भयहरणनाथ धाम : वो जगह जहाँ भीम ने बकासुर का वध करके एक ऐसा शिवलिंग स्थापित किया, जो आज "डर हरने वाला" बाबा कहलाता है
प्रतापगढ़-प्रयागराज की सरहद पर, बकुलाही नदी के किनारे, कटरा गुलाब सिंह गाँव में बसा एक ऐसा शिवधाम — जिसकी नींव में महाभारत का अज्ञातवास है, जिसे एक साधु ने अपने दम पर खड़ा किया, और जिसके आँगन में आज भी एक बंदर की समाधि पूरी श्रद्धा से पूजी जाती है।
प्रतापगढ़ ज़िले के पाँच प्रमुख शिव धामों में बाबा भयहरणनाथ धाम सबसे अनूठा माना जाता है। इसकी वजह यह है कि इसकी कहानी किसी राजा-महाराजा के दौर से नहीं, बल्कि सीधे द्वापर युग के महाभारत काल से जुड़ी है।
यह पावन धाम प्रतापगढ़ ज़िला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर, कटरा गुलाब सिंह गाँव में, पौराणिक बकुलाही नदी के किनारे बसा है। यह ठीक वही जगह है जहाँ प्रतापगढ़ ज़िले की सीमा खत्म होती है और प्रयागराज ज़िले की सरहद शुरू होती है। यहाँ आने पर महाभारत के अज्ञातवास का इतिहास, एक तपस्वी साधु की मेहनत और एक बेज़ुबान जानवर का सच्चा प्यार — सब एक साथ महसूस होता है।
🌿 प्रतापगढ़ का प्रसिद्ध 'पंच-धाम' और बकुलाही नदी
प्रतापगढ़ की धरती पर भगवान शिव के पाँच बड़े और चमत्कारी धाम बसे हैं, जिन्हें स्थानीय लोग श्रद्धा से "पंच-धाम" कहते हैं। इनमें भयहरणनाथ धाम अपनी महाभारत कालीन पहचान की वजह से बहुत खास माना जाता है:
| धाम का नाम | कहाँ स्थित है | खास पहचान और इतिहास |
|---|---|---|
| बाबा भयहरणनाथ धाम | कटरा गुलाब सिंह (बकुलाही नदी तट) | भीम द्वारा बकासुर वध, अज्ञातवास की स्थापना और भय मुक्ति धाम। |
| बाबा बेलखरनाथ धाम | ग्राम अहियापुर, पट्टी (सई नदी तट) | 90 मीटर ऊँचा टीला, बेलखरिया राजपूत और संतान-दाता सिद्धपीठ। |
| बाबा बालेश्वरनाथ धाम | सदर ब्लॉक, प्रतापगढ़ (सई तट) | बाणासुर की तपस्थली और बेहद पुराना स्वयंभू शिवलिंग। |
| बाबा घुश्मेश्वरनाथ धाम | लालगंज अझारा (सई नदी तट) | प्रसिद्ध द्वादश ज्योतिर्लिंगों में मान्य पावन धाम। |
| बाबा हौदेश्वरनाथ धाम | कुंडा, शाहपुर कछार (गंगा तट) | राजा भागीरथ की तपस्या, जाह्नु ऋषि और गंगा का जाह्नवी नाम। |
🏹 जब अपनी पहचान छुपाकर द्वैतवन के जंगलों में पहुंचे पाँचों भाई
महाभारत के वन पर्व में एक बहुत दिलचस्प कथा आती है। जब चौसर के खेल में छल से पांडवों को हरा दिया गया, तो युधिष्ठिर को अपने चारों भाइयों और द्रौपदी के साथ बारह साल का वनवास और एक साल का अज्ञातवास काटना पड़ा था। अज्ञातवास का नियम यह था कि अगर इस एक साल में कोई उन्हें पहचान लेता, तो उन्हें फिर से बारह साल के लिए जंगलों में भटकना पड़ता।
अपनी असली पहचान छुपाते-छुपाते पाँचों पांडव प्रतापगढ़ के पास मौजूद घने जंगल — द्वैतवन — में आ पहुंचे। यहाँ रहते हुए पाँचों भाइयों ने भगवान शिव की पूजा करने के लिए अलग-अलग जगहों पर शिवलिंग स्थापित किए। माना जाता है कि इसी दौरान धर्मराज युधिष्ठिर ने प्रतापगढ़ के रानीगंज अजगरा में एक भयानक अजगर रूपी राक्षस का वध किया था, जहाँ आज भी पांडवों द्वारा स्थापित पाँच सिद्ध जगहें मौजूद हैं।
⚡ भीम, बकासुर का आतंक और वह शिवलिंग जिसने 'डर' को भगा दिया
इन्हीं जगहों में से सबसे प्रमुख जगह थी — आज का भयहरणनाथ धाम।
कथा के अनुसार, उस दौर में इस पूरे इलाके में बकासुर नाम के एक बेहद ताकतवर और खूंखार राक्षस का राज चलता था। वह राक्षस इतना बेरहम था कि गाँव के लोगों को मार-मार कर खा जाता था। पूरा गाँव और आस-पास के इलाके दिन-रात उसके खौफ में जीते थे। शाम होते ही लोग अपने घरों के दरवाज़े बंद कर लेते थे। कोई भी उसके आतंक के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं कर पाता था।
💥 भीम और बकासुर का घमासान मल्ल-युद्ध
जब महाबली भीम यहाँ पहुंचे, तो उनसे गाँववालों का यह रोना-बिलखना देखा नहीं गया। भीम ने उस राक्षस को ललकारा। दोनों के बीच ज़मीन हिला देने वाला भयानक युद्ध हुआ। भीम ने अपने असीम बाहुबल से बकासुर को पटक-पटक कर मार डाला और गाँववालों को उस राक्षस के खौफ से हमेशा-हमेशा के लिए आज़ाद करा दिया।
राक्षस के मारे जाने के बाद, सारे गाँव के भले के लिए भीम ने अपने हाथों से यहीं पर एक पाषाण शिवलिंग की स्थापना की और महादेव की पूजा की।
क्योंकि भगवान शिव के इस स्वरूप ने लोगों को उनके सबसे बड़े डर (भय) से मुक्ति दिलाई थी, इसलिए गाँव के लोग इन्हें आदर से "भव भयहरणनाथ" कहने लगे — यानी "इस संसार के सारे डरों को हर लेने वाले नाथ"। यही नाम समय के साथ आम बोलचाल में छोटा होकर आज "भयहरणनाथ" के रूप में पूरी दुनिया में जाना जाता है।
🌊 नदी का नाम कैसे पड़ा "बकुलाही"?
महाभारत में इस इलाके में बहने वाली नदी को "बालकुनी" कहा गया है। भाषा के जानकारों का कहना है कि सदियों के सफर में लोगों की बोलचाल में 'बालकुनी' शब्द बदलते-बदलते आज की बकुलाही नदी बन गया। यानी जिस नदी के किनारे यह धाम है, उसका नाम भी सीधे महाभारत के पन्नों से जुड़ा है।
🧘 एक साधु, जिसने अकेले अपने दम पर इस धाम को खड़ा किया
महाभारत काल के सदियों बीत जाने के बाद, यह पवित्र जगह घने जंगलों और झाड़ियों के बीच कहीं खो गई थी। इस पौराणिक जगह को उसका आज का भव्य रूप देने का पूरा श्रेय एक सच्चे तपस्वी संत को जाता है — जिनका नाम था नागा बाबा।
नागा बाबा ने अकेले अपने दम पर, गाँव के लोगों का सहयोग लेकर झाड़ियों को साफ किया और मंदिर के जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाया। आज जो सुंदर मंदिर हमें दिखाई देता है, वह काफी हद तक नागा बाबा की कड़ी मेहनत और तपस्या का फल है। उनके साथ दाण्डी स्वामी नाम के एक और महान संत ने अपनी पूरी ज़िंदगी इस धाम की सेवा और रख-रखाव में लगा दी।
आज भी धाम के आँगन में इन दोनों पूज्य संतों की समाधियाँ मौजूद हैं, जहाँ आने वाला हर भक्त शीश नवाता है।
🐒 एक बंदर की समाधि — वो वफ़ादारी जिसने पूरे गाँव का दिल जीत लिया
इस धाम की सबसे भावुक और अनोखी बात यहाँ मौजूद तीसरी समाधि है — जो किसी इंसान या साधु की नहीं, बल्कि एक बंदर की है! इस सच्ची घटना को सुनकर आज भी लोगों की आँखें भर आती हैं।
💔 अनजानी भूल, मूक इशारा और सच्ची वफ़ादारी
कहा जाता है कि कटरा गुलाब सिंह के बाज़ार में बंदरों की एक बहुत प्यारी जोड़ी रहा करती थी। एक दिन किसी दुकानदार या व्यक्ति से गलती से वज़न तौलने वाला भारी बाट छूटकर उस बंदरिया को जा लगा, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। पूरे बाज़ार में उदासी छा गई। बाज़ार के लोगों ने तय किया कि इसका अंतिम संस्कार गंगा तट पर सम्मान के साथ किया जाएगा।
जब शवयात्रा निकली, तो सबने देखा कि वह नर बंदर रोता हुआ सबसे आगे-आगे रास्ता दिखाते हुए चल रहा था। लोगों ने सोचा कि जिधर यह बंदर जा रहा है, उधर ही चलना चाहिए। बाज़ार से निकलकर वह बंदर सीधा भयहरणनाथ धाम की तरफ मुड़ गया। पहले वह मुख्य शिवलिंग के सामने सिर झुका कर बैठा, और फिर उठकर राधा-कृष्ण मंदिर के सामने जाकर बैठ गया।
गाँववालों ने उस बेज़ुबान जानवर का मूक इशारा समझ लिया और ठीक उसी जगह पर उस बंदरिया की समाधि बना दी। कहते हैं कि जिस व्यक्ति से वह अनजानी भूल हुई थी, वह बहुत परेशान और दुखी रहने लगा था। तब बाज़ार के लोगों की सलाह पर उसने अपनी हैसियत के हिसाब से वहाँ एक छोटा मंदिर बनवाया। मान्यता है कि इसके बाद उस परिवार के सारे कष्ट दूर हो गए।
यह घटना बताती है कि भयहरणनाथ धाम में आस्था सिर्फ बड़े देवी-देवताओं तक सीमित नहीं है — यहाँ एक बेज़ुबान जानवर के प्यार, वफ़ादारी और करुणा को भी उतना ही ऊंचा स्थान दिया गया है।
🚩 कटरा गुलाब सिंह — एक वीर क्रांतिकारी के नाम पर बसा बाज़ार
यह धाम जिस गाँव में बसा है, उस कटरा गुलाब सिंह बाज़ार का नाम भी अपने आप में बहुत गौरवशाली है। इस बाज़ार को 18वीं सदी के एक महान देशभक्त और वीर क्रांतिकारी बाबू गुलाब सिंह ने बसाया था। यानी यह जगह सिर्फ महाभारत के पौराणिक इतिहास से ही नहीं जुड़ी है, बल्कि आज़ादी और स्वाभिमान की लड़ाई के इतिहास से भी जुड़ी है।
🏛️ धाम की बनावट — 10 एकड़ ज़मीन, 10 सुंदर मंदिर और 3 समाधियाँ
आज बाबा भयहरणनाथ धाम लगभग 10 एकड़ के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है। इस पूरे परिसर को बहुत ही सुंदर ढंग से संवारा गया है:
| परिसर का हिस्सा | विवरण एवं खास बातें |
|---|---|
| मुख्य शिवलिंग मंदिर | एक ऊँचे टीले पर बना है। गर्भगृह के चारों तरफ परिक्रमा मार्ग है और बाहर नंदी बैल विराजमान हैं। |
| वास्तु और दिशा | मंदिर उत्तर भारतीय नागर शैली में बने हैं और हिंदू वास्तु के अनुसार हर मंदिर का मुख पूरब (सूर्योदय) की ओर है। |
| परिसर के 10 मंदिर | मुख्य शिवलिंग, हनुमान जी, शिव-पार्वती, संतोषी माता, राधा-कृष्ण, भगवान विश्वकर्मा और बैजू बाबा मंदिर। |
| शंकर-पार्वती की मूर्ति | 7 नवंबर 1960 को कुर्मी क्षत्रिय समाज द्वारा मंदिर के सामने शंकर-पार्वती की सुंदर सदेह प्रतिमा बनवाई गई थी। |
| 3 पवित्र समाधियाँ | नागा बाबा की समाधि, दाण्डी स्वामी की समाधि, और प्रांगण में वफादार बंदर की ऐतिहासिक समाधि। |
🎪 मेले, सावन की कांवड़ यात्रा और राष्ट्रीय पहचान
बाबा भयहरणनाथ धाम में पूरे साल भक्तों की चहल-पहल रहती है, लेकिन कुछ खास मौकों पर यहाँ का नज़ारा देखते ही बनता है:
| पर्व / उत्सव | समय एवं आयोजन | भक्तों का उत्साह एवं परंपरा |
|---|---|---|
| हर मंगलवार का मेला | साल भर (प्रत्येक मंगलवार) | दूर-दूर से हज़ारों श्रद्धालु जल चढ़ाने, लाल ध्वजा (पताका) फहराने और मन्नत मांगने आते हैं। |
| महाशिवरात्रि मेला | फाल्गुन मास में दो दिन | सैकड़ों साल पुराना विशाल मेला, जिसमें लाखों श्रद्धालु आते हैं। साथ ही दो दिवसीय "महाकाल महोत्सव" होता है। |
| सावन की कांवड़ यात्रा | पूरा सावन का महीना | प्रयागराज के श्रृंगवेरपुर धाम और फाफामऊ से कांवड़िए पैदल गंगाजल लेकर आते हैं और जलाभिषेक करते हैं। |
| घुघुरी उत्सव | नागपंचमी का पावन पर्व | यहाँ का पारंपरिक और प्रसिद्ध उत्सव, जिसने इस धाम को देश-विदेश में भी एक खास पहचान दिलाई है। |
📸 बाबा भयहरणनाथ धाम: संपूर्ण छायाचित्र दीर्घा (Photo Gallery)
बकुलाही नदी तट पर स्थित बाबा भयहरणनाथ मंदिर परिसर, मुख्य शिखर, टीला, प्राचीन मूर्तियाँ और दर्शन के मूल छायाचित्र (बड़ा देखने के लिए किसी भी तस्वीर पर क्लिक करें):
🎥 बाबा भयहरणनाथ धाम: वीडियो दर्शन (Video Darshan)
बकुलाही नदी के किनारे स्थित बाबा भयहरणनाथ धाम परिसर और पावन शिवलिंग के सजीव वीडियो दर्शन:
🏛️ भयहरणनाथ धाम: श्रद्धालु, प्रशासन और पर्यटन विकास
यह धाम सिर्फ पूजा-पाठ की जगह नहीं है, बल्कि धार्मिक पर्यटन और महाभारत कालीन इतिहास का एक जीता-जागता केंद्र है। इसके विकास के लिए सरकार ने कदम भी उठाए हैं:
1. आम आदमी और श्रद्धालुओं के लिए
यहाँ आने वाला हर व्यक्ति महाभारत के उस दौर से जुड़ता है जब पांडव जंगलों में भटक रहे थे। यहाँ शिवजी की पूजा करने से मन का हर तरह का डर और घबराहट दूर होती है और नई ऊर्जा मिलती है।
2. सरकारी विकास योजना और प्रशासन का काम
मार्च 2021 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस धाम को बड़े धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए 49.25 लाख रुपये की धनराशि मंजूर की थी। यह विश्वनाथगंज विधानसभा क्षेत्र और प्रतापगढ़-प्रयागराज सीमा पर स्थित होने के कारण बहुत महत्वपूर्ण है। आगे इन कामों पर ध्यान देना जरूरी है:
- 2021 की स्वीकृत विकास योजना के बचे हुए कामों को तेजी से पूरा करना।
- सावन और महाशिवरात्रि में उमड़ने वाले कांवड़ियों के लिए पक्की सड़क, रोशनी, पानी और स्वास्थ्य सेवाएँ।
- प्रतापगढ़ के बाक़ी चार धामों से जोड़ने वाला एक सुगम "महाभारत-शिव सर्किट" तैयार करना।
- पौराणिक बकुलाही नदी (महाभारत की बालकुनी) के पानी को स्वच्छ रखना और उसके किनारों को मजबूत बनाना।
3. पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय के लिए
भारत में ऐसी बहुत कम जगहें हैं जहाँ महाभारत के अज्ञातवास की कहानी किसी खास जगह से सीधे जुड़ी मिलती हो। अगर महाकाल महोत्सव और घुघुरी उत्सव को पर्यटन कैलेंडर में प्रमुखता मिले, तो यहाँ देश भर से पर्यटक और इतिहास प्रेमी खिंचे चले आएंगे।
📍 बाबा भयहरणनाथ धाम कैसे पहुँचें (Travel Guide & Google Map)
भयहरणनाथ धाम प्रतापगढ़ और प्रयागराज दोनों शहरों से सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है:
| सफर का साधन | नजदीकी स्टेशन एवं दूरी | पहुँचने का आसान रास्ता |
|---|---|---|
| 🚆 रेल मार्ग (Train) | विश्वनाथगंज रेलवे स्टेशन (लगभग 16 किमी) प्रतापगढ़ जंक्शन (लगभग 30 किमी) प्रयागराज जंक्शन (लगभग 45 किमी) |
स्टेशन से कटरा गुलाब सिंह के लिए ऑटो, टैक्सी या बस आसानी से मिल जाती है। |
| 🚌 सड़क मार्ग (Bus/Road) | कटरा गुलाब सिंह बस स्टॉप (गाँव में ही) | प्रयागराज-अयोध्या राजमार्ग या मानधाता-विश्वनाथगंज मार्ग से कटरा गुलाब सिंह बाज़ार पहुँचें। बाज़ार से मंदिर मात्र कुछ ही दूरी पर है। |
| ✈️ हवाई मार्ग (Air) | प्रयागराज एयरपोर्ट (बमरौली) - लगभग 50 किमी | हवाई अड्डे से टैक्सी या गाड़ी बुक करके लगभग एक से डेढ़ घंटे में सीधा मंदिर पहुंचा जा सकता है। |
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (Frequently Asked Questions)
Q1. बाबा भयहरणनाथ धाम कहाँ है और यह क्यों इतना प्रसिद्ध है?
यह मंदिर उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में कटरा गुलाब सिंह गाँव में बकुलाही नदी के किनारे है। यह जगह प्रतापगढ़ और प्रयागराज की सीमा पर है। महाभारत काल में महाबली भीम ने यहाँ बकासुर राक्षस को मारकर इस शिवलिंग की स्थापना की थी।
Q2. इस मंदिर का नाम 'भयहरणनाथ' क्यों पड़ा?
बकासुर राक्षस के आतंक से लोग बहुत डरे रहते थे। भीम ने उस राक्षस को मारकर लोगों के मन का डर दूर किया और फिर शिवलिंग स्थापित किया। इसलिए लोगों ने इस रूप को 'भयहरणनाथ' यानी 'डर को दूर करने वाले बाबा' कहा।
Q3. यहाँ बंदर की समाधि क्यों बनी है?
बाज़ार में एक बंदरिया की अचानक मौत हो गई थी। उसका साथी नर बंदर खुद आगे-आगे चलकर लोगों को इस मंदिर तक लाया और शिवलिंग के सामने बैठ गया। लोगों ने उस बंदर के प्यार और वफ़ादारी का सम्मान करते हुए वहीं बंदरिया की समाधि बनाई और मंदिर भी बनवाया।
Q4. नागा बाबा और दाण्डी स्वामी कौन थे?
सदियों बाद जब यह मंदिर जंगल में खो गया था, तब नागा बाबा ने अकेले मेहनत करके और गाँववालों की मदद से इस मंदिर को फिर से खड़ा किया। दाण्डी स्वामी ने भी जीवन भर यहाँ सेवा की। दोनों संतों की समाधियाँ मंदिर में हैं।
Q5. दर्शन करने के लिए सबसे अच्छा दिन कौन सा है?
वैसे तो मंदिर हर दिन खुला रहता है, लेकिन हर मंगलवार को यहाँ खास पूजा होती है और लोग ध्वजा चढ़ाते हैं। महाशिवरात्रि पर यहाँ विशाल मेला लगता है और सावन में कांवड़िए जल चढ़ाते हैं।
Q6. बकुलाही नदी का पुराना नाम क्या था?
महाभारत के वन पर्व में इस नदी का नाम 'बालकुनी' मिलता है। सदियों में बोलचाल के बदलते-बदलते यह नाम आज 'बकुलाही नदी' बन गया है।
✨ आखिर में: इंसान के डर और भरोसे की सबसे सुंदर दास्तान
भयहरणनाथ धाम की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि डर से मुक्ति पाना इंसान की सबसे बड़ी चाहत रही है — चाहे वह द्वापर युग में बकासुर के आतंक से कांपता हुआ कोई गाँव हो, या आज की भागदौड़ में मन की शांति ढूँढता कोई आम इंसान। भीम ने राक्षस को मारकर लोगों को डर से आज़ाद कराया, नागा बाबा ने अकेले मेहनत करके इस धाम को फिर से जीवित किया, और एक बेज़ुबान बंदर के प्यार को भी इस धरती ने उतना ही आदर दिया जितना किसी संत को।
अगली बार जब आप कटरा गुलाब सिंह से होकर गुज़रें, तो याद रखिएगा — आप सिर्फ एक मंदिर के सामने नहीं, बल्कि महाभारत के अज्ञातवास की एक जीती-जागती निशानी के सामने खड़े हैं।
1. विकिपीडिया — भयहरणनाथ मन्दिर, प्रतापगढ़ ज़िला (उत्तर प्रदेश)
2. भारतकोश (bharatdiscovery.org) — प्रतापगढ़ ज़िला (कटरा गुलाब सिंह एवं बाबू गुलाब सिंह का इतिहास)
3. खास ख़बर (khaskhabar.com) — "पांडव युग के समय के मंदिर को विकसित करेगी योगी सरकार" (मार्च 2021)
4. घुइसरनाथ धाम प्रसार समिति (ghuisarnathdham.com) — "प्रतापगढ़ के पर्यटन स्थल बाबा भयहरणनाथ धाम"
5. प्रतापगढ़ HUB (pratapgarhup.in) — बाबा भयहरणनाथ मंदिर
(पारदर्शिता नोट: इस लेख में दी गई पौराणिक कथाएँ — जैसे बकासुर का वध और बंदर की समाधि — स्थानीय परंपरा और जनश्रुति पर आधारित हैं। सरकारी योजना (2021, 49.25 लाख रुपये) समाचार स्रोत पर आधारित तथ्य है और उसकी मौजूदा प्रगति की अलग से पुष्टि इस लेख में नहीं की गई है।)