महाकवि भिखारीदास: टेंउगा गाँव से राजदरबार तक — एक अनोखे आचार्य की जमीनी दास्तान (Mahakavi Bhikhari Das Biography, Teonga Pratapgarh, Kavya Nirnay, Hindupat Singh Court, Ritikaal Hindi Sahitya)
"आगे के सुकवि रीझिहैं तो कविताई, न तु राधिका कन्हाई सुमिरन को बहानो है" — जिसने महलों की झूठी चापलूसी के बीच कविता को उसका पहला ठोस कानून दिया
ज़रा सोचिए, क्या आपने कभी किसी ऐसे विद्वान के बारे में सुना है जिसने खुद अपना नाम 'भिखारी' रख लिया हो, लेकिन जिसके सामने उस दौर के बड़े-बड़े राजा, नवाब और काशी के प्रकांड पंडित सिर झुकाकर बैठते थे? एक ऐसा सीधा-साधा इंसान जो प्रतापगढ़ के एक छोटे से गाँव टेंउगा में मिट्टी और खपरैल के घर में रहता था, लेकिन जिसकी नजर इतनी पैनी थी कि जब उस जमाने के राजे-रजवाड़े महलों में बैठकर सिर्फ शतरंज के खेल में अपना वक्त और दौलत उड़ा रहे थे, तब उसने पूरी 64 खानों की बिसात, एक-एक मोहरे की चाल और शह-मात के दांव-पेंच पर कविता की दुनिया की पहली मुकम्मल किताब लिख डाली!
और सबसे मजेदार बात जानते हैं क्या है? उस 18वीं सदी के दौर में जब सारे दरबारी कवि केवल राजा को रिझाने और सोने के सिक्के बटोरने के लिए झूठी तारीफों के पुल बांध रहे थे, तब इस इंसान ने समाज के तानों का जवाब बड़ी बेबाकी और ईमानदारी से दिया। उसने साफ-साफ कह दिया — "अगर आगे आने वाले समझदार लोग मेरी बात को परखेंगे और उन्हें इसमें दम लगेगा, तो इसे कविता मान लेना; वरना कम से कम इसी बहाने मैंने भगवान का नाम तो ले लिया!" यह कोई मनगढ़ंत किस्सा नहीं, बल्कि प्रतापगढ़ की माटी के बेटे भिखारीदास की असली जिंदगी की कहानी है — जिसे आज 300 साल बाद भी साहित्य का सबसे बड़ा नियम बनाने वाला आचार्य माना जाता है।
वे सिर्फ दोहे गढ़ने वाले कवि नहीं थे, बल्कि उन्होंने कविता लिखने के कायदे-कानून (रस, छंद, तुक, अलंकार) को पहली बार एक नियम-किताब (काव्य-निर्णय) में बांध दिया।
इनका जन्म प्रतापगढ़ शहर से सिर्फ 4 किमी दूर टेंउगा गाँव (पिन 230002) में 1721 ई. के करीब हुआ था। ये पढ़े-लिखे श्रीवास्तव कायस्थ परिवार से थे।
प्रतापगढ़ के सोमवंशी राजा पृथ्वीपति सिंह के भाई बाबू हिंदूपति सिंह ने इन्हें अपने दरबार में रखा और किताबें लिखने के लिए पूरा खर्चा व सम्मान दिया।
संवत 1803 (सन् 1746) में लिखी गई यह किताब हिंदी की पहली ऐसी गाइड बनी, जिसे पढ़कर कोई भी नया इंसान समझ सकता था कि अच्छी कविता कैसे लिखी जाती है।
यह पूरी दुनिया की इकलौती ऐसी किताब है जिसमें शतरंज के 64 खानों, वजीर, हाथी, घोड़े की चालों और मात देने के गुर को दोहों व छंदों में सिखाया गया है।
इन्होंने तुलसीदास का उदाहरण देकर समझाया कि ब्रजभाषा में अवधी व गाँव-घर की बोलियों का मेल ही भाषा को असली ताकत देता है, न कि भारी-भरकम संस्कृत के शब्द।
"आगे के सुकवि रीझिहैं तो कविताई, न तु राधिका कन्हाई सुमिरन को बहानो है।"
— महाकवि भिखारीदास (काव्य-निर्णय) | दरबारी चापलूसी के दौर में एक सच्चे कवि का बेबाक सचटेंउगा गाँव की माटी, कायस्थ कुल और वंशावली के पक्के सबूत
बात करीब तीन सौ साल पुरानी है, जब 18वीं सदी की शुरुआत (लगभग सन् 1721 या संवत 1778) का दौर था। प्रतापगढ़ शहर के घंटाघर से कटरा जाने वाली सड़क पर सिर्फ चार किलोमीटर आगे बढ़िए, तो बाईं तरफ सई नदी के कछार से सटा एक पुराना गाँव मिलता है — टेंउगा (जिसे सरकारी कागजों और पुरानी पोथियों में 'ट्योंगा' या 'ट्योंग' भी लिखा गया है, पिनकोड 230002)। इसी गाँव के एक सीधे-सादे कायस्थ परिवार में एक बच्चे की किलकारी गूंजी, जिसका नाम रखा गया भिखारीदास।
अब आपके मन में एक सीधा सवाल उठेगा कि जब परिवार कायस्थ था और घर में पढ़ने-लिखने का माहौल था, तो बच्चे का नाम 'भिखारी' क्यों रखा गया? गाँव-देहात के लोग इस बात को बहुत अच्छी तरह समझते हैं। पुराने जमाने में जब किसी घर में बच्चे बचपन में बार-बार बीमार पड़ते थे या नजर लगने का डर होता था, तो माँ-बाप बच्चे को नजर-दोष और बुरी बला से बचाने के लिए जानबूझकर 'भिखारी', 'घुरहू' या 'फेकू' जैसा नाम रख देते थे ताकि यमराज की नजर उस पर न पड़े! आगे चलकर यही भिखारीदास अपनी कलम की ताकत से पूरे देश के सबसे धनी आचार्य बने।
"पूरब जनम सुकृत कछु कीन्हें। श्री राधावर सुजस सु दीन्हें॥
श्रीवास्तव कुल कायथ जाना। हरिकृष्णदास प्रपितामह माना॥
पितामह वीरभानु विख्याता। कृपालदास पितु जग रस ज्ञाता॥
तिनके सुत भिखारीदास नामा। करै काव्य-निरनय गुन धामा॥"
ज़रा इस चार लाइन के दोहे को गौर से देखिए। भिखारीदास जी ने कोई मनगढ़ंत किस्सा नहीं गढ़ा, बल्कि अपने परदादा (हरिकृष्णदास), दादा (वीरभानु) और पिता (कृपालदास) का नाम साफ-साफ दर्ज कर दिया। उनके पिता कृपालदास उस दौर के पढ़े-लिखे इंसान थे जो फारसी के साथ-साथ संस्कृत की पोथियों का हिसाब-किताब जानते थे।
बाबू हिंदूपति सिंह का दरबार: 18वीं सदी के प्रतापगढ़ का असली माहौल
18वीं सदी के उस दौर में दिल्ली की गद्दी कमजोर हो रही थी और अवध के नवाब चारों तरफ अपनी पकड़ मजबूत करने में लगे थे। ऐसे नाजुक वक्त में प्रतापगढ़ पर सोमवंशी क्षत्रिय राजाओं का राज था। प्रतापगढ़ का किला उस समय राजनीति और लड़ाइयों का बड़ा केंद्र था। उस समय वहाँ के शासक राजा पृथ्वीपति सिंह थे, और उनके सगे छोटे भाई थे — बाबू हिंदूपति सिंह।
अब यहाँ हमें बिना किसी लाग-लपेट के इतिहास की कड़वी सच्चाई को समझना होगा। उस जमाने में राजा-महाराजाओं के पास रहने वाले दरबारी कवियों का काम सिर्फ एक होता था — राजा जब सोकर उठे तो उसकी झूठी वीरता की तारीफ करो, राजा जब खाना खाए तो उसकी सुंदरता के गीत गाओ, और बदले में राजा से अशर्फियां, घोड़े या गाँव की जागीर बटोर लो! इसे साहित्य की दुनिया में 'दरबारी चापलूसी' कहा जाता है।
- रोजी-रोटी का सहारा: भिखारीदास कोई अमीर खानदान के नहीं थे। उन्हें किताबें लिखने, कागज जुटाने और परिवार पालने के लिए किसी बड़े आश्रयदाता की जरूरत थी, जो उन्हें बाबू हिंदूपति सिंह ने दी।
- चापलूसी से बचकर ठोस काम: भिखारीदास ने राजा की शान में दो-चार दोहे जरूर कहे (जो उस दौर की मजबूरी थी), लेकिन उनका 90% ध्यान इस बात पर रहा कि वे भाषा के ऐसे नियम बनाएं जो राजा के मरने के बाद भी सदियों तक काम आएं।
- शतरंज और साहित्य की बैठकी: बाबू हिंदूपति सिंह को शतरंज खेलने और विद्वानों से शास्त्रार्थ सुनने का बड़ा शौक था। भिखारीदास जी उनके इस शौक को साहित्यिक गहराई में बदल देते थे।
लेकिन रुकिए, असल बात तो इसके बाद सामने आती है! भिखारीदास जी ने बाबू हिंदूपति सिंह को सिर्फ अपना अन्नदाता नहीं माना, बल्कि उनके साथ एक दोस्त और गुरु जैसा रिश्ता निभाया। जब राजदरबार में काशी और कन्नौज के पंडित संस्कृत में धौंस जमाने की कोशिश करते, तो भिखारीदास जी अपनी सरल ब्रजभाषा में ऐसे सटीक तर्क रखते कि सामने वाले निरुत्तर हो जाते थे।
इतिहास के पन्ने बताते हैं कि राजा पृथ्वीपति सिंह और अवध के नवाब सफदरजंग के बीच भारी तनाव चल रहा था। युद्ध के बादल हमेशा सिर पर मंडराते रहते थे। ऐसे अशांत दौर में बाबू हिंदूपति सिंह के महल में बैठकर शांत मन से सात-सात विशाल किताबों की रचना करना किसी तपस्या से कम नहीं था।
'काव्य-निर्णय': जब कविता को मिला उसका पहला मुकम्मल कानून
संवत 1803 (यानी सन् 1746 ईस्वी) में भिखारीदास जी ने अपनी सबसे मशहूर किताब पूरी की, जिसका नाम रखा — 'काव्य-निर्णय' (Kavya-Nirnay)। अब ज़रा सीधे शब्दों में समझिए कि यह किताब क्या है और इसे लेकर साहित्य की दुनिया में इतना हल्ला क्यों मचता है?
जैसे अगर किसी मिस्त्री को मजबूत मकान बनाना हो, तो उसे पता होना चाहिए कि ईंट कहाँ लगेगी, गारा कितना पड़ेगा और छत का ढलाव किधर होगा। अगर बिना नाप-जोख के दीवार खड़ी कर दी जाए, तो मकान पहली ही बारिश में ढह जाएगा! ठीक वैसे ही, 300 साल पहले लोग तुकबंदी तो कर लेते थे, लेकिन किसी को यह पक्का पता नहीं था कि अच्छी कविता के नियम क्या हैं। भिखारीदास जी ने 'काव्य-निर्णय' लिखकर कविता की नाप-जोख का पूरा पैमाना तय कर दिया।
"रस कविता को अंग, भूषण है भूषण सुखद।
दोष कंत कर रूप, गुन जो कवितन में लहैं॥"
भिखारीदास जी ने इसे समझाने के लिए कितना सीधा और सुंदर उदाहरण दिया, ज़रा देखिए: उन्होंने कहा कि कविता एक जीते-जागते इंसान के शरीर जैसी है। जैसे इंसान के सीने में धड़कता दिल और उसकी जान सबसे जरूरी है, वैसे ही कविता की जान 'रस' (मन को छू लेने वाला भाव) है। कविता के शब्द और उनके मायने उसके हाथ-पैर हैं। उसकी स्वाभाविक अच्छाई और सच्चाई उसके गुण हैं। और अलंकार (उपमा, रूपक वगैरह) क्या हैं? वे औरत के गले के हार और कानों की बाली जैसे गहने हैं! अगर किसी मुर्दे के ऊपर सोने के भारी गहने लाद दिए जाएं, तो क्या वह जिंदा कहलाएगा? कभी नहीं! इसलिए कविता में सिर्फ भारी शब्द ठूंसने से कुछ नहीं होता, जब तक कि उसमें दिल को छूने वाला सच्चा दर्द या खुशी न हो।
- अभिधा (सीधा मतलब): अगर कोई कहे "सूरज डूब गया", तो इसका सीधा मतलब है कि शाम हो गई और दिन ढल गया।
- लक्षणा (इशारे का मतलब): खेत में हल चला रहे किसान या गाय चरा रहे ग्वाले के लिए इसका मतलब है — "अब काम समेटो और मवेशियों को लेकर घर की तरफ लौटो।"
- व्यंजना (गहरा छिपा हुआ मतलब): घर में बैठी माँ या बहू के लिए इसका मतलब है — "चूल्हा सुलगाने और दाल-रोटी पकाने का वक्त हो गया, दीया-बत्ती जलाओ।"
भिखारीदास जी ने यही समझाया कि एक अच्छा कवि वही है जो सीधे शब्दों के पीछे छिपे गहरे इशारों को पहचानकर जनता के दिलों पर राज करे।
'छंदोर्णव पिंगल': जब गाँव के दोहों को मिला वैज्ञानिक ढांचा
संवत 1799 (सन् 1742 ईस्वी) में भिखारीदास जी ने एक और विशाल ग्रंथ रचा, जिसका नाम था 'छंदोर्णव पिंगल' (Chhandornav Pingal)। 'छंदोर्णव' नाम भले ही भारी लगे, लेकिन इसका मतलब बहुत सीधा है — 'छंदों का गहरा समंदर'।
गाँव का कोई भी किसान जब खेत में काम करते हुए बिरहा गाता है, या चौपाल पर आल्हा-ऊदल की गाथा गाई जाती है, तो उसमें एक खास लय और ताल होती है। अगर ताल बिगड़ी, तो सुनने वाले का कान खटकने लगता है। इसी ताल और मात्राओं की गिनती को साहित्य में 'छंद' (Meter) कहा जाता है।
जैसे खेत के चारों तरफ बांधी गई मेड़ (आड़) पानी को बाहर बहने से रोकती है और फसल को महफूज रखती है, ठीक वैसे ही 'छंद' शब्दों की मेड़ है, जो कविता के भावों को बिखरने से रोकती है। अगर मेड़ टूटी तो पानी बह जाएगा, और अगर छंद टूटा तो कविता बेसुरी होकर बिखर जाएगी!
भिखारीदास जी से पहले कवियों को छंद सीखने के लिए संस्कृत के पिंगल आचार्यों के चक्कर काटने पड़ते थे। भिखारीदास जी ने क्या किया? उन्होंने संस्कृत के 160 कठिन छंदों के साथ-साथ आम जनता में गाए जाने वाले दोहा, सोरठा, चौपाई, कवित्त, सवैया, छप्पय और कुंडलिया जैसे सैकड़ों छंदों को एक जगह इकट्ठा किया और हर एक की मात्राओं को गिनने का ऐसा आसान तरीका बताया कि कोई भी नया सीखने वाला आसानी से समझ जाए।
'शतरंज-शतिका': 64 खानों के खेल पर दुनिया की पहली काव्यात्मक किताब
अब कहानी में एक ऐसा मोड़ आता है जो दुनिया के किसी भी शोधार्थी को हैरान कर देगा। क्या आपने कभी सोचा है कि जिस शतरंज (Chess) को आज कंप्यूटर और ऐप पर खेला जाता है, उस पर 300 साल पहले किसी कवि ने पूरी की पूरी दोहों की किताब लिख दी होगी?
जी हाँ! भिखारीदास जी ने लगभग सन् 1743 के आसपास 'शतरंज-शतिका' (Shatranj Shatika) नाम की एक ऐसी किताब लिखी जो पूरी दुनिया के साहित्य में बेजोड़ है। इस किताब में लगभग 100 दोहों और छंदों के जरिए लकड़ी के 64 कोठों (खानों) की बिसात पर चलने वाले एक-एक मोहरे की चाल को कविता में पिरो दिया गया।
"राजा फरजी फील असु, पैदल रुख अधिकार।
चौसठि कोठे की बिसात, खेलत सब संसार॥"
(देसी मतलब: राजा, वजीर यानी फरजी, हाथी यानी फील, घोड़ा यानी असु, ऊंट यानी रुख, और पैदल सिपाही — इन सबकी अपनी-अपनी हैसियत और चाल है। यह 64 खानों का तख्ता असल में इस दुनिया का आईना है, जहाँ हर इंसान जिंदगी की बाजी खेल रहा है!)
बाबू हिंदूपति सिंह शाम के वक्त जब अपने दीवानखाने में शतरंज की बाजी लगाते थे, तो मोहरों की चालों पर अक्सर बहस छिड़ जाती थी। भिखारीदास जी ने देखा कि खेल के कोई पक्के लिखित नियम न होने से लोग आपस में उलझते हैं। तब उन्होंने कलम उठाई और घोड़े की अढ़ाई चाल, हाथी की सीधी मार, ऊंट की तिरछी चाल और प्यादे के वजीर बनने तक के सारे दांव-पेंच दोहों में लिख दिए!
- प्यादे की ताकत: भिखारीदास ने दिखाया कि छोटा सा पैदल सिपाही अगर धैर्य रखकर आगे बढ़ता रहे, तो वह भी एक दिन वजीर बनकर पूरी बाजी पलट सकता है — ठीक वैसे ही जैसे एक गरीब किसान का बेटा अपनी मेहनत से बड़ा अफसर बन सकता है।
- घमंड की हार: अगर राजा अपनी हिफाजत भूलकर केवल अपनी ताकत के घमंड में रहे, तो सामने वाले का एक मामूली मोहरा भी उसे शह-मात देकर ढेर कर सकता है।
- मन की शांति: जल्दबाजी में उठाया गया कदम बाजी हरवा देता है, चाहे वह शतरंज की बिसात हो या जिंदगी का फैसला।
सप्त ग्रंथावली: महाकवि भिखारीदास की 7 प्रामाणिक किताबों का सच
काशी की नागरी प्रचारिणी सभा और देश के बड़े इतिहासकारों ने पुरानी पांडुलिपियों की जांच करके यह साबित किया है कि भिखारीदास जी ने कुल सात प्रामाणिक ग्रंथों (सप्त ग्रंथावली) की रचना की थी। इनमें से हर किताब अपने आप में एक अलग विषय को लेकर चलती है।
आइए नीचे दी गई इस सारणी में देखें कि किस किताब में क्या खास बात लिखी गई है:
| किताब का नाम | लिखने का समय | इसमें क्या लिखा है? | इसका जमीनी महत्व |
|---|---|---|---|
| रस-सारांश (Ras-Saransh) | संवत 1799 (1742 ई.) | इंसानी जज्बातों, सुख-दुख और प्रेम के अलग-अलग रूपों की समझ। | बिना किसी अश्लीलता के इंसानी रिश्तों का बड़ा ही मर्यादित और साफ-सुथरा चित्रण। |
| काव्य-निर्णय (Kavya-Nirnay) | संवत 1803 (1746 ई.) | कविता लिखने के कायदे-कानून, शब्द-शक्तियां, तुक और अलंकार। | भिखारीदास की सबसे महान किताब; इसे हिंदी कविता का संविधान कहा जाता है। |
| शृंगार-निर्णय (Shringar-Nirnay) | संवत 1807 (1750 ई.) | राधा और कृष्ण के प्रेम, विरह और मिलन के सुंदर दोहे। | उस दौर की दरबारी वासना से अलग हटकर ईश्वरीय और पावन प्रेम की प्रस्तुति। |
| छंदोर्णव पिंगल (Chhandornav) | संवत 1799 (1742 ई.) | संस्कृत और हिंदी के सैकड़ों छोटे-बड़े छंदों की मात्राओं की गिनती। | छंदशास्त्र का सबसे बड़ा विश्वकोश; कवियों के लिए सबसे जरूरी गाइड। |
| अमरकोश / शब्दनाम प्रकाश | संवत 1795 (1738 ई.) | संस्कृत डिक्शनरी 'अमरकोश' का आसान ब्रजभाषा में दोहा-अनुवाद। | हिंदी का पहला पद्य शब्दकोश (Thesaurus), ताकि नए कवियों को नए शब्द मिलें। |
| विष्णु पुराण भाषा | संवत 1810 के आसपास | संस्कृत के विष्णुपुराण की धार्मिक कथाओं का आसान चौपाइयों में अनुवाद। | गाँव-देहात की आम जनता तक पुराणों की सच्ची सीख पहुँचाने वाली धार्मिक किताब। |
| शतरंज-शतिका (Shatranj Shatika) | संवत 1800 के लगभग | शतरंज के खेल की बिसात, मोहरे, शह-मात और दांव-पेंच के दोहे। | पूरी दुनिया में किसी खेल पर लिखी गई अपनी तरह की पहली और इकलौती काव्यात्मक किताब। |
ब्रजभाषा का खुलापन: तुलसीदास, कवि गंग और रामचंद्र शुक्ल की निष्पक्ष समीक्षा
अब आइए उस मुद्दे पर बात करते हैं जो किसी भी भाषा के जिंदा रहने के लिए सबसे जरूरी है — वह है भाषा की आजादी और खुलापन। 18वीं सदी में मथुरा और आगरा के कुछ किताबी विद्वान यह जिद पकड़कर बैठे थे कि ब्रजभाषा केवल वही सही है जो उनके इलाके में बोली जाती है। अगर कोई बाहर का शब्द आया, तो वे नाक-भौं सिकोड़ने लगते थे।
प्रतापगढ़ के इस सपूत ने इस संकीर्ण सोच को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि भाषा कोई बंद कुआं नहीं है जिसमें सड़ांध पैदा हो जाए; भाषा तो गंगा जैसी बहती नदी है, जिसमें जहाँ से भी अच्छी धारा मिले, उसे मिला लेना चाहिए! उन्होंने तुलसीदास जी और अकबर के दरबारी कवि गंग का उदाहरण देकर एक ऐतिहासिक दोहा कहा:
"तुलसी गंग दुवौ भए, सुकविन के सरदार।
इनके काव्यन में मिली, भाषा विविध प्रकार॥
ब्रजभाषा भाषा रुचिर, कहैं सुकवि बहु मान।
सो मिलि कै भाषा भई, सबही सों पहिचान॥"
ज़रा गहराई से समझिए कि भिखारीदास जी यहाँ क्या कह रहे हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी मूल रूप से अवधी के कवि थे जिन्होंने रामचरितमानस लिखी। लेकिन जब उन्होंने ब्रजभाषा में 'विनय पत्रिका' या 'कवितावली' लिखी, तो उसमें अवधी, भोजपुरी और बुंदेली के शब्द भी बड़ी खूबसूरती से घुलमिल गए। भिखारीदास ने कहा कि इससे ब्रजभाषा कमजोर नहीं हुई, बल्कि उसकी छाती और चौड़ी हो गई और वह पूरे उत्तर भारत के जन-जन की भाषा बन गई!
- कहाँ मजबूत थे भिखारीदास? आचार्य शुक्ल ने माना कि रीतिकाल में भिखारीदास से बड़ा 'व्यवस्थापक' और 'लक्षणकार' कोई नहीं हुआ। उन्होंने संस्कृत के कठिन ज्ञान को हिंदी में सबसे ज्यादा स्पष्ट और व्यवस्थित तरीके से पेश किया।
- कहाँ कमी रह गई? शुक्ल जी ने यह भी साफ लिखा कि भिखारीदास में घनानंद जैसी तड़प और दिल को चीर देने वाली बेकाबू भावुकता नहीं थी। वे एक भावुक प्रेमी कवि कम, और एक समझदार, गंभीर अध्यापक और शास्त्रकार ज्यादा थे।
- तुकबंदी का पहला नियम: भिखारीदास जी ने पहली बार बताया कि दोहे के अंत में मिलने वाली 'तुक' (Rhyme) शुद्ध होनी चाहिए। उन्होंने 'दोषपूर्ण तुक' को पकड़ने का ऐसा नियम बनाया जिसने आगे चलकर आधुनिक हिंदी को रास्ता दिखाया।
भभुआ में अंतिम सांस: एक युग का शांत होना और आज के लिए सबक
जिंदगी के आखिरी पड़ाव में, जब उम्र ढलने लगी, तो भिखारीदास जी तीर्थाटन और ज्ञान के विस्तार के लिए पूरब की दिशा में निकले। उस समय बिहार का शाहाबाद इलाका विद्या का बड़ा केंद्र हुआ करता था। ऐतिहासिक साक्ष्यों और स्थानीय परंपरा के मुताबिक, लगभग सन् 1773 (संवत 1830 के आसपास) आरा के पास कैमूर की पहाड़ियों की तलहटी में बसे भभुआ (बिहार) में इस महान साहित्य-साधक ने अपनी अंतिम सांस ली और दुनिया को अलविदा कह दिया।
उनका जाना एक युग का शांत होना था। लेकिन क्या भिखारीदास सचमुच चले गए? जब तक हिंदी में कविता लिखी जाएगी, जब तक दोहे की मात्राएं गिनी जाएंगी, और जब तक यह बहस चलेगी कि भाषा को कैसा होना चाहिए — तब तक प्रतापगढ़ के टेंउगा गाँव का यह 'भिखारी' अमर रहेगा।
आज की युवा पीढ़ी, जो सोशल मीडिया पर चंद लाइक्स के लिए कुछ भी लिख देती है, उसे भिखारीदास के जीवन से सीखना चाहिए। उन्होंने कभी सस्ते प्रचार के पीछे भागकर हल्की चीजें नहीं लिखीं। उन्होंने जो भी लिखा, पूरी ईमानदारी, ठोस तैयारी और जिम्मेदारी के साथ लिखा।
उनका वही अमर दोहा आज भी हर उस इंसान का मार्गदर्शन करता है जो समाज के तानों से डरे बिना अपनी धुन में सच्चा काम करना चाहता है:
"आगे के सुकवि रीझिहैं तो कविताई, न तु राधिका कन्हाई सुमिरन को बहानो है।"
— अपनी कला में घमंड न करने और परमात्मा को सब कुछ सौंप देने की सर्वोच्च विनम्रता🔍 महाकवि भिखारीदास के बारे में गूगल पर खोजे जाने वाले सभी प्रश्न
गूगल और इंटरनेट पर रीतिकाल के सिरमौर आचार्य महाकवि भिखारीदास के जीवन, काव्य-निर्णय, शतरंज-शतिका, टेंउगा गाँव व प्रमुख ऐतिहासिक तथ्यों को लेकर सबसे ज़्यादा पूछे जाने वाले प्रामाणिक सवाल व जवाब
वे 18वीं सदी के मूर्धन्य रीतिकालीन आचार्य व कवि थे। उन्होंने संस्कृत काव्य-शास्त्र के गूढ़ नियमों (रस, छंद, अलंकार, काव्य-दोष) को अत्यंत सरल, व्यवस्थित और वैज्ञानिक तरीके से जनभाषा ब्रजभाषा में प्रस्तुत किया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उन्हें रीतिकाल का सबसे बड़ा व्यवस्थापक और शिक्षक माना है।
उनका जन्म लगभग सन् 1721 (संवत 1778) में प्रतापगढ़ ज़िले के ऐतिहासिक टेंउगा (ट्योंगा) गाँव (पिन 230002, कटरा रोड) में हुआ था। वे श्रीवास्तव कायस्थ कुल के सपूत थे, जिनके पिता का नाम कृपालदास, दादा का नाम वीरभानु और परदादा का नाम हरिकृष्णदास था।
नहीं, वे एक प्रतिष्ठित और शिक्षित कायस्थ कुल से थे। अवध की लोक-परंपरा में नवजात शिशु को बुरी नजर व अकाल मृत्यु से बचाने हेतु टोटके के रूप में ऐसा विनम्र नाम (जैसे भिखारी, फेंकू, घुरहू) रखने का रिवाज था। आगे चलकर उन्होंने इसी नाम को अपनी निरहंकारिता और ईश्वर-समर्पण का प्रतीक बना लिया।
वे प्रतापगढ़ रियासत के सोमवंशी राजा पृथ्वीपति सिंह के छोटे भाई बाबू हिंदूपति सिंह के राजदरबार में सम्मानित राजकवि व विद्वान सलाहकार थे। बाबू हिंदूपति सिंह स्वयं साहित्य और शतरंज के बड़े पारखी थे, जिनकी छत्रछाया में भिखारीदास जी ने अपनी अमर कृतियों का सृजन किया।
संवत 1803 (1746 ई.) में रचित 'काव्य-निर्णय' काव्य-शास्त्र का सबसे प्रामाणिक ग्रंथ है। इसमें उन्होंने कविता के अंगों—रस, भाव, अलंकार, गुण और दोषों का ऐसा सांगोपांग वैज्ञानिक विवेचन किया जिसने पहली बार उत्तर भारत के कवियों को सिखाया कि सामान्य तुकबंदी और कालजयी कविता में क्या अंतर होता है।
सन् 1743 के आसपास रचित 'शतरंज-शतिका' में लगभग 100 दोहों के माध्यम से 64 खानों की बिसात, राजा, वजीर (फरजी), हाथी (फील), घोड़ा (असु), ऊंट (रुख) और प्यादे (पैदल) की चालों व शह-मात के नियमों को काव्यात्मक रूप दिया गया। यह खेल के साथ-साथ जीवन व राजनीति की कूटनीति का अमर आईना है।
यह दोहा उनकी सर्वोच्च विनम्रता का परिचायक है: "यदि आगे आने वाले मर्मज्ञ विद्वान इसे सराहें तो इसे कविता मानना, अन्यथा इसे राधा-कृष्ण के स्मरण का पावन बहाना समझ लेना।" यह दरबारी चापलूसी के दौर में अपनी रचना को जनता और परमात्मा की कसौटी पर परखने का अद्भुत नैतिक साहस था।
संवत 1799 (1742 ई.) में रचित 'छंदोर्णव पिंगल' छंदशास्त्र का महाविश्वकोश है। इसमें संस्कृत के जटिल वृत्तों के साथ-साथ दोहा, सोरठा, चौपाई, कवित्त, सवैया, छप्पय और कुंडलिया जैसे लोक-छंदों की मात्रा-गणना के ऐसे सटीक व सरल नियम बनाए गए जिसने आगे चलकर आधुनिक हिंदी को रास्ता दिखाया।
उन्होंने संकीर्ण क्षेत्रीय कट्टरता को नकारते हुए सिद्धांत दिया: "तुलसी गंग दुवौ भए, सुकविन के सरदार... सो मिलि कै भाषा भई, सबही सों पहिचान।" उन्होंने सिद्ध किया कि ब्रजभाषा में अवधी, भोजपुरी और बुंदेली के शब्दों को समाहित करने से भाषा कमजोर नहीं, बल्कि उत्तर भारत के जन-जन की भाषा बनती है।
नागरी प्रचारिणी सभा काशी द्वारा प्रमाणित 7 अमर ग्रंथ हैं: 1. रस-सारांश (1734 ई.), 2. छंदोर्णव पिंगल (1742 ई.), 3. काव्य-निर्णय (1746 ई.), 4. शृंगार-निर्णय (1750 ई.), 5. शतरंज-शतिका, 6. नामप्रकाश कोश (अमरकोश), और 7. विष्णुपुराण भाषा।
प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर 'काव्य-निर्णय' का रचनाकाल (1746 ई.), आश्रयदाता (बाबू हिंदूपति सिंह), प्रसिद्ध पंक्तियां ('आगे के सुकवि रीझिहैं...'), सर्वांग निरूपक आचार्यों में उनका स्थान, तुक-दोष पर उनके नियम, और शतरंज पर विश्व की पहली काव्यात्मक कृति (शतरंज-शतिका) से जुड़े प्रश्न प्रमुखता से पूछे जाते हैं।
जीवन के अंतिम पड़ाव में वे बिहार के शाहाबाद अंचल गए थे। ऐतिहासिक शोध के अनुसार लगभग सन् 1773 (संवत 1830) में कैमूर की पहाड़ियों के निकट भभुआ (कैमूर ज़िला, बिहार) में उन्होंने महाप्रस्थान किया। प्रतापगढ़ के टेंउगा की माटी में इस महान आचार्य की अमर कीर्ति आज भी जगमगा रही है।
- नागरी प्रचारिणी सभा (काशी): 'भिखारीदास ग्रंथावली' (दो खंड, संपादक: आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र)।
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल: 'हिंदी साहित्य का इतिहास' — रीतिकाल प्रकरण 3 (आचार्य भिखारीदास का सर्वांग निरूपण व शास्त्रीय समीक्षा)।
- डॉ. नगेन्द्र एवं डॉ. हरदयाल: 'हिंदी साहित्य का इतिहास' — मयूर बुक्स, नई दिल्ली (रीतिबद्ध काव्य-शास्त्र परंपरा)।
- उत्तर प्रदेश ज़िला गजेटियर (प्रतापगढ़): टेंउगा गाँव, सोमवंशी क्षत्रिय राजा पृथ्वीपति सिंह व बाबू हिंदूपति सिंह का दरबारी इतिहास व राजस्व अभिलेख।
- प्रतापगढ़ HUB फ़ील्ड रिसर्च व सर्वेक्षण: टेंउगा (ट्योंगा) गाँव, सई नदी कछार व स्थानीय कायस्थ परिवार वंशावली के प्रत्यक्ष ऐतिहासिक दस्तावेज।