मुंह से खून आ रहा था। कमरे में दवा की जगह सिर्फ खाली शीशियां थीं और जेब में डॉक्टर की फीस के लिए एक धेला भी नहीं था। मौत जब दरवाजे पर दस्तक दे रही थी, तभी उस नौजवान ने टूटे दिल और खाली पेट एक ऐसी किताब लिख डाली जिसने पूरे देश के मंचों पर आग लगा दी—उस किताब का नाम था 'मधुशाला' और उस नौजवान का नाम था हरिवंश राय बच्चन!
यह कोई फिल्मी किस्सा नहीं, बल्कि प्रतापगढ़ के बाबू पट्टी गाँव की माटी से जुड़े एक ऐसे इंसान की सच्ची दास्तान है, जिसे कभी मंदिर-मस्जिद के ठेकेदारों ने शराबी कहा, तो कभी रूढ़िवादी समाज ने अंतरजातीय विवाह पर बिरादरी से निकाल फेंका। लेकिन उसी इंसान ने कैम्ब्रिज से लेकर संसद तक भारत का परचम लहराया और दुनिया को सिखाया कि जब तक सांस चले, तब तक हार नहीं माननी है।
उनका पुश्तैनी गाँव बाबू पट्टी (रानीगंज, प्रतापगढ़) है। परिवार प्रयागराज में रहा, लेकिन घर का अनाज, संस्कार और मिट्टी बाबू पट्टी के खेतों से ही आती थी।
बिल्कुल नहीं! उन्होंने जिंदगी भर कभी शराब नहीं छुई। मधुशाला में 'प्याला' दिल है, 'हाला' जिंदगी का सच है और यह मंदिर-मस्जिद के झगड़े मिटाकर भाईचारा सिखाती है।
इंग्लैंड की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी साहित्य में Ph.D. पाने वाले वे समूचे भारत के दूसरे विद्वान बने। उनका शोध मशहूर कवि डब्ल्यू. बी. यीट्स पर था।
नेहरू जी के बुलावे पर विदेश मंत्रालय में पहले हिन्दी विशेषज्ञ बने और सरकारी संधियों की हिंदी बनाई। सन् 1966 में राष्ट्रपति द्वारा राज्य सभा सांसद मनोनीत हुए।
अवधी में छोटे बच्चे को लाड़ से 'बच्चन' कहते हैं। दूसरी पत्नी तेजी बच्चन थीं। दो बेटे हुए—सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और उद्यमी अजिताभ बच्चन।
सन् 1991 में बिड़ला फाउंडेशन ने आत्मकथा के चार खंडों (क्या भूलूँ क्या याद करूँ आदि) के लिए देश का पहला सरस्वती सम्मान डॉ. बच्चन जी को दिया।
"मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला, 'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला; अलग-अलग पथ बतलाते सब, पर मैं यह बतलाता हूँ—'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला!'"
— डॉ. हरिवंश राय बच्चन ('मधुशाला', 1935)बाबू पट्टी प्रतापगढ़ की माटी और कायस्थ कुल की असलियत
किसी भी पेड़ की छांव और फल कितने भी बड़े क्यों न हों, उसकी असली ताकत उस मिट्टी में होती है जहाँ उसकी जड़ें धंसी होती हैं। डॉ. हरिवंश राय बच्चन जब देश-दुनिया के बड़े-बड़े मंचों पर शेर की तरह गरजते थे, तब उनके भीतर की सादगी अवध के एक छोटे से गाँव की देन थी—उस गाँव का नाम है बाबू पट्टी (तहसील रानीगंज, जिला प्रतापगढ़, पिन कोड 230304)।
उनके पुरखे मूल रूप से बाबू पट्टी के सीधे-सादे कायस्थ (श्रीवास्तव) थे। उनके पिता बाबू प्रताप नारायण श्रीवास्तव पेट पालने के लिए गाँव छोड़कर इलाहाबाद (प्रयागराज) चले आए और कचहरी में बीस-पच्चीस रुपये की मामूली मुंशीगीरी (क्लर्क) करने लगे। लेकिन गाँव की मिट्टी से परिवार का रिश्ता कभी नहीं छूटा।
बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा में साफ लिखा है कि इलाहाबाद शहर में रहते हुए भी उनके घर का चूल्हा बाबू पट्टी के खेतों से आने वाले गेंहू, अरहर की दाल और गुड़ से ही जलता था। जब गाँव से बैलगाड़ी पर अनाज की बोरियां आती थीं, तो पूरे घर में बाबू पट्टी की माटी की सोंधी महक फैल जाती थी। गाँव के लोग जब शहर आते तो प्रताप नारायण जी को 'प्रताप मुंशी' और छोटे हरिवंश को सिर्फ 'बच्चन' कहकर पुकारते थे।
यह कोई महलों का ठाठ नहीं था। बाबू पट्टी के खेतों की मेहनत और पिता की मामूली नौकरी ने बालक बच्चन को सिखाया कि जीवन में अभाव कितने भी हों, अपनी जड़ों और मिट्टी की सच्चाई को कभी भूलना नहीं चाहिए।
'हरिवंश पुराण' की मन्नत और घरेलू नाम 'बच्चन' का भेद
प्रताप नारायण जी और उनकी पत्नी सरस्वती देवी के ब्याह के कई सालों बाद तक जब कोई औलाद नहीं हुई, तो घर में गहरा सन्नाटा पसर गया था। तब बच्चन जी की दादी ने कुलदेवता के आगे आंचल फैलाकर मन्नत मांगी और घर में 'हरिवंश पुराण' का पाठ बैठाया।
मन्नत पूरी हुई और 27 नवम्बर 1907 को इलाहाबाद के पुराने चक मोहल्ले में एक बच्चे का रोना सुनाई पड़ा। पुराण की मन्नत से जन्म लेने के कारण पिता ने नाम रखा — हरिवंश राय!
- गाँव की बोली का दुलार: अवध और गाँव-देहात में नटखट और लाड़ले बच्चे को प्यार से 'बच्चा' या 'बच्चन' कहा जाता है। चक मोहल्ले में सब उन्हें 'बच्चन' ही कहते थे।
- जाति का ठप्पा छोड़ा: आगे चलकर जब वे लिखने लगे, तो उन्होंने अपने जातिसूचक उपनाम 'श्रीवास्तव' को किनारे कर दिया और इसी घरेलू लाड़ले नाम 'बच्चन' को अपनी स्थायी पहचान बना लिया।
- मौलवी साहब से उर्दू की तालीम: उस जमाने की कायस्थ रवायत के मुताबिक उन्होंने इलाहाबाद की कायस्थ पाठशाला में मौलवी साहब से उर्दू-फारसी के कायदे सीखे। इसी उर्दू की मिठास ने आगे चलकर उनकी हिंदी कविताओं में गजब की रवानी और मिठास घोल दी।
उर्दू के बाद उनका ध्यान अंग्रेजी पर गया। घर में पैसों की भारी तंगी थी, कई बार एक वक्त का खाना खाकर दिन गुजारना पड़ता था। लेकिन अपनी जिद और मेहनत के बल पर उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. की डिग्री ली और वहीं पढ़ाने लगे।
श्यामा का असामयिक वियोग, टीबी का दर्द और घोर तंगहाली
सन 1926 में, जब हरिवंश राय जी मात्र 19 साल के थे, उनका ब्याह 14 साल की भोली-भाली श्यामा से कर दिया गया। दोनों ने गरीबी के बीच एक-दूसरे का हाथ थामकर गुजर-बसर शुरू की। लेकिन तकदीर ने ऐसी चोट मारी जो किसी की भी रूह कंपा दे। उस दौर में टीबी (तपेदिक) एक ऐसा जानलेवा रोग था जिसका कोई पक्का इलाज नहीं था। श्यामा टीबी की चपेट में आ गईं।
मास्टरी से मिलने वाले चंद रुपयों में घर का खर्च चले या दवाइयों का? श्यामा जी की देह हड्डियों का ढांचा बन गई। बच्चन जी रात-रात भर उनके सिरहाने बैठकर पंखा झलते और बलगम साफ करते। दस साल के लंबे और रुला देने वाले संघर्ष के बाद, सन 1936 में सिर्फ 24 साल की कच्ची उम्र में श्यामा ने दम तोड़ दिया।
"जिस कमरे में कभी श्यामा की चूड़ियों की खनक थी, वहाँ अब सिर्फ खाली शीशियां और कफ़न का सन्नाटा बचा था... मैं आधी-आधी रात को उठकर दीवारों से सिर टकराता था कि भगवान ने मुझसे मेरी दुनिया क्यों छीन ली!"
उसी बेबसी और अकेलेपन की आग में तपकर उनकी दो मर्मस्पर्शी किताबें निकलीं — 'निशा निमंत्रण' (1938) और 'एकांत संगीत' (1939), जिसे पढ़कर आज भी किसी की भी आंखें भर आएं।
श्यामा के जाने के बाद बच्चन जी कई महीनों तक इलाहाबाद की सड़कों पर पागलों की तरह भटकते रहे। लेकिन जिंदगी का सच यह है कि सबसे गहरा दर्द ही सबसे बड़ी कलम को जन्म देता है।
'मधुशाला' (1935) पर भारी बवाल: जब गांधी जी ने वर्धा आश्रम बुलाया
श्यामा की बीमारी के दिनों में, सन 1935 में बच्चन जी ने एक ऐसी किताब लिखी जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया — 'मधुशाला'!
जब वे कवि सम्मेलनों में अपनी गंभीर और लयबद्ध आवाज में इसे गाते, तो दस-दस हजार लोग रात-रात भर खड़े होकर सुनते थे। लेकिन इसके साथ ही देश भर में भारी बवाल खड़ा हो गया। रूढ़िवादी पंडितों और कुछ आलोचकों ने आरोप लगाया कि बच्चन नौजवानों को शराबी बना रहे हैं और समाज में अय्याशी फैला रहे हैं।
- शिकायत बापू तक पहुँची: विरोधियों ने महात्मा गांधी से शिकायत की कि यह नया कवि देश को बिगाड़ रहा है। गांधी जी ने बच्चन जी को सेवाग्राम आश्रम बुलाया।
- बापू और कस्तूरबा के सामने पाठ: बच्चन जी ने जमीन पर बैठकर बापू और कस्तूरबा को मधुशाला की रुबाइयाँ सुनाईं। गांधी जी ध्यान से सुनते रहे।
- गांधी जी का फैसला: पाठ खत्म होने पर बापू मुस्कुराए और बोले—"बच्चन! तुम्हारी पंक्तियों में कोई खराबी नहीं है, यह तो जिंदगी का गहरा दर्शन है। बस यह ध्यान रखना कि नौजवान इसका उल्टा मतलब न निकाल लें!"
एक मगर उनका मदिरालय, एक मगर उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद-मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद-मन्दिर, मेल कराती मधुशाला!"
मधुशाला में 'शराब' केवल एक रूपक (मेटाफर) थी। 'साकी' कुदरत या भगवान था, 'प्याला' इंसान का दिल था, और 'मदिरालय' यह पूरा संसार था। बच्चन जी ने साफ कहा कि मंदिर और मस्जिद आपस में लड़ाते हैं, लेकिन इंसानियत का प्याला सबको एक कर देता है।
तेजी बच्चन से ब्याह, समाज का गुस्सा और बालक अमिताभ बच्चन का जन्म
श्यामा के जाने के बाद बच्चन जी पूरी तरह अकेले पड़ चुके थे। सन 1941 में बरेली में एक दोस्त के घर उनकी मुलाकात लाहौर के एक खाते-पीते सिख परिवार की तेजी सूरी से हुई। तेजी जी खुले विचारों की, गाने-बजाने और थियेटर (नाटक) की बेहद शौकीन थीं। दोनों के दिलों के तार जुड़े और उसी साल दोनों ने शादी कर ली।
लेकिन यह शादी आसान नहीं थी। उस जमाने में एक रूढ़िवादी कायस्थ का एक सिख महिला से अंतरजातीय ब्याह करना बहुत बड़ा पाप समझा जाता था। बच्चन जी के अपने रिश्तेदारों और बिरादरी ने उनका हुक्का-पानी बंद कर दिया, कई दोस्तों ने मुँह मोड़ लिया। लेकिन बच्चन जी ने समाज के इस खोखले दकियानूसीपन की परवाह नहीं की और तेजी जी के साथ एक नया संसार बसाया:
नेह का आह्वान फिर-फिर!
वह उठी आंधी कि नभ में छा गया सहसा अंधेरा,
धूलि-धूसर बादलों ने भूमि को इस भांति घेरा...
प्राची से उषा मोहिनी मुस्क्याई,
फिर-फिर, फिर-फिर!"
11 अक्टूबर 1942 को इलाहाबाद में उनके घर पहले बेटे ने जन्म लिया। उस समय गांधी जी का 'भारत छोड़ो आंदोलन' चल रहा था, इसलिए बच्चन जी ने अपने बागी मिजाज में बेटे का नाम रख दिया था — 'इनकलाब'! लेकिन जब उनके घनिष्ठ मित्र और मशहूर कवि सुमित्रानंदन पंत बच्चे को देखने आए, तो उन्होंने कहा — "बच्चन, यह नाम बहुत गरम है। इस तेजस्वी बालक का नाम 'अमिताभ' (जिसकी चमक कभी न मिटे) रखो।" वही बालक आगे चलकर सदी का महानायक अमिताभ बच्चन बना। 18 मई 1947 को छोटे बेटे अजिताभ का जन्म हुआ।
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में डंका: अंग्रेजी में डॉक्टरेट पाने वाले दूसरे भारतीय
हरिवंश राय बच्चन सिर्फ हिंदी के लोकप्रिय कवि नहीं थे, बल्कि अंग्रेजी भाषा के भी प्रकांड विद्वान थे। सन 1952 में 45 साल की उम्र में वे शोध के लिए इंग्लैंड के प्रसिद्ध कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय (University of Cambridge) गए।
उस समय कैम्ब्रिज में किसी भारतीय को सीधे Ph.D. में दाखिला नहीं मिलता था जब तक उसके पास ब्रिटेन की डिग्री न हो। लेकिन बच्चन जी के ज्ञान और तर्क को देखकर सेंट कैथरीन्स कॉलेज के मशहूर प्रोफेसर टी.आर. हेन (T.R. Henn) दंग रह गए और उन्होंने विशेष अनुमति से उन्हें शोध की मंजूरी दी।
- शोध का विषय (W.B. Yeats and Occultism): उन्होंने नोबेल विजेता आयरिश कवि यीट्स के उस रहस्यमय दर्शन पर शोध किया जो भारत के उपनिषदों और तंत्र विद्या से प्रेरित था।
- समूचे भारत के दूसरे विद्वान: कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में Ph.D. की उपाधि हासिल करने वाले वे पूरे भारत के इतिहास में दूसरे भारतीय बने।
- धोती-कुर्ते पर अडिग: इंग्लैंड की हाड़ कंपाने वाली ठंड और अंग्रेजों के बीच रहकर भी उन्होंने अपनी भारतीय पोशाक और शाकाहारी जीवनशैली से कभी समझौता नहीं किया।
- शेक्सपियर का हिंदी अनुवाद: कैम्ब्रिज से लौटकर उन्होंने शेक्सपियर के महान नाटकों मैकबेथ और ओथेलो का ऐसा लाजवाब हिंदी पद्यानुवाद किया, जिसमें तेजी बच्चन ने खुद मंच पर अभिनय किया।
विदेश मंत्रालय में नेहरू जी का साथ और राज्यसभा में बुलंद आवाज
कैम्ब्रिज से लौटने के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने खुद पत्र लिखकर बच्चन जी को दिल्ली बुलाया। सन 1955 में वे भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में प्रथम हिन्दी विशेषज्ञ (Officer on Special Duty) बने।
उस समय आजाद भारत के सरकारी दफ्तरों में हर काम अंग्रेजी में होता था और बड़े-बड़े अफसर हिंदी का मजाक उड़ाते थे। बच्चन जी ने पूरे दस साल तक रात-दिन एक करके अंतरराष्ट्रीय संधियों, सरकारी नियमों, पासपोर्ट और कूटनीतिक कागजों का ऐसा आसान और सटीक हिंदी अनुवाद तैयार किया, जो आज भी भारत सरकार की रीढ़ है।
उनकी निष्पक्ष विद्वता और सेवाओं को देखकर सन 1966 में राष्ट्रपति द्वारा उन्हें राज्य सभा का मनोनीत सदस्य बनाया गया। संसद में छह साल के कार्यकाल में उन्होंने किसी राजनीतिक दल की चापलूसी नहीं की, बल्कि भारतीय भाषाओं, लेखकों के कॉपीराइट और शिक्षा में सुधार के लिए बेबाक आवाज उठाई।
'अग्निपथ' और जन-जन में नया हौसला फूंकने वाली कालजयी कविताएं
जब भी कोई इंसान जिंदगी की मुसीबतों से हारने लगता है, जब रास्ते बंद दिखने लगते हैं, तब बच्चन जी की पंक्तियां सीने में आग लगा देती हैं। उनकी कविता 'अग्निपथ' कोई किताबी कविता नहीं, बल्कि हर उस मजदूर, किसान और नौजवान का घोषणा-पत्र है जो पसीना बहाकर अपनी तकदीर खुद लिखता है:
हों घने हों बड़े,
एक पत्र छांह भी,
मांग मत, मांग मत, मांग मत,
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!
तू न थकेगा कभी,
तू न थमेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!"
उनकी दूसरी कविता 'जो बीत गई सो बात गई' ने सिखाया कि जो चला गया उस पर रोने से वक्त बर्बाद होता है, जो बचा है उसी से नया आशियाना बनाना चाहिए। इसी तरह 'कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती' जैसी पंक्तियों ने लाखों निराश मनों में फिर से खड़े होने की हिम्मत भरी।
हरिवंश राय बच्चन का संपूर्ण साहित्य संसार: 24 काव्य संग्रह व 29 पुस्तकें
बच्चन जी की कलम इतनी तेज और विविध थी कि उन्होंने कविता, अनुवाद, नाटक, संस्मरण और आत्मकथा हर क्षेत्र में ऐसा काम किया जो सदियों तक याद रखा जाएगा। उनकी सम्पूर्ण रचनाओं का प्रामाणिक विवरण नीचे दिया गया है:
📜 1. कालजयी कविता संग्रह (24 काव्य संग्रह - संपूर्ण प्रामाणिक सूची):
| क्र. सं. | कविता संग्रह का नाम | प्रकाशन वर्ष | साहित्यिक महत्व |
|---|---|---|---|
| 1. | तेरा हार | 1932 | पहला प्रकाशित काव्य संग्रह |
| 2. | मधुशाला | 1935 | हालावाद की अमर युगप्रवर्तक कृति |
| 3. | मधुबाला | 1936 | प्रेम और सौंदर्य का आध्यात्मिक विस्तार |
| 4. | मधुकलश | 1937 | 'मधु' त्रयी का पूर्ण स्वरूप |
| 5. | निशा निमंत्रण | 1938 | श्यामा वियोग की मर्मस्पर्शी पीड़ा |
| 6. | एकांत संगीत | 1939 | अकेलेपन और अवसाद की गहरी अभिव्यक्ति |
| 7. | आकुल अंतर | 1943 | द्वितीय विश्वयुद्ध व मानसिक द्वंद्व |
| 8. | सतरंगिनी | 1945 | जीवन के सतरंगी उल्लास के गीत |
| 9. | हलाहल | 1946 | सामाजिक विषमताओं पर तीखा प्रहार |
| 10. | बंगाल का काव्य | 1946 | 1943 के भीषण बंगाल अकाल का दर्द |
| 11. | खादी के फूल | 1948 | गांधी जी को काव्यांजलि (पंत जी के संग) |
| 12. | सूत की माला | 1948 | स्वाधीनता और चरखे की चेतना |
| 13. | मिलन यामिनी | 1950 | दांपत्य सुख और नए जीवन का गान |
| 14. | प्रणय पत्रिका | 1955 | गंभीर प्रेम और निष्ठा के पत्र |
| 15. | धार के इधर उधर | 1957 | प्रवाहमान जीवन का दार्शनिक चित्र |
| 16. | आरती और अंगारे | 1958 | भक्ति, आस्था व सामाजिक चेतना |
| 17. | बुद्ध और नाचघर | 1958 | आधुनिक भोगवाद बनाम शांति की खोज |
| 18. | त्रिभंगिमा | 1961 | तीन भंगिमाओं का काव्यात्मक नृत्य |
| 19. | चार खेमे चौंसठ खूंटे | 1962 | लोक-जीवन व लोक-संस्कृति के रंग |
| 20. | दो चट्टानें | 1965 | साहित्य अकादमी पुरस्कृत ऐतिहासिक काव्य |
| 21. | बहुत दिन बीते | 1967 | अतीत की स्मृतियां और आत्मीय झांकी |
| 22. | कटती प्रतिमाओं की आवाज़ | 1968 | बदलते मूल्यों और समाज की टूटन |
| 23. | उभरते प्रतिमानों के रूप | 1969 | नए युग की चेतना का स्वागत |
| 24. | जाल समेटा | 1973 | जीवन के अंतिम पड़ाव का सार-संक्षेप |
📚 2. विविध गद्य, अनुवाद, नाटक एवं संस्मरण (29 महत्वपूर्ण पुस्तकें):
| क्र. सं. | पुस्तक का नाम | प्रकाशन वर्ष | विधा / विशेष टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| 1. | बचपन के साथ क्षण भर | 1934 | आरंभिक संस्मरण व आलेख |
| 2. | खय्याम की मधुशाला | 1938 | उमर खय्याम की रुबाइयों का पद्यानुवाद |
| 3. | सोपान | 1953 | दार्शनिक चिंतन व साहित्यिक आलेख |
| 4. | मैकबेथ | 1957 | शेक्सपियर के नाटक का अमर हिंदी अनुवाद |
| 5. | जनगीता | 1958 | श्रीमद्भगवद्गीता का लोक-छंद में अनुवाद |
| 6. | ओथेलो | 1959 | शेक्सपियर के नाटक का हिंदी रूपांतरण |
| 7. | उमर खय्याम की रुबाइयाँ | 1959 | फारसी रुबाइयों का प्रामाणिक अनुवाद |
| 8. | कवियों के सौम्य संत: पंत | 1960 | सुमित्रानंदन पंत पर समीक्षात्मक ग्रंथ |
| 9. | आज के लोकप्रिय हिन्दी कवि: पंत | 1960 | संपादन एवं साहित्यिक मूल्यांकन |
| 10. | आधुनिक कवि: ७ | 1961 | समकालीन कवियों का संकलन |
| 11. | नेहरू: राजनैतिक जीवनचित्र | 1961 | जवाहरलाल नेहरू का प्रामाणिक वृत्त |
| 12. | नये पुराने झरोखे | 1962 | साहित्यिक निबंध व रेखाचित्र |
| 13. | अभिनव सोपान | 1964 | चिंतन और साहित्यिक समीक्षा |
| 14. | चौसठ रूसी कविताएँ | 1964 | रूसी कवियों का हिंदी पद्यानुवाद |
| 15. | नागर गीत | 1966 | नागरी संस्कृति के प्रतिनिधि गीत |
| 16. | बचपन के लोकप्रिय गीत | 1967 | बाल-साहित्य व लोकप्रिय गीत |
| 17. | W.B. Yeats and Occultism | 1968 | कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय का अंग्रेजी शोध ग्रंथ |
| 18. | मरकट द्वीप का स्वर | 1968 | आयरलैंड यात्रा संस्मरण |
| 19. | हैमलेट | 1969 | शेक्सपियर के त्रासद नाटक का अनुवाद |
| 20. | भाषा अपनी भाव पराये | 1970 | भाषा विज्ञान व अनुवाद का सिद्धांत |
| 21. | पंत के सौ पत्र | 1970 | सुमित्रानंदन पंत के दुर्लभ पत्रों का संकलन |
| 22. | प्रवास की डायरी | 1971 | इंग्लैंड व विदेश प्रवास के अंतरंग अनुभव |
| 23. | किंग लियर | 1972 | शेक्सपियर के महान नाटक का अनुवाद |
| 24. | टूटी छूटी कड़ियाँ | 1973 | साहित्यिक कड़ियों का समाकलन |
| 25. | मेरी कविताई की आधी सदी | 1981 | 50 वर्षों की काव्य-यात्रा का सार |
| 26. | सोहं हंस | 1981 | आध्यात्मिक काव्य व उपनिषद चिंतन |
| 27. | आठवें दशक की श्रेष्ठ कवितायें | 1982 | समकालीन हिंदी कविता का संपादन |
| 28. | मेरी श्रेष्ठ कविताएँ | 1984 | कवि द्वारा स्वयं चुनी हुई श्रेष्ठ रचनाएं |
| 29. | आ रही रवि की सवारी | -- | कालजयी बाल व प्रकृति कविता |
आत्मकथा के 4 खंड: बिना किसी लाग-लपेट के जिंदगी का सच्चा आईना
आमतौर पर लोग आत्मकथा इसलिए लिखते हैं ताकि खुद को महान और बेदाग दिखा सकें। लेकिन बच्चन जी ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने बिना किसी शर्म, बिना अपने दोषों को छिपाए और 100% ईमानदारी से अपनी कमजोरियों, भटकावों, श्यामा की बीमारी में अपनी लाचारी और परिवार की दबी हुई सच्चाइयों को पन्नों पर उड़ेल दिया।
| खंड / भाग | पुस्तक का नाम | प्रकाशन वर्ष | वर्णित जीवन-कालखंड व विषयवस्तु |
|---|---|---|---|
| पहला खंड | क्या भूलूँ क्या याद करूँ | 1969 | अमोड़ा से बाबू पट्टी पुरखों का इतिहास, बचपन, श्यामा जी से विवाह व उनकी दुखद मृत्यु। |
| दूसरा खंड | नीड़ का निर्माण फिर | 1970 | तेजी जी से परिचय व विवाह, अमिताभ बच्चन व अजिताभ का जन्म, इलाहाबाद में पारिवारिक पुनर्जीवन। |
| तीसरा खंड | बसेरे से दूर | 1977 | कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में अध्ययन, इंग्लैंड के अनुभव और विदेश की चुनौतियां। |
| चौथा खंड | दशद्वार से सोपान तक | 1985 | दिल्ली विदेश मंत्रालय, 10 क्लाइव रोड से 'सोपान', राज्यसभा और मुंबई के दिन। |
| समग्र संकलन | बच्चन रचनावली (9 खंड) | 1983 | अजीत कुमार द्वारा संपादित बच्चन जी के सम्पूर्ण वाङ्मय का 9 वृहद खंडों में प्रकाशन। |
मशहूर लेखिका अमृता प्रीतम ने कहा था कि भारतीय साहित्य में अपनी कमजोरियों को इतनी बहादुरी से स्वीकार करने वाली आत्मकथा दूसरी कोई नहीं है। इसी आत्मकथा के लिए सन 1991 में के.के. बिड़ला फाउंडेशन ने देश का पहला 'सरस्वती सम्मान' बच्चन जी को दिया।
पद्म भूषण, सरस्वती सम्मान और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार
डॉ. हरिवंश राय बच्चन का साहित्यिक कद किसी एक राज्य या भाषा की सीमाओं में बंधा नहीं था। उन्हें देश-विदेश के सर्वोच्च पुरस्कारों से नवाजा गया:
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1968): उनके महान काव्य संग्रह 'दो चट्टानें' के लिए साहित्य का शीर्ष राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
- सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार (1968): अंतरराष्ट्रीय शांति, साहित्य और भारत-रूस मैत्री के लिए प्रदान किया गया।
- कमल पुरस्कार / Lotus Prize (1968): एफ्रो-एशियाई लेखक सम्मेलन (Afro-Asian Writers Conference) द्वारा विश्व साहित्य के शीर्ष सम्मान से विभूषित।
- पद्म भूषण (1976): साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में युगांतरकारी योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा देश का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान।
- प्रथम सरस्वती सम्मान (1991): चार खंडों की आत्मकथा के लिए देश का पहला ऐतिहासिक सरस्वती सम्मान दिया गया।
18 जनवरी 2003: दुनिया से विदाई, वीडियो डाक्यूमेंट्री व बाबू पट्टी का आज का सच
जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर बच्चन जी अपने दोनों बेटों—अमिताभ बच्चन और अजिताभ—तथा पत्नी तेजी बच्चन के साथ मुंबई के जुहू स्थित बंगले 'प्रतीक्षा' में रहते थे। उम्र 90 पार कर चुकी थी, सांस की बीमारी थी, लेकिन जब भी वे अपने पोते-पोतियों (अभिषेक, श्वेता) को देखते, उनके चेहरे पर वही पुराने अवध की सोंधी मुस्कान खिल उठती थी।
आखिरकार 18 जनवरी 2003 को 95 साल की उम्र में मुंबई में इस महान कलमकार ने अपनी आखिरी सांस ली। उनके जाने पर समूचे देश में शोक की लहर दौड़ गई। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि में कहा था—"हिंदी साहित्य ने आज अपनी सबसे बुलन्द और लोकप्रिय आवाज को खो दिया है।"
जिस गाँव के नाम ने दुनिया में इतना बड़ा मान कमाया, आज उस बाबू पट्टी (प्रतापगढ़) का हाल क्या है? गाँव में बच्चन जी के पुरखों का पुराना दालान, कुआं और नीम का पेड़ आज भी मौजूद है। हालांकि अमिताभ बच्चन ने गाँव में पुस्तकालय और विकास की पहल की, लेकिन ग्रामीणों की यह आज भी टीस है कि सरकार को इस गाँव को एक अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक तीर्थ के रूप में विकसित करना चाहिए था।
📺 एक्सक्लूसिव वीडियो डाक्यूमेंट्री: बाबू पट्टी गाँव (प्रतापगढ़) और बच्चन परिवार की जड़ों की पड़ताल:
📍 गूगल मैप (सेटेलाइट व्यू): बाबू पट्टी गाँव, तहसील रानीगंज (प्रतापगढ़):
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वे आधुनिक हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य कवि व विद्वान थे। 1930 के दशक में छायावाद के दौर में उन्होंने उमर खय्याम की रुबाइयों की तर्ज पर 'हाला' (प्रेम रस), 'प्याला' और 'मधुशाला' के रूपक से जीवन की मस्ती व जिजीविषा का अमर दर्शन दिया, जिसे साहित्य में 'हालावाद' कहा गया।
उनका मूल नाम हरिवंश राय श्रीवास्तव था। बचपन में घर में सब उन्हें प्यार से 'बच्चन' (छोटा बच्चा / बालरूप) पुकारते थे। आगे चलकर उन्होंने इसी घरेलू नाम को अपना साहित्यिक उपनाम बना लिया और श्रीवास्तव की जगह 'बच्चन' कुलनाम के रूप में अमर हो गया।
बाबू पट्टी (रानीगंज, प्रतापगढ़) उनका पुश्तैनी गाँव था। उनके पूर्वज कायस्थ कुल के जमींदार थे जो बाबू पट्टी में रहते थे। बाद में उनके पिता प्रताप नारायण रोजगार हेतु प्रयागराज बसे, मगर बाबू पट्टी की माटी से बच्चन परिवार का आत्मीय नाता आज तक कायम है।
सन् 1935 में प्रकाशित हुई। उस समय वे प्रयागराज में घोर तंगहाली, मुफलिसी और अपनी पहली पत्नी श्यामा जी की टीबी (तपेदिक) की बीमारी से जूझ रहे थे। टूटे दिल और खाली जेब के अंधेरे में उन्होंने दुनिया को जीने का नया फलसफा देने के लिए 'मधुशाला' रची थी।
कुछ लोगों ने बापू से शिकायत की थी कि यह किताब शराबखोरी सिखाती है। तब बच्चन जी ने वर्धा आश्रम में स्वयं गांधी जी को पूरी मधुशाला गाकर सुनाई। बापू ने मंत्रमुग्ध होकर कहा कि "इसमें शराब नहीं, बल्कि समाज के दर्द और पाखंड को मिटाने वाला आध्यात्मिक रस है" और इसे आशीर्वाद दिया।
उन्होंने 1952-1954 में इंग्लैंड के विख्यात कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से प्रो. टी.आर. हेन के निर्देशन में आयरिश कवि डब्ल्यू. बी. यीट्स और भारतीय तंत्र/रहस्यवाद (W.B. Yeats and Occultism) पर पी-एच.डी. पूरी की। वे कैम्ब्रिज से अंग्रेजी में डॉक्टरेट पाने वाले दूसरे भारतीय थे।
सन् 1942 में जब अमिताभ का जन्म हुआ, तब भारत छोड़ो आंदोलन के दौर में महान छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत ने बालक के चेहरे का तेज देखकर उनका नाम 'अमिताभ' (जिसका तेज कभी मंद न पड़े) रखा। बचपन में घर में उन्हें 'इनकलाब' भी कहा जाता था।
चार अमर खंड हैं: 1. 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ' (1969), 2. 'नीड़ का निर्माण फिर' (1970), 3. 'बसेरे से दूर' (1977), और 4. 'दशद्वार से सोपान तक' (1985)। इसमें उन्होंने अपनी कमजोरियों और सच्चाइयों को बिना किसी लाग-लपेट के निडरता से लिखा है।
उन्हें 1968 में साहित्य अकादमी पुरस्कार ('दो चट्टानें' हेतु), 1976 में भारत सरकार द्वारा 'पद्म भूषण', सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, और 1991 में देश का 'प्रथम सरस्वती सम्मान' (आत्मकथा के 4 खंडों हेतु) प्रदान किया गया था।
'अग्निपथ' ('तू न थकेगा कभी, तू न थमेगा कभी, कर शपथ, कर शपथ'), 'नीड़ का निर्माण फिर फिर', 'निशा निमंत्रण' और 'हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती' जैसी अमर रचनाएं हर निराश मन में नया हौसला फूंक देती हैं।
प्रधानमंत्री पं. नेहरू के आमंत्रण पर वे 1955 से 1966 तक विदेश मंत्रालय में प्रथम विशेष कार्य अधिकारी (हिन्दी) रहे, जहाँ उन्होंने आधिकारिक हिन्दी शब्दावली गढ़ी। इसके बाद 1966 से 1972 तक वे राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत राज्य सभा सांसद रहे।
18 जनवरी 2003 को 95 वर्ष की आयु में मुंबई के जुहू स्थित अपने निवास 'प्रतीक्षा' में उन्होंने महाप्रस्थान किया। उनकी अमर पंक्तियां 'मिट्टी का तन, मस्ती का मन, क्षण भर जीवन — मेरा परिचय' आज भी साहित्य जगत की धरोहर हैं।
- डॉ. हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा (चार खंड): 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ', 'नीड़ का निर्माण फिर', 'बसेरे से दूर', 'दशद्वार से सोपान तक' — राजपाल एंड संस, दिल्ली।
- 'बच्चन रचनावली' (9 खंड): वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली (संपादक: अजित कुमार)।
- कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय शोध अभिलेखागार (इंग्लैंड): Ph.D. Dissertation on W.B. Yeats and Occultism under Prof. T.R. Henn (St. Catharine's College, 1952-1954)।
- महात्मा गांधी सेवाग्राम आश्रम (वर्धा) संस्मरण: सन् 1936 में बापू के समक्ष 'मधुशाला' पाठ एवं स्वीकृति के ऐतिहासिक दस्तावेज।
- प्रतापगढ़ HUB फ़ील्ड रिसर्च व राजस्व अभिलेख: बाबू पट्टी (रानीगंज, प्रतापगढ़) के जमींदारी व चकबंदी अभिलेख, दालान व प्राथमिक शाला के प्रत्यक्ष साक्षात्कार।