प्रतापगढ़ की खास जगहों का इतिहास (Pratapgarh Places History)

प्रतापगढ़ के ऐतिहासिक स्थल, प्राचीन धरोहरें और तीर्थ: 10,000 वर्ष पुराने सराय नाहर राय से मानिकपुर के 52 घाटों तक

प्रतापगढ़ सिर्फ खेती-किसानी और उपजाऊ जमीन वाला इलाका नहीं है, बल्कि यह हमारे पुरखों के हजारों साल पुराने इतिहास, पूजा-पाठ और राजा-रजवाड़ों की शान की एक खुली किताब है। यहाँ एक तरफ सराय नाहर राय है, जहाँ जमीन की खुदाई में 10,000 साल पुराने 7 फीट लंबे इंसानी कंकाल मिले हैं, तो दूसरी तरफ गंगा किनारे बसा मानिकपुर है, जहाँ 1296 में अलाउद्दीन खिलजी ने दिल्ली की गद्दी हथियाने के लिए बहुत बड़ा खेल खेला था।

सई नदी के किनारे विराजीं मां बेल्हा देवी, भगवान शिव के बारहवें ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजे जाने वाले बाबा घुइसरनाथ धाम, गंगा किनारे बसा कालाकांकर का राजभवन जहाँ बैठकर महाकवि सुमित्रानंदन पंत ने अपनी यादगार कविताएं लिखीं, और राजा प्रताप सिंह का 1617 का पुराना किला (पुरानी कोट)—इस पावन धरती के चप्पे-चप्पे में शानदार इतिहास बसा हुआ है। आइए, उत्तर प्रदेश जिला गजेटियर (1980) के 19वें अध्याय से प्रतापगढ़ के सभी 50 ऐतिहासिक गांवों, कस्बों, पुराने किलों और तीर्थों की सैर करें।

10,000 साल पुराना इतिहास
8000 ईसा पूर्व
सराय नाहर राय में टाटा इंस्टीट्यूट (TIFR) की वैज्ञानिक जांच में 10,000 साल पुराना 7 फीट लंबा इंसानी कंकाल और पत्थर के औजार मिले।
गंगा तट की ऐतिहासिक नगरी
मानिकपुर के 52 घाट
1296 में अलाउद्दीन खिलजी का ठिकाना; 40 खंभों वाला चहल सतून, जामा मस्जिद, संगीन-रंगीन महल और मशहूर संतों की दरगाहें।
जिले का नामकरण व किला
1617 ई. पुरानी कोट
राजा प्रताप सिंह ने अलोर के पुराने खंडहरों पर मजबूत किला बनवाया; अंदर का तहखाना और गहरे कुएं आज भी मौजूद हैं।
पावन ज्योतिर्लिंग धाम
बाबा घुइसरनाथ
सई नदी किनारे कुंभापुर में विराजे घुश्मेश्वर महादेव, घुइसा अहीर की पुरानी कहानी और शिवरात्रि पर लगने वाला भारी मेला।
साहित्य व क्रांति का संगम
कालाकांकर राजभवन
राजा रामपाल सिंह, महाकवि सुमित्रानंदन पंत की 'नक्षत्र' कुटिया और 1929 में गांधी जी की मौजूदगी में विदेशी कपड़ों की होली।
2000 साल पुराना यूनानी शहर
रानकी (अठेहा)
अठेहा के रानकी टीले की खुदाई में भारी संख्या में इंडो-बैक्ट्रियन (हिंद-यूनानी सिक्के) मिले, जो इसके बड़े व्यापारिक शहर होने का पक्का सबूत हैं।

🏰 1. सदर (प्रतापगढ़) तहसील: मां बेल्हा देवी, 10,000 साल पुराना सराय नाहर राय और पुरानी कोट

प्रतापगढ़ की सदर तहसील पूरे जिले का दिल है। सई और बकुलाही नदियों के किनारे फैली यह जमीन हजारों साल पुराने इतिहास से लेकर राजा-रानियों और आजादी की अनगिनत लड़ाइयों की गवाह रही है।

1. बेल्हा प्रतापगढ़ (Bela Pratapgarh) - जिला मुख्यालय व छावनी

परगना व तहसील: प्रतापगढ़ | निर्देशांक: 25°55' उत्तर, 82°0' पूर्व | क्षेत्रफल: 8 वर्ग किमी

जिला मुख्यालय का यह ऐतिहासिक शहर सई नदी के किनारे बसा है। इस शहर का नाम सई नदी के किनारे बने मां बेल्हा भवानी (बेला देवी) के बहुत पुराने मंदिर के नाम पर पड़ा है। पुराणों में लिखा है कि वनवास लेकर जंगल की ओर जाते समय श्री राम ने भोर होने से पहले सई नदी पार की थी और माता बेल्हा देवी के दर्शन कर पूजा की थी।

18वीं सदी के मशहूर कवि बाबा भिखारी दास का जन्म यहीं हुआ था, जिन्होंने हिंदी साहित्य का मशहूर ग्रंथ 'काव्य निर्णय' लिखा था। सन 1802 ई. में अंग्रेजों ने अवध की फौज के लिए यहाँ अपनी फौजी छावनी (कैंटोनमेंट) बनाई। जब 1857 में आजादी की पहली लड़ाई शांत हुई, तो अंग्रेजों ने इसे जिले का मुख्य दफ्तर बना दिया और 1 दिसंबर 1871 को यहाँ नगरपालिका बन गई।

सरकार ने इस शहर के कामकाज को 7 भागों में बाँट दिया है जिसे वार्ड कहते हैं। वार्ड 1 में सदर बाजार, भैरोपुर, बेला देवी मंदिर, धर्मशाला और कुम्हारों के बर्तन बनाने का काम आता है। वार्ड 2 में कोतवाली थाना, नगरपालिका की लाइब्रेरी, अनाथालय और बैंक हैं, जबकि बाकी वार्डों में अनाज का बाजार व कचहरी के दफ्तर आते हैं।

2. प्रतापगढ़ शहर / पुरानी कोट (Pratapgarh City - Old Fort)

परगना व तहसील: प्रतापगढ़ | निर्देशांक: 25°54' उत्तर, 81°57' पूर्व | बेला से 4 किमी

सई नदी के किनारे बसा यह पुराना कस्बा ही इस जिले की असली पहचान है। सन 1617 में उस दौर के बड़े योद्धा राजा प्रताप सिंह ने पुराने अलोरिखपुर (अलोर या अरोर) के खंडहरों पर एक बहुत मजबूत किला बनवाया और इस जगह का नाम 'प्रतापगढ़' रखा।

18वीं सदी में इस किले पर कई बार दुश्मनों ने घेरा डाला और लड़ाइयां हुईं। 1857 के गदर के बाद अंग्रेजों ने किले की बाहर की मजबूत दीवारें और बुर्ज तुड़वा दिए, लेकिन अंदर की गढ़ी और चारदीवारी आज भी देखी जा सकती है। आगे चलकर राजा अजीत सिंह और उनके गोद लिए बेटे राजा प्रताप बहादुर सिंह ने यहाँ एक बेहद खूबसूरत महल बनवाया। इस महल के नीचे एक खुफिया तहखाना (Underground Chamber) और बहुत गहरे कुएं बनवाए गए थे, ताकि अगर दुश्मन लंबे समय तक किले को घेरे रहे, तब भी अंदर पानी और छिपने की कोई कमी न हो।

🏺 3. सराय नाहर राय (Sarai Nahar Rai): 10,000 साल पुराना विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल

सदर तहसील में विश्वनाथगंज से करीब 11 किमी दूर स्थित सराय नाहर राय का नाम दुनिया भर के इतिहासकारों की जबान पर रहता है। यहाँ करीब 6 बीघे में फैला एक पुराना टीला है, जिसे गाँव के लोग 'डावरिहा बारा' (Davariha Bara) कहते हैं।

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के जाने-माने इतिहासकार प्रो. जी. आर. शर्मा और पुरातत्व विभाग ने जब यहाँ जमीन की खुदाई कराई, तो जमीन के अंदर से हजारों साल पुराने मध्य-पाषाण काल के इंसानी कंकाल, जानवरों की हड्डियां और पत्थर के छोटे-छोटे औजार (Microliths) मिले। ताज्जुब की बात यह थी कि इनमें से एक इंसानी कंकाल की लंबाई सात फीट (7 Feet) से भी ज्यादा निकली!

जब देश की सबसे बड़ी रिसर्च लैब टाटा इंस्टीट्यूट (TIFR, मुंबई) ने इन हड्डियों की वैज्ञानिक कार्बन-14 जांच की, तो पता चला कि ये हड्डियां आज से करीब 10,000 साल पुरानी (8,000 ईसा पूर्व) हैं। यह खोज इस बात का पक्का सबूत है कि गंगा और सई नदी के इलाके में इंसानों के बसने की शुरुआत प्रतापगढ़ की इसी पावन धरती से हुई थी।

4. संडवा चंडिका (Sandwa Chandika) - मां चंडिका देवी सिद्धपीठ

परगना व तहसील: प्रतापगढ़ | निर्देशांक: 25°58' उत्तर, 81°52' पूर्व | बकुलाही नदी तट

प्रतापगढ़ शहर से करीब 21 किमी दूर बकुलाही नदी के खूबसूरत किनारे पर संडवा चंडिका का पवित्र मंदिर है। यहाँ माँ चंडिका देवी का बहुत पुराना सिद्ध धाम है। चैत्र और क्वार (आश्विन) के नवरात्र में यहाँ बहुत बड़ा मेला भरता है। इसके अलावा पूरे साल हर मंगलवार और शनिवार को दूर-दूर के गांवों से लोग मुंडन कराने, दर्शन करने और मन्नत मांगने आते हैं।

5. बनबीरपुर कच्छ व पंचोसिद्ध (Banbirpur Kachhe & Panchosiddh)

परगना व तहसील: प्रतापगढ़ | सई व सकरनी नदी संगम | मोहनगंज के निकट

सई नदी और सकरनी नदी जहाँ आपस में मिलती हैं, उस संगम पर यह जगह बसी है। माना जाता है कि सोमवंशी क्षत्रियों के पहले पुरखे लाखन सेन का जन्म यहीं हुआ था। यहाँ का सबसे बड़ा आकर्षण पंचोसिद्ध शिव मंदिर है। पुरानी कहानियों के अनुसार महाभारत के समय पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान एक रात यहाँ छिपकर बिताई थी। महाशिवरात्रि पर यहाँ बड़ा मेला लगता है।

6. अठेहा (Atheha) - अमेठिया क्षत्रियों की प्राचीन राजधानी

परगना: अठेहा, तहसील: प्रतापगढ़ | लालगंज-अठेहा मार्ग | सई नदी कछार

पुराने अठेहा परगने का यह मुख्य गाँव अमेठिया क्षत्रियों के पुरखे राजा रायपाल सिंह (विक्रम सेन के बेटे) ने बसाया था। सन 1700 के आसपास यहाँ पक्की ईंटों का एक बहुत बड़ा और मजबूत किला बनवाया गया था, जिसके चारों तरफ गहरी खाई और घना जंगल था ताकि दुश्मन आसानी से हमला न कर सके। 1857 में आजादी की पहली लड़ाई के समय अठेहा के वीरों ने अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया। लड़ाई के बाद अंग्रेजों ने तोपों से इस किले को तुड़वा दिया। यहाँ 'भैंसासुर' का पुराना मंदिर और एक ऐतिहासिक मस्जिद भी है।

7. रानकी / रंकी (Ranki) - 2000 साल पुराना हिंद-यूनानी व्यापारिक नगर

परगना: अठेहा, तहसील: प्रतापगढ़ | निर्देशांक: 26°4' उत्तर, 81°35' पूर्व | परशदेपुर मार्ग

अठेहा से परशदेपुर जाने वाले रास्ते पर रानकी नाम का गाँव है। यह जगह इतिहास का एक बड़ा अजूबा है। गजेटियर में साफ लिखा है कि यहाँ के पुराने टीलों और खंडहरों की खुदाई में बहुत सारे इंडो-बैक्ट्रियन सिक्के (हिंद-यूनानी सिक्के) निकले हैं। इन पुराने खंडहरों के फैलाव को देखकर इतिहासकार बताते हैं कि आज से करीब 2000 साल पहले रानकी एक बहुत बड़ा और गुलजार शहर था, जहाँ दूर देशों से व्यापारी आते थे। गाँव के उत्तर-पश्चिम में पुराने किले का टीला आज भी दिखाई देता है।

8. कुंभापुर व बाबा घुइसरनाथ धाम (Kumbhapur - Ghuisarnath Dham)

परगना व तहसील: प्रतापगढ़ | सई नदी तट | लालगंज-अठेहा मार्ग

लालगंज से करीब 10 किमी दूर सई नदी के किनारे कुंभापुर गाँव बसा है, जिसे पूरी दुनिया बाबा घुइसरनाथ (घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग) धाम के नाम से जानती है। इस पवित्र मंदिर की कहानी घुइसा नाम के एक अहीर से जुड़ी है। वह सई नदी के कछार में अपनी गायें चराते समय एक पत्थर पर डंडा बजाया करता था। एक रात सपने में भगवान शिव ने उसे दर्शन दिए और बताया कि जिस पत्थर पर तुम डंडा बजाते हो, वह कोई मामूली पत्थर नहीं बल्कि साक्षात शिवलिंग है।

इसके बाद गाँव वालों ने उस शिवलिंग की पूजा शुरू की और आगे चलकर वहाँ बड़ा मंदिर बन गया। यहाँ दूर से आने वाले यात्रियों के ठहरने के लिए 5 बड़ी धर्मशालाएं हैं। महाशिवरात्रि के मौके पर यहाँ लाखों भक्तों की भारी भीड़ जुटती है और हर मंगलवार को मेला लगता है।

9-16. सदर तहसील के अन्य प्रमुख ऐतिहासिक स्थल व कस्बे

अंतू, कटरा मेदनीगंज, भोपियामऊ, मांधाता, सांगीपुर, लक्ष्मणपुर, चिलबिला व गोंडा
  • अंतू (Antu): 19वीं सदी में सोमवंशी राजा भरत सिंह के घुड़सवार फौजी अंत खान ने इसे बसाया था। बाद में यह बिलखरिया राजपूत सूरजपाल सिंह का ठिकाना बना। यहाँ सतीजी का पुराना मंदिर, बाजार और रेलवे स्टेशन है।
  • कटरा मेदनीगंज (Katra Medniganj): बाबू मेदनी सिंह द्वारा बसाया गया पुराना व्यापारिक कस्बा, जो सदियों से तंबाकू, कपड़ा, चूड़ी और टिकिया उद्योग के लिए मशहूर रहा।
  • भोपियामऊ (Bhopiamau): सई नदी के पास लाखनऊ-वाराणसी और इलाहाबाद-अयोध्या का मुख्य चौराहा, जहाँ जाना-माना 'मुनीम का बाग' है।
  • मांधाता (Mandhata): पुराने जमाने के चक्रवर्ती राजा मान्धाता के नाम से जुड़ा कस्बा और ब्लॉक केंद्र, जहाँ पुराने टीले और तालाब मौजूद हैं।
  • सांगीपुर (Sangipur): सोमवंशी राजा संगीतमल की पुरानी गढ़ी और ब्लॉक केंद्र, जो अपने पुराने तालाबों और देहाती मेलों के लिए जाना जाता है।
  • लक्ष्मणपुर (Laxmanpur): लीलापुर सड़क पर स्थित ब्लॉक केंद्र और आसपास के दर्जनों गांवों की मुख्य बाजार।
  • रणजीतपुर चिलबिला (Ranjitpur-Chilbila): बाबू रणजीत सिंह द्वारा बसाया गया कस्बा, जहाँ चिलबिला रेलवे जंक्शन, ईंट के भट्ठे, बर्फ फैक्ट्री और गल्ला मंडी है।
  • गोंडा (Gonda): इलाहाबाद-अयोध्या सड़क पर राजा प्रताप सिंह की बसाई पुरानी सराय, जहाँ पुराने जमाने में यात्री और व्यापारी रात बिताते थे।

🌊 2. कुंडा तहसील: मानिकपुर के 52 घाट, अलाउद्दीन खिलजी की गद्दी और कालाकांकर

कुंडा तहसील गंगा नदी के किनारे फैली हुई इतिहास की बहुत बड़ी धरोहर है। यहाँ का हर टीला और गंगा का हर घाट दिल्ली की पुरानी सल्तनत, सूफी संतों की दरगाहों और आजादी की लड़ाइयों की अमर कहानियां सुनाता है।

1. मानिकपुर (Manikpur) - कड़ा-मानिकपुर का ऐतिहासिक साम्राज्य व 52 घाट

परगना: मानिकपुर, तहसील: कुंडा | निर्देशांक: 25°46' उत्तर, 81°24' पूर्व | गंगा नदी तट

गंगा के पावन किनारे पर बसा मानिकपुर इस इलाके का सबसे पुराना और नामी शहर है। पुरानी कहानियों के अनुसार इसे कन्नौज के राजा जयचंद के सौतेले भाई माणिक चंद्र ने बसाया था। गंगा किनारे 36 मीटर ऊंचे कगार पर उनका पुराना किला बना है, जिसकी नींव में बहुत पुरानी और बड़ी-बड़ी ईंटें आज भी मिलती हैं।

1296 में दिल्ली की सल्तनत का फैसला: मानिकपुर का नाम भारत के इतिहास में बहुत खास है। 1296 ई. में अलाउद्दीन खिलजी कड़ा-मानिकपुर का हाकिम था। दक्षिण भारत के देवगिरि से बेहिसाब खजाना लूटने के बाद उसने अपने चाचा और दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन फिरोज खिलजी को मिलने के लिए मानिकपुर बुलाया। जैसे ही सुल्तान नाव से गंगा की रेती पर उतरे, अलाउद्दीन के सैनिकों ने धोखे से उनका कत्ल कर दिया। इसके बाद अलाउद्दीन ने मानिकपुर की धरती से ही खुद को पूरे हिंदुस्तान का नया शहंशाह घोषित कर दिया।

शानदार महल और सूफी संतों की दरगाहें: मानिकपुर में राजा सैयद अब्दुल कादिर खान का बनवाया 'चहल सतून' (Chihal Satun - 40 खंभों का बड़ा पत्थर का हॉल), जामा मस्जिद, संगीन महल और रंगीन महल मौजूद हैं। इन इमारतों को बनाने के लिए खास तौर पर फतेहपुर सीकरी से लाल पत्थर मंगाए गए थे। इसके साथ ही यह शहर बड़े सूफी संतों—हजरत शेख हुसामुद्दीन मानिकपुरी, सैयद शम्सुद्दीन फरीद और शाह खामोश की दरगाहों के लिए मशहूर है। यहाँ गंगा के 52 घाट (शाहाना घाट, राजघाट आदि) हैं, जहाँ कार्तिक पूर्णिमा पर लाखों लोग गंगा नहाने आते हैं।

2. कालाकांकर (Kalakankar) - क्रांति, कविता और गंगा तीरे राजभवन

परगना: मानिकपुर, तहसील: कुंडा | निर्देशांक: 25°47' उत्तर, 81°22' पूर्व | गंगा नदी तट

गंगा किनारे बसा कालाकांकर का राजभवन आजादी की लड़ाई और हिंदी साहित्य का बहुत बड़ा केंद्र रहा है। 1857 में आजादी की पहली लड़ाई के समय यहाँ के वीर राजा हनुमंत सिंह ने पहले तो कई अंग्रेज महिलाओं और अफसरों को अपने यहाँ पनाह देकर जान बचाई, लेकिन जब अपनी मातृभूमि अवध की आजादी की बात आई, तो उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ खुलकर तलवार उठा ली।

1883 में यहाँ के ज्ञानी राजा रामपाल सिंह ने भारत का पहला हिंदी दैनिक अखबार 'हिंदुस्तान' निकाला और पंडित मदन मोहन मालवीय जी को इसका संपादक बनाया। इसी राजभवन के शांत माहौल में गंगा किनारे हिंदी के महान कवि सुमित्रानंदन पंत ने अपनी 'नक्षत्र' नाम की कुटिया में 10 साल तक रहकर अपनी अमर कविताएं लिखीं।

14 नवंबर 1929 को महात्मा गांधी कालाकांकर आए थे। राजभवन के मैदान में हजारों लोगों की भारी सभा हुई और विदेशी कपड़ों की ऐतिहासिक होली जलाई गई। आजादी के बाद भारत सरकार में विदेश मंत्री रहे राजा दिनेश सिंह इसी परिवार से ताल्लुक रखते थे।

3. भदरी व बेंती (Bhadri & Benti) - भद्रकाली धाम व बेंती झील

परगना: बिहार, तहसील: कुंडा | निर्देशांक: 25°43' उत्तर, 81°33' पूर्व | भदरी रियासत

भदरी के राजाओं ने अपनी कुलदेवी 'माँ भद्रकाली' के नाम पर 19वीं सदी की शुरुआत में इस जगह को बसाया था। नवाबों के जमाने में सन 1800-1801 में अवध के हाकिम मिर्जा जान और भदरी के तालुकदार दलजीत सिंह के बीच यहाँ भारी जंग हुई थी।

भदरी के राजा अक्सर बेंती में रहा करते थे। बेंती अपनी बहुत बड़ी और खूबसूरत बेंती झील (ताल) के लिए पूरे अवध में मशहूर है, जहाँ जाड़ों के मौसम में सात समंदर पार से रंग-बिरंगे विदेशी पक्षी आते हैं। यहाँ आजादी के सेनानी और बाद में हिमाचल प्रदेश के उपराज्यपाल रहे राय बजरंग बहादुर सिंह ने 500 एकड़ में खेती और फलों के बागों का बहुत बड़ा आधुनिक फार्म बनाया था।

4. शाहपुर व बाबा हौदेश्वर नाथ महादेव (Shahpur - Haudeshwar Nath)

परगना: बिहार, तहसील: कुंडा | गंगा नदी तट | शाहपुर उपरहार व कछार

कुंडा के शाहपुर में गंगा के किनारे बाबा हौदेश्वर नाथ महादेव का बहुत पुराना मंदिर है। माना जाता है कि गंगा की गोद में विराजे इस शिवलिंग की पूजा सदियों से हो रही है। महाशिवरात्रि और मलमास (पुरुषोत्तम महीने) में दूर-दूर से लाखों लोग गंगा नहाकर यहाँ जल चढ़ाने आते हैं और महीने भर मेला चलता है।

5. ऐधा (Aidha) - 1857 के 120 अमर शहीदों की मजारें

परगना: बिहार, तहसील: कुंडा | निर्देशांक: 25°46' उत्तर, 81°35' पूर्व | 29 पुरवों का गांव

ऐधा गाँव 29 पुरवों से मिलकर बना है, जिसे राजा अवधेश सिंह ने बसाया था। 1857 में आजादी की पहली लड़ाई में राजा अवधेश सिंह ने अंग्रेजों से मोर्चा लिया। उनके अपने भाइयों ने अंग्रेजों का साथ दिया, लेकिन राजा और उनके 120 वफादार सिपाही आखिरी सांस तक लड़े और देश के लिए शहीद हो गए। ऐधा के पुराने किले के खंडहरों में आज भी 120 शहीदों की मजारें/कब्रें उस महान कुर्बानी की गवाही देती हैं।

6-12. कुंडा तहसील के अन्य प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

कुंडा, लालगंज, ढींगवास, बाबागंज, गुटनी, लवाना, धारूपूर, संग्रामगढ़, परियावां व डेरवा
  • कुंडा (Kunda): तहसील का मुख्य दफ्तर, 1857 की लड़ाई का बड़ा केंद्र, अनाज का बड़ा बाजार और सरकारी दफ्तर।
  • लालगंज अझारा (Lalganj): बाबा घुइसरनाथ जाने वालों का मुख्य पड़ाव और पश्चिमी प्रतापगढ़ की सबसे बड़ी अनाज और कपड़े की मंडी।
  • ढींगवास व बाबागंज: ढींगवास पुराना परगना केंद्र जहाँ छत्रधारी सिंह की गढ़ी थी; पास में बाबागंज है जिसे लक्ष्मण प्रसाद 'बाबा' ने बसाया था।
  • गुटनी व लवाना: गुटनी गंगा किनारे संतों का पुराना साधना स्थल है; लवाना 12 पुरवों वाला गाँव है जो पुराने जमाने में नमक के व्यापार और नाव घाट के लिए जाना जाता था।
  • धारूपूर व संग्रामगढ़: धारूपूर में राजा धरू सिंह और राजा हनुमंत सिंह का गढ़ था जहाँ से 1857 में अंग्रेजों से लड़े; संग्रामगढ़ राजा संग्राम सिंह का बनवाया किला था।
  • परियावां (Pariyawan): पुरानी परियावां रियासत की गढ़ी, पक्की बावली और पुराने महलों के निशान।
  • डेरवा (Derwa): मशहूर डेरवा बाजार, जो हथकरघा सूती कपड़ों और अनाज के व्यापार का बड़ा केंद्र है।
  • पूरा बाघराय, रायगढ़, मलका रज्जाकपुर: राय छबीले राम का पुराना बाग, भदरी रियासत का जंगली किला रायगढ़ और मौलवी रज्जाक की ऐतिहासिक मस्जिद।

🏹 3. पट्टी तहसील: बाबा बेलखरनाथ धाम, कोट बिलखार का पुराना किला और बछगोती रियासत

जिले का पूर्वी इलाका यानी पट्टी तहसील, सई नदी के किनारे फैली शूरवीरों, पुराने किलों और भगवान शिव के पवित्र मंदिरों की धरती है।

1. याहियापुर व कोट बिलखर (Yahyapur - Kot Bilkhar & Bilkharnath)

परगना व तहसील: पट्टी | निर्देशांक: 25°53' उत्तर, 82°5' पूर्व | सई नदी का उत्तरी तट

सई नदी के खूबसूरत किनारे पर बसा यह गाँव बहुत पुराना है। पुरानी कहानियों के अनुसार इसे पहले 'अहीरापुर' कहा जाता था, क्योंकि यहाँ रहने वाले अहीर पास के कोट बिलखर किले में दूध-दही पहुंचाया करते थे।

कोट बिलखर किले की कहानी: बांदा के बिसौली से आए घईबर शाह दीक्षित ने यहाँ कोट बिलखर का मजबूत किला बनवाया और बिलखरिया खानदान की नींव रखी। बाद में बछगोती क्षत्रियों के पुरखे बरियार सिंह और डिंगुर सिंह ने इस पर कब्जा किया। सन 1773 में अवध के नवाब के हाकिम ने राजा मेहरबान सिंह को हराकर इस पुराने किले को तोपों से तुड़वा दिया।

कैप्टन बक्सर की मजार (1856): अवध के नवाब वाजिद अली शाह के जमाने में 1856 में जब कैप्टन बक्सर नाम का अंग्रेज फौजी अफसर लगान वसूलने गाँव में घुसा, तो यहाँ के जांबाज लोगों ने उसे वहीं मार गिराया। उसकी मजार आज भी किले के खंडहरों में दिखाई देती है।

बाबा बेलखरनाथ महादेव मंदिर: पुराने किले के खंडहरों के पास सई नदी के किनारे विराजे बाबा बेलखरनाथ महादेव का बहुत पुराना मंदिर है। यह शिवलिंग अपने आप प्रकट (स्वयंभू) हुआ माना जाता है। महाशिवरात्रि पर यहाँ बहुत बड़ा सालाना मेला लगता है, जिसमें दूर-दूर से लाखों लोग सई नदी में नहाकर भगवान शिव पर जल चढ़ाने आते हैं।

2. पट्टी (Patti) - बछगोती रियासत का ऐतिहासिक केंद्र

परगना व तहसील: पट्टी | निर्देशांक: 25°55' उत्तर, 82°12' पूर्व | सई कछार

यह पट्टी तहसील का मुख्य कस्बा है। पुराने समय में यह बछगोती राजाओं की रियासत का मुख्य ठिकाना था। 1857 में आजादी की पहली लड़ाई के समय यहाँ के राजाओं और किसानों ने अंग्रेजी हुकूमत से जमकर मोर्चा लिया था। आज यह तहसील का मुख्य दफ्तर, कोर्ट-कचहरी और बाजार है।

3. दलीपपुर (Dalippur) - पुराना परगना केंद्र व गढ़ी

परगना व तहसील: पट्टी | निर्देशांक: 25°53' उत्तर, 82°3' पूर्व | सई नदी तट

सई नदी के किनारे बसा यह गाँव पुराने समय में एक अलग परगने की राजधानी था, जिसे बाद में पट्टी में जोड़ दिया गया। इसे पट्टी के राजा दलीप सिंह ने बसाया था। यहाँ उनकी पुरानी गढ़ी के खंडहर आज भी मौजूद हैं।

4. रानीगंज व रामगंज (Raniganj & Ramganj) - व्यापारिक हब

परगना व तहसील: पट्टी | रेलवे स्टेशन व अनाज मंडी

रानीगंज: पट्टी की महारानी का बसाया यह कस्बा आज जिले का बड़ा व्यापारिक केंद्र और रेलवे स्टेशन है, जहाँ से दूर-दूर तक अनाज और आंवले भेजे जाते हैं।
रामगंज: सई नदी के पास का पुराना गल्ला बाजार और हाट, जो आसपास के गांवों की रोजमर्रा की जरूरतों का बड़ा केंद्र है।

5-9. पट्टी तहसील के अन्य दर्शनीय व ऐतिहासिक स्थल

कोहंडौर, आसपुर देवसरा, मंगरौरा, परसरामपुर, हनुमानगंज व दत्तापुर
  • कोहंडौर (Kohandaur): प्रतापगढ़ से पट्टी जाने वाली सड़क पर बसा बड़ा कस्बा और रेलवे स्टेशन, जो खरीदारी और पढ़ाई-लिखाई का केंद्र है।
  • आसपुर देवसरा (Aspur Deosra): ब्लॉक का मुख्य दफ्तर, जहाँ हर साल पुराना पारंपरिक मेला लगता है।
  • मंगरौरा (Mangraura): सई और पीली नदी के संगम के पास बसा ब्लॉक केंद्र और पुराने टीलों वाला गाँव।
  • परसरामपुर (Parasrampur): लोककथाओं के अनुसार भगवान परशुराम जी के विश्राम और तपस्या से जुड़ा सई किनारे का पवित्र स्थल।
  • हनुमानगंज व दत्तापुर: दक्षिणमुखी हनुमान जी के मंदिर वाला बड़ा साप्ताहिक बाजार और पुरानी खेती-किसानी वाली बस्तियां।

📊 4. प्रतापगढ़ के प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों का संपूर्ण तुलनात्मक विवरण

नीचे दी गई चार सारणियों में गजेटियर के आधार पर तीनों तहसीलों के सभी प्रमुख स्थलों, उनके संस्थापकों, नदियों और ऐतिहासिक विशेषताओं का प्रामाणिक ब्यौरा संकलित किया गया है:

सारणी 1: सदर तहसील (प्रतापगढ़) के प्रमुख ऐतिहासिक व दर्शनीय स्थल

स्थल का नाम संस्थापक / ऐतिहासिक काल समीपवर्ती नदी / मार्ग प्रमुख ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्व
बेल्हा प्रतापगढ़ 1802 में फौजी छावनी, 1871 में नगरपालिका सई नदी, प्रयागराज-अयोध्या मार्ग मां बेल्हा भवानी मंदिर, बाबा भिखारी दास की जन्मभूमि, जिला मुख्यालय।
प्रतापगढ़ शहर (पुरानी कोट) राजा प्रताप सिंह (1617 ई.) सई नदी तट अलोर के खंडहरों पर निर्मित किला, भूमिगत तहखाना, राजा प्रताप बहादुर सिंह महल।
सराय नाहर राय 8,000 ईसा पूर्व (मध्य-पाषाण) विश्वनाथगंज के निकट 10,000 साल पुराना 'डावरिहा बारा', 7 फीट लंबा मानव कंकाल, पत्थर के औजार।
संडवा चंडिका बहुत पुराना सिद्धपीठ बकुलाही नदी तट माँ चंडिका देवी का प्रसिद्ध मंदिर, चैत्र व आश्विन नवरात्र में विशाल मेला।
रानकी (Ranki) 2,000 वर्ष प्राचीन (हिंद-यूनानी) अठेहा-परशदेपुर मार्ग बड़ी मात्रा में इंडो-बैक्ट्रियन सिक्के, प्राचीन विशाल नगर व किले के टीले।
कुंभापुर (बाबा घुइसरनाथ) घुइसा अहीर लोकगाथा सई नदी तट, लालगंज मार्ग द्वादश ज्योतिर्लिंग घुश्मेश्वर धाम, 5 धर्मशालाएं, महाशिवरात्रि पर लाखों श्रद्धालु।
अठेहा रायपाल सिंह (अमेठिया क्षत्रिय) सई नदी कछार 1700 ई. का ईंटों का विशाल दुर्ग, 1857 संग्राम, भैंसासुर मंदिर।
बनबीरपुर कच्छ व पंचोसिद्ध लाखन सेन (सोमवंशी संस्थापक) सई-सकरनी नदी संगम महाभारत कालीन पांडव गुप्त विश्राम स्थल, पंचोसिद्ध शिव मंदिर।

सारणी 2: कुंडा तहसील एवं गंगा कछार के प्रमुख ऐतिहासिक केंद्र

स्थल का नाम संस्थापक / राजवंश नदी / भौगोलिक स्थिति प्रमुख ऐतिहासिक धरोहर व महत्व
मानिकपुर माणिक चंद्र / अलाउद्दीन खिलजी पवित्र गंगा नदी का बायां तट 52 गंगा घाट, चहल सतून (40 खंभे), जामा मस्जिद, संगीन-रंगीन महल, सूफी दरगाहें।
कालाकांकर राजा हनुमंत सिंह / रामपाल सिंह गंगा नदी तट 1883 में 'हिंदुस्तान' प्रेस, महाकवि सुमित्रानंदन पंत की 'नक्षत्र' कुटिया, गांधी जी की सभा।
भदरी व बेंती भदरी तालुकदार (दलजीत सिंह) बेंती विशाल झील माँ भद्रकाली धाम, 1801 का नाजिम युद्ध, राय बजरंग बहादुर सिंह कृषि अनुसंधान फार्म।
शाहपुर बहुत पुराना तीर्थ गंगा नदी तट बाबा हौदेश्वर नाथ महादेव मंदिर, महाशिवरात्रि व मलमास में विशाल गंगा स्नान मेला।
ऐधा (Aidha) राजा अवधेश सिंह हरनामगंज स्टेशन निकट 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में शहीद 120 अमर क्रांतिवीरों की मजारें/कब्रें।
लालगंज अझारा सीतामऊ तालुकदारी सई कछार मार्ग पश्चिमी प्रतापगढ़ की सबसे बड़ी व्यापारिक मंडी, बाबा घुइसरनाथ का मुख्य पड़ाव।
ढींगवास व बाबागंज छत्रधारी सिंह / 'बाबा' कुंडा-प्रतापगढ़ मार्ग ढींगवास की प्राचीन गढ़ी, बाबागंज का ब्लॉक मुख्यालय व बाजार।
डेरवा (Derwa) स्थानीय व्यापारिक केंद्र कुंडा-प्रतापगढ़ मार्ग विशाल डेरवा बाजार, पारंपरिक हथकरघा, सूती वस्त्र व कृषि व्यापार।

सारणी 3: पट्टी तहसील के ऐतिहासिक किले, तीर्थ व प्रमुख नगर

स्थल का नाम संस्थापक / शासक समीपवर्ती नदी / स्थिति प्रमुख ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व
याहियापुर (कोट बिलखर) घईबर शाह दीक्षित / बरियार सिंह सई नदी का उत्तरी तट बाबा बेलखरनाथ महादेव मंदिर, प्राचीन कोट का किला, 1856 में कैप्टन बक्सर की मजार।
पट्टी (Patti) बछगोती राजपूत घराना सई कछार अंचल तहसील मुख्यालय, 1857 संग्राम का मुख्य केंद्र, तहसील व कोर्ट-कचहरी।
दलीपपुर राय दलीप सिंह (पट्टी रियासत) सई नदी तट प्राचीन परगना दलीपपुर का मुख्यालय, ऐतिहासिक गढ़ी के खंडहर।
रानीगंज पट्टी की महारानी रेलवे लाइन व राजमार्ग जिले का प्रमुख व्यापारिक केंद्र, रेलवे स्टेशन, आंवला व गल्ला व्यापार।
रामगंज स्थानीय रियासत सई नदी के निकट ऐतिहासिक गल्ला मंडी, साप्ताहिक बाजार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था का केंद्र।
कोहंडौर रियासती बाजार प्रतापगढ़-सुल्तानपुर सीमा रेलवे स्टेशन, इंटर कॉलेज, व्यस्त व्यापारिक बाजार।
आसपुर देवसरा देवसरा तालुकदार अमरगढ़ मार्ग विकास खंड मुख्यालय, प्रतिवर्ष लगने वाला पारंपरिक ऐतिहासिक मेला।

सारणी 4: प्रतापगढ़ के प्रमुख धार्मिक मेले, तीर्थ व वार्षिक उत्सव

मेले / तीर्थ का नाम स्थल व तहसील आयोजन का समय / तिथि धार्मिक व सांस्कृतिक विशेषता
बाबा घुइसरनाथ मेला कुंभापुर (सदर / लालगंज) महाशिवरात्रि व प्रत्येक मंगलवार द्वादश ज्योतिर्लिंग घुश्मेश्वर धाम में लाखों भक्तों द्वारा जल चढ़ाना और कांवड़ यात्रा।
बाबा बेलखरनाथ मेला याहियापुर, कोट बिलखर (पट्टी) महाशिवरात्रि सई नदी तट पर प्राचीन शिवलिंग की पूजा और दर्शन व विशाल ग्रामीण मेला।
बाबा हौदेश्वर नाथ मेला शाहपुर (कुंडा) महाशिवरात्रि व मलमास (पुरुषोत्तम) गंगाजल से जल चढ़ाना और दर्शन, गंगा स्नान और एक माह का अखंड धार्मिक अनुष्ठान।
मां चंडिका देवी मेला संडवा चंडिका (सदर) चैत्र व आश्विन नवरात्र, मंगल-शनि बकुलाही नदी तट पर मां चंडिका के सिद्धपीठ पर विशाल मुंडन व दर्शन मेला।
मां बेल्हा भवानी मेला बेल्हा प्रतापगढ़ चैत्र व शारदीय नवरात्र सई तट पर नगर की नगर की रक्षा करने वाली देवी का दर्शन-पूजन और नगर शोभायात्रा।
मानिकपुर गंगा स्नान मेला मानिकपुर (कुंडा) कार्तिक पूर्णिमा व गंगा दशहरा गंगा के 52 घाटों पर लाखों श्रद्धालुओं का गंगा स्नान और दीपदान।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) - प्रतापगढ़ के दर्शनीय व ऐतिहासिक स्थल

सराय नाहर राय को इतिहास में इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?
सराय नाहर राय (डावरिहा बारा) भारत में इंसानी इतिहास की सबसे पुरानी जगहों में से एक है। टाटा इंस्टीट्यूट (TIFR, मुंबई) की वैज्ञानिक जांच में यह करीब 10,000 साल पुराना (8,000 ईसा पूर्व) साबित हुआ है। यहाँ जमीन की खुदाई में 7 फीट लंबा इंसानी कंकाल, जानवरों की हड्डियां और पत्थर के औजार मिले, जिससे साबित होता है कि गंगा घाटी में इंसान सबसे पहले यहीं बसे थे।
मानिकपुर में अलाउद्दीन खिलजी और सुल्तान जलालुद्दीन के बीच क्या हुआ था?
1296 ई. में अलाउद्दीन खिलजी कड़ा-मानिकपुर का हाकिम था। दक्षिण के देवगिरि से बेहिसाब धन लूटकर लाने के बाद उसने दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी को मानिकपुर में गंगा किनारे बुलाया। जैसे ही सुल्तान नाव से उतरे, अलाउद्दीन के सैनिकों ने धोखे से उन्हें मार डाला और अलाउद्दीन ने मानिकपुर से ही खुद को दिल्ली का नया सुल्तान घोषित कर दिया।
बाबा घुइसरनाथ धाम (कुंभापुर) का नाम कैसे पड़ा?
पुरानी कहानी के अनुसार घुइसा नाम का अहीर सई नदी के किनारे गायें चराते समय एक पत्थर पर डंडा बजाया करता था। एक रात सपने में भगवान शिव ने आकर बताया कि वह पत्थर साक्षात शिवलिंग है। इसके बाद गाँव के लोगों ने उस शिवलिंग की पूजा शुरू की और मंदिर का नाम 'बाबा घुइसरनाथ' पड़ा, जिन्हें भगवान शिव के बारहवें ज्योतिर्लिंग घुश्मेश्वर के रूप में पूजा जाता है।
कालाकांकर राजभवन का साहित्य और स्वाधीनता आंदोलन में क्या योगदान है?
कालाकांकर के राजा रामपाल सिंह ने 1883 में भारत का पहला हिंदी दैनिक 'हिंदुस्तान' शुरू किया, जिसके संपादक पंडित मदन मोहन मालवीय बने। इसी राजभवन की 'नक्षत्र' कुटिया में छायावाद के महाकवि सुमित्रानंदन पंत ने 10 वर्षों तक रहकर काव्य साधना की। 1929 में महात्मा गांधी यहाँ आए थे और विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई थी।
अठेहा के रानकी (Ranki) गांव में क्या पुरातात्विक खोज हुई थी?
गजेटियर के अनुसार रानकी के प्राचीन टीलों की खुदाई में बड़ी संख्या में इंडो-बैक्ट्रियन (हिंद-यूनानी सिक्के) मिले हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि ईसा पूर्व और प्रारंभिक ईस्वी सदियों में रानकी एक विशाल और समृद्ध अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक नगर था।
🌾 आखिर में एक बात...

प्रतापगढ़ के ये 50 ऐतिहासिक स्थल सिर्फ ईंट, पत्थर और मिट्टी के टीले नहीं हैं, बल्कि ये हमारे पुरखों की उस महान विरासत की जीती-जागती धड़कन हैं, जिसने 10,000 सालों से आज तक अपनी पहचान बनाए रखी है। सराय नाहर राय के 10,000 साल पुराने इंसानों से लेकर मानिकपुर के शाही महलों, मां बेल्हा देवी के पावन चरणों, बाबा घुइसरनाथ व बेलखरनाथ के पवित्र मंदिरों, और कालाकांकर की क्रांतिकारी धरती तक—प्रतापगढ़ का इतिहास पूरे देश की शान है। अपनी इस पुरानी धरोहर को जानना, समझना और अपनी आने वाली पीढ़ियों को गर्व के साथ बताना हम सबका फर्ज है।

प्रामाणिक संदर्भ (Official Reference): यह विस्तृत ऐतिहासिक आलेख उत्तर प्रदेश शासन द्वारा 1980 में प्रकाशित आधिकारिक 'उत्तर प्रदेश जिला गजेटियर: प्रतापगढ़' (Uttar Pradesh District Gazetteers: Pratapgarh) के अध्याय 19 (Chapter XIX: Places of Interest, पृष्ठ 309 से 345) में दर्ज आधिकारिक पुरातात्विक, भौगोलिक, ऐतिहासिक और जनसांख्यिकीय विवरणों पर शत-प्रतिशत आधारित है।
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