डॉ. हरिवंश राय बच्चन: 'मधुशाला' के अमर शिल्पी, कैम्ब्रिज से पद्मभूषण और प्रतापगढ़ की माटी का कालजयी सफर
जब जिंदगी के रास्ते अंधेरे लगने लगें, जब चारों तरफ निराशा की दीवारें खड़ी हों, और जब इंसान अंदर से पूरी तरह टूट चुका हो—तब एक ही कवि की पंक्तियां सीने में उम्मीद की मशाल जलाती हैं। वह आवाज है डॉ. हरिवंश राय बच्चन की! एक ऐसा कलमकार जिसने गरीबी के काले थपेड़ों, पत्नी के असामयिक वियोग और पेट की भूख को अपनी स्याही बनाया और दुनिया को 'मधुशाला' व 'अग्निपथ' जैसी कालजयी रचनाएं सौंप दीं।
प्रयागराज के मोहल्ला चक से लेकर इंग्लैंड की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और संसद के गलियारों तक गूंजने वाला यह नाम सिर्फ एक साहित्यकार का नहीं, बल्कि हर उस इंसान के संघर्ष का सच्चा आईना है जो मिट्टी से उठकर आसमान में सितारा बन गया।
🌱 बचपन की मिट्टी: 'हरिवंश पुराण' की मन्नत से बालक 'बच्चन' तक
कहानियां तो बहुत से लोगों की लिखी जाती हैं, लेकिन बच्चन जी का जीवन खुद एक ऐसी महागाथा है जिस पर यदि हॉलीवुड में फिल्म बने तो वह दर्शकों की आंखों में आंसू और सीने में हौसला दोनों एक साथ भर दे। 27 नवम्बर 1907 को तत्कालीन इलाहाबाद (आज के प्रयागराज) के मोहल्ला चक में एक साधारण कायस्थ परिवार में उनका जन्म हुआ था। उनके पिता बाबू प्रताप नारायण श्रीवास्तव कचहरी में मामूली क्लर्क थे और माता सरस्वती देवी अत्यंत धर्मपरायण स्त्री थीं।
विवाह के कई सालों तक जब कोई औलाद नहीं हुई, तो प्रताप नारायण जी की माता (बच्चन जी की दादी) ने कुलदेवता के सामने रो-रोकर मन्नत मांगी और लगातार हरिवंश पुराण का अखंड पाठ करवाया। इसी मन्नत के फलस्वरुप जब यह बालक संसार में आया, तो उसका नाम रखा गया—हरिवंश राय!
अवधी और पूर्वांचल की लोक-बोली में छोटे, नटखट और लाड़ले बच्चे को प्यार से 'बच्चा' या 'बच्चन' कहा जाता है। घर-परिवार और मोहल्ले के लोग बालक हरिवंश को प्यार से 'बच्चन' कहकर पुकारते थे। आगे चलकर यह लाड़ला घरेलू नाम इतना मशहूर हुआ कि उन्होंने अपने वंश-गोत्र (श्रीवास्तव) की जगह इसी को अपना उपनाम बना लिया और यह दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित उपनाम बन गया!
हालांकि परिवार प्रयागराज में रहता था, लेकिन उनकी जड़ें प्रतापगढ़ के बाबू पट्टी गाँव में गहराई से धंसी हुई थीं। परिवार का पेट पूरे साल बाबू पट्टी के खेतों से आने वाले गेंहू, दाल और गुड़ से भरता था। बाबू पट्टी की मिट्टी के इसी संस्कार ने बच्चन जी को हमेशा ज़मीन से जोड़े रखा।
📚 कायस्थ पाठशाला से उर्दू की तालीम और अंग्रेजी में महारत
उस दौर में कायस्थ परिवारों की पुरानी परंपरा थी कि बच्चों को सबसे पहले उर्दू और फारसी की तालीम दी जाती थी, क्योंकि अदालती कामकाज और कानून की पढ़ाई के लिए उर्दू पहली अनिवार्य सीढ़ी मानी जाती थी। हरिवंश राय जी ने अपनी आरंभिक शिक्षा प्रयागराज की प्रसिद्ध कायस्थ पाठशाला में ली। मौलवी साहब की सख्त निगरानी में उन्होंने उर्दू की ऐसी पुख्ता तालीम हासिल की, जिसने आगे चलकर उनकी हिंदी कविताओं में एक अनोखी मिठास, रवानी और नफासत घोल दी।
उर्दू के बाद उनका मन साहित्य के विशाल सागर में उतरने लगा। उन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय (इलाहाबाद यूनिवर्सिटी)—जिसे उस समय 'पूरब का ऑक्सफोर्ड' कहा जाता था—में दाखिला लिया। आर्थिक तंगियों का आलम यह था कि किताबों के लिए पैसे नहीं होते थे, कई बार एक वक्त का खाना खाकर दिन गुजारना पड़ता था। लेकिन अपनी अटूट लगन के दम पर उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. (M.A.) की डिग्री प्रथम श्रेणी में हासिल की। इसके बाद उन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम.ए और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पी.एच डी (Ph.D.) किया तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन का कार्य किया!
💔 पहली मोहब्बत का टूटना, टीबी का दंश और 'मधुशाला' का तूफ़ान
सन 1926 में, जब हरिवंश राय जी की उम्र मात्र 19 वर्ष थी, उनका विवाह 14 वर्ष की भोली-भाली कन्या श्यामा बच्चन से हुआ। दोनों ने एक-दूसरे के सहारे जिंदगी की गाड़ी को खींचना शुरू किया। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। उस जमाने में टीबी (तपेदिक) एक लाइलाज और जानलेवा महामारी थी। श्यामा जी टीबी की चपेट में आ गईं।
दवाइयों के अभाव और लगातार गिरती सेहत के बीच बच्चन जी ने दिन-रात अपनी पत्नी की सेवा की। लेकिन 10 साल के लंबे दर्दनाक संघर्ष के बाद, सन 1936 में श्यामा जी का निधन हो गया। 29 साल की जवानी में जीवनसंगिनी का साया उठ जाने से बच्चन जी अंदर तक टूट गए। वे महीनों तक प्रयागराज की गलियों में पागलों की तरह भटकते रहे।
श्यामा जी की बीमारी के आखिरी दौर में, जब मौत उनके दरवाजे पर खड़ी थी, बच्चन जी ने अपने सीने के दर्द, जीवन के दर्शन और सामाजिक बंधनों के खिलाफ एक ऐसी अमर कृति की रचना की, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया—'मधुशाला' (1935)!
कवि सम्मेलनों में जब वे अपनी खनकती और जादुई आवाज में गाते थे, तो दस-दस हजार की भीड़ रात-रात भर मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनती थी। 'मधुशाला' केवल शराब की बात नहीं थी, वह तो इंसानी एकता और जिंदगी की सच्चाई का सबसे बड़ा फलसफा थी:
एक मगर उनका मदिरालय, एक मगर उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद-मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद-मन्दिर, मेल कराती मधुशाला!"
श्यामा जी के गुजर जाने के बाद उसी अवसाद और अकेलेपन से उनका कालजयी काव्य संग्रह 'निशा निमंत्रण' (1938) और 'एकांत संगीत' (1939) निकला, जिसे पढ़कर आज भी पत्थर दिल इंसान की आँखें भी नम हो जाएं।
🕊️ तेजी सूरी का आगमन: 'नीड़ का निर्माण फिर' और बालक 'अमिताभ'
श्यामा जी के जाने के बाद बच्चन जी का जीवन उजाड़ हो चुका था। लेकिन जिंदगी कभी रुकती नहीं। सन 1941 में, बरेली के एक साहित्यिक कार्यक्रम में उनकी मुलाकात पंजाब के एक कुलीन सिख परिवार की विदुषी कन्या तेजी सूरी से हुई। तेजी जी आधुनिक विचारों की धनी थीं और गायन तथा रंगमंच (थियेटर) से गहराई से जुड़ी हुई थीं।
दोनों के दिलों के तार जुड़े और उसी वर्ष दोनों ने सादगी से विवाह कर लिया। तेजी जी के आने से बच्चन जी के वीरान जीवन में फिर से बहार लौट आई। उन्होंने नई ऊर्जा के साथ लिखा:
नेह का आह्वान फिर-फिर!
वह उठी आंधी कि नभ में छा गया सहसा अंधेरा,
धूलि-धूसर बादलों ने भूमि को इस भांति घेरा...
प्राची से उषा मोहिनी मुस्क्याई,
फिर-फिर, फिर-फिर!"
तेजी बच्चन जी ने हरिवंश राय बच्चन द्वारा हिंदी में अनुवाद किए गए शेक्सपियर के विश्वप्रसिद्ध नाटकों—जैसे मैकबेथ और ओथेलो—में मुख्य महिला पात्रों का जीवंत अभिनय किया और प्रयागराज के मंच पर धूम मचा दी।
तेजी जी से बच्चन परिवार में दो रत्न जन्मे—पहले 11 अक्टूबर 1942 को अमिताभ बच्चन (जिन्हें पहले 'इनकलाब' नाम दिया गया था, बाद में पंत जी के कहने पर 'अमिताभ' हुआ), और 18 मई 1947 को छोटे पुत्र अजिताभ बच्चन। बच्चन जी के संस्कारों और तेजी जी के कला-प्रेम ने ही आगे चलकर अमिताभ बच्चन को सदी का महानायक बनाया!
🎓 कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में डंका: अंग्रेजी में डॉक्टरेट पाने वाले दूसरे भारतीय
हरिवंश राय बच्चन जी केवल हिंदी के लोकप्रिय कवि नहीं थे, बल्कि वे अंग्रेजी भाषा और पाश्चात्य साहित्य के अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रकांड विद्वान थे। सन 1952 में, वे शोध कार्य के लिए इंग्लैंड की विश्वविख्यात कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी (University of Cambridge) गए।
कैम्ब्रिज के सेंट कैथरीन्स कॉलेज में रहकर उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता आयरिश कवि डब्ल्यू. बी. यीट्स (W.B. Yeats) के गूढ़ दर्शन और रहस्यवाद पर अपना शोध प्रबंध लिखा—'W.B. Yeats and Occultism' (1968)।
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में Ph.D. की उपाधि प्राप्त करने वाले वे समूचे भारत के दूसरे विद्वान बने! कैम्ब्रिज के अंग्रेज प्रोफेसर भी उनके ज्ञान, अंग्रेजी उच्चारण और तर्कशीलता के कायल हो गए थे। विदेश में रहकर भी उन्होंने अपनी भारतीय धोती-कुर्ते और मातृभाषा के प्रति निष्ठा को कभी आंच नहीं आने दी।
🇮🇳 विदेश मंत्रालय में नेहरू जी के साथी और राज्यसभा में दस्तक
कैम्ब्रिज से भारत लौटने के बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। नेहरू जी के विशेष आग्रह पर सन 1955 में बच्चन जी दिल्ली आ गए और भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिन्दी विशेषज्ञ (प्रथम विशेष कार्याधिकारी / Officer on Special Duty) नियुक्त किए गए।
उस समय आजाद भारत के सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का बोलबाला था। बच्चन जी ने पूरे एक दशक तक विदेश मंत्रालय में रात-दिन एक करके सरकारी दस्तावेजों, अंतरराष्ट्रीय संधियों और कूटनीतिक शब्दावली का ऐसा प्रामाणिक और सहज हिंदी अनुवाद तैयार किया, जो आज भी भारत सरकार का आधार स्तंभ है।
उनकी अद्वितीय राष्ट्रसेवा और साहित्य-साधना को देखते हुए भारत के राष्ट्रपति द्वारा सन 1966 में उन्हें संसद के उच्च सदन यानी राज्य सभा (राज्यसभा) के मनोनीत सदस्य बनाया गया। संसद में रहते हुए उन्होंने भारतीय भाषाओं और लेखकों के अधिकारों के लिए पुरजोर आवाज उठाई।
📖 हरिवंश राय बच्चन का संपूर्ण साहित्य संसार: कालजयी कृतियां
बच्चन जी की लेखनी इतनी विपुल, विविध और समृद्ध थी कि उन्होंने कविता, अनुवाद, संस्मरण, नाटक और आत्मकथा हर विधा में मील का पत्थर स्थापित किया। उनकी सम्पूर्ण रचनाओं का प्रामाणिक विवरण नीचे दिया जा रहा है:
📜 1. कालजयी कविता संग्रह (24 काव्य संग्रह - प्रामाणिक सूची)
| क्र. सं. | कविता संग्रह का नाम | प्रकाशन वर्ष | साहित्यिक महत्व |
|---|---|---|---|
| 1. | तेरा हार | 1932 | प्रथम प्रकाशित काव्य संकलन |
| 2. | मधुशाला | 1935 | हालावादी युग प्रवर्तक अमर कृति |
| 3. | मधुबाला | 1936 | प्रेम और सौंदर्य का आध्यात्मिक गीत |
| 4. | मधुकलश | 1937 | 'मधु' त्रयी का पूर्ण विस्तार |
| 5. | निशा निमंत्रण | 1938 | श्यामा वियोग का मर्मस्पर्शी विलाप |
| 6. | एकांत संगीत | 1939 | एकाकी मन की गहन पीड़ा |
| 7. | आकुल अंतर | 1943 | द्वितीय विश्वयुद्ध व मानसिक द्वंद्व |
| 8. | सतरंगिनी | 1945 | जीवन के सतरंगी उल्लास का गान |
| 9. | हलाहल | 1946 | सामाजिक विषमताओं पर तीखा प्रहार |
| 10. | बंगाल का काव्य | 1946 | 1943 के बंगाल अकाल का दर्द |
| 11. | खादी के फूल | 1948 | गांधीजी को काव्यांजलि (सुमित्रानंदन पंत संग) |
| 12. | सूत की माला | 1948 | खादी व स्वाधीनता चेतना के गीत |
| 13. | मिलन यामिनी | 1950 | दांपत्य सुख व प्रेम का संगीत |
| 14. | प्रणय पत्रिका | 1955 | गंभीर प्रेम और निष्ठा की पाती |
| 15. | धार के इधर उधर | 1957 | प्रवाहमान जीवन का दार्शनिक चित्र |
| 16. | आरती और अंगारे | 1958 | भक्ति, आस्था व सामाजिक आक्रोश |
| 17. | बुद्ध और नाचघर | 1958 | आधुनिक भोगवाद बनाम शांति की खोज |
| 18. | त्रिभंगिमा | 1961 | तीन भंगिमाओं का काव्यात्मक नृत्य |
| 19. | चार खेमे चौंसठ खूंटे | 1962 | लोक-जीवन व लोक-गीतों का रंग |
| 20. | दो चट्टानें | 1965 | साहित्य अकादमी पुरस्कृत महाकाव्य |
| 21. | बहुत दिन बीते | 1967 | स्मृतियों और अतीत की झांकी |
| 22. | कटती प्रतिमाओं की आवाज़ | 1968 | बदलते मूल्यों और टूटन का स्वर |
| 23. | उभरते प्रतिमानों के रूप | 1969 | नए युग की चेतना का स्वागत |
| 24. | जाल समेटा | 1973 | जीवन के अंतिम पड़ाव का विहंगावलोकन |
📚 2. विविध गद्य, अनुवाद, नाटक एवं संस्मरण (29 महत्वपूर्ण ग्रंथ)
| क्र. सं. | रचना / पुस्तक का नाम | प्रकाशन वर्ष | विधा / विशेष टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| 1. | बचपन के साथ क्षण भर | 1934 | आरंभिक संस्मरण व आलेख |
| 2. | खय्याम की मधुशाला | 1938 | उमर खय्याम की रुबाइयों का पद्यानुवाद |
| 3. | सोपान | 1953 | दार्शनिक चिंतन व साहित्यिक आलेख |
| 4. | मैकबेथ | 1957 | शेक्सपियर के नाटक का अमर हिंदी अनुवाद |
| 5. | जनगीता | 1958 | श्रीमद्भगवद्गीता का लोक-छंद में अनुवाद |
| 6. | ओथेलो | 1959 | शेक्सपियर के नाटक का हिंदी रूपांतरण |
| 7. | उमर खय्याम की रुबाइयाँ | 1959 | फारसी रुबाइयों का प्रामाणिक भावानुवाद |
| 8. | कवियों के सौम्य संत: पंत | 1960 | सुमित्रानंदन पंत पर आलोचनात्मक ग्रंथ |
| 9. | आज के लोकप्रिय हिन्दी कवि: सुमित्रानंदन पंत | 1960 | संपादन एवं मूल्यांकन |
| 10. | आधुनिक कवि: ७ | 1961 | समकालीन कवियों का संकलन |
| 11. | नेहरू: राजनैतिक जीवनचित्र | 1961 | जवाहरलाल नेहरू का जीवन-वृत्त |
| 12. | नये पुराने झरोखे | 1962 | साहित्यिक निबंध व रेखाचित्र |
| 13. | अभिनव सोपान | 1964 | चिंतन और समीक्षा |
| 14. | चौसठ रूसी कविताएँ | 1964 | रूसी काव्य का हिंदी अनुवाद |
| 15. | नागर गीत | 1966 | नागरी संस्कृति के प्रतिनिधि गीत |
| 16. | बचपन के लोकप्रिय गीत | 1967 | बाल-साहित्य व लोकप्रिय गीत |
| 17. | डब्लू बी यीट्स एंड औकल्टिज़्म (W.B. Yeats and Occultism) | 1968 | कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय का अंग्रेजी शोध प्रबंध |
| 18. | मरकट द्वीप का स्वर | 1968 | आयरलैंड यात्रा संस्मरण |
| 19. | हैमलेट | 1969 | शेक्सपियर के त्रासद नाटक का अनुवाद |
| 20. | भाषा अपनी भाव पराये | 1970 | भाषा विज्ञान व अनुवाद का सिद्धांत |
| 21. | पंत के सौ पत्र | 1970 | सुमित्रानंदन पंत के दुर्लभ पत्रों का संकलन |
| 22. | प्रवास की डायरी | 1971 | इंग्लैंड व विदेश प्रवास के अंतरंग संस्मरण |
| 23. | किंग लियर | 1972 | शेक्सपियर के महान नाटक का अनुवाद |
| 24. | टूटी छूटी कड़ियाँ | 1973 | साहित्यिक कड़ियों का समाकलन |
| 25. | मेरी कविताई की आधी सदी | 1981 | 50 वर्षों की काव्य-यात्रा का सार |
| 26. | सोहं हंस | 1981 | आध्यात्मिक काव्य व उपनिषद चिंतन |
| 27. | आठवें दशक की प्रतिनिधी श्रेष्ठ कवितायें | 1982 | समकालीन हिंदी कविता का संपादन |
| 28. | मेरी श्रेष्ठ कविताएँ | 1984 | कवि द्वारा स्वयं चुनी हुई प्रतिनिधि रचनाएं |
| 29. | आ रही रवि की सवारी | -- | कालजयी बाल व प्रकृति कविता |
🏆 आत्मकथा के चार खंड: विश्व साहित्य का अनमोल दस्तावेज
यदि दुनिया के किसी साहित्यकार ने बिना किसी लाग-लपेट, बिना किसी बनावट और 100% निर्भीक ईमानदारी के साथ अपने जीवन को पन्नों पर उतारा है, तो वे डॉ. हरिवंश राय बच्चन हैं। उनकी आत्मकथा केवल एक व्यक्ति का इतिहास नहीं, बल्कि 20वीं सदी के भारत का सजीव सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक दस्तावेज है।
| खंड / भाग | पुस्तक का शीर्षक | प्रकाशन वर्ष | वर्णित जीवन-कालखंड एवं विषयवस्तु |
|---|---|---|---|
| पहला खंड | क्या भूलूँ क्या याद करूँ | 1969 | अमोड़ा से बाबू पट्टी पुरखों का इतिहास, बचपन, श्यामा जी से विवाह व उनकी दुखद मृत्यु। |
| दूसरा खंड | नीड़ का निर्माण फिर | 1970 | तेजी जी से परिचय व विवाह, अमिताभ-अजिताभ का जन्म, इलाहाबाद में पारिवारिक पुनर्जीवन। |
| तीसरा खंड | बसेरे से दूर | 1977 | कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में अध्ययन, इंग्लैंड के अनुभव और विदेश की चुनौतियां। |
| चौथा खंड | दशद्वार से सोपान तक | 1985 | दिल्ली विदेश मंत्रालय, 10 क्लाइव रोड से 'सोपान', राज्यसभा और मुंबई के दिन। |
| समग्र संकलन | बच्चन रचनावली (9 खंड) | 1983 | अजीत कुमार द्वारा संपादित बच्चन जी के सम्पूर्ण वाङ्मय का 9 वृहद खंडों में ऐतिहासिक प्रकाशन। |
🎖️ राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान: भारत का गौरव
डॉ. बच्चन का कद किसी एक देश या भाषा तक सीमित नहीं था। उन्हें देश-विदेश में सर्वोच्च सम्मानों से नवाजा गया:
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1968): उनके महान काव्य संग्रह 'दो चट्टानें' के लिए हिंदी साहित्य का सर्वोच्च सम्मान।
- सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार (1968): भारत-रूस मैत्री और अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक योगदान के लिए।
- कमल पुरस्कार / Lotus Prize (1968): एफ्रो-एशियाई लेखक सम्मेलन (Afro-Asian Writers Conference) द्वारा विश्व साहित्य के शीर्ष सम्मान से विभूषित।
- पद्म भूषण (1976): साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में युगांतरकारी सेवाओं हेतु भारत सरकार द्वारा देश का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान।
- सरस्वती सम्मान (1991): के.के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा आत्मकथा के चार खंडों के लिए दिया गया देश का प्रथम ऐतिहासिक सरस्वती सम्मान!
🕊️ जीवन का अंतिम पड़ाव और अमर महाप्रयाण
अपने जीवन के उत्तरार्ध में डॉ. हरिवंश राय बच्चन अपने दोनों बेटों—अमिताभ और अजिताभ—तथा पत्नी तेजी बच्चन के साथ मुंबई के जुहू स्थित बंगले 'प्रतीक्षा' में निवास करने लगे थे। बढ़ती उम्र और सांस की बीमारी के बावजूद उनकी चेतना सदैव प्रखर रही। जब भी वे अपने पोते-पोतियों (श्वेता, अभिषेक) को देखते, उनके चेहरे पर वही पुरानी सोंधी मुस्कान खिल उठती थी।
आखिरकार 18 जनवरी 2003 को 95 वर्ष की आयु में मुम्बई (मुंबई) में निवास करते हुए इस महान युगदृष्टा, साहित्य के सूर्य ने अपनी अंतिम सांस ली। उनके निधन पर पूरे देश में राष्ट्रीय शोक छा गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि देते हुए कहा था—"हिंदी साहित्य ने आज अपनी सबसे बुलन्द और लोकप्रिय आवाज को खो दिया है।" भले ही उनका नश्वर शरीर चला गया, लेकिन उनकी पंक्तियां आज भी करोड़ों दिलों में धड़क रही हैं।
डॉ. हरिवंश राय बच्चन के पुश्तैनी गाँव बाबू पट्टी (प्रतापगढ़), पुराने पारिवारिक परिसर और स्थानीय ग्रामीणों के दुर्लभ साक्षात्कारों पर आधारित यह विशेष वीडियो अवश्य देखें:
प्रयागराज से मात्र 55 किमी और प्रतापगढ़ शहर से 18 किमी की दूरी पर स्थित बाबू पट्टी गाँव का सटीक गूगल मैप:
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
डॉ. हरिवंश राय बच्चन जी का जन्म 27 नवम्बर 1907 को प्रयागराज (इलाहाबाद) के मोहल्ला चक में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। उनका पुश्तैनी गाँव प्रतापगढ़ जिले का बाबू पट्टी है।
अवधी और पूर्वांचल में छोटे, लाड़ले बालक को प्यार से 'बच्चा' या 'बच्चन' कहा जाता है। उन्होंने इसी घरेलू नाम को अपना अमर उपनाम बना लिया।
1935 में रचित 'मधुशाला' का गहरा दार्शनिक संदेश है कि मदिरालय (संसार) में सब बराबर हैं। यह मंदिर-मस्जिद के नाम पर लड़ने वालों को आपसी भाईचारे और इंसानियत की राह दिखाती है।
उन्हें 1968 में साहित्य अकादमी पुरस्कार ('दो चट्टानें'), 1968 में सोवियत लैंड नेहरू व लोटस प्राइज, 1976 में पद्म भूषण और 1991 में प्रथम सरस्वती सम्मान से सम्मानित किया गया।
उनकी दूसरी पत्नी तेजी बच्चन थीं। उनके दो पुत्र हैं—सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और उद्योगपति अजिताभ बच्चन। अभिनेता अभिषेक बच्चन उनके पौत्र हैं।
डॉ. हरिवंश राय बच्चन का जीवन सिखाता है कि कलम की ताकत तोपों और महलों से कहीं बड़ी होती है। जिस परिवार के पुरखों ने बाबू पट्टी के खेतों में हल जोता, उसी परिवार के बेटे ने दुनिया भर में भारत का नाम रौशन किया।
उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग एवं प्रतापगढ़-प्रयागराज जिला प्रशासन के लिए अंतरराष्ट्रीय विकास मॉडल:
जैसे ब्रिटेन में शेक्सपियर के जन्मस्थल 'स्ट्रैटफ़ोर्ड' को और रूस में टॉल्स्टॉय के 'यास्नाया पोलियाना' को ग्लोबल टूरिज्म हब बनाया गया, ठीक उसी प्रकार:
- बाबू पट्टी (रानीगंज) में 'हरिवंश राय बच्चन अंतरराष्ट्रीय डिजिटल लाइब्रेरी एवं संग्रहालय' की स्थापना की जाए।
- प्रयागराज के मोहल्ला चक व क्लाइव रोड (10 द्वार) को बाबू पट्टी से जोड़कर एक विशेष 'बच्चन लिटरेरी ट्रेल' (साहित्यिक पर्यटन सर्किट) घोषित किया जाए।
- छायावाद और हालावादी कविता पर शोध करने वाले देशी-विदेशी शोधार्थियों के लिए बाबू पट्टी में फेलोशिप व शोध केंद्र का निर्माण हो।
मिट्टी से उठकर सितारों को छू लेने की यह दास्तान आने वाली हर उस पीढ़ी को हिम्मत देती रहेगी जो अभावों में भी अपने सपनों को सच करने का माद्दा रखती है!
यह आलेख पूर्णतः प्रमाणित प्राथमिक एवं द्वितीयक ऐतिहासिक स्रोतों पर आधारित है:
- डॉ. हरिवंश राय बच्चन — 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ' (1969), 'नीड़ का निर्माण फिर' (1970), 'बसेरे से दूर' (1977), 'दशद्वार से सोपान तक' (1985), राजपाल एंड संस, दिल्ली।
- अजीत कुमार (संपादक) — 'बच्चन रचनावली' (समग्र 9 खंड, 1983), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
- कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय अभिलेखागार (University of Cambridge Archives) — Ph.D. Dissertation: 'W.B. Yeats and Occultism' (1954/1968)।
- साहित्य अकादमी एवं भारत सरकार राजपत्र — साहित्य अकादमी पुरस्कार (1968), पद्म भूषण अलंकरण अभिलेख (1976)।
- के.के. बिड़ला फाउंडेशन अभिलेख — प्रथम सरस्वती सम्मान प्रशस्ति पत्र (1991)।
- प्रतापगढ़ HUB (pratapgarhup.in) — पी.के. सिंह द्वारा बाबू पट्टी गाँव का जमीनी शोध, राजस्व अभिलेख एवं डाक्यूमेंट्री साक्ष्य।