प्रतापगढ़ की खेती और सिंचाई: 1980 के सरकारी गजेटियर की प्रामाणिक पड़ताल
सई नदी की कल-कल धारा और गंगा के पावन कछारों के बीच बसी प्रतापगढ़ की माटी सदियों से अन्नपूर्णा रही है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 1980 में प्रकाशित आधिकारिक 'प्रतापगढ़ जिला गजेटियर' का अध्याय-4 'Agriculture and Irrigation' (कृषि एवं सिंचाई, पृष्ठ 86 से 122) हमारे जिले की कृषि संपदा का वह प्रामाणिक दस्तावेज है, जो बताता है कि कैसे हमारे पुरखों ने अपने पसीने और बैलों की जोड़ी के दम पर इस धरती को सींचा था।
1863 के पहले भूमि बंदोबस्त से लेकर 1971 तक खेती का विस्तार, कुओं से चरस (पुर) खींचने से लेकर शारदा नहर और नलकूपों का जल जाल, विश्व प्रसिद्ध आंवले के बागों का विकास, और कुंडा की खास भेड़ों से लेकर हरित क्रांति तक—आइए गजेटियर के पन्नों से बिल्कुल आसान, आम बोलचाल की भाषा में समझें अपनी धरती की पूरी कहानी।
🌾 1. भूमि का उपयोग और रकबे का इतिहास: 1863 से 1971 तक का सफर
प्रतापगढ़ शुरू से ही एक ऐसा जिला रहा है जिसकी नब्ज किसानी से चलती है। गजेटियर दर्ज करता है कि 1951 में जिले की 86.1% आबादी पूरी तरह खेती पर निर्भर थी, जबकि 1901 में यह अनुपात 76.2% था। 1971 की जनगणना तक आते-आते जिले की 98.4% जनता गांवों में बसती थी, जिनके जीवनयापन का मुख्य सहारा जमीन ही थी।
जिले में खेती के रकबे का सबसे पहला विधिवत रिकॉर्ड 1863 के प्रथम नियमित बंदोबस्त (First Regular Settlement) में मिलता है। उस समय जिले में मात्र 4.49 लाख एकड़ (1.82 लाख हेक्टेयर) जमीन पर जुताई होती थी, जो कुल क्षेत्रफल का 48.8% था। उस दौर में भी सदर तहसील प्रतापगढ़ सबसे आगे थी, जहां की 54.1% जमीन पर फसलें लहलहाती थीं।
बेंती झील का उद्धार और कुंडा का चमत्कार
1863 के बाद जंगलों और बंजर जमीनों को तेजी से आबाद किया गया। 1892 तक आते-आते जुताई का रकबा 54% हो गया। इसमें सबसे चौंकाने वाली प्रगति कुंडा तहसील के परगना बिहार में हुई, जहां खेती का रकबा 14% बढ़ गया। इसका मुख्य कारण था कुंडा की प्रसिद्ध बेंती झील (Benti Lake) की जमीन को सुखाकर और व्यवस्थित करके उसे बेहद उपजाऊ खेत में बदलना। हालांकि इसी दौरान गंगा नदी की बाढ़ में कई कछारी खेत कटकर बह भी गए थे।
दो-फसली जमीन (Double-cropped Area) का चमत्कार: 1901 में जहां किसान साल में केवल एक फसल ले पाते थे और दो-फसली रकबा मात्र 1.54 लाख एकड़ था, वहीं 1970-71 तक सिंचाई के साधन बढ़ते ही यह दोगुना होकर 2.80 लाख एकड़ (1.13 लाख हेक्टेयर) तक पहुंच गया। यानी एक ही खेत से साल में धान और गेहूं दोनों की भरपूर फसल ली जाने लगी।
| भूमि का प्रकार एवं उपयोग | 1901 (हजार एकड़) | 1901 (हजार हे.) | 1901 प्रतिशत | 1970-71 (हजार एकड़) | 1970-71 (हजार हे.) | 1970-71 प्रतिशत |
|---|---|---|---|---|---|---|
| शुद्ध बोया गया रकबा (Cultivated Area) | 513 | 207 | 55.5% | 625 | 253 | 68.8% |
| बाग-बगीचे व कृषि योग्य परती (Culturable Waste) | 151 | 61 | 16.4% | 111 | 45 | 12.2% |
| पुरानी परती (Old Fallow) | — | — | — | 5 | 2 | 0.5% |
| चालू परती (Current Fallow) | 20 | 8 | 2.1% | 25 | 10 | 2.7% |
| अकृषि व बंजर भूमि (Not Available for Cultivation) | 239 | 97 | 26.0% | 143 | 58 | 15.8% |
| कुल भौगोलिक क्षेत्रफल (Total Area) | 923 | 373 | 100% | 909 | 368 | 100% |
💧 2. सिंचाई के साधन: पुर-चरस से लेकर शारदा नहर और नलकूप क्रांति
प्रतापगढ़ की धरती जितनी उपजाऊ थी, पानी की एक-एक बूंद के लिए किसानों का संघर्ष उतना ही कठिन था। 1901 में जिले का कुल सिंचित रकबा 2.62 लाख एकड़ (1.06 लाख हेक्टेयर) था, जो 1970-71 में बढ़कर 3.12 लाख एकड़ (1.26 लाख हेक्टेयर) हो गया। लेकिन इस दौरान पानी खींचने के साधनों में जमीन-आसमान का बदलाव आया।
आजादी से पहले पक्के और कच्चे कुएं ही सिंचाई का प्राण थे। भारी चमड़े के पुर (चरस) में सैकड़ों लीटर पानी भरकर बैलों की जोड़ी द्वारा खींचा जाता था। कम गहरे पानी के लिए किसान बांस और मिट्टी के भार वाली 'ढेंकली' चलाते थे।
बरसात के पानी से भरे तालाबों और झीलों से दो लोग मिलकर बांस की टोकरी (दौरा या बेड़ी) से पानी उछालकर खेतों की नालियों में डालते थे। इसे 'उठाव सिंचाई' (Lift Irrigation) कहा जाता था।
जिले में नहर सिंचाई का वास्तविक इतिहास 1928 में शारदा नहर प्रणाली (Sarda Canal) के आगमन से शुरू हुआ। नहरों और रजबहों ने पट्टी, कुंडा और सदर के हजारों एकड़ असिंचित खेतों तक सस्ता पानी पहुंचाया।
1950 के दशक में पहली पंचवर्षीय योजना के तहत जिले में बिजली से चलने वाले सरकारी नलकूप गड़े। 1970-71 तक नलकूपों ने कुओं को पीछे छोड़ दिया और 45,710 हेक्टेयर खेतों को सींचने लगे।
| सिंचाई का मुख्य स्रोत | 1970-71 में सिंचित रकबा (हेक्टेयर) | कुल सिंचित क्षेत्र में हिस्सेदारी (%) | विशेष टिप्पणी व ऐतिहासिक स्थिति |
|---|---|---|---|
| नलकूप (Tube-wells) | 45,710 | 36.1% | राजकीय नलकूप एवं तेजी से बढ़े निजी डीजल-इलेक्ट्रिक पंपसेट |
| शारदा नहरें (Canals) | 37,925 | 30.0% | 1928 से चालू; पट्टी, कुंडा व प्रतापगढ़ तहसीलों का मुख्य सहारा |
| पारंपरिक कुएं (Wells) | 35,462 | 28.0% | पक्के व कच्चे कुएं (पहले इनका हिस्सा 70% से अधिक था) |
| तालाब, झीलें व अन्य स्रोत (Tanks & Lakes) | 7,442 | 5.9% | झीलों से दौरा-बेड़ी द्वारा की जाने वाली लिफ्ट सिंचाई |
| कुल शुद्ध सिंचित क्षेत्र | 1,26,539 | 100% | जिले के कुल खेती रकबे का लगभग 50% हिस्सा |
🌱 3. फसल चक्र: खरीफ, रबी और जायद की माटी से जुड़ी पैदावार
प्रतापगढ़ की खेती ऋतु चक्र के अनुसार तीन मुख्य मौसमों में बंटी रही है, जिन्हें स्थानीय भाषा में खरीफ (सयारी), रबी (असाड़ी) और जायद (चेती) कहा जाता है।
1. खरीफ की फसलें (सयारी - जुलाई से अक्टूबर)
मानसून की पहली फुहार के साथ खरीफ की बुवाई शुरू होती थी। इसका राजा धान (Paddy) था। गजेटियर बताता है कि जिले में धान की दो मुख्य किस्में बोई जाती थीं:
- क्वारी या साठी धान: यह जल्दी (साठ से नब्बे दिन में) पकने वाला धान था, जो सितंबर-अक्टूबर में कट जाता था और गरीब किसानों को भुखमरी से बचाता था।
- जरहन (देर से पकने वाला धान): यह गहरे पानी और ताल-तलैयों के किनारे अगहन (नवंबर-दिसंबर) में पकता था। यह चावल स्वाद और सुगंध में लाजवाब होता था।
- मोटे अनाज: उस दौर में ज्वार, बाजरा, मडुआ (रागी), कोदों, सावां और काकुन गरीबों की थाली के प्रमुख अन्न थे। ये कम बारिश में भी खूब फलते थे।
- दलहन: अरहर (तुअर), उड़द, मूंग और मोठ की भरपूर पैदावार होती थी।
2. रबी की फसलें (असाड़ी - नवंबर से अप्रैल)
दीपावली के बाद जब ठंडक बढ़ती थी, तो रबी का मौसम शुरू होता था:
- गेहूं (Wheat): पारंपरिक देशी गेहूं के अलावा 1965 के बाद मेक्सिकन उन्नत किस्में जैसे कल्याण सोना और सोनालिका तेजी से लोकप्रिय हुईं।
- जौ (Barley): पुराने समय में प्रतापगढ़ में गेहूं से ज्यादा जौ बोया जाता था। जौ और चने को मिलाकर पिसाया गया आटा 'बेझर' कहलाता था, जिसकी मोटी रोटी और गुड़ ग्रामीण जीवन की सबसे पौष्टिक खुराक थी।
- चना और मटर: दलहन में चना और मटर की पैदावार बहुत बड़े रकबे पर होती थी।
- तिलहन: सरसों, राई, अलसी (तीसी) और तिल से घर-घर का तेल कोल्हू से निकाला जाता था।
3. नकदी और औद्योगिक फसलें (Cash Crops)
गन्ना (Sugarcane): सई और गंगा के उपजाऊ कछारों में गन्ने की खेती होती थी। गांव-गांव में कोल्हू चलते थे और गुड़ व खांडसारी बनाई जाती थी।
सनई (Sunn-hemp) और पटसन: सनई की खेती दोहरे लाभ के लिए की जाती थी—एक तो इसके डंठल को पानी में सड़ाकर मजबूत सन (रस्सी, टाट-पट्टी व खाट बुनने का बाण) निकाला जाता था, दूसरा इसे खेत में जोतकर उत्तम हरी खाद बनाई जाती थी।
🍈 4. बागवानी और विश्व प्रसिद्ध आंवला: प्रतापगढ़ की हरी-भरी विरासत
प्रतापगढ़ की असली वैश्विक पहचान उसका आंवला (Emblica officinalis) है। गजेटियर में दर्ज है कि प्रतापगढ़ की जलवायु और बलुई दोमट मिट्टी आंवले के पेड़ों के लिए कुदरत का सबसे बड़ा उपहार है।
आंवले की प्रमुख देशी व उन्नत किस्में
जिले के बागानों में सदियों से आंवले की चार प्रमुख किस्में शान से उगाई जाती रही हैं:
- बनारसी: बड़े आकार का, चमकदार और गूदेदार फल, जो मुरब्बा बनाने के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
- चकइया: अधिक फल देने वाली, कड़े गूदे वाली टिकाऊ किस्म, जिससे उच्च गुणवत्ता का अचार और चूर्ण बनता है।
- फ्रांसिस (हाथीझूल): डालियों को झुका देने वाले बड़े-बड़े रसीले गुच्छों वाला आंवला।
- बलवंत: स्थानीय स्तर पर विकसित अत्यधिक पौष्टिक और औषधीय गुणों से भरपूर किस्म।
प्रतापगढ़ से आंवले का मुरब्बा, लच्छेदार चटनी, अचार और च्यवनप्राश पूरे भारत के बाजारों और वैद्यों तक पहुंचता था।
आम और महुआ के ऐतिहासिक बाग: 1970-71 में जिले में बागों का कुल रकबा 26,118 हेक्टेयर था। इसमें 4,940 हेक्टेयर में सिर्फ आम के बाग थे (दशहरी, लंगड़ा, चौसा, फजली और स्थानीय गौरजीत)। इसके अलावा कटहल (560 हे.), अमरूद (419 हे.), आंवला और नींबू के सघन बाग फैले हुए थे।
गजेटियर विशेष रूप से रेखांकित करता है कि पूरे अवध में प्रतापगढ़ ही एकमात्र ऐसा जिला था जहां महुआ के सबसे घने जंगल और बाग पाए जाते थे (विशेषकर अठेहा और सदर परगने में)। महुआ के फूल गरीबों के लिए भोजन और पशुओं के लिए ऊर्जा का वरदान थे।
🚜 5. हरित क्रांति, उन्नत बीज और वैज्ञानिक खेती की शुरुआत
1960 के दशक के मध्य में जब भारत में हरित क्रांति (Green Revolution) की लहर चली, तो प्रतापगढ़ के जागरूक किसानों ने नई तकनीकों को हाथों-हाथ लिया।
उन्नत बीजों का प्रसार: कृषि विभाग के बीज भंडारों द्वारा धान की अधिक उपज देने वाली किस्में—आईआर-8 (IR-8), जया, और ताइचुंग नेटिव-1 बांटी गईं। गेहूं में सोनालिका, कल्याण सोना और शरबती सोनारा ने पुराने देशी गेहूं की तुलना में तीन गुना तक अधिक उपज देकर खलिहान भर दिए।
रासायनिक खाद बनाम देशी कम्पोस्ट: पारंपरिक रूप से किसान गोबर की खाद, तालाबों की तलछट और सनई की हरी खाद का प्रयोग करते थे। लेकिन 1970 के दशक में यूरिया (नाइट्रोजन), सुपरफॉस्फेट और पोटाश का उपयोग तेजी से बढ़ा। 1972-73 तक जिले में सालाना 20,000 मीट्रिक टन से अधिक नाइट्रोजन उर्वरक की खपत होने लगी थी।
| मुख्य फसल | प्रमुख हानिकारक कीट (Common Insects) | प्रचलित फसल रोग (Plant Diseases) | पारंपरिक व आधुनिक उपचार |
|---|---|---|---|
| धान (Paddy) | गुंधी बग (Gundhi Bug), तना छेदक (Stem Borer), धान का हिस्पा | झुलसा (Bacterial Blight), खैरा रोग (जिंक की कमी), ब्लास्ट | नीम की खली, खेत में पानी का निकास, बीएचसी व एल्ड्रिन का छिड़काव |
| गेहूं (Wheat) | दीमक (Termites), गुजिया कीड़ा | गेरुई (Rust), कंडुआ (Smut), पत्ती झुलसा | बीज शोधन (धूप में सुखाना व रसायन उपचार), गहरी जुताई |
| ज्वार व बाजरा | लाल रोयेंदार सूंडी (Red Hairy Caterpillar), तना छेदक | ग्रीन इयर रोग (अरगट / सुगंधी) | संक्रमित पौधों को उखाड़कर नष्ट करना, समय पर निराई |
| गन्ना (Sugarcane) | पायरीला (Pyrilla), सफेद मक्खी, तना छेदक | लाल सड़न रोग (Red Rot of Sugarcane) | रोगमुक्त बीज गन्नों का चयन, फसल चक्र में बदलाव |
| आम (Mango) | भुनगा (Mango Hopper), मीली बग | कोयली रोग (Black Tip - ईंट भट्ठों के धुएं से), चूर्णिल फफूंद | भट्ठों की चिमनी ऊंची करना, गंधक व कीटनाशक छिड़काव |
🐂 6. पशुधन संपदा, गोवंश और कुंडा की खास भेड़ें
प्रतापगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुधन केवल दूध का साधन नहीं, बल्कि खेती का इंजन था। ट्रैक्टरों के आने से पहले हर छोटे-बड़े किसान के पास बैलों की जोड़ी होना उसकी संपन्नता का प्रतीक माना जाता था। 1899 में जिले में 4.10 लाख मवेशी दर्ज थे, जो 1966 की आधिकारिक पशुगणना में बढ़कर 10 लाख से अधिक हो गए।
| पशुधन वर्ग (Livestock Category) | 1966 की अधिकृत संख्या | ग्रामीण जीवन में उपयोग एवं महत्व |
|---|---|---|
| गोवंश (गाय, बैल व बछड़े) | 5,79,355 | हल चलाने, गाड़ी खींचने, पुर से पानी निकालने व दूध-गोबर हेतु |
| बकरियां (Goats) | 2,43,135 | गरीबों की कामधेनु; दूध व मांस का प्रमुख साधन |
| महिषवंश (भैंसें व पाड़े) | 1,70,669 | गाढ़े दूध व शुद्ध देसी घी उत्पादन का प्रमुख आधार |
| कुक्कुट (मुर्गी पालन / Poultry) | 1,06,640 | अंडे व मांस; कुटीर रोजगार का साधन |
| सूअर (Pigs) | 45,373 | पारंपरिक पशुपालन व सफाई कार्य |
| भेड़ें (Sheep - विशेषकर कुंडा) | 40,162 | कुंडा नस्ल की खास भेड़ें; देशी कंबल बुनाई व खेतों की खाद |
| घोड़े एवं टट्टू (Horses & Ponies) | 4,929 | कस्बों में इक्का-तांगा व सवारी |
| ऊंट एवं गधे (Camels & Donkeys) | 5,183 | ईंट-भट्ठों पर ढुलाई व कुम्हार समाज का काम |
कुंडा की भेड़ें और गड़ेरिया समाज की कंबल बुनाई
गजेटियर में दर्ज है कि कुंडा तहसील में उत्तम नस्ल की भेड़ें पाई जाती थीं। यहां के गड़ेरिया अपनी भेड़ों को जल्दी कसाई को नहीं बेचते थे, बल्कि उनसे साल में दो बार ऊन काटकर हाथ के करघे पर भारी, टिकाऊ और बेहद गर्म देशी कंबल (कमरी) बुनते थे। इसके अलावा किसान अपने खेतों में भेड़ों के रेवड़ को रात में बैठाने (Fold grazing) के लिए गड़ेरियों को अनाज और पैसे देते थे, क्योंकि भेड़ों की लेंडी (खाद) से खेत की उर्वरा शक्ति कई गुना बढ़ जाती थी।
पशु चिकित्सालय और रोग नियंत्रण: 1971 तक जिले में 20 राजकीय पशु चिकित्सालय और 23 पशु पालन केंद्र (Stockman Centres) खुल चुके थे। पुराने जमाने में मवेशियों में पोकनी (Rinderpest / माता रोग), घुर्रका (Haemorrhagic Septicaemia), और खुरपका-मुंहपका (FMD) की महामारियां फैलती थीं, जिन्हें बड़े पैमाने पर टीकाकरण करके नियंत्रित किया गया।
🐟 7. मत्स्य संपदा और कुक्कुट पालन: नदियों व तालों का जल जीवन
गंगा और सई नदियों तथा रोनी ताल, लसार ताल, गुजवाल ताल और मांझी कटन ताल जैसी बड़ी प्राकृतिक झीलों के कारण प्रतापगढ़ में मीठे पानी की मछलियों का विशाल भंडार रहा है।
30 प्रकार की स्वादिष्ट मछलियां: गजेटियर के अनुसार जिले के जलस्रोतों में 30 से अधिक प्रजातियों की मछलियां मिलती थीं, जिनमें खाने के लिए सबसे उत्तम रोहू, कतला (भाकुर), नैन (मृगल), टेंगर, करौंच, बाटा, परहिन और पटरा थीं।
मल्लाह, केवट और कंहार समाज का पुश्तैनी हुनर
जिले में लगभग 10,000 मल्लाह और कंहार परिवार अपनी आजीविका के लिए मछली पकड़ने और नौका संचालन पर निर्भर थे। वे मछली पकड़ने के लिए कई तरह के पारंपरिक देशी जाल बनाते थे:
- महाजाल और छांटा: बड़े तालों और नदी के गहरे पानी में घेरा डालने वाला विशाल जाल।
- झिंगुरी और फांसला (Gill Net): छोटी और मध्यम मछलियों को फंसाने वाला जाल।
- बंसी और पचकी: कांटे और तीर-कमान जैसे औजार से शिकार करने का पारंपरिक तरीका।
1966-67 में कालाकांकर के पनिगो में 1.8 हेक्टेयर का सरकारी फिश सीड फार्म बनाया गया, जहां गंगा नदी से मछली के अंडे (जीरा) एकत्र कर नर्सरियों में फिंगरलिंग्स (मछली के बच्चे) तैयार किए जाते थे और ग्राम पंचायतों के तालाबों में बांटे जाते थे।
⛈️ 8. सूखा, अकाल और ऐतिहासिक बाढ़: आपदाओं से जूझती माटी
यूं तो प्रतापगढ़ में कुओं और तालाबों के घने नेटवर्क के कारण भयानक अकाल बहुत कम पड़े, लेकिन जब कुदरत का कहर टूटा तो जिले के किसानों ने अदम्य साहस का परिचय दिया।
1877-78 और 1896-97 का अकाल
1877 में पूरे साल में 19 इंच से भी कम बारिश हुई और फसलें सूख गईं। गरीब मजदूरों को भुखमरी से बचाने के लिए अंग्रेजी हुकूमत को राहत कार्य खोलने पड़े। उस समय अठेहा से जलेसरगंज सड़क और प्रतापगढ़ से पट्टी सड़क के निर्माण कार्य में हजारों भूखे ग्रामीणों को काम और रोटी दी गई। 1896-97 में भी सूखे के दौरान राहत कार्यों के तहत जिले के कई बड़े तालाबों को गहरा खोदा गया।
1970 और 1971 की प्रलयंकारी बाढ़
सूखे से ज्यादा नुकसान प्रतापगढ़ को सई और गंगा की भीषण बाढ़ ने पहुंचाया। गजेटियर में 1970 और 1971 की बाढ़ का दिल दहला देने वाला आधिकारिक आंकड़ा दर्ज है:
- 1970 की बाढ़: 2,242 गांव डूबे, 3.60 लाख हेक्टेयर इलाका जलमग्न हुआ, 6.56 लाख लोग बेघर हुए और 39,000 मकान ढह गए।
- 1971 की बाढ़: लगातार दूसरे साल सई और गंगा ने विकराल रूप लिया। 2,241 गांवों के 10,42,710 लोग बाढ़ की चपेट में आ गए और 23,666 घर जमींदोज हो गए।
- इस तबाही के बाद सरकार ने किसानों को 31 लाख रुपये का तकावी कर्ज, 5.50 लाख रुपये मकान बनाने की सहायता और लाखों रुपये की लगान माफी देकर जिले को दोबारा खड़ा किया।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (प्रतापगढ़ कृषि व सिंचाई FAQs)
1980 के सरकारी गजेटियर का यह चौथा अध्याय हमें यह सिखाता है कि प्रतापगढ़ की संपन्नता का राज किसी कल-कारखाने में नहीं, बल्कि हमारे मेहनतकश किसानों के पसीने, हमारी उपजाऊ मिट्टी, सई-गंगा के पानी और हमारे हरे-भरे आंवले व महुआ के बागों में छिपा है।
आज जब हम रासायनिक खादों और भूजल संकट के दौर से गुजर रहे हैं, तब अपने पुरखों की उस समृद्ध पारंपरिक खेती, कुओं-तालाबों के संरक्षण और आंवले के गौरव को बचाए रखना ही हमारी माटी के प्रति सबसे सच्ची श्रद्धांजलि है।
यह आलेख उत्तर प्रदेश सरकार (Government of Uttar Pradesh) द्वारा 1980 में प्रकाशित आधिकारिक 'Uttar Pradesh District Gazetteers: Pratapgarh' के Chapter IV - 'Agriculture and Irrigation' (पृष्ठ 86 से 122) में दर्ज प्रामाणिक कृषि आंकड़ों, बंदोबस्त रिपोर्टों, नहर-नलकूप रिकॉर्ड और पशुगणना पर आधारित है।