प्रतापगढ़ में चिकित्सा और जनस्वास्थ्य का इतिहास: राजा उदयन के राजवैद्य से 14 पीएचसी और 1918 का प्रलय (गजेटियर 1980)
इंसान का सबसे बड़ा धन उसका स्वास्थ्य है। आज जब हम शहर के आधुनिक अस्पतालों या ब्लॉक के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) पर दवा लेने पहुंचते हैं, तो शायद हमें अंदाजा नहीं होता कि इस स्वास्थ्य तंत्र को खड़ा करने के पीछे हमारे पुरखों ने महामारियों के कितने खौफनाक दौर देखे हैं। कभी हैजे से पूरा का पूरा पुरवा उजड़ जाता था, तो कभी प्लेग के चूहों के डर से लोग कड़कड़ाती ठंड में घरों को छोड़कर बागों में झोपड़ी डालकर रहने को मजबूर हो जाते थे।
उत्तर प्रदेश जिला गजेटियर (1980) का अध्याय 16 (Medical and Public Health Services) बेल्हा के स्वास्थ्य इतिहास की एक अविश्वसनीय गाथा है। ईसा पूर्व 5वीं सदी में कौशाम्बी के राजा उदयन के राजवैद्य से लेकर, रानी रघुराज कुंवर का डफरिन अस्पताल, 1918 के स्पैनिश फ्लू का तांडव, 1973 में सीएमओ (CMO) पद का जन्म, और आंवला-बेझड़ का पोषक खानपान—आइए बहुत ही सरल और आत्मीय भाषा में जानें कि बेल्हा ने बीमारियों से लड़कर जिंदगी की जंग कैसे जीती।
1 प्राचीन आयुर्वेद, राजा उदयन के राजवैद्य और यूनानी हकीमों का दौर
प्रागैतिहासिक काल में जब चिकित्सा विज्ञान का विकास नहीं हुआ था, तब दुनिया भर की तरह प्रतापगढ़ के लोग भी बीमारियों को बुरी आत्माओं, दैवीय प्रकोप या भूत-प्रेत का साया मानते थे। उस समय झाड़-फूंक, मंत्रोच्चार, तावीज-गंडा और शांति यज्ञों के सहारे रोगों से मुक्ति की प्रार्थना की जाती थी।
लेकिन जैसे-जैसे वैदिक सभ्यता विकसित हुई, आयुर्वेद ('जीवन का विज्ञान') ने मानव सेवा की बागडोर संभाली। भगवान धनवंतरी, महर्षि चरक, सुश्रुत और वाग्भट की परंपरा में प्रशिक्षित वैद्य और कविराज नाड़ी देखकर, वात, पित्त और कफ (त्रिदोष) के असंतुलन को पहचानकर जड़ी-बूटियों, भस्मों और काढ़े से सटीक इलाज करने लगे।
गजेटियर में यह गौरवशाली ऐतिहासिक उल्लेख मिलता है कि ईसा पूर्व 5वीं शताब्दी में जब वर्तमान प्रतापगढ़ का भूभाग कौशाम्बी साम्राज्य के अंतर्गत आता था, तब राजा उदयन के दरबार में एक प्रधान 'राजवैद्य' (State Physician) नियुक्त थे। राजा उदयन चिकित्सा विज्ञान में गहरी रुचि रखते थे और उन्होंने अपने राज्य के बौद्ध विहारों (मठों) में आयुर्वेद और चिकित्सा शास्त्र की विधिवत शिक्षा का प्रबंध कराया था।
मध्यकाल में मुस्लिम शासन की स्थापना के साथ यूनानी चिकित्सा पद्धति का आगमन हुआ। कस्बों और बाजारों में हकीम साहब नब्ज देखकर यूनानी अर्क, खमीरा और माजून से इलाज करते थे। आयुर्वेद और यूनानी दोनों पद्धतियां बिना किसी विरोध के साथ-साथ फलीं-फूलीं। वहीं घावों की मरहम-पट्टी, फोड़े-फुंसी की चीर-फाड़ और टूटी हड्डियों को बैठाने का काम स्थानीय जर्राह (Jarrahs) करते थे, जो प्रायः नाई बिरादरी के हुनरमंद लोग होते थे।
2 अंग्रेजी हुकूमत, 1856 के बाद एलोपैथी और रानी रघुराज कुंवर का डफरिन अस्पताल
1856 में अंग्रेजों द्वारा अवध के अधिग्रहण के बाद जिले में आधुनिक पश्चिमी चिकित्सा यानी एलोपैथी (Allopathy) की नींव पड़ी। अंग्रेजी सरकार ने देशी पद्धतियों (आयुर्वेद व यूनानी) को उपेक्षित कर एलोपैथिक डिस्पेंसरी खोलना शुरू किया। जिले का सर्वोच्च चिकित्सा प्रशासनिक अधिकारी सिविल सर्जन (Civil Surgeon) होता था, जो जिला अस्पताल का प्रबंधन देखता था।
शुरुआत में जिले की तीनों तहसीलों—सदर (बेला), पट्टी और कुंडा मुख्यालयों पर जिला बोर्ड की डिस्पेंसरी खोली गईं। इसके अलावा जेल, पुलिस लाइन और रेलवे स्टेशन पर अलग अस्पताल बने।
🌸 रानी रघुराज कुंवर का महान दान: महिला डफरिन अस्पताल
उस दौर में पर्दा प्रथा और संकोच के कारण महिलाएं पुरुष डॉक्टरों के पास जाने से कतराती थीं, जिससे प्रसव के दौरान हजारों माताओं की अकाल मौत हो जाती थी। इस दर्द को बेल्हा के राजपरिवार ने समझा:
- अंतू के ताल्लुकदार की सुपुत्री और प्रतापगढ़ के राजा प्रताप बहादुर सिंह की धर्मपत्नी रानी रघुराज कुंवर ने अपने निजी दान और चंदे से महिलाओं के लिए अलग 'डफरिन अस्पताल' (Female Hospital) का भव्य निर्माण कराया।
- यह अस्पताल मातृ स्वास्थ्य का सबसे बड़ा सहारा बना, जिसका वर्ष 1946 में सरकार द्वारा प्रांतीयकरण कर दिया गया।
इसके अलावा राजा रामपाल सिंह ने धारूपुर और कालाकांकर में निजी अस्पताल बनवाए, राजा प्रताप बहादुर सिंह ने प्रतापगढ़ शहर में औषधालय खोला और कोर्ट ऑफ वार्ड्स ने डेरवा में डिस्पेंसरी स्थापित की, जहां ग्रामीणों को निशुल्क दवाएं बांटी जाती थीं।
3 जनसांख्यिकी और महाप्रलय: जब 1918 में मृत्यु दर 99 प्रति हजार पहुंच गई
पुराने सरकारी आंकड़ों की पड़ताल से पता चलता है कि सामान्य वर्षों में जन्म दर हमेशा मृत्यु दर से अधिक रहती थी। लेकिन जब कोई महामारी टूटती थी, तो मौत का ऐसा तांडव मचता था कि श्मशानों और कब्रिस्तानों में जगह कम पड़ जाती थी:
प्रतापगढ़ के इतिहास का सबसे काला वर्ष 1918 था। प्रथम विश्व युद्ध के अंतिम दिनों में दुनिया भर में फैले 'स्पैनिश इन्फ्लूएंजा' ने बेल्हा में ऐसा कहर बरपाया कि घर-घर लाशें बिछ गईं। लोग समझ ही नहीं पाए कि यह कैसा रहस्यमयी बुखार है:
- अकेले 1918 में बुखार (इन्फ्लूएंजा) से 64,828 लोगों की दर्दनाक मौत हुई!
- उसी साल प्लेग ने भी 3,272 लोगों की जान ले ली और हैजे ने 13,178 जिंदगियां लील लीं।
- जिले की मृत्यु दर सामान्य (20-25) से उछलकर सीधे 99.05 प्रति हजार के डरावने स्तर पर पहुंच गई, जबकि उस साल जन्म दर मात्र 37.41 थी। यानी पैदा होने वालों से ढाई गुना ज्यादा लोग काल के गाल में समा गए।
इसके अलावा 1897 के अकाल और चेचक में मृत्यु दर 42.08 रही थी, जबकि 1905 और 1908 में मलेरिया बुखार से क्रमशः 21,382 और 25,096 लोगों की जान गई थी। आज़ादी के बाद स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार से मृत्यु दर में भारी गिरावट आई और 1964 में यह घटकर मात्र 6.6 प्रति हजार रह गई।
4 तीन जानलेवा महामारियां: प्लेग, हैजा और चेचक का खौफनाक इतिहास
गजेटियर के अनुसार पुराने समय में तीन महामारियां सबसे ज्यादा तबाही मचाती थीं:
🐀 1. प्लेग (गांठ वाली बीमारी): चूहों की मौत और बागों में पलायन
जिले में प्लेग का पहला हमला साल 1902 में हुआ (280 मौतें)। माना जाता है कि मुंबई से लौटे कुछ जुलाहे अपने साथ इस बीमारी के पिस्सू लाए थे। अक्टूबर 1903 में प्लेग ने बेला शहर को जकड़ लिया और 1,205 मौतें हुईं।
प्रतापगढ़ के ग्रामीणों ने प्लेग से बचने का एक गजब का देशी तरीका सीख लिया था—जैसे ही घर में कोई मरा हुआ चूहा गिरता, लोग समझ जाते कि यमराज ने दस्तक दे दी है। पूरा गांव तुरंत पक्के मकान खाली कर देता था और जाड़े-बरसात की परवाह किए बिना खेतों और आम के बगीचों में फूस की झोपड़ियां (छावनी) बनाकर रहने लगता था। धूप और खुली हवा में रहने से संक्रमण टूट जाता था। 1951 में 431 मौतों के बाद प्लेग जिले से हमेशा के लिए विदा हो गया।
💧 2. हैजा (विब्रियो कोलेरी): कुओं में लाल दवा का पहरा
हैजा गर्मियों में दूषित पानी से फैलता था। 1891 में हैजे से 11,869, 1905 में 11,087 और 1918 में 13,178 मौतें हुई थीं। उल्टी-दस्त से कुछ ही घंटों में मरीज डिहाइड्रेशन का शिकार हो जाता था। आज़ादी के बाद कुओं में नियमित रूप से पोटैशियम परमैंगनेट (लाल दवा) डालने, ब्लीचिंग पाउडर के छिड़काव और शुद्ध पेयजल से इस पर काबू पाया गया।
💉 3. चेचक (शीतला माता): टीकों की विजय गाथा
1897 में चेचक से 4,316 मौतें हुई थीं। लोग इसे 'माता का कोप' मानकर नीम के पत्तों से झाड़ते थे। 1887 में बेला नगर पालिका में वैक्सीनेशन एक्ट लागू हुआ। 1903 में 22 सरकारी वैक्सीनेटरों ने 24,484 टीके लगाए। 1960 के दशक में चले राष्ट्रीय चेचक उन्मूलन अभियान के तहत घर-घर जाकर टीके लगाए गए, जिससे 1970 तक चेचक से होने वाली मौतें घटकर लगभग शून्य हो गईं।
5 प्रशासनिक पुनर्गठन: जुलाई 1973 में मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) का जन्म
पुराने समय में स्वास्थ्य विभाग दो फाड़ में बंटा हुआ था—अस्पतालों और डॉक्टरों की कमान सिविल सर्जन के हाथ में थी, जबकि सफाई, महामारी और टीकाकरण का जिम्मा जिला स्वास्थ्य अधिकारी (District Medical Officer of Health) संभालते थे। दोनों में अक्सर तालमेल की कमी रहती थी।
उत्तर प्रदेश सरकार ने जुलाई 1973 में पूरे राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं का ऐतिहासिक पुनर्गठन किया। जिले में सिविल सर्जन और जिला स्वास्थ्य अधिकारी के पदों को समाप्त कर दोनों विभागों का विलय कर दिया गया। जिले के पूरे चिकित्सा एवं स्वास्थ्य तंत्र का एक अकेला सर्वोच्च मुखिया बनाया गया, जिसे मुख्य चिकित्सा अधिकारी (Chief Medical Officer - CMO) का पदनाम दिया गया। उनकी सहायता के लिए डिप्टी सीएमओ (स्वास्थ्य) और डिप्टी सीएमओ (परिवार कल्याण) नियुक्त किए गए।
6 अस्पताल और डिस्पेंसरी संजाल: जिला अस्पताल, कैनोसा, ब्रिजेश सिंह व 14 पीएचसी
1970 के दशक तक जिले में स्वास्थ्य सुविधाओं का एक व्यवस्थित जाल तैयार हो चुका था:
🩺 8 एलोपैथिक डिस्पेंसरी और 14 आयुर्वेदिक-यूनानी औषधालय
ग्रामीण अंचल में 8 एलोपैथिक डिस्पेंसरी कार्यरत थीं: विश्वनाथगंज (8 बेड), धारूपुर (8 बेड), डालीपुर (6 बेड), कटरा गुलाब सिंह (3 बेड), मानिकपुर (8 बेड), पहाड़पुर (8 बेड), पृथ्वीगंज और संग्रामगढ़।
वहीं भारतीय चिकित्सा पद्धति के तहत सरकार 12 आयुर्वेदिक औषधालय (अंतू, अठेहा, गड़वारा, जमताली, लालगंज, लोकियापुर, उरैयाडीह, प्रतापगढ़ सिटी, पूरे धनु, रानीगंज, सैफाबाद आदि) और 2 यूनानी औषधालय (बहलोलपुर और सुवंसा) चलाती थी। इसके अलावा पट्टी तहसील के जागीपुर में 1970 में एक सरकारी होम्योपैथिक डिस्पेंसरी भी खोली गई।
🏥 14 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHCs)
जिले के सभी विकास खंडों में 14 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र स्थापित थे: सुखपालनगर, सांगीपुर, सांडवा चंद्रिका, लक्ष्मणपुर, मांधाता, सदर, डेरवा (बिहार), अमरगढ़ (आसपुर देवसरा), लालगंज, बाबागंज, पट्टी, शिवगढ़, कुंडा, मंगरौरा और गौरा। प्रत्येक पीएचसी पर एक मेडिकल ऑफिसर और कंपाउंडर तैनात थे, जो ओपीडी के साथ संक्रामक रोगों की रोकथाम संभालते थे।
7 मातृ-शिशु कल्याण, यूनिसेफ दूध योजना और परिवार नियोजन
शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए जिले में 15 मुख्य मातृ-शिशु कल्याण केंद्र और 58 उप-केंद्र (Sub-centres) बनाए गए थे। प्रत्येक केंद्र पर एक एएनएम (Midwife) और 2-3 प्रशिक्षित दाइयां तैनात थीं, जो गर्भवती माताओं के घर जाकर प्रसव पूर्व जांच और सुरक्षित डिलीवरी कराती थीं।
कुपोषण के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) के सहयोग से साल 1954 में जिले में निशुल्क सूखा दूध वितरण योजना शुरू हुई थी। मातृ-शिशु कल्याण केंद्रों के जरिए कमजोर गर्भवती व स्तनपान कराने वाली माताओं और नवजात शिशुओं को पोषक दूध का पाउडर मुफ्त दिया जाता था। यह योजना 1967 तक सफलतापूर्वक चली।
जनसंख्या नियंत्रण के लिए 1965 में परिवार नियोजन कार्यक्रम शुरू हुआ। पुरुष नसबंदी (Vasectomy) और महिला नसबंदी (Tubectomy) के लिए सचल टीमें (Mobile Teams) गांव-गांव कैंप लगाती थीं। 1965 से 1971 के बीच जिले में 7,800 से अधिक नसबंदी ऑपरेशन किए गए और 6,000 से अधिक लूप (IUCD) लगाए गए।
8 नेत्र चिकित्सालय और राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन का महाअभियान
आंखों की बीमारियों और मोतियाबिंद से ग्रामीणों को मुक्ति दिलाने के लिए 1956 में रेड क्रॉस के सहयोग से जिला नेत्र चिकित्सालय (District Eye Hospital, प्रतापगढ़) बना (36 बेड)। इसके साथ ही देश-प्रसिद्ध सीतापुर आंख अस्पताल (Sitapur Eye Hospital) की मोबाइल टीमें जिले भर में हर साल 17 बड़े कैंप लगाती थीं, जहां मोतियाबिंद के हजारों सफल ऑपरेशन किए जाते थे।
🦟 मलेरिया उन्मूलन: 100 हाउस विजिटर और 70,000 खून की जांच
मलेरिया से हर साल हजारों मौतें होती थीं। इसे जड़ से मिटाने के लिए 1959-60 में राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम (NMEP) शुरू हुआ। जिले में 1 एंटी-मलेरिया ऑफिसर, 8 इंस्पेक्टर, 25 सर्विलांस इंस्पेक्टर, 216 फील्ड वर्कर और 100 हाउस विजिटर तैनात किए गए:
- प्रत्येक हाउस विजिटर को 10 से 12 हजार की आबादी दी गई थी। वह महीने में दो बार हर घर का दरवाजा खटखटाकर बुखार के मरीजों की खोज करता था।
- मौके पर ही मरीज की उंगली से खून की स्लाइड बनाई जाती थी और उसे 4-एमिनोक्विनोलीन की गोलियां दी जाती थीं।
- स्लाइड लैब में पॉजिटिव आने पर 8-एमिनोक्विनोलीन का संपूर्ण इलाज दिया जाता था।
- साल में दो बार हर घर और मवेशियों के बाड़े में डीडीटी (DDT) का सघन छिड़काव होता था। 1968 से 1972 तक हर साल 70,000 से अधिक ब्लड स्लाइडों की जांच की गई, जिससे मलेरिया पर ऐतिहासिक जीत हासिल हुई।
9 पारंपरिक खानपान, आहार और पोषण: बेझड़, मोटे अनाज, आंवला और पोषण कमियां
गजेटियर का यह हिस्सा बेल्हा की खानपान संस्कृति का अद्भुत दस्तावेज है। 1970 के दशक में प्रतापगढ़ के लोगों का भोजन पूरी तरह स्थानीय और प्राकृतिक था:
गजेटियर विशेष रूप से दर्ज करता है कि आंवला (Emblica officinalis) विटामिन 'सी' का सबसे समृद्ध स्रोत है और प्रतापगढ़ के लोग इसे अपनी दैनिक खुराक में अचार, मुरब्बा और पाचक चूर्ण के रूप में प्रचुर मात्रा में खाते थे, जिससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) मजबूत रहती थी।
आहार की कमियां: गजेटियर के अनुसार उस दौर में जिले के आहार में दो बड़ी कमियां थीं—पहला, तेल-घी का उपभोग मात्र 10 ग्राम प्रतिदिन था (जबकि मानक 40 ग्राम था), और दूध का उत्पादन कम होने से प्रति व्यक्ति उपलब्धता 285 ग्राम से बहुत नीचे थी। साथ ही भोजन में विटामिन 'ए' की कमी के कारण बच्चों और बड़ों में रतौंधी (Night Blindness) और आंखों के सूखेपन (Xerosis) की बीमारी काफी देखी जाती थी।
📊 प्रामाणिक सांख्यिकीय सारणियां: महामारियां, डिस्पेंसरी और जनस्वास्थ्य आंकड़े
📈 1. जन्म-मृत्यु दर और महामारियों के दशकवार आंकड़े (1891-1930)
| दशक (Decade) | औसत जन्म दर (प्रति हजार) | औसत मृत्यु दर (प्रति हजार) | उच्चतम मृत्यु दर (वर्ष सहित) | प्रमुख कारण व महामारी |
|---|---|---|---|---|
| 1891-1900 | 34.29 | 34.75 | 42.08 (1897) | अकाल, चेचक (4,316 मौतें) और बुखार। |
| 1901-1910 | 41.44 | 36.26 | 52.82 (1905) | मलेरिया बुखार (21,382 मौतें) और हैजा (11,087 मौतें)। |
| 1911-1920 | 45.36 | 39.15 | 99.05 (1918) | स्पैनिश इन्फ्लूएंजा (64,828 मौतें), हैजा व प्लेग प्रलय। |
| 1921-1930 | 28.14 | 21.12 | 31.66 (1924) | महामारियों में कमी, स्वास्थ्य सेवाओं का धीमा सुधार। |
| 1951-1960 | 12.76 | 8.53 | — | आज़ादी के बाद टीकाकरण और एंटीबायोटिक दवाओं का असर। |
| 1964 | 12.90 | 6.60 | — | जिले के इतिहास की सबसे कम मृत्यु दर दर्ज। |
🏥 2. एलोपैथिक डिस्पेंसरी नेटवर्क (1970-71)
| डिस्पेंसरी का नाम | बेड संख्या (पुरुष / महिला) | डॉक्टर व स्टाफ | वार्षिक मरीज (ओपीडी) | वार्षिक खर्च (₹) |
|---|---|---|---|---|
| विश्वनाथगंज डिस्पेंसरी | 6 पुरुष / 2 महिला | 1 डॉक्टर + 3 स्टाफ | 12,280 मरीज | ₹10,000 |
| धारूपुर डिस्पेंसरी | 4 पुरुष / 4 महिला | 1 डॉक्टर + 3 स्टाफ | 5,500 मरीज | ₹11,231 |
| डालीपुर डिस्पेंसरी | 4 पुरुष / 2 महिला | 1 डॉक्टर + 3 स्टाफ | 6,254 मरीज | ₹10,000 |
| कटरा गुलाब सिंह डिस्पेंसरी | 2 पुरुष / 1 महिला | 1 डॉक्टर + 3 स्टाफ | 18,332 मरीज | ₹10,000 |
| मानिकपुर डिस्पेंसरी | 4 पुरुष / 4 महिला | 1 डॉक्टर + 3 स्टाफ | 5,500 मरीज | ₹15,647 |
| पहाड़पुर डिस्पेंसरी | 6 पुरुष / 2 महिला | 1 डॉक्टर + 3 स्टाफ | 7,820 मरीज | ₹10,000 |
| पृथ्वीगंज डिस्पेंसरी | ओपीडी केवल | 1 डॉक्टर + 3 स्टाफ | 15,106 मरीज | ₹10,000 |
| संग्रामगढ़ डिस्पेंसरी | ओपीडी केवल | 1 डॉक्टर + 3 स्टाफ | 3,352 मरीज | ₹12,872 |
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
महिला डफरिन अस्पताल का निर्माण अंतू के ताल्लुकदार की बेटी और राजा प्रताप बहादुर सिंह की धर्मपत्नी रानी रघुराज कुंवर ने अपने निजी दान से कराया था। इसका उद्देश्य पर्दानशीं महिलाओं को सुरक्षित प्रसव और सम्मानजनक इलाज दिलाना था। 1946 में इसका प्रांतीयकरण हुआ।
1918 में प्रथम विश्व युद्ध के समय दुनिया भर में फैले स्पैनिश इन्फ्लूएंजा (बुखार), प्लेग और हैजे के भीषण प्रकोप के कारण अकेले बुखार से 64,828 और प्लेग से 3,272 मौतें हुई थीं, जिससे एक ही साल में 68,000 से अधिक लोग मारे गए और मृत्यु दर 99.05 पहुंच गई।
जुलाई 1973 में उत्तर प्रदेश सरकार ने सिविल सर्जन (चिकित्सा) और जिला स्वास्थ्य अधिकारी (जनस्वास्थ्य) के पदों का एकीकरण कर पूरे जिले के स्वास्थ्य प्रशासन का सर्वोच्च पद 'मुख्य चिकित्सा अधिकारी' (CMO) बनाया।
जैसे ही घर में कोई चूहा मरकर गिरता, ग्रामीण समझ जाते थे कि प्लेग फैल चुका है। वे तुरंत पक्के मकान खाली कर देते थे और खेतों व आम के बगीचों में फूस की झोपड़ियां बनाकर रहते थे। धूप और हवा के कारण संक्रमण रुक जाता था।
लोगों का मुख्य भोजन गेहूं-चावल और बेझड़ (गेहूं-चना, जौ-चना) था, जबकि दालों में अरहर-उड़द प्रमुख थी। विटामिन 'सी' के सबसे बड़े खजाने के रूप में आंवला का मुरब्बा, अचार और चूर्ण हर घर में खाया जाता था।
उत्तर प्रदेश जिला गजेटियर (1980) का यह 16वां अध्याय हमें यह एहसास कराता है कि आज हम जिस आधुनिक स्वास्थ्य सुविधा और लंबी औसत आयु का उपभोग कर रहे हैं, वह हमारे पुरखों की अनगिनत कुर्बानियों और संघर्षों का फल है। 1918 के महाप्रलय और प्लेग-हैजे के खौफ से निकलकर 14 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, रानी रघुराज कुंवर के डफरिन अस्पताल, मलेरिया उन्मूलन और आंवले की अमृतमयी परंपरा ने बेल्हा को एक स्वस्थ और सशक्त समाज के रूप में पुनर्जीवित किया।