बेल्हा के पारंपरिक अवधी लोकगीत और अमर कहावतें: सोहर, कजरी, परिछन से लेकर देहाती मुहावरों तक का पूरा खजाना
जन्म की पूर्व पीठिका: जब अंगना में गूंजता है अनवइया गीत
अवध के देहात में जब किसी नई-नवेली बहू के पाँव भारी होते हैं, तो पूरे घर-कुटुंब में एक अनजानी सी खुशी की लहर दौड़ जाती है। सावन का महीना आता है, मायके से भाई अपनी बहन को विदा कराने (लिवाने) आता है। लेकिन होने वाली माँ अपने होने वाले बच्चे और ससुराल के आंगन को छोड़कर मायके जाने से कतराती है। वह अपनी ननद से प्यार भरी मनुहार करती है:
कवि राजमूर्ति सिंह 'सौरभ' जी ने इस नाजुक और ममता भरी घड़ी को कितने सहज दोहे में ढाला है:
सपनों में आने लगे, पीपर, हल्दी, सोंठ।।"
घर की बुजुर्ग औरतें समझ जाती हैं कि अब रसोई में सोंठ, पीपर और अजवाइन के लड्डू बनने के दिन करीब आ गए हैं।
सोहर: ललनवाँ का जन्म और राम-कृष्ण का अवतरण
जब घर में नन्हे बच्चे की किलकारी गूंजती है, तो अवध का कोई भी गाँव साधारण गाँव नहीं रह जाता; वह सीधे अयोध्या का राजमहल या नंदबाबा का गोकुल बन जाता है। ढोलक की थाप पर औरतें सोहर गाना शुरू करती हैं। सोहर केवल बच्चे के पैदा होने पर ही नहीं गाया जाता, बल्कि बेल्हा में जब किसी किसान की नई बोरिंग से गंगा जैसा मीठा पानी निकलता है या घर में नया ट्रैक्टर आता है, तब भी खुशी में सोहर ही गूंजता है!
सोहर के बोल सिर्फ खुशी नहीं बांटते, बल्कि माँ बनने वाली औरत के उस पुराने डर और संशय को भी मिटाते हैं जो उसने समाज के तानों के बीच झेला था:
जच्चा (माँ) का इस दिन मानो दूसरा जन्म होता है। कल तक जो किसी की बेटी, बहू या भाभी थी, आज वह 'माँ' बनकर पूरे कुल की धुरी बन जाती है।
लोरी: मोर भइया सोना कली और लाल दुलहिन का सपना
गाँव की शाम ढलते ही जब थकी-हारी माँ अपने नन्हे बच्चे को सुलाने खटिया पर बैठती है, तो उसकी जुबान पर लोरी तैरने लगती है। लोरी बड़ों को भी एक पल में बच्चा बना देती है। इसमें बच्चे को दुलारने के साथ-साथ उसके बड़े होने और ब्याह रचाने का मीठा सपना भी बुना जाता है:
नन्हा मुन्ना इन मीठे बोलों को सुनते-सुनते माँ की गोदी में कब सो जाता है, पता ही नहीं चलता।
मुण्डन के गीत: ननिहाल का रोचन और सोने का छुरवा
जब बालक थोड़ा बड़ा होता है, तो उसके पहले बाल (मुण्डन) उतारने की तैयारी होती है। अवध की परंपरा में कोई भी बड़ा उत्सव ननिहाल के बिना पूरा नहीं हो सकता। बच्चे की माँ अपने मायके संदेश भिजवाती है और सासू माँ से मिन्नत करती है:
भले ही गरीब से गरीब घर हो और बाल एक रुपये के ब्लेड से काटे जा रहे हों, लेकिन गीत में हमेशा यही गाया जाता है कि—
यह इस बात की गवाही है कि हमारा भारत कभी सचमुच 'सोने की चिड़िया' था और हमारे गीतों ने उस वैभव को आज तक जिंदा रखा है।
विद्यारंभ गीत: खेत की मेड़ पर तोते और गिनती का पाठ
आजकल के बच्चे स्कूल में एबीसीडी और गिनती रटते हैं, लेकिन हमारे अवध के देहात में प्राथमिक पढ़ाई भी खेल-खेल में लोकगीतों से कराई जाती थी। बच्चे को प्रकृति और पक्षियों से जोड़कर गिनती सिखाई जाती थी:
नीम के पेड़, खेत की मेड़ और सुग्गा (तोता) देखकर बच्चा हंसते-हंसते जोड़ और गुणा सीख जाता था। यही हमारे लोक परिवेश की सबसे सहज पाठशाला थी।
उपनयन / जनेऊ: बरुआ का ब्रह्मचर्य और जग-कल्याण की भीख
बालक जब थोड़ा बड़ा होता है, तो उसे संस्कार और सदाचार की दीक्षा देने के लिए जनेऊ (उपनयन) कराया जाता है। जनेऊ के गीतों में बालक को समझाया जाता है कि अब उसे अहंकार छोड़कर विनम्रता से विद्या अर्जित करनी है:
बरुआ जब काठ की खड़ाऊं पहनकर अपनी माँ और बुजुर्गों के पैर छूता है और झोली फैलाकर भिक्षा मांगता है, तो पूरा माहौल त्याग और सेवा भावना से सराबोर हो जाता है।
विवाह की शुरुआत: मचिया पर बैठीं रानी कौशिल्या और तिलक-हल्दी
अवध में विवाह कोई बंद कमरे का निजी मामला नहीं होता। यहाँ सगाई से लेकर विदाई तक हर कदम की घोषणा लोकगीतों के जरिए सरेआम पूरे गाँव के सामने होती है। चाहे लड़का किसी का भी हो, गीतों में उसकी माँ रानी कौशिल्या और लड़का राजा राम का राजकुमार बन जाता है:
गीतों में वर और वधू दोनों पक्षों के गाँव, ननिहाल और कुल का नाम ले-लेकर गाया जाता है ताकि पूरे जवार को पता चल जाए कि संबंध किन कुलीन परिवारों के बीच जुड़ रहा है।
बारात की रवानगी: संग-संगतिया और दुलरू दमाद की अगवानी
जब दूल्हा बारात लेकर निकलने लगता है, तो गाँव के चौपाल पर बारात के गीत गूंजते हैं। कोई बिना पूछे भी जान सकता है कि किसकी बारात किसके द्वारे जा रही है:
उधर कन्या के दरवाजे पर जब बारात पहुँचती है, तो समधिनें और कन्या पक्ष की औरतें उल्लास से गा उठती हैं:
और दूसरी तरफ मंडप में बैठी बिटिया के मन में विरह की पहली टीस उठती है: "हटिया सेंधुरवा मँहग भये बाबा चुनरी भई अनमोल। वहिरे सेंधुरवा के कारन बाबा, छोड़बैं मैं देशवा तोहार।"
मण्डप में दूल्हे की सीख: जरा झुक के चलो दूल्हे राजा!
मंडप में दूल्हे का प्रवेश होते ही हमारे अवध की औरतें उसे जीवन भर का सबसे बड़ा सबक बहुत मीठी और चुलबुली चुटकी लेकर सिखा देती हैं। दूल्हे को समझाया जाता है कि ससुराल में अकड़ कर नहीं, बल्कि झुककर और मर्यादा से चलना चाहिए:
और जब कन्या मंडप में कदम रखती है, तो उसे धीरे-धीरे कदम बढ़ाने की सीख मिलती है: "धीरे-धीरे डाँकिऊ दुआरी हो अभी बेटी बाटू कुआंरी हो।" यह गीत हर किसी की आंखें नम कर देता है।
कन्यादान का महाभाव: काँपै लोटवा अउर काँपै थारी हो
कन्यादान विवाह का सबसे कारुणिक और पवित्र पल होता है। पिता जब अपनी जान से प्यारी बेटी का हाथ वर के हाथ में सौंपता है, तो उसका पूरा शरीर कांप उठता है। लोकगीत इस दर्द को सीधे कलेजे में उतार देते हैं:
गंगा-जमुना के जल से भरे कलश से जब पिता और घर के बुजुर्ग वर-वधू के पैर पखारते हैं, तो ऐसा लगता है मानो पूरे संसार का धर्म उस मंडप में सिमट आया हो:
सात फेरे व सिंदूरदान: एक चुटकी सेंधुरा के कारण भई पराई
फेरों के समय मंडप का माहौल भावुकता के चरम पर पहुँच जाता है। लड़की जब पहली भांवर (फेरा) लेती है, तब तक वह अपने पिता की दुलारी बेटी रहती है, लेकिन सातवें फेरे तक पहुँचते-पहुँचते उसका गोत्र और कुल बदल जाता है:
इसी बीच जब ससुराल पक्ष के ससुर और जेठ मंडप में आते हैं, तो लोकगीतों से मर्यादा की लक्ष्मण रेखा भी खींच दी जाती है: "संभल के बैठ जा बेटी ससुर मंडप में आते हैं" और जेठ जी के लिए मीठी चेतावनी—"छू लो छू लो जेठ जी आज, आज से छूना मना है!"
परिछन का गूढ़ दर्शन: कलश, लोढ़ा, मूसल और मथानी की सीख
विवाह में 'परिछन' की रस्म सबसे अद्भुत और अर्थपूर्ण होती है। यह कोई साधारण शगुन नहीं, बल्कि नए जोड़े को जिंदगी जीने की पूरी ट्रेनिंग (प्रशिक्षण) है। सास और भाभी दूल्हे के हाथ में एक-एक घरेलू चीज थमाती हैं और गीत गाती हैं:
1. कलश: जैसे कलश जल को धारण करता है, वैसे ही अपने मन में पात्रता और गंभीरता रखो।
2. लोढ़ा: जैसे सिल-लोढ़े पर धीरे-धीरे मसाला पिसकर स्वादिष्ट बनता है, वैसे ही जीवन में धैर्य से काम लो।
3. मूसल: जैसे मूसल के क्रमिक प्रहार से ओखली का धान साफ होता है, वैसे ही लगातार प्रयास से कठिनाइयों को दूर करो।
4. खइलर (मथानी): दही को मथकर मक्खन निकालने के लिए निरंतर मथना पड़ता है; सफलता भी निरंतर मेहनत से ही मिलती है।
5. सूप: जैसे सूप कूड़े-करकट को उड़ाकर अच्छे अनाज को रख लेता है, वैसे ही समाज से गुण ग्रहण करो और बुराइयों को उड़ा दो।
6. टिकरी: घर-परिवार को एक सूत्र में बांधकर रखने का प्रतीक।
7. आँचर: यह इस बात का भरोसा है कि गृहस्थी के संघर्ष में तुम अकेले नहीं हो, बड़ों का साया और आशीर्वाद सदा तुम्हारे सिर पर है।
विवाह की मीठी गारी: दुई जन गोर काहे दुई जन कारी?
विवाह में अगर केवल रोना-धोना और रस्में हों, तो माहौल बहुत भारी हो जाता है। इस भारीपन को दूर करने और दोनों परिवारों को हंसी-मजाक में घोलने के लिए 'गारी' गाई जाती है। यह कोई गाली-गलौज नहीं, बल्कि जनकपुर की नारियों का श्रीराम और लक्ष्मण के प्रति अगाध प्रेम भरा हास्य-विनोद है:
जब समधी जी पत्तल पर पूड़ी-सब्जी खा रहे होते हैं और घर की महिलाएं पर्दे की आड़ से चुटीली गारियां गाती हैं, तो समधी भी मुस्कुराए बिना नहीं रह पाते।
विदाई की बेला: काहे को भेज्या बिदेस और करुणा का समंदर
डोली उठने का समय जब आता है, तो पत्थर दिल इंसान की भी आंखें बह निकलती हैं। जिस बेटी को उंगली पकड़कर चलना सिखाया, आज वही अपनी देहरी लांघकर दूसरे घर जा रही है। अमीर खुसरो से लेकर अवध के देहाती लोकगीत इस विरह को अमर कर देते हैं:
गाँव की पूरी अमराई, कुआं और सहेलियां रो पड़ती हैं। विदाई का यह दर्द अवध की माटी का सबसे कोमल कोना है।
चैता और कजरी: साइकिल से मेहंदी और खोई हुई झुलनी
विवाह के बाद गृहस्थी में सुख और विरह दोनों आते हैं। जब चैत का महीना आता है और परदेसी पिया की याद सताती है, तो 'चैता' गाया जाता है:
और जब सावन में बदरा घिर आते हैं, तो नीम की डाल पर झूले पड़ते हैं और शुरू होती है 'कजरी'। इसमें ननद-भौजाई की मनुहार और पिया से मीठी फरमाइश होती है:
विरहा और आल्हा: वीर रस की हुंकार और दांपत्य विरह
अवध के पुरुषों की आवाज़ का जादू देखना हो तो 'विरहा' और 'आल्हा' सुनिए। विरहा खुले गले से ऊंचे सुरों में गाया जाता है, जिसमें दांपत्य प्रेम और विरह की कथाएं होती हैं। राम अधार, राम कैलाश, बालेश्वर और हैदर अली जैसे फनकारों ने इसे देश भर में गूंजाया।
वहीं भादों की अंधेरी रातों में जब झमाझम बारिश होती थी, तो चौपाल पर जगनिक रचित 'परमाल रासो' का आल्हा खण्ड गूंजता था। ढोलक की धमक और मजीरे की झनकार पर जब आल्हा गायक आल्हा-ऊदल की 52 लड़ाइयों का वर्णन करता था, तो बूढ़ों की बाजुएं भी फड़कने लगती थीं। हमारे प्रतापगढ़ के ही श्री गया प्रसाद पाण्डेय (मवइया) और जौनपुर के फौजदार सिंह इस विधा के अमर हस्ताक्षर रहे हैं।
फागुन की होरी: चौताल, डेढ़ ताल और मोहन की होली
फागुन का महीना लगते ही गाँव के मर्दों की टोली झांझ-मजीरा और नगाड़ा लेकर निकल पड़ती थी। डेढ़ ताल, चौताल, चैता और बेलवरिया धुनों में गाई जाने वाली होरी में रंग, अबीर और मर्यादापूर्ण छेड़छाड़ का ऐसा रस बरसता था कि सारा मन मैल धुल जाता था:
आज डीजे के कानफोड़ू शोर ने हमारी इस पारंपरिक चौताल होरी को थोड़ा पीछे धकेल दिया है, लेकिन जब भी गाँव में पुराने लोग ढोलक लेकर बैठते हैं, तो फागुन का असली नशा आज भी छा जाता है।
सरवन और धोबी गीत: स्वामी रैदास की परंपरा और घांघरे की थाप
सरवन विधा: यह अद्भुत विधा संत स्वामी रैदास जी की परंपरा से उपजी मानी जाती है। इसमें तुरंत कविता रचकर (आशुकविता) समाज की विसंगतियों और पाखंड पर करारी चोट की जाती है। हर तुक के अंत में 'जय गंगा' बोला जाता है:
वहीं धोबी गीत में घेरदार घांघरा पहनकर नर्तक बांसुरी और मृदंग की थाप पर आल्हा की तर्ज पर वीर और सामाजिक प्रसंग गाते हुए थिरकते थे, जिसे देखकर पूरा मेला झूम उठता था।
जँतसार व श्रम गीत: जांत पर पिसती माँ का दर्द और रोपनी-कटउनी
बिजली की आटा चक्की आने से पहले, गाँव की औरतें भोर के चार बजे उठकर भारी पत्थर की चक्की (जाँत) पर गेहूं और चना पीसती थीं। उस सन्नाटे में चक्की की घरघराहट के साथ जो दर्द फूटता था, उसे 'जँतसार' कहते हैं। ससुराल के तानों और मायके की याद को महिलाएं जांत पर पीसकर हल्का कर लेती थीं:
इसी तरह खेतों में धान रोपने के समय 'रोपनी', घास छीलते समय 'निरवही' और फसल काटते समय 'कटउनी' के गीत गाए जाते थे। ये गीत केवल मन बहलाव नहीं थे, बल्कि कड़ी धूप और कीचड़ में पसीना बहाते किसानों की थकान मिटाने की संजीवनी बूटी थे।
कारन गीत: जीवन का महाप्रयाण और विदाई का सधा हुआ विलाप
जिंदगी के तमाम गोरखधंधों में उलझा इंसान जब एक दिन अपनी देह छोड़कर अनंत यात्रा पर निकल पड़ता है, तो अवध के आँगन में 'कारन गीत' गूंजते हैं। जिसने जीवन में कभी कोई तान नहीं छेड़ी, वह अनपढ़ देहाती औरत भी जब अपने स्वजन के जाने पर रोती है, तो उसका विलाप अपने आप एक सधे हुए छंदबद्ध गीत में बदल जाता है:
सचमुच, अवध की संस्कृति में गीत केवल मनोरंजन नहीं हैं; वे जन्म से लेकर मरण तक इंसान के सुख-दुख के सबसे सच्चे और वफादार साथी हैं।
स्वास्थ्य और मौसम के नियम: क्वांर करैला और भोजन के बाद की करवट
हमारे पुरखों को किसी बड़े डॉक्टर की जरूरत नहीं थी, उन्होंने मौसम और खान-पान के अचूक नियम एक ही दोहे में बांध दिए थे:
कौड़ी जाय न गाँठ की रोग विसाह न जाय।।'
देहाती सीख: क्वार (आश्विन) के महीने में करेला खाने से पित्त बिगड़ता है, चैत में पुराना गुड़ गर्मी करता है, और सावन की झड़ी में हरी पत्तियों पर कीड़े-मकोड़े अधिक होने से साग पेट खराब करता है। जो इन तीनों महीनों में परहेज रखता है, उसकी जेब का एक पैसा भी दवा-दारू में खर्च नहीं होता!
इसी तरह भोजन के बाद पाचन का सटीक देहाती नियम देखिए:
दस कै दुगुना दायें-बायें। तब सुख होय अन्न के खाये।।'
देहाती सीख: खाना खाने के बाद पेशाब करें, फिर 10 सांस तक सीधे चित्त लेटें। इसके बाद 20 सांस दाईं करवट और फिर बाईं करवट लेटें। इससे खाया-पिया अन्न अमृत की तरह पच जाता है और शरीर निरोगी रहता है।
अयोग्य से उम्मीद और उपदेश: अन्हरे के आगे रोवई आपन दीदा खोवई
गाँव की चौपाल पर जब कोई नासमझ इंसान के सामने अपनी पीड़ा गाता है, तो बुजुर्ग तुरंत यह कहावत उछाल देते हैं:
देहाती सीख: अंधे के सामने रोने से न तो उसे आंसू दिखेंगे और न ही वह दया करेगा; उल्टा तुम्हारा ही रो-रोकर आंख खराब होगा। यानी जो व्यक्ति भावहीन या अयोग्य है, उसके सामने दुखड़ा रोना अपना ही नुकसान करना है।
और जो लोग दूसरों को ज्ञान बांटते हैं लेकिन खुद के घर का हाल बुरा होता है, उनके लिए कहा गया है:
देहाती सीख: दूसरों की ओखली का मुहूर्त और शगुन बताते फिर रहे हैं, और अपनी ओखली घर में कुत्ते नोच रहे हैं! यानी खुद के घर की बदहाली छोड़कर दुनिया को उपदेश देना।
देहाती सीख: जो दूसरों का बुरा करने के लिए गड्ढा खोदता है, समय का पहिया ऐसा घूमता है कि वह खुद उसी में औंधे मुंह गिरता है।
खोखला बड़प्पन और दिखावे की असलियत: उखड़ै क कुछ नायँ, नाव बरियार सिंह
समाज में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके पास योग्यता या ताकत तो रत्ती भर नहीं होती, लेकिन नाम और हवाबाजी इतनी बड़ी होती है कि पूछिए मत। ऐसे लोगों की हवा निकालने के लिए अवध में यह कहावत चलती है:
देहाती सीख: उखाड़ने के लिए तो इनसे एक तिनका भी नहीं उखड़ता, लेकिन नाम रख लिया है 'बरियार सिंह' (महाबली)! इसी तरह जब बाहरी दिखावे के पीछे की फटेहाली को उघाड़ना हो, तो कहते हैं:
देहाती सीख: ऊपर की उजली-सफेद धोती देखकर धोखे में मत पड़ जाना, उसके नीचे फटी हुई चिथड़ी (लुगरी) छिपी हुई है। यानी बाहर से रईसी का ढोंग और अंदर से कंगाली।
देहाती सीख: नाम तो रखा है 'सिन्नी प्रसाद' (प्रसाद जैसा मीठा), लेकिन व्यवहार में रूखेपन और कड़वाहट के सिवा कुछ नहीं।
संस्कार और कुल की पहचान: जेइसेन माई ओइसेन धिया
गाँव-घर में जब कोई रिश्ता तय करने जाता है या किसी के आचरण को परखता है, तो बुजुर्ग बीज और पेड़ का उदाहरण देकर कहते हैं:
देहाती सीख: जैसी ककड़ी होगी, वैसा ही उसका बीज निकलेगा; और जैसी माँ के संस्कार होंगे, वैसी ही उसकी बेटी का स्वभाव बनेगा। परवरिश का असर कभी छिप नहीं सकता।
और जबान की कीमत पर अवध की सबसे सख्त और खरी कहावत देखिए:
देहाती सीख: जो इंसान अपने दिए हुए वचन और बात से पलट जाए, वह समाज में किसी भी सम्मान के लायक नहीं है। प्राण जाएं पर वचन न जाई का यह ठेठ देहाती रूप है।
स्वार्थ और मतलबी दुनिया: तोहार नऊज बिचाय, हमइ घेलवा द्या
आज की दुनिया में हर कोई अपना उल्लू सीधा करने में लगा रहता है। दूसरे के नुकसान से किसी को कोई लेना-देना नहीं होता। इस मतलबी सोच पर अवध की यह कहावत सीधे तीर की तरह लगती है:
देहाती सीख: तुम्हारा चाहे मूल सामान बिके या न बिके (चाहे तुम्हारा सत्यानाश हो जाए), लेकिन हमें तो ऊपर से मुफ्त का 'घेलुआ' (कमीशन या छूट) जरूर चाहिए! यानी अपने स्वार्थ के आगे दूसरे की बर्बादी की भी परवाह न करना।
और जब कमजोर व्यक्ति पर पूरा गाँव रौब झाड़ने लगता है, तो दर्द छलक पड़ता है:
देहाती सीख: जो सीधा-सादा और कमजोर (निबल) होता है, उसकी बीवी पर पूरे गाँव के लोग भाभी समझकर हंसी-मजाक और धौंस जमाने लगते हैं। कमजोर का शोषण समाज की पुरानी बुराई रही है।
पारिवारिक कलह व झूठी हमदर्दी: बड़ मयानिन ककिया सास, त कंडा लेके पोंछईं आँसु
संयुक्त परिवारों में जब अंदर ही अंदर ईर्ष्या की आग सुलगती है और ऊपर से बनावटी आंसू बहाए जाते हैं, तो गाँव की औरतें यह कहावत कहकर पोल खोल देती हैं:
देहाती सीख: चाची-सास बड़ी दयावान और मर्मस्पर्शी बनकर आईं, लेकिन बहू के आंसू पोंछने के लिए हाथ में गोबर का कंडा (उपला) लेकर आ गईं! यानी हमदर्दी का ऐसा घिनौना नाटक जिससे घाव और ज्यादा छिल जाए।
देवरानी और जेठानी की अमर कलह पर देखिए:
देहाती सीख: दोनों में से कोई झुकने को तैयार नहीं हुई, आखिरकार घर का मुखिया (पति) ही दोनों के झगड़े में बर्बाद होकर हार मान गया।
देहाती सीख: खानदान का नाम तो इतना बड़ा कि पूरे जवार में ढोल बजता है, और घर की बहू तन ढकने के लिए फटे-पुराने चिथड़े (पोतना) पहन रही है!
खुद में खोट और दूसरे पर उंगली: सुपवा तो सुपवा बोलइ, चलनिअउ बोलइ जेकरे बहत्तरि छेद
जब कोई महाभ्रष्ट या अवगुणी व्यक्ति किसी दूसरे के छोटे से ऐब पर भाषण देने लगता है, तो चौपाल पर ठहाका गूंज उठता है:
देहाती सीख: सूप तो फटकने का काम करता है, वह अगर बोले तो समझ आता है; लेकिन वह चलनी भी बोल रही है जिसमें खुद बहत्तर छेद हैं! यानी खुद आकंठ बुराइयों में डूबा व्यक्ति जब दूसरों का चरित्र प्रमाण पत्र बांटने लगे।
और दुर्जन के स्वभाव की हकीकत:
देहाती सीख: कुत्ते की पूंछ को चाहे बारह साल नली में रखो, निकालते ही वह टेढ़ी की टेढ़ी ही रहेगी। दुष्ट व्यक्ति पर उपदेश का कोई असर नहीं होता।
देहाती सीख: पानी में की गई गंदगी कभी छिपती नहीं, वह तुरंत तैरकर ऊपर आ जाती है। यानी पाप और गलत काम चाहे कितना भी छिपाकर करो, एक दिन सबके सामने आ ही जाता है।
संकट में हिम्मत और हौसला: ओखरी म जौं मूँड़ परा तब मुसरेन कै कवन गिनती
जिंदगी जब इम्तिहान लेती है और चारों तरफ से मुसीबतें घेर लेती हैं, तो अवध का किसान घबराता नहीं है। वह ओखली और मूसल की यह अमर कहावत याद करता है:
देहाती सीख: जब ओखली में सिर दे ही दिया है, तो फिर मूसल की चोटों से क्या डरना! यानी जब किसी कठिन काम का बीड़ा उठा ही लिया है, तो फिर रास्ते में आने वाली परेशानियों और कष्टों से घबराना कैसा; सीना तानकर मुकाबला करो!
अहंकारी और अल्पज्ञानी की पोल खोलती कहावत:
देहाती सीख: आधा भरा हुआ घड़ा ही छलक-छलक कर शोर मचाता है, पूरा भरा घड़ा शांत रहता है। जिसके पास अधूरा ज्ञान होता है, वही सबसे ज्यादा शेखी बघारता है।
बेरोजगारी और व्यवस्था की लाचारी: पढ़ै फारसी बेचैं तेल इ देखा कलयुग कै खेल
आज जो नौजवान डिग्रियों के बाद भी रोजगार के लिए भटक रहे हैं, हमारे अवध के लोक कवियों ने इस विडंबना को सदियों पहले भाँप लिया था:
देहाती सीख: पढ़ाई तो की फारसी जैसी कठिन और उच्च भाषा की, और काम मिल रहा है सड़क किनारे तेल बेचने का! योग्यता के अनुरूप कद्र न मिलना ही कलयुग की सबसे बड़ी त्रासदी है।
और अयोग्य पिता की संतान जब बड़ी-बड़ी डींगें हांकती है:
देहाती सीख: बाप से तो जिंदगी भर एक छोटी सी गौरैया (पिड़की) भी नहीं मारी गई, और बेटा खुद को बड़ा भारी तीरंदाज बता रहा है!
सच्ची मित्रता, एहसान फरामोशी और लातों के भूत
सच्ची दोस्ती क्या होती है, इसे कुएं के लोटा और डोरी से बेहतर कोई नहीं समझा सकता। अवध की यह अमर कहावत दोस्ती की कसौटी तय करती है:
आपन गला फंसाइ कै पानी लावै बोरि।।"
देहाती सीख: लोटा और डोरी की दोस्ती जैसी कठिन मित्रता निभानी पड़ती है। डोरी खुद अपने गले में फंदा डालकर कुएं की अथाह गहराई में डूबती है, तब जाकर लोटे में भरकर शीतल जल बाहर लाती है। यानी जो दोस्त आपके लिए अपनी जान जोखिम में डालने को तैयार हो, वही सच्चा मीत है।
वहीं एहसान फरामोश लोगों पर कटाक्ष देखिए:
देहाती सीख: बिल्ली को दूध हमने पिलाया और आज वही हमीं पर गुर्रा रही है! जिस पर उपकार किया, वही आंखें दिखाने लगे।
देहाती सीख: जो लोग दुष्ट प्रवृत्ति के होते हैं, वे मीठी बातों और समझौतों से नहीं सुधरते; उन्हें सीधा करने के लिए कानून और डंडे की सख्त भाषा ही काम आती है।
| क्र.सं. | विधा / कहावत | अवसर / संदर्भ | जीवन संदेश व मूल भाव |
|---|---|---|---|
| 01 | सोहर | नवजात शिशु का जन्म / नए कार्य | राम-कृष्ण का रूप मानकर कुल के उजाले और नई खुशियों का उल्लास। |
| 02 | लोरी | शिशु को सुलाते समय | वात्सल्य, दुलार और लाल-दुलहिन के मीठे भविष्य का सपना। |
| 03 | मुण्डन के गीत | प्रथम केश संस्कार | मायके और ननिहाल का सम्मान, सोने के छुरवे से संपन्नता का शगुन। |
| 04 | विद्यारंभ गीत | प्राथमिक शिक्षा का प्रारंभ | नीम की छांव और तोते गिनकर प्रकृति के साथ सहज पढ़ाई। |
| 05 | उपनयन (जनेऊ) | संस्कार व दीक्षा | ब्रह्मचर्य, खड़ाऊं, माँ से भिक्षा और लोक कल्याण का संकल्प। |
| 06 | कन्यादान गीत | विवाह में कन्यादान | पिता के हाथ से कांपता लोटा-थाली और बेटी का धर्म-संकट। |
| 07 | परिछन रस्म | मंडप में वर-वधू आगमन | कलश (पात्रता), लोढ़ा (धैर्य), मूसल (प्रयास), मथानी (सफलता की सीख)। |
| 08 | विवाह की गारी | बारात भोज (पत्तल) | जनकपुर की नारियों का हास्य-विनोद, भारीपन को हल्का करना। |
| 09 | कजरी व चैता | सावन की रिमझिम व चैत | साइकिल से मेहंदी, झुलनी की तलाश और वियोग-संयोग का शृंगार। |
| 10 | आल्हा व विरहा | भादों की रातें व चौपाल | आल्हा-ऊदल का 52 गढ़ी वीर रस और खुले गले से विरह का आख्यान। |
| 11 | जँतसार व श्रम गीत | जांत पर पिसाई व धान रोपाई | घरेलू पीड़ा को हल्का करना और खेत में पसीना बहाते किसानों की ऊर्जा। |
| 12 | कारन गीत | महाप्रयाण (मृत्यु विलाप) | जन्म से मरण तक गीतों का पहरा, छंदबद्ध कारुणिक क्रंदन। |
| 13 | क्वार करैला, चैते गुड़... | ऋतुचर्या व स्वास्थ्य | क्वार में करेला, चैत में गुड़ व सावन में साग न खाने से निरोगी काया। |
| 14 | खाई कै मूतै, परैं उतान... | भोजन उपरांत दिनचर्या | लघुशंका, 10 सांस सीधा, 20 सांस दाएं-बाएं करवट से उत्तम पाचन। |
| 15 | उखड़ै क कुछ नायँ, नाव बरियार... | खोखले बड़प्पन पर व्यंग्य | योग्यता शून्य और नाम बड़ा रखने वालों की पोल खोलना। |
| 16 | जेहि घर सास जवानिन... | परिवार का मुखिया | मुखिया के स्वार्थी होने पर कुटुंब का बिखरना और बहू-नातिन की उपेक्षा। |
| 17 | सुपवा बोले तो बोले, चलनिअउ... | चरित्र प्रमाण पत्र बांटने वाले | बहत्तर छेद वाली चलनी द्वारा दूसरों के दोष निकालने पर कटाक्ष। |
| 18 | ओखरी म जौं मूँड़ परा... | संघर्ष और विषम हालात | जब बड़ा काम हाथ में ले लिया तो कठिनाइयों और चोटों से बेपरवाह रहना। |
| 19 | पढ़ै फारसी बेचैं तेल... | शिक्षित बेरोजगारी | उच्च योग्यता के बावजूद मजबूरी का काम मिलना (कलयुग की विडंबना)। |
| 20 | मित्र-मिताई कठिन है जस लोटा... | सच्ची दोस्ती की कसौटी | डोरी की तरह खुद संकट में डूबकर मित्र का कल्याण करने वाला ही सच्चा साथी। |
अवध में सोहर मूलतः 'उल्लास और नई उपलब्धि' का प्रतीक है। बच्चा पैदा होना जैसे कुल का विस्तार है, वैसे ही किसान के खेत में बोरिंग से पानी निकलना अन्न की समृद्धि लाता है और घर में ट्रैक्टर आना गृहस्थी की तरक्की है। इसलिए गाँव की औरतें हर नई जीवनदायिनी उपलब्धि पर सोहर गाकर खुशियां मनाती हैं।
परिछन की रस्म असल में एक प्राचीन व्यावहारिक काउंसलिंग (जीवन कौशल प्रशिक्षण) है। कलश हमें विनम्र और सहनशील बनने की सीख देता है, लोढ़ा और मूसल बताते हैं कि गृहस्थी की उलझनों को एक झटके में नहीं बल्कि रोज थोड़ा-थोड़ा धैर्य से सुलझाना चाहिए, और मथानी बताती है कि मेहनत के बिना सुख रूपी मक्खन नहीं मिलता। यह नए युगल को वास्तविक जीवन की चुनौतियों के लिए तैयार करता है।
पुराने समय में जब बहुएं अपनी बात खुलकर ससुराल में नहीं कह सकती थीं, तब भोर में चक्की (जाँत) पीसते समय गाए जाने वाले जँतसार के गीत उनकी 'इमोशनल थेरेपी' (मनोवैज्ञानिक निकास) का काम करते थे। वे मायके के प्यार, भाई की याद और ससुराल के दर्द को गाकर रो लेती थीं, जिससे उनका मन हल्का हो जाता था और अवसाद से बची रहती थीं।
कहावतें सीधी डांट या उपदेश नहीं होतीं। यदि किसी को सीधे कहो कि तुम नालायक हो, तो विवाद होगा; लेकिन जब चौपाल पर 'उखड़ै क कुछ नायँ, नाव बरियार सिंह' बोल दिया जाता है, तो सामने वाले को अपनी गलती का अहसास भी हो जाता है और माहौल में कड़वाहट की जगह ठहाका लग जाता है। यह अवध के लोगों का सहज सामाजिक संतुलन साधने का हुनर है।
डीजे के शोर और सोशल मीडिया के दौर में हमारी यह सोंधी लोक भाषा और मौखिक परंपरा लुप्त होने की कगार पर है। ये केवल पुराने गीत नहीं हैं, बल्कि इनमें हमारा इतिहास, पारिवारिक मूल्य, स्वास्थ्य विज्ञान और पुरखों का प्यार धड़कता है। इन्हें सहेजना हमारी सांस्कृतिक अस्मिता को जिंदा रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
सई नदी के कछारों से लेकर बेल्हा के सुदूर गाँवों के चौपालों तक, हमारी अवधी बोली में जो रस और मिठास है, वह दुनिया की किसी भाषा में नहीं मिल सकती। जब हमारी दादी-नानी अपने कंपकंपाते होठों से सोहर गाती हैं या कोई बुजुर्ग हुक्के की गुड़गुड़ाहट के बीच कोई अचूक कहावत कह देता है, तो सदियों पुरानी सभ्यता जीवित हो उठती है।
अंग्रेजी और आधुनिकता की अंधी दौड़ में कहीं हम अपनी इस सोंधी थाती को भूल न जाएं। आइए, अपने घरों में बच्चों को ये गीत सुनाएं, अपनी बातचीत में इन मारक कहावतों का प्रयोग करें और अपनी अवधी बोली पर गर्व करना सीखें। यही हमारे पुरखों को सबसे सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
सांस्कृतिक संकलन एवं डिजिटल प्रस्तुति: प्रतापगढ़ HUB (Pratapgarh HUB) — बेल्हा महोत्सव एवं अवध की लोक धरोहर को समर्पित